नई परंपरा, नए सपने बस आंकड़े नदारद

हरवीर सिंह
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण
त्रिभुवन तिवारी

हरवीर सिंह
क्रांतिकारी ऐलानों की भरमार, मगर महज प्रतीकों से पांच ट्रिलियन डॉलर की इकोनॉमी कहां बनेगी

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने पांच जुलाई को वित्त वर्ष 2019-20 के लिए नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए-2 सरकार का पहला बजट पेश किया। जाहिर है, इतने बड़े बहुमत से सत्ता में आई सरकार का बजट कुछ अलग होना चाहिए। देश के लोग, अर्थविद, कारोबारी, कॉरपोरेट और विदेशी निवेशक हर कोई 'न्यू इंडिया' के लक्ष्य को आगे बढ़ाने वाले बजट का इंतजार कर रहा था। वित्त मंत्री ने इस उम्मीद को बखूबी पूरा भी किया क्योंकि उन्होंने वाकई बजट को बदल दिया है। पहला बदलाव रहा बजट दस्तावेजों का ब्रीफकेस में न लाना। इसे लाल कपड़े में रख कर संसद में लाया गया, जिस पर अशोक चिन्ह था। पांच साल की सबसे कमजोर विकास दर से जूझ रही देश की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए इस 'सकारात्मक' बदलाव के भला क्या कहने! इसे सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार ने गुलामी की निशानी को बदलने का तरीका बताया। उनकी बात को देश के तमाम इलेक्ट्रॉनिक चैनलों ने तुरंत लपक लिया। बताया गया कि गुलामी की परंपरा को बदल कर इस बार देसज परंपरा शुरू हो रही है। साथ ही बजट को बही-खाता कहा गया। लेकिन जो बजट भाषण वित्त मंत्रालय की वेबसाइट पर मिला, उसमें इसे 2019-20 का बजट भाषण ही कहा गया। वहां बही-खाता नहीं लिखा था। वैसे भी, बही-खाता लिखा जाता तो फिर भाषण कैसे होता।

भाषण में भी नई परंपरा शुरू हुई है जो देश के बजटीय इतिहास में अनोखी है। इसमें पिछले साल के बजटीय प्रावधान, संशोधित प्रावधान और नए साल के बजटीय प्रावधान नहीं बताए गए। असल में, देश के लोग बजट के दिन टीवी या रेडियो पर बजट भाषण सुनने की कोशिश जरूर करते हैं, ताकि अर्थव्यवस्‍था की दशा-दिशा जानी जा सके और अपने व्यक्तिगत बजट का हिसाब-किताब लगाया जा सके। तभी तो देश के सभी टीवी चैनल दिन भर के कार्यक्रमों की तैयारी महीनों पहले से शुरू कर देते हैं। लेकिन करीब सवा दो घंटे के भाषण में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बजटीय प्रावधानों पर कोई रोशनी नहीं डाली। इसका सभी इंतजार करते रह गए।

असल में, बजट के आंकड़े एक तरह से सरकार की नीयत और प्रदर्शन दोनों पर प्रकाश डालते हैं। एक नजर में लोगों को समझ में आ जाता है कि सरकार ने खेती-किसानी, शिक्षा, स्वास्थ्य, रक्षा, रोजगार, ग्रामीण विकास, ढांचागत सुविधाओं के विकास, सड़क, बिजली, पानी, आवास, रेलवे के मद में पिछले साल जो प्रावधान किए थे, साल के अंत में उतना पैसा खर्च हुआ या नहीं। खर्च ज्यादा हुआ या कम। पिछले साल के मुकाबले सरकार इस साल इन मदों में खर्च कितना बढ़ा या घटा रही है। यही वह पेच है, जिसे जाहिर करने से शायद वित्त मंत्री ने बचना चाहा। कई मदों में पैसा पिछले प्रावधान से कम खर्च हुआ क्योंकि सरकार ने अंतिम तिमाही में खर्च में कटौती कर दी थी। इस साल तमाम अहम मदों में पैसा पिछले साल के बराबर ही रखा है। बहुत से मदों के प्रावधान में कटौती की गई है। इसमें 'स्वच्छ भारत' अभियान भी है। इसलिए वित्त मंत्री ने इसका तरीका निकाल लिया। एक, नई परंपरा शुरू कर दी, जिसमें बजट प्रावधानों का जिक्र करने की जरूरत नहीं है। दूसरे, बजट भाषण को लोग विजन डाक्यूमेंट बताने लगे हैं जिसमें देश की इकोनॉमी को पांच ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचाने का ब्ल्यूप्रिंट है।

यह बात अलग है कि उन्होंने अपने भाषण के करीब आधे हिस्से में मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में शुरू की गई योजनाओं की कामयाबी और उपलब्धियों से आए बदलावों का जिक्र किया। अंतरिम बजट के समय वित्त मंत्रालय का जिम्मा संभाल रहे पीयूष गोयल ने लोकसभा के चुनावों को ध्यान में रखकर कई महत्वपूर्ण घोषणाएं की थीं। उनको आगे बढ़ाने की बातें निर्मला सीतारमण ने की। उन्होंने इस बजट में बिग डाटा पर अच्छा खासा जोर दिया। मसलन, ढांचागत क्षेत्र के विकास पर सौ लाख करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे। ग्रामीण क्षेत्र में सवा लाख किलोमीटर सड़कें बनाई जाएंगी। पांच साल में देश की अर्थव्यवस्था को पांच ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य हासिल किया जाएगा। यह पुरुषार्थ और जनभागीदारी से हासिल होगा। कृषि क्षेत्र में 25 लाख करोड़ रुपये का निवेश किया जाएगा। किसानों को अन्नदाता से ऊर्जादाता बनाया जाएगा, ताकि किसान बिजली का निर्यात कर कमाई कर सकें। उनकी आय दोगुनी की जाएगी। लेकिन कुछ के बारे में बजट में डिटेल नहीं है, तो कुछ के लिए अभी कमेटी बनाई जाएगी जो बताएगी कि संसाधन कैसे जुटाए जाएंगे। फिर भी दनादन कई क्रांतिकारी घोषणाएं कर दी गईं।

बजट में वित्त मंत्री ने राजकोषीय संतुलन को लेकर बड़ी महत्वाकांक्षा दिखाई है। तमाम प्रतिकूल स्थितियों के बीच उन्होंने राजकोषीय घाटे को पिछले वित्त वर्ष के 3.4 फीसदी के स्तर से 0.1 फीसदी घटाकर 3.3 फीसदी रखने का लक्ष्य तय किया है। लक्ष्य से पिछड़ते प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष करों से जूझते हुए उन्होंने सीमा शुल्क से लेकर उत्पाद शुल्क और सेस में बढ़ोतरी कर अतिरिक्त संसाधन जुटाने की कोशिश की है। वैसे, मोदी के नेतृत्व में भाजपा को भारी बहुमत दिलाने वाले मध्य वर्ग को 'थैंक्स गिविंग' की उम्मीद थी। इसके उलट उस पर डीजल-पेट्रोल से लेकर तमाम जरूरी उत्पादों को महंगा कर नया बोझ डाल दिया गया। आय कर प्रावधानों में कोई अहम बदलाव नहीं करके पीयूष गोयल के पांच लाख रुपये की आय को करमुक्त रखने के वादे को बरकरार रखा गया है। बड़े अमीरों पर आय कर बढ़ा दिया गया ताकि कम आय वर्ग के लोग संतोष कर सकें कि चलिये हमें राहत भले न मिली हो, अमीरों पर कर का बोझ बढ़ गया है। यह राजनीतिक रूप से भी फायदेमंद है क्योंकि कोई 'सूटबूट की सरकार' का आरोप नहीं लगा सकता है।

गांव-गरीब-किसान पर केंद्रित सरकार की नीतियों में किसानों के लिए कुछ पैराग्राफ के भाषण का डोज काफी है। कोई नया बदलाव बजट में नहीं किया गया। किसानों की आय दोगुनी करने के लिए जो बातें एक दिन पहले आर्थिक समीक्षा में कही गई थीं, उनको बजट में दोहरा दिया गया है। इनमें से अधिकांश प्रधानमंत्री के नाम से चल रही हैं और पहले से जारी हैं। यानी निरंतरता में ही भरोसा कायम रखा गया है। इसलिए किसानों को भी 2022 के आने तक भरोसा रखना चाहिए। बेहतर होता कि लक्ष्य का करीब आधा समय बीत जाने के बाद आय दोगुनी करने की दिशा में कितनी प्रगति हुई, इसकी समीक्षा की जाती।

इन सबके साथ जो बात मायने रखती है, वह है 2024 तक पांच ट्रिलियन डॉलर की इकोनॉमी बनाने की। इसके लिए सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में हर साल आठ फीसदी वृद्धि की जरूरत है। इस पर चार फीसदी महंगाई दर जोड़ें तो 12 फीसदी की दर से नॉमिनल ग्रोथ चाहिए। यह कैसे होगा, इसका हल मुख्य आर्थिक सलाहकार कृष्णमूर्ति सुब्रह्मण्यम ने निवेश में ढूंढ़ा है, जो कई साल के न्यूनतम स्तर पर है। चालू साल के लिए उन्होंने आर्थिक समीक्षा में सात फीसदी वृद्धि दर की उम्मीद जताई है। वहीं, वित्त मंत्री ने बजट में इस साल आठ फीसदी वृद्धि दर के आधार पर आय के अनुमान लगाए हैं। यानी सिर्फ एक दिन के अंतराल में विकास दर में एक फीसदी का अंतर आ गया। 2.7 ट्रिलियन डॉलर की इकोनॉमी में एक फीसदी के मायने बहुत बड़े होते हैं।

इस लेखक के साथ बजट पर बातचीत करते हुए पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने कहा कि आर्थिक समीक्षा और बजट में चालू साल के लिए जीडीपी की वृद्धि दर में एक फीसदी का अंतर साबित करता है कि एक ही मंत्रालय में बैठे हुए अधिकारियों के बीच तालमेल नहीं है। वहीं, पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने के बारे में वे कहते हैं कि यह सामान्य गणित है। अगर हम हर साल आठ फीसदी की दर से बढ़ेंगे तो जाहिर-सी बात है कि पांच साल में पांच ट्रिलियन डॉलर की इकोनॉमी बन ही जाएंगे। उनकी बात तो सही है लेकिन जब इकोनॉमी की वृद्धि दर पांच साल के न्यूनतम स्तर पर हो तो क्या यह बजट गिरावट की दिशा बदलकर उसे लक्षित स्तर पर ले जाएगा? यह तो बजट के दावों और प्रावधानों पर अमल के बाद देखने को मिल ही जाएगा। वैसे मुख्य आर्थिक सलाहकार ब्रीफकेस और लाल कपड़े में गुलामी से मुक्ति के मायने तो खोज रहे हैं, लेकिन इकोनॉमी के लक्ष्य ट्रिलियन डॉलर में तय करते हैं। अब इसमें न तो ट्रिलियन भारतीय है और न ही डॉलर। इसलिए बात केवल प्रतीकों से नहीं बनेगी, जमीनी हकीकत की व्यावहारिकता को पहचान कर उस पर चलने से ही बात बनेगी।

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