नाउम्मीदी में उम्मीद की तलाश

श्रीनगर से नसीर गनई
इस हंसी का राज क्याः नेशनल काॅन्फ्रेंस मुखिया फारूक अब्दुल्ला और उमर अब्दुल्ला
इस हंसी का राज क्याः नेशनल काॅन्फ्रेंस मुखिया फारूक अब्दुल्ला और उमर अब्दुल्ला
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श्रीनगर से नसीर गनई
क्या अनुच्छेद 370 के बहाने कश्मीरियत से छेड़छाड़ करेगी भाजपा?

देश में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) स्पष्ट बहुमत के साथ सत्ता में आ गई है। इस बहुमत से घाटी नाउम्मीदी और उम्मीद के बीच झूलने लगी है। चिंता की बात यह कि घाटी में जिसे, 'कश्मीर विरोधी नीति' माना जाता है, भाजपा उसे लागू कर सकती है। लेकिन ठीक इसी वक्त मुख्यधारा की राजनैतिक पार्टियां और घाटी के कुछ वर्ग उम्मीद कर रहे हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बातचीत से कश्मीर का मुद्दा सुलझाएंगे और विश्व मंच पर एक राजनेता के रूप में उभरने के लिए पाकिस्तान को इसमें शामिल करेंगे। दुकानों, विश्वविद्यालय परिसर और अन्य स्थानों पर जहां देखें, लोग प्रधानमंत्री के संभावित कदमों की चर्चा कर रहे हैं। घाटी में हर जगह चर्चा है कि प्रधानमंत्री की कश्मीर नीति क्या होगी और वह  घाटी के मुद्दे से कैसे निपटेंगे। अपने घोषणापत्र में भाजपा ने कहा है कि उनकी पार्टी कश्मीर क्षेत्र में लागू भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 और 35ए को समाप्त कर देगी। अनुच्छेद 370 जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा प्रदान करता है, जबकि अनुच्छेद 35ए बाहरी लोगों को स्थायी रूप से रहने और मुस्लिम-बहुल क्षेत्र में नौकरी पाने से रोकता है।

बीते 14 फरवरी को पुलवामा में सीआरपीएफ पर हुए आत्मघाती हमले में 40 जवान मारे गए थे। उसके बाद 26 फरवरी को भारतीय वायुसेना ने नियंत्रण रेखा के पार हवाई हमला किया। तब से ही इस चुनाव प्रचार के दौरान कश्मीर मुख्य मुद्दा बन गया।

चुनाव प्रचार के दौरान राजनाथ सिंह और अमित शाह सहित भाजपा नेताओं ने दोनों अनुच्छेदों की समीक्षा पर बात की। भाजपा नेता अरुण जेटली ने भी अनुच्छेद 370 और 35ए पर भाषण दिया। प्रधानमंत्री ने भी माना कि अनुच्छेद 370 कश्मीर के विकास में बाधा है।

अपना नाम न छापने की शर्त पर एक शिक्षाविद कहते हैं, “भाजपा का चुनाव अभियान पाकिस्तान और कश्मीर के बालाकोट हवाई हमले के बारे में था। पूरा प्रचार राष्ट्रवाद पर था। इसलिए घाटी में आशंका है कि भाजपा कोई उग्र कदम उठा सकती है। ये वास्तविक चिंताएं हैं और अगर ऐसा होता है तो यह कश्मीर और पूरे क्षेत्र को और अधिक अनिश्चितता में धकेल देगा।” साथ ही वह कहते हैं कि प्रधानमंत्री के पास लंबे समय से चले आ रहे 'विवाद' को सौहार्दपूर्ण बातचीत और सुलह के माध्यम से हल करने और राजनेता के रूप में उभरने का मौका है।

पूरे कश्मीर में लोगों की बातचीत में शिक्षाविद की बातों की गूंज है। वह कहते हैं, “उम्मीद है प्रधानमंत्री कश्मीर क्षेत्र को संघर्ष का स्थायी स्रोत बनाने के लिए कठोर कदम नहीं उठाएंगे, बल्कि ‘घावों’ को ठीक करेंगे और कश्मीरियों तक पहुंचेंगे।” यह उम्मीद भाजपा के ट्रैक रिकॉर्ड से दिखती है।

सत्ता में रहते हुए कांग्रेस के विपरीत भाजपा ने कश्मीर के बारे में कोई कठोर संवैधानिक बदलाव नहीं किया है। घाटी में कुछ वर्गों का मानना है कि कांग्रेस के मुकाबले भाजपा दो-टूक कहने वाली पार्टी है। शिक्षाविद कहते हैं, “भाजपा की राजनीति, कांग्रेस की तरह नहीं है जो दिखे तो कश्मीरियों की हितैषी लेकिन संवैधानिक गारंटी को खत्म कर दे। कोई कश्मीरी नहीं भूला है कि कांग्रेस ने शेख अब्दुल्ला के साथ क्या किया। उन लोगों ने उन्हें 22 साल जेल में रखा और इन सालों में कश्मीर की स्वायत्तता पूरी तरह खत्म कर दी।” वह आगे कहते हैं, “इसके अलावा पिछले 29 सालों के संघर्ष में कश्मीरियों ने सबसे बुरा दौर देखा है। सैकड़ों हत्याएं हुईं, बड़े पैमाने पर मानवाधिकारों का हनन हुआ। अब लोगों का मानना है कि इससे बुरा और क्या होगा।”

मार्च 2015 में पीडीपी के साथ गठबंधन के बाद भाजपा ने सभी लोगों के साथ सामंजस्य और वार्ता की बात की थी। पार्टी ने जोर देकर यह भी कहा था कि वह जम्मू और कश्मीर के विशेष दर्जे पर यथास्थिति बनाए रखेगी। पिछले पांच सालों से सत्ता में रहने वाली भाजपा ने राज्य के विशेष दर्जे पर यथास्थिति बनाए रखी है। भाजपा ने कश्मीर वार्ताकार के रूप में दिनेश्वर शर्मा की नियुक्ति भी की। दो साल पहले अपनी नियुक्ति के बाद से ही शर्मा अलग-अलग वर्गों से बात कर रहे हैं, लेकिन उन्होंने अभी तक सरकार को कोई रिपोर्ट नहीं सौंपी है।

घाटी में उम्मीद की एक वजह नरेंद्र मोदी का पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान के 'बधाई संदेश' पर जवाब देना भी है। नरेंद्र मोदी ने कहा कि उन्होंने हमेशा क्षेत्र में शांति और विकास को प्रधानता दी है। पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान ने भाजपा और सहयोगियों की चुनावी जीत पर प्रधानमंत्री मोदी को बधाई संदेश में कहा था कि वह दक्षिण एशिया में शांति, प्रगति और समृद्धि के लिए उनके साथ काम करने के लिए उत्सुक हैं।

आइएएस से राजनेता बने शाह फैसल कहते हैं, “लोगों के गुस्से को शांत होने दिया जाए। दूसरे कार्यकाल में प्रधानमंत्री जम्मू-कश्मीर के लोगों तक पहुंचकर इतिहास रच सकते हैं। कश्मीर के घाव भरना जरूरी है।” फैसल ने आउटलुक से कहा, “इमरान खान के संदेश पर प्रधानमंत्री की प्रतिक्रिया बताती है कि दोनों देश बातचीत करेंगे और यह जम्मू और कश्मीर के लिए अच्छा होगा।”

विगत 14 फरवरी को जैश के स्थानीय आतंकवादी आदिल डार के अर्धसैनिक बल सीआरपीएफ पर जानलेवा आत्मघाती हमले के बाद से अधिकारियों ने जमात-ए-इस्लाम और जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (जेकेएलएफ) जैसे अलगाववादी समूहों पर प्रतिबंध लगा दिया था। सुरक्षा बलों ने भी बड़े पैमाने पर ऑपरेशन चलाए और अकेले इस साल करीब 90 आतंकवादी मार गिराए। सरकार ने स्थानीय लोगों के लिए हफ्ते में दो दिन राजमार्ग बंद कर दिया था। हालांकि सरकार ने कुछ दिन पहले ही यह रोक हटा ली है और राज्यपाल ने लोगों से इस प्रतिबंध के लिए माफी भी मांगी है। यह कदम सकारात्मक बदलाव के संकेत देता है। साथ ही सरकार ने भारतीय छात्रों को पाक अधिकृत कश्मीर के कॉलेजों में प्रवेश न लेने के लिए चेतावनी भी जारी की थी। पाक अधिकृत कश्मीर में एमबीबीएस जैसे पाठ्यक्रमों में कश्मीरी छात्रों को छह प्रतिशत तक आरक्षण मिलता है। 

पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती का कहना है कि प्रधानमंत्री को बहुत बड़ा जनादेश मिला है और अब पार्टी को कश्मीरियों तक पहुंचना चाहिए। वह कहती हैं कि उनकी पार्टी अनुच्छेद 370 का बचाव करेगी और अगर भाजपा इसके साथ कोई छेड़छाड़ करती है, तो उसे इसके परिणाम भुगतने होंगे।

शपथ लेने से पहले ही प्रधानमंत्री शनिवार को नवनिर्वाचित सांसदों को संबोधित करते हुए कह चुके हैं, “हम सब के लिए काम करेंगे। उनके लिए भी जिन्होंने हमें वोट नहीं दिया। हमें अल्पसंख्यकों का भी विश्वास जीतना है।” उनके इस संबोधन ने कश्मीर में आशावादियों के इस विश्वास को मजबूत किया है कि भाजपा अब कश्मीर तक पहुंच बनाएगी। लेकिन आशंकाएं बरकरार हैं। 

पीडीपी के प्रवक्ता और वरिष्ठ नेता नईम अख्तर का कहना है, “कश्मीर प्रधानमंत्री की परीक्षा लेगा। सभी प्रधानमंत्रियों के लिए राजनेता बनने का रास्ता कश्मीर से होकर जाता है। उन्हें अपनी पसंद के राज्यों में से एकमात्र मुस्लिम बहुल राज्य को सम्मानजनक स्थान देने के लिए नेतृत्व करना होगा।”   

नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला भी मानते हैं कि नई संसद आसान नहीं होगी। उनका कहना है कि जम्मू और कश्मीर में अनुच्छेद 370 और अनुच्छेद 35ए सहित कई महत्वपूर्ण मुद्दे हैं। वह कहते हैं, “हमें इनसे निपटना होगा।” उनका मानना है कि जम्मू-कश्मीर में शांति स्थापित करने के लिए भारत और पाकिस्तान को बातचीत करनी ही होगी।

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