अपराध क्यों बेइंतहा

अक्षय दुबे और प्रतीक वर्मा
दिल्ली में बढ़ रहे अपराध के मामले
दिल्ली में बढ़ रहे अपराध के मामले

अक्षय दुबे और प्रतीक वर्मा
देश की राजधानी दिल्ली में दिन-ब-दिन अपराध के बढ़ते मामले और आंकड़े यह पुख्ता कर रहे हैं कि यह 'क्राइम कैपिटल' बनती जा रही है, फिर भी पुलिस-प्रशासन इसे झुठलाने में जुटा

लूट, स्नैचिंग, चोरी, हत्या...सिर्फ 17 मई से लेकर 1 जुलाई तक डेढ़ महीने में ही 50 से ज्यादा गोली चलने की घटनाएं! यह सूरत-ए-हाल कहीं और का नहीं, बल्कि देश की राजधानी दिल्ली का है, जहां से पूरे हिंदुस्तान की हुकूमत चलती है। लेकिन हुकूमत बेपरवाह है और लोग खौफजदा। अपराध पर अंकुश के लिए जिम्मेदार दिल्ली पुलिस तो मानने को ही तैयार नहीं है कि अपराध बढ़े हैं। हालांकि एक पर एक संगीन वारदातें पिछले 30-35 दिन में ही ऐसी होती रही हैं कि दहशत घर करने लगी है। अपराध भी दिल्ली के किसी खास इलाके या सीमावर्ती क्षेत्रों तक ही सीमित नहीं हैं। दक्षिण में बारापुला फ्लाईओवर से लेकर मध्य दिल्ली के करोलबाग और पश्चिमी दिल्ली के द्वारका से लेकर पूर्वी दिल्ली के कल्याणपुरी तक किसी न किसी की हत्या या गोली मारने की खबरें रोजाना सुर्खियां बनती रही हैं। दिल्ली के विकासपुरी, मुखर्जी नगर, रोहिणी जैसे इलाकों में लूट, स्नैचिंग, चोरी और हत्या जैसी वारदातों में काफी इजाफा देखा गया। गंभीर किस्म के अपराधों में उछाल का आलम यह है कि पिछले 23 जून को सिर्फ 24 घंटे के भीतर नौ लोगों की हत्या का मामला सामने आया।

हैरानी यह है कि अधिकतर वारदातें सार्वजनिक स्थानों जैसे- सड़क, दफ्तर, रेस्तरां और दुकानों में हुई हैं। ऐसी घटनाओं में सिर्फ पेशेवर बदमाश ही नहीं, बल्कि कई नाबालिगों के नाम भी सामने आए।

किसका दरवाजा खटखटाएं

अपराधों का सिलसिला जारी है। 1 जुलाई की रात नजफगढ़ के मितराऊं में चार लोगों को गोली मार दी गई। गोली मारने के बाद अपराधी फरार हो गए। इससे पहले 25 जून को नरेला इलाके में 2 बाइक सवार बदमाशों ने एक आढ़ती को गोली मारकर उससे पैसों से भरा बैग लूट लिया। पिछले महीने द्वारका मोड़ मेट्रो स्टेशन के नीचे दिन-दहाड़े बीच सड़क पर फिल्मी अंदाज में गैंगवार हुई। इन घटनाओं से अंदाजा लगाया जा सकता है कि दिल्ली के लोग किस तरह अपराधियों के खौफ तले जीने को बेबस हैं। दिल्ली पुलिस के स्पेशल सेल के पूर्व डीसीपी एल.एन. राव भी मानते हैं कि दिल्ली में पिछले कुछ दिनों में एकाएक आपराधिक घटनाओं में वृद्धि देखी गई है। राव ने आउटलुक को बताया, “दिल्ली में पिछले कुछ दिनों में लगातार क्राइम में वृद्धि हुई है। अधिकांश मामले गैंगवार या आपसी रंजिश के हैं। पुलिस को इंटेलिजेंस नेटर्वक को सक्रिय रखना चाहिए ताकि यह पता चल सके कि कौन से गैंग एक्टिव हैं और उन पर कार्रवाई की जा सके।”

लेकिन दिल्ली पुलिस राजधानी में अपराध बढ़ने की बात से साफ इनकार करती है। दिल्ली पुलिस के अतिरिक्त प्रवक्ता अनिल कुमार मित्तल ने बताया कि पिछले कुछ वर्षों में अपराध में काफी कमी आई है। केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा भी अपराध बढ़ने की बात को सिरे से नकार रही है। नई दिल्ली से सांसद मीनाक्षी लेखी कहती हैं, “कौन कहता है कि दिल्ली में अपराध बढ़ रहे हैं? क्या एनसीआरबी के आंकड़े या पुलिस की रिपोर्ट से ऐसा साबित होता है?” हालांकि, आंकड़े अलग ही कहानी बयान करते हैं।

दिल्ली पुलिस केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन है। ऐसे में दिल्ली में सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी (आप)भी बढ़ते अपराध पर केंद्र को घेरने में कोई कसर नहीं छोड़ रही है। आप से राज्यसभा सांसद संजय सिंह ने आउटलुक को बताया कि दिल्ली में गैंगवार की घटनाएं भी बढ़ी हैं। सड़कों पर खुले आम गोलियां चल रही हैं। पिछले एक साल में 2043 बलात्कार की घटनाएं हुई हैं। अपराध के मामलों में बढ़ोतरी का मुद्दा 24 जून को राज्यसभा में भी उठा और आप के सांसद संजय सिंह ने कहा कि दिल्ली पुलिस केंद्र सरकार के अधीन है और बढ़ते अपराध की वजह से राजधानी की छवि खराब हो रही है।

फिर सवाल उठता है कि आखिर अपराध में इजाफा होने के पीछे के कारण क्या हैं? दिल्ली पुलिस के पूर्व ज्वाइंट कमिश्नर एस.बी.एस. त्यागी का मानना है कि अपराधियों में दंड का भय कम होता जा रहा है। त्यागी अपराध को कम करने में सिर्फ पुलिस की ही भूमिका नहीं देखते। उन्होंने आउटलुक से बताया,  “रूल ऑफ लॉ कायम करने में सिर्फ पुलिस की ही भूमिका नहीं होती, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया का भी योगदान होता है। सजा मिलने में लंबा वक्त लगता है जिससे अपराधियों के मन में डर पैदा नहीं हो पाता।”

वहीं, एल.एन. राव आसानी से मिलने वाले अवैध हथियार, प्रवासी लोगों का रिकॉर्ड न होना, बेरोजगारी, पुलिस रिफॉर्म का लागू न होना और सुस्त न्याय प्रणाली को अपराध बढ़ने के पीछे बड़ी वजह मानते हैं। राव और त्यागी दोनों दिल्ली में प्रवासी लोगों को भी अपराध बढ़ने की एक वजह मानते हैं। उनका कहना है कि दिल्ली में प्रवासी बहुत आते हैं और इनमें कुछ सुबह आकर अपराध को अंजाम देते हैं और शाम को वापस चले जाते हैं, पुलिस के पास उनके रिकॉर्ड नहीं होने की वजह से उन्हें पकड़ना काफी मुश्किल होता है।

दिल्ली पुलिस के नियंत्रण का मसला

दूसरे राज्यों में पुलिस राज्य सरकार के अधीन होती है। लेकिन दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा हासिल नहीं होने से पुलिस केंद्र सरकार के अधीन है। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या दिल्ली पुलिस का गृह मंत्रालय के अधीन होना भी यहां के कानून व्यवस्था को प्रभावित करता है? पूर्व डीसीपी एल.एन. राव कहते हैं, “पुलिस का गृह मंत्रालय के तहत होना फायदेमंद है। दिल्ली पुलिस पर राजनैतिक दबाव बाकी राज्यों के मुकाबले कम है, जिस वजह से दिल्ली के विधायक और सांसद पुलिस के काम में कोई दखलंदाजी नहीं करते।” लेकिन दिल्ली की आप सरकार पुलिस के राजनैतिक इस्तेमाल की हाल में कई घटनाओं का जिक्र करती है, जिसमें जेएनयू मामले में दाखिल किया गया आरोप-पत्र और आप के मंत्रियों-विधायकों के खिलाफ मामले भी हैं, जिन्हें अदालत में पुष्ट नहीं किया जा सका।

पूर्व ज्वाइंट कमिश्नर एस.बी.एस. त्यागी यूपी-बिहार जैसे राज्यों का हवाला देते हुए सवाल उठाते हैं कि इन राज्यों में पुलिस राज्य सरकार के अंतर्गत काम करती है लेकिन वहां क्या स्थिति है?

नाबालिगों में बढ़ता आकर्षण

दिल्ली में घटित आपराधिक घटनाओं में कई किशोरों के नाम भी सामने आए। इन नाबालिगों की उम्र महज 16-18 के बीच है। 21 मई को हुई सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म टिकटॉक पर बहुचर्चित मोहित मोर की हत्या की घटना में गिरफ्तार किए गए बंदूकधारियों में से एक की उम्र महज 17 साल की है। वह गैंग में खुद को साबित करने के लिए इस हमले में शामिल हुआ था। एल.एन. राव कहते हैं कि यह उम्र ही ऐसी होती है कि नाबालिग जल्दी प्रभावित हो जाते हैं। युवा आसानी से पैसे और जल्दी शोहरत कमाने के चक्कर में इस तरह के अपराध करने लगते हैं। इनमें टीवी, फिल्म और इंटरनेट का भी खासा योगदान होता है। सेंटर फॉर सोशल रिसर्च की निदेशक डॉ रंजना कुमारी अपराध बढ़ने के पीछे आर्थिक कारणों को भी देखती हैं। उन्होंने आउटलुक को बताया कि देश में इन दिनों गरीब जनता और मध्यम वर्ग भारी आर्थिक दबाव और बेरोजगारी से जूझ रहे हैं। आर्थिक विषमता बड़ी भूमिका निभा रही है।

डॉ. रंजना आगे कहती हैं, “हमारे शासक इन चिंताजनक स्थितियों के बावजूद समाधान के लिए कोई गंभीर प्रयास करते दिखाई नहीं दे रहे हैं।” लेकिन सामाजिक कार्यकर्ता और लेखिका मधु किश्वर अपराध के पीछे आर्थिक कारणों के बजाय पुलिस के रवैए को जिम्मेदार ठहराती हैं। उनका कहना है, “अगर अपराध के पीछे आर्थिक कारण होते तब अधिकांश गरीब अपराधी बन चुके होते। पुलिस खुद अपराधियों को सरंक्षण देती है। पुलिस व्यवस्‍था में आमूलचूल सुधार की जरूरत है।”

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