सोनभद्र कत्लेआम की जमीन

उभ्भा (घोरावल), रॉबर्ट्सगंज से शशिकांत
फायरिंग में मारे गए एक व्यक्ति के घर पहुंचे एसपी सलमान ताज पाटिल
फायरिंग में मारे गए एक व्यक्ति के घर पहुंचे एसपी सलमान ताज पाटिल
पीटीआइ

उभ्भा (घोरावल), रॉबर्ट्सगंज से शशिकांत
पुश्तों की जमीन बचाने के लिए गोंड आदिवासियों पर तड़ातड़ गोली चलाने की हिम्मत भला प्रशासन की मिलीभगत के बिना कैसे संभव

याद कीजिए 1919 का जलियांवाला बाग और वह कुआं, जिसमें तड़तड़ाती गोलियों के बीच लोग जान बचाने कूदे तो अंग्रेजी राज की पुलिस ने कुएं में गोलियां दागनी शुरू कर दीं! अब आइए सौ साल बाद 2019 के सोनभद्र के उभ्‍भा गांव में कत्लेआम वाले खेतों के पास उस पुलिया के नीचे, जहां जान बचाने को छुपे लोगों को भूना गया! सौ साल पहले जलियांवाला नरसंहार आजादी की अलख जगाने का ऐसा प्रतीक बना कि अंग्रेजी राज ज्यादा वक्त तक कायम नहीं रह सका। लेकिन उभ्‍भा गांव कत्लेआम! बकौल मुख्यमंत्री आदित्यनाथ, “यह कांग्रेस के पापों का फल है।” अलबत्ता, उन्हें यह इल्हाम तब हुआ जब कत्लेआम के दो दिन बाद कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी दुखियारे आदिवासियों से मिले बिना न डिगने की ठान बैठीं। इस कत्लेआम में अपनी पुश्तों की जमीन बचाने के लिए 10 गोंड आदिवासी मौके पर ही ढेर कर दिए गए और 28 जख्मी हो अस्पतालों में पहुंच गए।

देश में राजनैतिक रूप से सबसे प्रभावी और आबादी में सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर के पास सोनभद्र जिले में आदिवासियों का यह कत्लेआम आजाद भारत की ऐसी विद्रूप कथा है जिससे आंखें चुराने के ढेरों करतब चलते रहते हैं। मगर इसे छोड़, आइए पहले उस दर्दनाक कथा को दोहरा दें, जिसकी भयावहता दिल दहला देती है।

आशंकाओं से भरी 17 जुलाई की सुबह 10 बजे उभ्भा गांव के लोग रोज की तरह खेतों में काम कर रहे थे। तभी प्रधान यज्ञदत्त 32 ट्रैक्टर-ट्राली में डेढ़-दो सौ लोगों के साथ वहां पहुंचा और जुताई शुरू कर दी। खेत पर काम कर रहे लोगों ने इसका विरोध किया तो लाठियां बरसने लगीं। खबर गांव पहुंची तो और लोग मौके की तरफ भागे। विरोध बढ़ता देख प्रधान के लोगों ने हथियार निकाल लिए और अंधाधुंध गोलियां चलानी शुरू कर दीं। जिसे गोली लगी वह खेत में ही लहूलुहान होकर गिर गया। जान बचाकर भागते लोगों को दौड़ा-दौड़ा कर और खोज-खोज कर गोली मारी गई। लोग कुछ दूरी पर छोटी-सी पुलिया और सबसे पास के घर में भागे तो वहां भी पीछाकर गोलियां दागी गईं। चारों ओर लाशें बिछ गईं। नतीजाः 10 लोग मौके पर ही जान गंवा बैठे और 28 गंभीर जख्मी। उन्हें बनारस के बीएचयू अस्पताल ले जाया गया। प्रधान के सात आदमियों को भी चोट लगी, जिनका इलाज जिला चिकित्सालय में किया गया।

प्रधान के आदमियों ने इस पुलिया के नीचे छिपे लोगों को निकालकर गोली मारी

नरसंहार की चश्मदीद अनारा डबडबाई आंखों से वह मंजर याद करती हैं, “गांव में किसी को यह अंदेशा नहीं था कि ऐसा भी हो सकता है। मेरे भाई का लड़का अपने पिता की जान तो नहीं बचा पाया, लेकिन कई लोगों की जान उसकी वजह से बची।” अनारा को भी छर्रे लगे हैं और उनके पति भी घायल हैं। अनारा के परिवार के भी तीन लोग इस फायरिंग में घायल हुए हैं।

लेकिन अंदेशा तो था, भले ऐसे कत्लेआम का न रहा हो और प्रशासन को भी जानकारी थी। गांव के ही रामराज ने बताया कि घटना वाले दिन उन्हें सुबह थाने से सिपाही का फोन आया था कि थाने आकर समझौता कर लो। रामराज ने सिपाही से कहा कि यह सिर्फ मेरा मामला नहीं है, पूरे गांव का मामला है और मैं नहीं आऊंगा। इसके बाद सिपाही ने कहा कि थाना प्रभारी ने तुम्हें बुलाया है, लेकिन रामराज ने थाने जाने से मना कर दिया। तब सिपाही ने कहा कि अगर कुछ हो गया तो मुझसे मत कहना। इसके बाद रामराज ने एसपी को फोन किया और उनको पूरी बात बताई। एसपी ने रामराज से कहा कि इंस्पेक्टर से बात करो, यह उन्हीं के स्तर का मामला है।

घटनास्थल से 50-60 मीटर दूर एकमात्र घर राम सिंह गोंड का है। वे कहते हैं, “यह घर नहीं होता तो और लाशें बिछ जातीं। गोली चलने के बाद भगदड़ मची तो हर कोई छिपने की जगह ढूंढ़ रहा था। लोग मेरे घर की तरफ आए। 25-30 लोगों की जान तो ऐसे बची।” एक अन्य चश्मदीद हेमा देवी के जेठ जवाहिर की मौत हो गई। हेमा देवी कहती हैं कि गांव में सबके रोजगार का साधन खेती या मजदूरी ही है। जेठ के जाने से परिवार पर कहर टूट पड़ा है। परिवार में वही एक कमाने वाले थे। 60 साल की एक अन्य बुजुर्ग महिला अतवरिया के पति रामधारी (65 वर्ष) की भी जान चली गई। अतवरिया अब गुमसुम हो गई हैं। उनके परिवार में एक ही लड़की थी, जिसकी शादी हो चुकी है। अब वे घर में अकेली रह गई हैं। वे कहती हैं कि सरकार की मदद से वे संतुष्ट नहीं हैं।

गोली से घायल व्यक्ति को इलाज के लिए वाराणसी के अस्पताल में लाया गया

बसंतलाल के छोटे भाई की पत्नी और उनके बेटे को भी गोली लगी है। उन्होंने बताया कि गोली से बचने के लिए कुछ लोग छोटी-सी पुलिया के नीचे छिप गए, लेकिन प्रधान के लोगों ने उनको वहां से निकाल कर गोली मारी। तीन पुश्तों से गांव की चौकीदारी कर रहे रामलाल बताते हैं कि वे 1982 से चौकीदारी कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि मूर्तिया ग्राम पंचायत के उभ्भा गांव में नरसंहार के पीछे 600 बीघा सोसाइटी की जमीन है। यह जमीन पहले मिर्जापुर के राजा विजयपुर की थी। उन्होंने अपनी बेटी की शादी राजा बड़हर राजपुर के यहां की, और भात खवाई में 28 गांव की जमीन उन्हें दे दी। राजा के जो कर्मचारी जमीन की देखरेख करते थे, उन्हें भी दे दिया। यह जमीन 1963 से बंजर के रूप में दर्ज है।

गांव के लोग बताते हैं कि 1955 में एक पूर्व आइएएस अधिकारी प्रभात मिश्रा ने तहसीलदार से फर्जी आदेश कराकर ग्राम समाज की 635 बीघा जमीन अपनी ‘आदर्श कृषि सहकारी समिति’ के नाम करा दी। जबकि तहसीलदार को 1955 में नामांतरण का अधिकार ही नहीं था। गांव के आदिवासी लोग 1947 के पहले से ही जमीन पर रहकर खेतीबाड़ी कर रहे हैं। प्रभात मिश्रा ने 6 सितंबर 1989 को यह जमीन पत्नी आशा मिश्रा और बेटी के नाम करा दी, जबकि सहकारी समिति की जमीन किसी व्यक्ति के नाम नहीं हो सकती। कब्जा नहीं मिलने के कारण प्रभात मिश्रा ने ग्राम प्रधान यज्ञदत्त को 100 बीघा जमीन बेच दी। ग्राम प्रधान ने अक्तूबर 2017 में इस जमीन को अपने और अपने रिश्तेदारों के नाम करवा लिया। इलाहाबाद हाइकोर्ट के एक अधिवक्ता बताते हैं कि ग्राम प्रधान को पहले से अंदेशा था कि गांववाले विरोध करेंगे और याचिका भी दाखिल कर सकते हैं। इस कारण हाइकोर्ट में उन्होंने ग्राम प्रधान की ओर से कैविएट भी फाइल की थी।

इसके बाद ग्रामीणों ने प्रधान के नाम जमीन की रजिस्ट्री का विरोध किया और एआरओ राजकुमार के यहां प्रार्थना-पत्र दिया, पर एआरओ ने इस साल 6 फरवरी को अपील खारिज कर दी। इसके बाद गांव वालों ने डीएम सोनभद्र के यहां अपील की, लेकिन उनकी अपील वहां भी खारिज हो गई। घटना वाले  दिन गांववाले अपील करने मिर्जापुर जा रहे थे। इस बात की जानकारी कोतवाली घोरावल में भी थी।

घोरावल तहसील के कानूनगो (राजस्व) बलवीर सिंह बताते हैं कि गांव उभ्भा के खसरा-खतौनी में तमाम खामियां होने के कारण 11 साल पहले राज्यपाल की अनुमति से सर्वे के लिए आदेश जारी हुआ। सर्वे के कारण सभी रिकॉर्ड 2011 में ही सहायक अभिलेख अधिकारी को सुपुर्द कर दिए गए, लेकिन आज तक गांव का सर्वे नहीं हो पाया है। घोरावल तहसील के 42 गांवों का सर्वे होना था, जिसमें से अभी 22 गांवों का ही सर्वे हो पाया है।

सोनभद्र के डीएम अंकित अग्रवाल के अनुसार, अधिकारियों और कर्मचारियों की कमी के कारण सर्वे नहीं हो सका है। इसके लिए पहले भी कई बार शासन को पत्र भेजा गया था। वे बताते हैं कि मामले में पहले भी दोनों तरफ से करीब 10 मुकदमे दर्ज कराए गए हैं। पुलिस की तरफ से भी मुकदमे किए गए थे। कुछ में चार्जशीट फाइल हो गई है। सिविल कोर्ट में भी मुकदमा किया गया था। विवादित जमीन की कुर्की के लिए पुलिस की ओर से एसडीएम कोर्ट में तीन माह पहले मुकदमा भी दाखिल किया गया था। उन्होंने बताया कि सोनभद्र जिले में राजस्व के करीब नौ हजार मुकदमे लंबित हैं।

सोनभद्र नरसंहार के बाद राजस्व परिषद के अध्यक्ष प्रवीर कुमार ने डीएम से स्थानीय प्रशासन की भूमिका की गहराई से पड़ताल करने और दोषी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की संस्तुति उपलब्ध कराने के लिए कहा है। यह भी कहा है कि मामले में भू-राजस्व नियमों की किसी तरह की विसंगति सामने आई है तो उसके निराकरण के प्रस्ताव भी उपलब्ध कराएं। हालांकि डीएम अंकित अग्रवाल ने किसी खास विसंगति के होने से इनकार किया है।

राजस्व विभाग के अधिकारियों के अनुसार, यह घटना बताती है कि लगातार सख्त निर्देशों के बावजूद स्थानीय प्रशासन भूमि विवाद के निस्तारण में लचर रवैया अपनाए हुए है। यह बात भी सामने आई है कि राजस्व कानूनों की समीक्षा के बाद बनाई गई नई राजस्व संहिता पुराने विवादों के हल में पूरी तरह कारगर साबित नहीं हो रही है।

ग्रामीणों की ओर से मुकदमा लड़ रहे वकील नित्यानंद द्विवेदी कहते हैं कि आदिवासियों को अगर समय रहते न्याय मिल गया होता तो यह नौबत नहीं आती। लेकिन पुलिस प्रशासन के अधिकारियों ने आदिवासियों की नहीं सुनी।

चुनार गेस्ट हाउस में पीड़ित परिवारों से मिलती कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी

सोनभद्र नरसंहार को लेकर विपक्ष ने 17 जुलाई को ही सरकार पर हमला शुरू कर दिया। कांग्रेस महासचिव और यूपी की प्रभारी प्रियंका गांधी और समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने ट्वीट करके प्रदेश में बिगड़ती कानून-व्यवस्था को लेकर सरकार पर निशाना साधा। 18 जुलाई से शुरू हुए मानसून सत्र में विपक्ष ने यह मुद्दा जोरशोर से उठाया। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इसके लिए पुरानी कांग्रेस सरकार को जिम्मेदार ठहरा डाला। उन्होंने कहा, “1955 में जब कांग्रेस की सरकार थी तो जमीन को गलत तरीके से आदर्श सोसायटी के नाम दर्ज कर दिया गया। 1985 तक यह जमीन सोसायटी के नाम थी। उसके बाद एक व्यक्ति के नाम चढ़ा दी गई और 2017 में वहीं के ग्राम प्रधान को बेच दी गई। वनवासी समाज के लोग इस जमीन पर काबिज थे। जब उन्हें बेदखल करने की बात आई तो यह घटना घटी। जब प्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी, तभी यह गलत काम हुआ।”

लेकिन कांग्रेस की विधायक आराधना मिश्रा ने कहा, “2017 में भी सोनभद्र मामला सामने आया था। तब तो भाजपा की सरकार थी, तब ऐक्शन क्यों नहीं लिया गया। आदिवासियों ने पुलिस को पूरा मामला बताया था, फिर भी पुलिस प्रशासन मौके पर नहीं पहुंचा। यह घटना सरकार और भूमाफियों की मिलीभगत का नतीजा है। मुख्यमंत्री को इस्तीफा दे देना चाहिए।” उन्होंने आरोप लगाया कि प्रधान को सत्ता का संरक्षण था।

अब प्रमुख सचिव, राजस्व की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय कमेटी बनाई गई है। यह 1955 से लेकर अब तक क्या कोताही बरती गई है, उस पर 10 दिन में रिपोर्ट देगी। वाराणसी जोन के अपर सचिव से भी 10 दिन में रिपोर्ट मांगी गई है।

विपक्ष के हमले के बाद मुख्यमंत्री आदित्यनाथ पीड़ितों से मिलने पहुंचे

18 जुलाई को ही कांग्रेस का एक प्रतिनिधिमंडल विधानमंडल दल के नेता अजय कुमार उर्फ लल्लू के नेतृत्व में सोनभद्र में पीड़ितों से मिला। उभ्भा गांव का दौरा कर लौटे अजय कुमार ने बताया कि आदिवासी समुदाय के लोगों ने लंबे समय से अपनी जान माल की सुरक्षा को लेकर मुख्यमंत्री तक से गुहार लगाई थी, जिसे अनदेखा किया गया। घटना के दो दिन पहले भी आदिवासियों ने प्रशासन को अवगत कराया, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। घटनास्थल पर जब भूमाफिया गोलीबारी कर रहे थे तब पीड़ितों ने पुलिस की मदद के लिए 100 नंबर पर फोन किया, लेकिन प्रशासन की मिलीभगत के चलते पुलिस देर से पहुंची। उन्होंने यह आरोप भी लगाया कि नरसंहार के बाद प्रशासन शवों को घुमाता रहा और बाद में पीड़ित परिवारों पर दबाव बनाकर दाह संस्कार करा दिया।

19 जुलाई को कांग्रेस की प्रदेश प्रभारी प्रियंका गांधी पीड़ितों से मिलने के लिए वाराणसी पहुंचीं। यहां उन्होंने बीएचयू में भर्ती घायलों से मुलाकात की, लेकिन उन्हें मिर्जापुर जिले में ही सोनभद्र जाने से रोक दिया गया। पुलिस प्रशासन ने सोनभद्र में धारा 144 लागू होने का हवाला दिया तो उन्होंने कहा कि अगर आप चाहें तो मुझे अकेले भी ले जा सकते हैं, लेकिन पुलिस प्रशासन नहीं माना। बाद में उन्हें हिरासत में लेकर चुनार गेस्ट हाउस ले जाया गया। वहां प्रियंका गांधी अपने इस निर्णय पर अडिग रहीं कि "बिना पीड़ितों से मिले नहीं जाऊंगी।" भीषण गर्मी में गेस्ट हाउस की बिजली भी काट दी गई, जिस कारण कांग्रेस नेताओं को अंधेरे में ही रात गुजारनी पड़ी। हालांकि प्रशासन ने कहा कि रूटीन प्रक्रिया के तहत बिजली काटी गई थी। रात में करीब डेढ़ बजे मंडल के आला अधिकारी गेस्ट हाउस पहुंचे और प्रियंका गांधी को मनाने की कोशिश की, लेकिन वह नहीं मानीं। दूसरे दिन उभ्भा गांव के लोग चुनार गेस्ट हाउस पहुंचे। इस दौरान प्रियंका भावुक हो गईं और उन्होंने पीड़ितों की हरसंभव मदद का आश्वासन दिया। कहा कि पार्टी की ओर से पीड़ितों को 10-10 लाख रुपये दिए जाएंगे। उन्होंने मांग की कि सरकार हर पीड़ित परिवार को 25 लाख रुपये मुआवजा और जमीन का पट्टा दे।

प्रियंका गांधी के लौटने के अगले दिन मुख्यमंत्री आदित्यनाथ ने उभ्भा गांव का दौरा किया। उन्होंने घटना के लिए सपा और कांग्रेस को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने कहा कि घटना का आरोपी यज्ञदत्त समाजवादी पार्टी का कार्यकर्ता है। वह समाजवादी पार्टी में सक्रिय भूमिका में है। उसका भाई बीएसपी नेता है। मुख्यमंत्री ने मृतकों के परिजनों को 18.50 लाख रुपये और घायलों को 2.50 लाख रुपये देने, गांव में पुलिस चौकी, अग्निशमन केंद्र, आंगनबाड़ी खोलने और बुजुर्गों को पेंशन देने की घोषणा की।

कुल मिलाकर, मध्य प्रदेश की सीमा और मिर्जापुर जिले की सीमा से सटे सोनभद्र जिले की मूर्तिया ग्राम पंचायत का उभ्भा गांव इस बात की नजीर बन गया है कि किस प्रकार पुलिस प्रशासन की मिलीभगत से कागजों में हेराफेरी करके लोगों की जमीनें हड़पी जा रही हैं। अपनी ही जमीन बचाने के लिए कोर्ट कचहरी के चक्कर काटते-काटते लोग या तो हिम्मत हार जा रहे हैं या मौत के घाट उतार दिए जा रहे हैं। उभ्भा गांव के लोगों की भी बदनसीबी थी कि उन्होंने बाप-दादा के जमाने से जोत रहे खेतों को बचाने का प्रयास किया, लेकिन अंधाधुंध फायरिंग में उन्हें अपने 10 लोगों की जान गंवानी पड़ी।

प्रदेश में भूमि विवाद से जुड़े पांच वर्ष से अधिक पुराने मामलों की राजस्व परिषद ने पड़ताल कराई तो पता चला कि कुल 77,377 मामले लंबित हैं। बलिया जिले में सबसे ज्यादा 9,421, प्रतापगढ़ में 8,436, आंबेडकरनगर में 6,072, गोंडा में 5,005 और जौनपुर में 4,258 मामले लंबित हैं। मंडल के हिसाब से लखनऊ, वाराणसी और आगरा की स्थिति सबसे खराब बताई जाती है। लेकिन सवाल यही है कि क्या आदिवासियों का यह नरसंहार ऐसे ही आया-गया होकर रह जाएगा।

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