टीटीई की डायरी के बहाने रेल में देश

कृष्‍ण कुमार
टिकट प्लीज
टिकट प्लीज

कृष्‍ण कुमार
छियासठ प्रसंगों में पिरोई गई रेल जीवन की यह कथा कभी लंबी नहीं हो पाती क्योंकि कथा के हीरो और वाचक टीटीई की ड्यूटी बीच के स्टेशन पर खत्म हो जाती है

कम किताबें ऐसी होती हैं जिन्हें पढ़कर अपने आसपास रहने वाली दुनिया एकाएक खुलकर सामने आ खड़ी होती हो। उससे हमारा एक नया संबंध बनता है, नया अर्थ जगाता है। रामदेव सिंह की टिकट प्लीज पढ़ते हुए लगता है, अभी तक हम सिर्फ यात्री थे, अब रेल-निवासी बन गए हैं क्योंकि रेल सिर्फ रेल नहीं रही, देश बन गई है। रेल-व्यवस्‍था और भारत के संबंध इतिहास का विषय है। इसे तसवीरों और पोस्टरों में प्रतीक के तौर पर व्यक्त किया जाता रहा है। रामदेव सिंह भी शब्दों के साथ तसवीरें बनाते हैं पर उनसे पैदा होने वाली अनुभूति और समझ व्यंजना के अछूते क्षितिज खोलती है। सैकड़ों बार यात्रा करने से मिले परिचय के पुराने-नए स्तर और पैबंद कटकर खुल जाते। कई जगह लगता है कि हम रेल के बारे में कुछ नहीं जानते, न ही देश के बारे में। फिर लगता है कि देश रेलगाड़ी में छिपा और लगातार भाग रहा है। लौट-लौटकर अप-डाउन कर रहा यदि उसका कोई नैतिक गंतव्य था तो वह उसे भूल चुका है।

छियासठ प्रसंगों में पिरोई गई रेल जीवन की यह कथा कभी लंबी नहीं हो पाती क्योंकि कथा के हीरो और वाचक टीटीई की ड्यूटी बीच के स्टेशन पर खत्म हो जाती है। टीटीई का पूरा रूप है ‘ट्रैवलिंग टिकट एक्जामिनर।’ रामदेव सिंह की रेल सेवा इसी पद पर रही और संयोगवश वे नियुक्ति के दिन से निवृत्ति तक मुगलसराय जंक्‍शन पर रहे। किताब की संकल्पना एक टीटीई की डायरी में दर्ज प्रसंगों की बौछार रूपी स्मृति सरीखी है। डायरी, लेखक को एक यात्री ने यह कहकर सौंपी थी कि कोई टीटीई उतरने की जल्दी में इसे छोड़ गया था। प्रतिदिन सफर करने की बाध्यता और तरह-तरह के लोगों से पेश आने में निहित अनिवार्य थकान के बीच लिखी गई यह काल्पनिक डायरी पाठक को उस नए समाज का दर्शन कराती है जो उसका अपना समाज है, पर यह समाज यात्रा की सामान्य चिंताओं, नींद, सामान की हिफाजत जैसे दबावों में छिपा रहता है। कैसा है यह समाज? घोर वैयक्तिक या नियम पालन में असमंजस और कष्ट महसूस करने वाला। शासन और ताकत से प्रेम और भय का खेल खेलने में मगन यह समाज अपने बारे में सोचने का समय निकालने में असमर्थ है। लोग अपने लिए कैसी भी सुविधा निस्संकोच मांग सकते हैं और हिंसा हो जाने पर मूक बने रह सकते हैं। यह समाजशास्‍त्र आप किसी विश्वविद्यालय में नहीं सीख सकते। साहित्य में इसकी उपस्थिति न्यून रही है। कोई टीटीई ही इसे प्रस्तुत कर सकता था।

एक लड़की दिल्ली से राजधानी एक्सप्रेस में चढ़ी है, कोलकाता जा रही है। आधी रात में उसे ढूंढ़कर मुगलसराय में उतार लेने का ऐसा अनुरोध मध्यवर्ग ही कर सकता है जो शासन को अपनी जागीर समझता हो। दूसरी तरफ वह दुनिया है जिसमें नागरिक पंजाब में मजूरी करके त्योहारों पर गांव आते हैं और रास्ते में हर स्तर के कर्मचारी की धौंस और मांग सहते हैं। बीच में अटैची चुराने वाले युवक, बचपन से चाय या फल बेच रहे अधेड़, राजनैतिक दलों की भीड़ बनने को तैयार बेरोजगार हैं। इस विहंगम विविधता के बीच हमारा नायक टीटीई है जो अपने कर्तव्य-बोध और पद की निरीहता के बीच का फासला हर वक्त तय करता है, कभी फंसता है, कभी बच निकलता है। उसके काले कोट के नीचे रेल की विशाल प्रदर्शनी अंग्रेजों के समय से आज तक विकास के तमाशे दिखाए-छिपाए रखती है।

मेहनत से बनी किसी पूर्ण कृति की तरह यह पुस्तक अपनी भाषा स्वयं रचती है। पदों और उनकी भूमिकाओं की अंग्रेजी हर वृत्तांत को उतना ही जीवन और स्पंदन देती है जितनी यात्रियों की नाना आंचलिकताएं और जुबानी आदतें देती हैं। सैकड़ों वाक्यों की रचना हमें चौंकाती है, भाषा की स्‍थापित तकनीकों को विस्तार देती है। बताने की जरूरत नहीं है कि यह कृति विधा, भाषा और संज्ञान के स्तरों पर एक बड़ा योगदान है।

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