कहां खो गया वतन मेरा

बिजनी से अब्दुल गनी
इंसाफ की गुहारः मधुबाला मंडल गलत पहचान के कारण तीन साल नजरबंदी शिविर में रहीं
इंसाफ की गुहारः मधुबाला मंडल गलत पहचान के कारण तीन साल नजरबंदी शिविर में रहीं
सुरजीत शर्मा

बिजनी से अब्दुल गनी
असम में जैसे-जैसे एनआरसी सूची के अंतिम प्रकाशन की समय सीमा करीब आ रही है, गलत गिरफ्तारियां भी कई गुना बढ़ गईं

मधुबाला मंडल की आंखों से नींद गायब है। जब भी वे अपनी आंखें बंद करती हैं, तो उन्हें बस अंधेरा, जेल की छोटी कोठरी और लंबी अकेली रातें दिखती हैं और वे जिंदगी के सबसे बड़े सवाल का जवाब खोजती हैं, “मैं कौन हूं?” 59 साल की मधुबाला को लगभग तीन साल के बाद हाल में असम के एक नजरबंदी शिविर से रिहा किया गया है। उन्हें विदेशी होने के शक में चिरांग जिले के उनके गांव से हिरासत में ले लिया गया था। इस घटना के बाद से उनका दर्द खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा। मधुबाला मंडल राजधानी गुवाहाटी से लगभग 150 किलोमीटर पश्चिम में पश्चिमी असम के नंबर-1 बिष्णुपुर गांव में रहती हैं। उन्होंने आउटलुक को बताया, “सरकार ने मेरी जिंदगी बर्बाद कर दी। मुझे तीन साल तक नजरबंदी शिविर में गलत तरीके से रखा गया। उस समय की भरपाई कौन करेगा? मैंने अपनी नजरें खो दी हैं। मैं ठीक से खा नहीं सकती और यहां तक कि पांच मिनट ठीक से खड़ी भी नहीं हो सकती। बुरे सपने मुझे सोने नहीं देते।”

मधुबाला की कहानी कोई अपवाद नहीं है। जबसे असम में बिना दस्तावेज वाले प्रवासियों को बाहर करने के लिए आधिकारिक दस्तावेज-नेशनल रजिस्टर ऑफ पॉपुलेशन (एनआरसी) अपडेट करने की मुहिम चली है, तबसे मधुबाला जैसे मामले कई गुना बढ़ गए हैं। उदाहरण के तौर पर, जब तक अधिकारियों को अपनी गलती का एहसास होता, उससे पहले ही उन्होंने सेना के एक पूर्व अधिकारी को नजरबंदी शिविर में भेज दिया। या फिर वैसे सैकड़ों लोग जिन्हें गलत तरीके से हफ्तों तक हिरासत में रखा गया। मधुबाला की गिरफ्तारी का मामला भी गलत पहचान के मामले के तौर पर सामने आया। पुलिस को मधुबाला दास नाम की महिला की तलाश थी, जिसकी संयोग से उसी गांव में कई साल पहले मौत हो चुकी थी।

एनआरसी को अपडेट करने की प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में चल रही है। यह मुहिम मुख्य रूप से बांग्लादेशी अवैध घुसपैठियों के खिलाफ छह साल के बड़े आंदोलन का नतीजा है। 1985 में हस्ताक्षर किए गए असम समझौते के अनुसार, 25 मार्च 1971 के बाद राज्य में प्रवेश करने वाले किसी भी व्यक्ति को अवैध माना जाएगा और उसका पता लगाया जाएगा, फिर उसे बाहर भेज दिया जाएगा। पिछले साल 30 जुलाई को प्रकाशित एनआरसी के अंतिम मसौदे में 3.29 करोड़ आवेदकों में से 40 लाख से अधिक लोगों को बाहरी बता दिया गया था। 26 जून को प्रकाशित अतिरिक्त सूची में भी एनआरसी से 1.02 लाख लोगों को बाहर रखा गया। एनआरसी की अंतिम सूची अब 31 जुलाई को प्रकाशित होगी।

हालांकि, तथाकथित विदेशियों के लिए ट्रिब्यूनल का कामकाज और एनआरसी को अपडेट करने की प्रक्रिया एक-दूसरे से जुड़ी नहीं है, लेकिन दोनों विवादित रहे हैं। विदेशियों का पता लगाने की जिम्मेदारी असम पुलिस की सीमा पुलिस इकाई के पास है और गलत नजरबंदी के कई मामलों के बाद विदेशियों का पता लगाने का काम भी सवालों के घेरे में आ गया है। रिकॉर्ड के लिए, मधुबाला का नाम, उनकी बेटी और पोतियों के नामों को एनआरसी के मसौदे में शामिल किया गया था, जबकि वह नजरबंदी शिविर में थी। असम में छह नजरबंदी शिविर हैं, जहां लगभग 1,000 लोग विदेशी होने के संदेह में बंद हैं।

मानवाधिकार कार्यकर्ता और एडवोकेट अमन वदूद ने आउटलुक से कहा, “मधुबाला की नजरबंदी असंवैधानिक थी। उनका पूरा परिवार बिखर गया है। सरकार को अपनी गलती माननी चाहिए और कायदे से उसकी भरपाई करनी चाहिए।” उन्होंने आगे कहा, “मधुबाला मुआवजे के लिए दीवानी मुकदमा दायर कर सकती हैं या हाइकोर्ट में जा सकती हैं।” नजरबंदी से पहले मधुबाला एक दिहाड़ी मजदूर थीं और अपने पति और बेटे दोनों को खो चुकी हैं।

एक्टिविस्ट गलत तरीके से हिरासत में लिए गए लोगों के कई मामलों की ओर इशारा करते हैं, जिनमें अधिकांश आर्थिक रूप से कमजोर और अनपढ़ हैं। वहीं, कुछ राज्य में बेहद लोकप्रिय शख्सियतें भी हैं। मसलन, साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता और असमिया नेपाली साहित्य सभा के अध्यक्ष दुर्गा खतीवाड़ा का नाम पिछले सप्‍ताह एनआरसी की जारी सूची से गायब है। हालांकि, उनके परिवार के सदस्य एनआरसी की सूची में शामिल हैं। बाहरी बताए गए लोगों में मंजू देवी का भी नाम है, जो असम में कांग्रेस के संस्थापकों में से एक स्वतंत्रता सेनानी छबिलाल उपाध्याय की प्रपौत्री हैं।

विदेशी ट्रिब्यूनल ने कुछ महीने पहले भारतीय सेना के सेवानिवृत्त अधिकारी मोहम्मद सनाउल्लाह को अवैध प्रवासी घोषित कर दिया था। इसके बाद उन्हें नजरबंदी शिविर भेज दिया गया। सेना से 2017 में ऑनरेरी कैप्टन के रूप में सेवानिवृत्त सनाउल्लाह सीमा पुलिस के साथ भी काम कर चुके हैं। गुवाहाटी हाइकोर्ट का दरवाजा खटखटाने के बाद उन्हें जमानत पर रिहा किया गया। बाद में, यह पता चला कि 2008 में जब नोटिस जारी किया गया था, तो सनाउल्लाह मणिपुर में तैनात थे और उन्हें नोटिस कभी मिला ही नहीं।

अन्य मामलों में भी आरोपियों को नोटिस नहीं मिला, जिससे वे अदालत में पेश नहीं हो पाए। अदालत ने तब उनके खिलाफ एकतरफा फैसला दे दिया। जैसा 102 वर्षीय चंद्रधर दास और मोईन मोल्ला के मामलों में हुआ। दास को खराब स्वास्थ्य के कारण सिलचर नजरबंदी शिविर से जमानत पर रिहा कर दिया गया और मोल्ला ने 2017 में नजरबंदी से बाहर आने से पहले तीन साल वहां गुजारे।

सरकार का कहना है कि उसने गलत तरीके से नजरबंदी के मामलों को गंभीरता से लिया है। असम के गृह और राजनैतिक विभाग के आयुक्त और सचिव आशुतोष अग्निहोत्री कहते हैं, “सीमा पुलिस के विशेष महानिदेशक को इस संबंध में पूछताछ करने और इस प्रक्रिया को पारदर्शी तथा विश्वसनीय बनाने के लिए सभी उपाय करने को कहा गया है। सरकार हर मुमकिन कोशिश कर रही है, ताकि किसी भी वास्तविक नागरिक का उत्पीड़न न हो।”

हम वापस बिष्णुपुर लौटते हैं, जहां मधुबाला व्याकुल हैं। उन पर शारीरिक रूप से अक्षम बेटी और 12 वर्षीय पोती की जिम्मेदारी है। मधुबाला कहती हैं, “मेरी नजरें जा चुकी हैं...मुझे काम कैसे मिलेगा?” वे चिरौरी करती हैं, “मैं यहीं पैदा हुई और यहीं मरना चाहती हूं। इसके बावजूद मुझे परेशान किया गया। मैं अब सरकार से अपील करती हूं कि वह मेरी और मेरी बेटी की देखभाल करे।”

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