बेमौत मारने के तौर-तरीके

हरीश मानव
हिरासत में मौत
हिरासत में मौत

हरीश मानव
हाल के वर्षों में हिरासत में मौतों का सिलसिला उसी तरह बढ़ता जा रहा है, जैसे लिंचिंग की वारदातें! मगर सरकार के कान पर जूं नहीं रेंगती, कानून बनाने और पुलिस सुधार की सिफारिशें और अदालती आदेश महज गर्द फांकने को अभिशप्त

जब-तब सुर्खियां चीखती हैं और फिर सन्नाटा छा जाता है! ठीक उसी तरह जैसे हिरासत में यातना से उठती चीत्कार सांसों के साथ ही थम जाती है और रोते-बिलखते परिजन मानो अपनी लाचारी को स्वीकार करके जिंदगी के बिखरे टुकड़े समेटने में जुट जाते हैं। नेता आते हैं, न्याय करने के वादे पर स्‍थापित राज्य व्यवस्‍था में हरकत होती है, कुछ तबादले और मुअत्तली होती है, जांच बैठती है। फिर सब सामान्य। सुर्खियां अगली मौत का इंतजार करने लगती हैं। यह कथा न जाने कब से चली आ रही है। बेशक, यह आरोप कोई क्यों मढ़े कि कुछ होता नहीं है। जी, दशकों से कई आयोगों की सिफारिशें सरकारी दफ्तरों की गर्द फांक रही हैं और पुलिस यातना तथा कत्ल की कथाएं बेताल की तरह फिर नमूदार हो जाती हैं, बल्कि उनकी चीत्कारों का सिलसिला तेज होता जा रहा है। हों भी क्यों नहीं, जब पुलिस को एन्काउंटर से लेकर नए-नए खौफनाक अधिकारों से लैश करना ही 'नया सामान्य' (नया चलन) बन गया है, भले संवैधानिक हिदायतें लोगों के अधिकारों में निरंतर विस्तार की शर्तें रखती हों। मगर उसकी किसे परवाह! फसाना चाहे जो हो पर हकीकत तो यही है कि हाल के दौर में पुलिस हवालात से लेकर जेलों तक में गरीब-लाचार बंदियों के मारे जाने का सिलसिला उसी तरह जोर पकड़ने लगा है, जैसे सरेआम पीट कर मार डालने की लिंचिंग की घटनाएं। दोनों में ही नैतिक बाधाओं और विवेक की अनदेखी करने की दलीलें और बहाने ढेरों हैं।

संसद में 16 जुलाई को गृह मंत्रालय के जवाब के मुताबिक 2015-16 से 2018-19 के चार वर्षों में 7,295 लोग हिरासत में मौत के शिकार हुए। 2018-19 में हिरासत में मौतें सबसे ज्यादा 1,933 हुईं, जो 2012-13 से अब तक सर्वाधिक हैं। इनमें 1,797 न्यायिक हिरासत में और 136 पुलिस हवालात में हुई हैं। देश भर में रोजाना औसतन पांच मौतें हिरासत में हो रही हैं। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने 2018 में पुलिस हिरासत और जेल में मौत के 1,680 मामले दर्ज किए। इनमें सबसे ज्यादा 365 मामले उत्तर प्रदेश, 127 पश्चिम बंगाल, 118 पंजाब और इतने ही महाराष्ट्र, 107 मध्य प्रदेश और 102 मामले बिहार के हैं। एशियन सेंटर फॉर ह्यूमन राइट्स (एसीएचआर) की रिपोर्ट के मुताबिक 1 अप्रैल 2017 से 28 फरवरी 2018 तक 11 महीने में हिरासत में 1,674 मौतें हुईं।

हिरासत में होने वाली कुल मौतों में 90 फीसदी से ज्यादा जेल में होती हैं। एनएचआरसी और एसीएचआर के 2018-19 के आंकड़े अभी जारी नहीं हुए हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के तो आंकड़े ही जारी नहीं किए गए हैं। इसलिए मानवाधिकार संगठनों ने संख्या बढ़ने का अंदेशा जताया है। इसकी गवाही हाल की घटनाएं चीख-चीख कर दे रही हैं।

 : सबसे ताजा मिसाल राजस्‍थान के चुरू जिले की है। गांव धीरासर के कालूराम चौधरी की भेड़-बकरियां चराने वाले सोनपालसर गांव के 25 वर्षीय नेमीचंद को चोरी के आरोप में पुलिस 30 जून को पकड़ कर ले गई। पुलिस ने बाद में उसकी भाभी को भी उठा लिया। 6 जुलाई को रात दस बजे पुलिस की गाड़ी उसकी लाश लेकर लौटी और परिजनों को परंपरा के विरुद्ध रात के अंधेरे में ही अंतिम संस्कार करने पर मजबूर किया गया। आरोप यह भी है कि उसकी भाभी के साथ गैंगरेप किया गया और उसके नाखून तक उखाड़ लिए गए।

नेमीचंद के पिता निरानाराम नायक ने आउटलुक को बताया, “पुलिस के दबाव में 6 जुलाई को रात करीब 12 बजे नेमीचंद का दाह संस्कार किया गया। पुलिस ने बैंक खाते का नंबर भी मांगा और कहा कि उसमें कुछ पैसे डाल देंगे। लेकिन परिवार का कोई बैंक खाता ही नहीं है। रात करीब तीन बजे जाते-जाते पुलिसवाले कह गए कि बहू को लेने कल थाने आ जाना। अगले दिन बड़ा बेटा सीताराम थाने गया। वहां बताया गया कि उसकी पत्नी को दूसरे थाने में ले गए हैं और शाम को घर पहुंचा देंगे। शाम को पुलिस उसे लेकर आई तो वह अधमरी हालत में थी। उसी दिन इलाज के लिए उसे 52 किलोमीटर दूर सरदारशहर अस्पताल लेकर गए। हालत खराब होने के कारण उसको चूरू के जिला अस्पताल भेज दिया गया। वहां से जयपुर एसएमएस अस्पताल ले गए, जहां अभी उसका इलाज चल रहा है।"

एसएमएस अस्पताल की जांच रिपोर्ट में कहा गया है कि रेप नहीं हुआ है। आउटलुक की टीम ने वहां महिला की हालत देखी। उसके नाखून निकाले गए हैं। लेकिन सरदारशहर के कांग्रेसी विधायक भंवरलाल शर्मा ने विधानसभा में कहा कि महिला के नाखून ऐसे ही हैं, उनको उखाड़ा नहीं गया है। थानाधिकारी रणवीर सिंह समेत छह पुलिसकर्मियों को निलंबित कर दिया गया है। लेकिन आउटलुक के प्रिंट में जाने तक किसी के खिलाफ रेप या मर्डर का केस दर्ज नहीं हुआ है। पीड़ित के घर न तो अभी तक स्थानीय कांग्रेस विधायक भंवरलाल शर्मा गए हैं और न ही चुरू के भाजपा सांसद राहुल कास्वान।

वह क्यों छीन लिया गया! चुरू में हिरासत में मौत के ‌शिकार नेमीचंद के पिता निरानाराम नायक (बीच में), छोटा भाई शंकरलाल (भगवा दुपट्टे में) और बड़ा भाई जगदीश (सफेद दुपट्टे में)

: उत्तराखंड के उधमसिंह नगर में 11 जुलाई 2019 को 12वीं के छात्र धीरज सिंह राणा की थाने में मौत हो गई। पुलिस का कहना है कि चोरी के आरोप में धीरज को बुधवार को हिरासत में लिया गया था, थाने में उसने अपनी शर्ट से फंदा बनाकर फांसी लगा ली। धीरज के घरवालों का कहना है कि पुलिसवालों के टॉर्चर की वजह से उसकी जान गई। उसके शरीर पर चोट के भी निशान थे। उसे अस्पताल भी नहीं ले जाया गया, उसका शव सीधे पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया। इस मामले में पांच पुलिसवालों के खिलाफ आपीसी की धारा 302 और धारा 342 के तहत केस दर्ज किया गया है।

: 22 जून 2019 की शाम 5 बजे पंजाब के नाभा की अति सुरक्षित जेल में मोहिंद्र पाल बिट्टू की वह आखिरी चाय थी। उसी दिन दोपहर बिट्टू की अपने बेटे अरमिंदर से मुलाकात भी आखिरी थी। उस पर धार्मिक ग्रंथों की बेअदबी का आरोप था। बिट्टू से मुलाकात के दौरान उसके बेटे अरमिंदर ने बगैर सिक्योरिटी गार्ड के अपने पिता को बैरक से आते-जाते देखा तो उसे चिंता हुई। जेल में पिता से मिलने के बाद अरमिंदर कोटकपुरा जा रहा था कि बीच रास्ते में उसे पिता के कत्ल की खबर मिली।

: 5 जून को उत्तर प्रदेश के बहराइच स्थित हुजूरपुर में पुलिस ने चोरी के आरोप में अशोक सोनी को हिरासत में लिया। केशरी सिंह नाम के जिस व्यक्ति के घर चोरी हुई थी, अशोक उसी के यहां काम करता था। पूछताछ के दौरान शाम को उसकी हालत बिगड़ गई तो पुलिसवालों ने चिरैयाटांड स्वास्थ्य केंद्र में भर्ती करवाया। वहां डॉक्टरों ने उसे जिला अस्पताल रेफर कर दिया, जहां उसकी मौत हो गई। घटना के बाद हुजूरपुर के प्रभारी निरीक्षक प्रमोद कुमार सिंह को निलंबित और अपराध निरीक्षक राकेश पांडेय को लाइन हाजिर कर दिया गया। अब एसपी ग्रामीण कहते हैं, “पोस्टमार्टम रिपोर्ट में कुछ नहीं था। अशोक के परिजनों ने एफीडेविट दिया है कि अशोक को बीमारी थी और उसे दौरे भी आते थे। पुलिस के खिलाफ कोई शिकायत नहीं है।”

: 6-7 अप्रैल की मध्य रात को लुधियाना की जनकपुरी पुलिस चौकी के हवालात में 22 वर्षीय करण की मौत हो गई थी। उसके पिता बूटा राम घर के बाहर खड़े ऑटो रिक्शा की ओर इशारा करते हुए आंसू पोंछते कहते हैं, “इसे चलाने वाला, कमाने वाला नहीं रहा।” कबाड़ खरीद-बेचकर गुजर-बसर करने वाले बूटा राम के घर में दूसरा कमाने वाला करण ही था। लुधियाना-चंडीगढ़ रोड स्थित प्रेम नगर भामियां में रहने वाले बूटा राम ने आउटलुक को बताया, “3 अप्रैल को करण और उसके दौस्त गौतम को मोटरसाइकिल चोरी के आरोप में कुछ लोगों ने पकड़ कर पुलिस के हवाले कर दिया था। पुलिस ने 4 अप्रैल को कहा कि अगले दिन करण को छोड़ देंगे, लेकिन उस दिन भी नहीं छोड़ा। 6 अप्रैल को बेटे को छुड़वाने के लिए पूरे दिन चौकी में बैठे रहे। 7 अप्रैल की सुबह पुलिस घर आई और सिविल अस्पताल पहुंचने को कहा, जहां बेटे की मौत की खबर मिली। पुलिस ने बताया कि लॉकअप में जहरीला पदार्थ निगलने की वजह से करण की मौत हुई है।” करण के परिजनों का सवाल है कि लॉकअप में उसके पास जहरीला पदार्थ कहां से आया? राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के निर्देश पर जांच जारी है।

बेटे करण की मौत का दर्द बयां करते पिता बूटा राम

: 18 मई को मुक्तसर के 22 वर्षीय जसपाल को फरीदकोट पुलिस की सीआइए विंग ने गुरुद्वारे से उठा लिया। हिरासत में उसी रात जसपाल की मौत हो गई। जसपाल को हिरासत में लेने वाले पुलिसकर्मी पर लाश को गायब करने का आरोप लगा तो पुलिसकर्मी ने भी खुदकशी कर ली। इसके बाद जसपाल की मौत का मामला उलझ गया। हिरासत में मौत का यह मामला ध्यान में न लाए जाने पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने पंजाब पुलिस महानिदेशक को नोटिस भेजा है।

: 21 जनवरी 2019 को लखनऊ के किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी अस्पताल में 38 साल के अब्दुल रहीम की मौत हुई। परिजनों का आरोप है कि जेल में ‘थर्ड डिग्री टॉर्चर’ से अब्दुल की मौत हुई है। मार-पीट के घाव उसकी पीठ पर थे। ऑटो रिक्शा चोरी के आरोप में 14 जनवरी को हिरासत में लिए जाने के अगले दिन अब्दुल को गोसाईंगंज जेल भेजा गया। कोर्ट में पेशी से पहले ठाकुरगंज के अस्पताल में अब्दुल की मेडिकल जांच हुई थी। तब उसके शरीर पर कोई जख्म नहीं था।

देश में पुलिस और न्यायिक हिरासत में मौत के मामलों की संख्या बढ़ती जा रही है। पुलिस हिरासत और जेल में प्रताड़ना की रोकथाम के लिए देश में अभी तक अलग कानून लागू नहीं हो पाया है। मानवाधिकार संगठनों का मानना है कि हिरासत में हुई मौत के मामलों में पुलिस के अलावा कोई और चश्मदीद गवाह नहीं होता, इसलिए पुलिसकर्मियों के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज करना मुश्किल होता है। कोई स्वतंत्र, गैर-पुलिस गवाह नहीं होने के चलते न्यायालय में पुलिसकर्मियों के खिलाफ अपराध साबित करना बेहद मुश्किल हो जाता है। सुप्रीम कोर्ट ने भी पुलिस और न्यायिक हिरासत में प्रताड़ना के चलते बढ़ती मौत के मामलों पर चिंता जताई है। एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली बेंच ने 8 जुलाई 2019 को केंद्रीय गृह मंत्रालय, राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों को नोटिस जारी कर हरेक जिले में मानवाधिकार कोर्ट स्थापित करने का आदेश दिया। कोर्ट ने मानवाधिकार रक्षा कानून, 1993 की धारा 30 और 31 के तहत यह आदेश दिया।

करण की तसवीर लिए उसकी मां

1980 से दिल्ली में कार्यरत मानवाधिकार संगठन पीपुल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स (पीयूडीआर) ने मार्च 2019 में जारी अपनी रिपोर्ट में गंभीर सवाल उठाए हैं। इसके मुताबिक, हिरासत में दी जाने वाली प्रताड़ना पुलिस के नियमित कार्य का हिस्सा बन चुकी है। हिरासत में हो रही मौतों को या तो ‘आत्महत्या’ या फिर पुलिस हिरासत से भागने की कोशिश के दौरान हुआ ‘हादसा’ बताया जाता है। रिपोर्ट के अनुसार 2018 में दिल्ली के आदर्श नगर थाने में सोमपाल, करावल नगर थाने में दीपक और नारायणा थाने में दलबीर सिंह की मौतों को उपलब्ध तथ्यों के आधार पर ना तो ‘आत्महत्या’ और न ही पुलिस हिरासत से ‘भागने’ की नाकाम कोशिश के रूप में साबित किया जा सका।

मामूली झगड़े और छोटी-मोटी चोरी के आरोप में पकड़े गए लोग भी पुलिस हिरासत या जेल में ज्यादती के चलते मौत के शिकार हो रहे हैं। जिम्मेदार पुलिस या जेलकर्मी को कड़ी सजा देने के बजाय सिर्फ लाइन हाजिर या निलंबित कर दिया जाता है। हालांकि गुजरात के बर्खास्त आइपीएस संजीव भट्ट का मामला अपवाद है। जामनगर कोर्ट ने भाजपा कार्यकर्ता प्रभुदास वैश्‍नानी की हिरासत में मौत के 30 साल पुराने मामले में उन्हें उम्रकैद की सजा दी। कोर्ट ने यह फैसला 20 जून 2019 को सुनाया। गौरतलब है कि संजीव भट्ट ने 2002 के गुजरात दंगों के मामले में तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दिया था। इस पर विवाद भी उठ खड़ा हुआ है।

2010 में पूर्व कानून मंत्री अश्वनी कुमार की अध्यक्षता वाली राज्यसभा की प्रवर समिति ने हिरासत में प्रताड़ना के कारण होने वाली मौत के मामले में दोषियों को आजीवन कारावास या मृत्युदंड जैसी सजा का प्रावधान किए जाने की सिफारिश की थी। इन सिफारिशों को नौ साल बाद भी संसद की मंजूरी नहीं मिल सकी है।

हिरासत में प्रताड़ना पर अंकुश लगाने के मकसद से पहली बार 26 अप्रैल 2010 को लोकसभा में प्रिवेंशन ऑफर टॉर्चर बिल पेश किया गया था। सदन ने इसे 6 मई 2010 को पास किया। फिर 31 अगस्त 2010 को इसे राज्यसभा की प्रवर समिति को भेजा गया। समिति ने दिसंबर 2010 में अपनी सिफारिशें सौंप दीं। इसने कहा कि भारत ने 1997 में संयुक्त राष्ट्र के कन्वेंशन पर दस्तखत किए थे। बिल में संशोधन होने चाहिए। लेकिन सरकार ने इस दिशा में कुछ नहीं किया। मई 2014 में लोकसभा भंग होने पर बिल भी बेमानी हो गया।

विधि आयोग ने अक्टूबर 2017 में अपनी 273वीं रिपोर्ट में हिरासत में प्रताड़ना के खिलाफ सिफारिशें दीं। इसने कहा कि टॉर्चर के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र के कन्वेंशन को लागू करना चाहिए। यह साबित करना पुलिस अधिकारी की जिम्मेदारी हो कि वह टॉर्चर में शामिल नहीं है। दोषी अधिकारियों को कड़ी सजा दी जाए और जुर्माना लगाया जाए। प्रावधान यह है कि टॉर्चर से पीड़ित व्यक्ति को मुआवजा मिले, जो कोर्ट तय करेगा। मुआवजा तय करते समय कोर्ट पीड़ित की सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि भी देखे। आयोग ने रिपोर्ट में प्रिवेंशन ऑफ टॉर्चर बिल 2017 का ड्राफ्ट भी दिया।

अरुणाचल से कांग्रेस के पूर्व सांसद निनोंग इरिंग ने 28 दिसंबर 2018 को लोकसभा में एक निजी विधेयक 'द प्रिवेंशन ऑफ कस्टोडियल टॉर्चर (पीसीटी) बिल, 2018' पेश किया था। इसमें टॉर्चर के दोषी अधिकारियों को तीन से सात साल तक सजा और जुर्माने का प्रावधान था। अगर टॉर्चर से मौत हो जाती है तो अधिकारी को आजीवन कारावास या मौत की सजा का भी प्रावधान था। जल्दी ट्रायल के लिए सेशन कोर्ट में एक साल में ट्रायल पूरा करने की बात थी, लेकिन टॉर्चर की शिकायत तीन महीने में करने का प्रावधान था। मई 2019 में सोलहवीं लोकसभा भंग होने के साथ यह बिल भी बेमानी हो गया।

अश्वनी कुमार ने 2016 में सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका भी दायर की। जनवरी में केंद्र सरकार ने हलफनामा दिया कि प्रिवेंशन ऑफ टॉर्चर बिल 2017 पर फरवरी 2018 में सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की राय मांगी गई है। लेकिन इस साल जनवरी तक सिर्फ आठ राज्यों ने जवाब दिया। तब कोर्ट ने तीन हफ्ते में राज्यों को जवाब भेजने का आदेश दिया। अश्वनी कुमार ने आउटलुक से कहा कि पुलिस हिरासत और जेल में आए दिन लोग मर रहे हैं, लेकिन केंद्र सरकार बिल नहीं ला रही है।

उन्होंने बताया कि संसदीय समिति, मानवाधिकार आयोग और विधि आयोग ने प्रस्तावित कानून के पक्ष में अपनी सिफारिशें दे दी हैं। ज्यादातर राज्य भी इसके पक्ष में अपनी राय भेज चुके हैं। भारत ने भी 1997 में यूएन कन्वेंशन अगेंस्ट टॉर्चर (यूएनसीएटी) पर हस्ताक्षर किए थे। भारत में अभी तक इस पर अमल नहीं हो सका है। लेकिन देश के राजनैतिक प्रतिष्ठान की पहली प्रतिबद्घता जैसे दुष्यंत कुमार की पंक्तियों को साकार करना ही लगती है कि सरकार को फिक्र है बहुत मगर आराम के साथ! और तब तक हर गरीब और मजबूर बेमौत मरने को अभिशप्त है।

चुरू (राजस्‍थान) से रामगोपाल जाट और लखनऊ से शशिकांत

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