चौधरी चरण सिंह की प्रासंगिकता

कुलदीप कुमार
चौधरी चरण सिंह
चौधरी चरण सिंह

कुलदीप कुमार
चरण सिंह ने लेखों और पुस्तकों के जरिए 1950 के दशक से ही विकास की अवधारणा का प्रतिपादन किया

आज के राजनीतिक परिदृश्य में चौधरी चरण सिंह की याद आना स्वाभाविक है। उनके समय में जिस तरह गैर-कांग्रेसवाद के आधार पर अनेक पार्टियां एकजुट हुई थीं और जिस तरह उन्होंने पिछड़ी जातियों और अल्पसंख्यकों के बीच एकजुटता के समीकरण बनाए थे, आज की महागठबंधन की राजनीति उसी तरह के नए समीकरण बनाने की कोशिश कर रही है। 1979 में जनता पार्टी को जिस आधार पर टूट का सामना करना पड़ा था, आज पूरे देश की राजनीति उसी आधार पर संचालित हो रही है। मधु लिमये जैसे प्रखर समाजवादी चिंतक और राजनीतिज्ञ ने जब जनता पार्टी के जनसंघ घटक के सदस्यों की राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सदस्यता का मुद्दा उठाया और मांग की कि वे दोहरी सदस्यता छोड़ दें, तो उन्हें चरण सिंह का समर्थन मिला। संघ के प्रति निष्ठा ही जनता पार्टी के विभाजन का कारण थी. पिछले पांच वर्षों से संघ के एक स्वयंसेवक देश के प्रधानमंत्री के पद पर आसीन हैं और अमेरिका की प्रतिष्ठित पत्रिका ‘टाइम’ ने उन्हें “प्रधान विभाजनकारी” की उपाधि से अलंकृत किया है। पूरे देश में इस समय संघ की विचारधारा और राजनीति के वर्चस्व का विरोध विपक्षी राजनीति की धुरी बन गया है। किसानों का असंतोष अपने चरम पर है। ऐसे में किसानों के हितों के प्रवक्ता के रूप में अपनी राजनीति को दिशा देने वाले चरण सिंह और भी प्रासंगिक लगने लगते हैं। यूं भी 29 मई को उनकी बत्तीसवीं पुण्यतिथि है जो हमें उनका स्मरण करने के लिए प्रेरित करती है। शायद बहुत लोगों को याद न हो कि देश को जब आजादी मिल रही थी तब 1947 में चरण सिंह ने एक पुस्तिका लिखी थी, जिसमें किसानों की संतानों के लिए 50 फीसदी आरक्षण की मांग की गई थी। लेकिन यह मांग उन्हीं के लिए थी जो वास्तव में खेती के काम में लगे हुए थे, अमिताभ बच्चन जैसे किसानों के लिए नहीं, जो कृषि भूमि खरीदकर किसान बनने का दावा करते हैं। चरण सिंह का तर्क था कि कृषि के काम में देश की 57.75 प्रतिशत जनता लगी हुई है और यदि इसमें भूमिहीन खेतिहर मजदूरों की तादाद को भी जोड़ दिया जाए तो यह आंकड़ा 75.5 प्रतिशत तक पहुंच जाएगा। जिस देश की इतनी अधिक आबादी कृषि में लगी हो, उसकी सरकार और प्रशासन को उसी के प्रतिनिधि चलाएं यह उम्मीद करना अनुचित न होगा। इसलिए किसानों के बच्चों को सरकारी नौकरियों में 50 प्रतिशत आरक्षण मिलना चाहिए। आज की आरक्षण-समर्थक राजनीति को चरण सिंह के इस योगदान को भुलाना नहीं चाहिए। यह अवश्य है कि वे अंततः निचली जातियों और ऊंची जातियों के बीच की मध्यम श्रेणी की जातियों तथा मझोले किसानों के हितों के ही प्रवक्ता बनने में सफल हुए।

उनके विचारों से सहमति-असहमति हो सकती है, लेकिन इस तथ्य को भुलाया नहीं जा सकता कि जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी ने भारत के विकास की जो रूपरेखा प्रस्तुत की थी उसके विकल्प के तौर पर चरण सिंह ने लेखों और पुस्तकों के जरिए 1950 के दशक से ही विकास की एक दूसरी अवधारणा का प्रतिपादन किया। 1981 में उन्होंने इकोनॉमिक नाइटमेयर ऑफ इंडिया : इट्स कॉज ऐंड क्योर (भारत का आर्थिक दु:स्वप्न: इसका कारण और इलाज) नामक ग्रंथ प्रकाशित किया, जिसमें एक पेशेवर अर्थशास्‍त्री की तरह उन्होंने पूरे तथ्यों के साथ भारतीय अर्थव्यवस्था की प्रकृति, उसकी समस्याओं और उनके समाधान पर विस्तार से विवेचन करके अपने निष्कर्ष प्रस्तुत किए। उनका मानना था कि आजादी के समय भारत के सामने एक-दूसरे से जुड़ी हुई चार समस्याएं थीं- गरीबी, बेरोजगारी या अर्ध-बेरोजगारी, निजी आय में व्यापक असमानता और कठोर श्रम के विरुद्ध रवैया। यदि हम आज के भारत पर नजर डालें तो यही समस्याएं आज भी मुंह बाए खड़ी दिखती हैं। हां, उनका स्वरूप अब पहले से कहीं अधिक विकराल हो गया है। विकास की प्रक्रिया इस प्रकार से आगे बढ़ी है कि आर्थिक विकास के फलस्वरूप देश के कुछेक परिवारों में समृद्धि का केंद्रीकरण हो रहा है और सबसे गरीब व्यक्ति और सबसे अमीर व्यक्ति के बीच की खाई इतनी अधिक गहरी और चौड़ी हो गई है कि अब उसे भरना असंभव हो गया है।

चरण सिंह ने हमेशा इस स्थिति के खिलाफ आवाज उठाई। वे ब्रिटिश-विरोधी राष्ट्रीय आंदोलन के भीतर से उभरे हुए नेता थे और उनकी सामाजिक चेतना और जीवनमूल्यों पर गांधीवादी चिंतन और आचरण का बहुत गहरा असर था। अपने ग्रंथ के प्राक्कथन में उन्होंने प्रसिद्ध स्वीडिश अर्थशास्‍त्री गुन्नार मिर्डल के एक लेख को उद्धृत किया है, जिसमें मिर्डल ने कहा है कि भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास की योजना यदि गांधी की समन्वित विकास की अवधारणा पर आधारित होती तो उसे अनेक समस्याओं का सामना ही न करना पड़ता। 

इसीलिए वह जीवन भर भ्रष्टाचार के खिलाफ बोलते और लड़ते रहे। अपनी पुस्तक (1939) में एक विधायक के रूप में जो प्रस्ताव उन्होंने संयुक्त प्रांत (अब उत्तर प्रदेश) के कांग्रेस विधायक दल की बैठक में रखे थे, उनमें भ्रष्टाचार के खिलाफ प्रस्ताव भी था। चरण सिंह उत्तर प्रदेश में विधायक, मंत्री और फिर मुख्यमंत्री बने और केंद्र सरकार में मंत्री और फिर प्रधानमंत्री बने। लेकिन उन पर भ्रष्टाचार का एक भी आरोप नहीं लगा। आज की भारतीय राजनीति में व्याप्त भ्रष्टाचार के मद्देनजर यह बहुत महत्वपूर्ण तथ्य है।

चरण सिंह का कहना था कि महात्मा गांधी देश का निर्माण नीचे से ऊपर की ओर करना चाहते थे, लेकिन नेहरू की मान्यता इसके उलट थी। उनकी राय में नीति-निर्माताओं का ध्यान गांव और शहरों में रहने वाले गरीबों पर केंद्रित होना चाहिए। जब तक उनकी दशा नहीं सुधरेगी और उनका आर्थिक विकास नहीं होगा, तब तक देश की अर्थव्यवस्था मजबूत नहीं हो सकती। आज के हमारे शासक चरण सिंह की अर्थनीति से बहुत कुछ सीख सकते हैं।

(लेखक वरिष्‍ठ पत्रकार हैं, राजनीति और कला-संस्कृति पर लिखते हैं)

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