अवचेतन मन की सपनीली दुनिया

आकांक्षा पारे काशिव
चाय का आखिरी कप
चाय का आखिरी कप

आकांक्षा पारे काशिव
सुधांशु गुप्त का यह दूसरा कहानी संग्रह है

सुधांशु गुप्त का यह दूसरा कहानी संग्रह है। उनकी कहानियां बहुत सधे हुए ढंग से सपनीली पगडंडियों पर चलती हैं और अपने लिए एक अलग दुनिया की चाह रखती हैं।

‘उसके साथ चाय का आखिरी कप’ ऐसी ही कहानी है। नायक अपनी कल्पना में नायिका से बातचीत करता है और उसी कल्पना को सच मान बैठता है। उसे अंदाजा ही नहीं होता कि प्रेम के बारे में सोचना और प्रेम के बारे में बता देना दो अलग-अलग बातें होती हैं। ‘यह सपना नहीं है!’ बिलकुल अलग तरह की कहानी है। इसका ट्रीटमेंट कल्पना और वास्तविकता के बीच गजब का सामंजस्य बैठाता है। नायक अपनी कल्पना और यथार्थ की कहानी में खुद को फंसा हुआ पाता है। हुमा और सपना नायिकाएं न होकर इस दुनिया का कठोर यथार्थ बन जाती हैं। यह यथार्थ दो समुदायों की बात तो करता है लेकिन कहीं भी मुखर रूप से इसका जिक्र नहीं आता। यह वास्तविक और अवास्तविक दुनिया के बीच की कहानी है। लेकिन सुधांशु गुप्त जिस कुशलता से इसे यहां से वहां शिफ्ट करते हैं दरअसल वही कहानी की खासियत है। अगर वे ‘के की डायरी’ की डायरी लिखते हैं तो ‘डबल बेड’  जैसी हल्की-फुल्की कहानी भी। डबल बेड एक दंपती के सपने की कहानी है। पत्नी की एक छोटी सी इच्छा की कहानी है। पहली बार पढ़ने पर यह साधारण कहानी लग सकती है, लेकिन इसे लेखक ने इतनी मासूमियत से लिखा है, जिसकी गवाही हर वाक्य देता है। प्रेम की कहानियां लिखना तो आसान है, लेकिन प्रेम से आगे की कहानियां लिखना मुश्किल है।  

सुधांशु गुप्त की कहानियां विचार की कहानियां हैं जिसके बारे में महसूस तो सभी करते हैं लेकिन अभिव्यक्त कम ही लोग कर पाते हैं क्योंकि यथार्थ वह नहीं है जो हमें दिख रहा है, यह उससे आगे की चीज है जिसे हम शायद कभी-कभी मनोविज्ञान कह देते हैं। लेकिन मनोविज्ञान इतना भी आसान विषय नहीं कि उसे रेजगारी की तरह कहानियों में खर्च किया जा सके। सुधांशु गुप्त कहानियां कहने के लिए न किसी जादुई यथार्थ के चक्कर में पड़ते हैं, न किसी भी प्रकार के लंबे-लंबे विमर्श थोपते हैं। न वे किसी खास परिवेश में अपनी कहानी बुनते हैं, न किसी तयशुदा फ्रेम में अपने शब्दों को फिट करने की कोशिश करते हैं।

‘संत, सत्यवान और सुधीर’ में आज के अक्खड़ और टीआरपी बटोरू पत्रकारों के बनिस्बत सुधीर ऐसा पत्रकार है जिसे दुख होता है। वरना पत्रकार बिरादरी के शब्दकोश से दुख जैसा शब्द गायब हुए दशकों बीत गए हैं। ‘संत, सत्यवान और सुधीर’ पढ़ते हुए लगता है कि मीडिया के गर्त में चले जाने की शायद यही वजहें रही होंगी। वह इस कहानी के माध्यम से अपराध की सामूहिक जिम्मेदारी पर बात करते हैं जो कहानी को नया एंगल देती है। खबरों की दुनिया से ही वे एक और कहानी ‘कंट्रोल जेड’ लेकर आते हैं। यह कहानी देश को झकझोरने वाली घटनाओं का जिक्र करती हुई चलती है। कहानी का मुख्य पात्र चाहता है कि वह देश के माथे पर कलंक की तरह इन घटनाओं को मिटा दे। यानी वह टाइम करेक्शन चाहता है, बिलकुल ऐसे जैसे टाइम मशीन में जाकर कुछ लोग इतिहास की कुछ घटनाओं को बदल देना चाहते हैं। लेकिन इस कहानी में ‘अनहुआ’ जैसे शब्द तो खटकते ही हैं, साथ ही घटनाएं सपाट ढंग से आती हैं और उतने ही सपाट ढंग से सूत्रधार इन्हें रोक देना चाहता है।

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