शेषन की तरह फैसला तो लेना होगा

हरवीर सिंह और प्रशांत श्रीवास्तव
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त नवीन चावला
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त नवीन चावला
सुरेश के. पांडे

हरवीर सिंह और प्रशांत श्रीवास्तव
सत्तारूढ़ और प्रमुख नेताओं के आचार संहिता उल्लंघन पर दो-एक से फैसले, नमो टीवी विवाद ऐसे अनेक मामलों में चुनाव आयोग की साख पर गंभीर सवाल शायद ही कभी उठे हों। इन तमाम मामलों के साथ इलेक्टोरल बांड, फेक न्यूज, पेड न्यूज और सोशल मीडिया की नई चुनौतियों से निपटने के तरीकों पर पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त नवीन चावला ने संपादक हरवीर सिंह और एसोसिएट एडिटर प्रशांत श्रीवास्तव से बातचीत में विस्तार से अपनी राय रखी। कुछ अंशः

चुनाव आयोग के रवैए पर विपक्षी दल तो सवाल उठा ही रहे हैं। आचार संहिता उल्लंघन के मामलों में सुप्रीम कोर्ट तक को हस्तक्षेप करना पड़ा। इससे क्या उसकी साख धूमिल हुई है? 

मैं भी मीडिया के जरिए यह देख और पढ़ रहा हूं। इसका मैं दो हिस्से में जवाब देता हूं। एक तो मैंने मुख्य चुनाव आयुक्त रहते हुए 2009 का चुनाव कराया था। लेकिन मैंने न कभी 2009 के इलेक्शन पर टिप्पणी की और न ही 2014 पर कोई टिप्पणी की। दूसरे, मेरे पास इन आरोपों पर कोई तथ्य नहीं है, इसलिए टिप्पणी करना ठीक नहीं।

2017 में गुजरात विधानसभा चुनावों के वक्त भी सवाल उठे थे। आयोग ने चुनाव का ऐलान करने में देरी की, यह माना गया कि इससे केंद्र सरकार को फायदा मिला।

मैं अपने समय की बात करूंगा। तीन ऐसे विषय थे, जब मैंने आयोग में असहमति जताई थी। अपनी असहमति को मैंने बकायदा लिखित रूप से दर्ज कराया था। एक, कर्नाटक विधानसभा चुनावों को लेकर मेरा मानना था कि मतदाता सूची तैयार नहीं होने के कारण चुनाव थोड़े देर से कराए जाने चाहिए। इसी तरह मैंने हिमाचल प्रदेश में भी चुनाव का विरोध किया था। मौजूदा दौर में जहां तक गुजरात की बात है तो उस वक्त मुख्य चुनाव आयुक्त ने कहा कि राज्य में प्राकृतिक आपदा की वजह से तिथियों के ऐलान में देरी हुई। लेकिन मेरा मानना है कि जब किसी राज्य में बड़ी आपदा होती है, तो पूरा देश उसे समझ जाता है। एक-दो जिले में बाढ़ आ जाए और उससे पूरे राज्य के चुनाव में देरी कर दी जाए तो सवाल उठेगा ही। चुनाव आयोग के पास पूरे देश में मशीनरी मौजूद है। यह ध्यान रखना चाहिए कि आयोग के फैसले की हर इलाके, घर, चौक, दुकान पर चर्चा होती है। ऐसे में फैसला इतना पारदर्शी होना चाहिए कि उस पर कोई सवाल न उठे। अगर ऐसा नहीं होता है, तो उसे लोग भूलते नहीं हैं।

कई राज्यों में चुनाव के ऐलान के पहले ही सोशल मीडिया पर शेड्यूल जारी हो गए। यह भी कहा गया कि एक रैली के लिए आयोग ने प्रेस कॉन्फ्रेंस करने में देरी कर दी।

इस बारे में कुछ कहने के लिए मेरे पास तथ्य नहीं है। हालांकि यह जरूर है कि इस तरह के मैसेज आ रहे थे। मुझे लगता है कि यह एक तरह से समझदारी भरा कयास था। सभी जानते हैं कि मार्च के महीने में परीक्षाएं होती हैं, ऐसे में एक मार्च से 7-8 अप्रैल के बीच चुनाव नहीं होंगे। सभी को मालूम है कि चुनाव कई चरणों में होते हैं। इस तरह के कयास लगाए जा सकते हैं।

इस बार एक राज्य में कई चरणों में चुनाव कराए जा रहे हैं, विपक्षी दल सत्ताधारी दल को फायदा पहुंचाने की कवायद बताते हैं। यह कितना तर्कसंगत है?

चुनाव कितने चरण में होंगे, यह तय करने में सबसे अहम है कि आयोग को केंद्रीय सुरक्षाबल कितनी संख्या में मिल रहे हैं। आज राजनैतिक दल राज्य की पुलिस पर भरोसा नहीं करते हैं। ऐसे में चुनाव के लिए ज्यादा से ज्यादा केंद्रीय सुरक्षाबलों की जरूरत पड़ती है। 2009 में जब मैंने चुनाव कराया था तो 74 करोड़ मतदाता थे, आज 90 करोड़ मतदाता हैं। इसी तरह मेरे समय में पोलिंग स्टेशन आठ लाख थे, आज करीब 9.5 लाख है। अगर चुनाव स्थानीय पुलिस की देखरेख में कराए जाएं और पर्यवेक्षकों की जरूरत न हो, तो तीन से चार चरणों में चुनाव कराए जा सकते हैं। चुनाव कैसे होंगे, उसका फैसला इनपुट्स के आधार पर लिया जाता है। आप देख रहे हैं कि पश्चिम बंगाल में हर चरण में हिंसा हो रही है। ऐसे में किसे सही माना जाए? आयोग तो चाहता है कि चुनाव में किसी तरह की हिंसा न हो। आप जानते हैं कि माओवादी इलाके में वोटरों पर भी खतरा मंडराता है। वह धमकाते हैं कि हम अंगुली पर स्याही के निशान देखेंगे तो काट देंगे। ऐसे में हमें चुनाव इस तरह कराना है कि मतदाता और उम्मीदवार दोनों की रक्षा हो। इसलिए चरणों की संख्या पर नहीं जाना चाहिए। उद्देश्य सुरक्षा और निष्पक्ष चुनाव होना चाहिए।

नवीन चावला

प्रधानमंत्री से लेकर सभी प्रमुख नेताओं पर आचार संहिता के उल्लंघन के आरोप लग रहे हैं। यह धारणा बनती जा रही है कि रसूख वालों को रियायत मिल रही है, ऐसा क्यों है?

मैं तीन बातें कहूंगा। इस मामले में (पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त) टी.एन.शेषन का उदाहरण सामने रखना चाहिए। उन्होंने देश के प्रधानमंत्री को भी दिखा दिया था कि आचार संहिता सभी के लिए समान है। वे मेरे गुरु हैं। जब मैं चुनाव आयोग में था, तो मेरे ऊपर भी आरोप लगते थे। तब मैं उनसे पूछता था कि क्या करूं? वे कहते कि तुम्हें वही करना चाहिए, जो तुम्हें सही लगता है। दूसरों के असर में नहीं आना चाहिए। तुम्हारी “चमड़ी मोटी” होनी चाहिए।

लेकिन आचार संहिता के मामले में जो दो बातें सामने आई हैं, वे काफी परेशान करने वाली हैं। एक, जिस तरह से चुनाव में पैसों का खेल हो रहा है, वह चिंताजनक है। पांचवें चरण तक 3,400 करोड़ रुपये से ज्यादा की नकदी और अन्य सामान की जब्ती की जा चुकी है। चुनाव खत्म होते-होते यह आंकड़ा 5,000 करोड़ रुपये पार हो जाने की आशंका है। आप यह मानकर चलिए कि जो पैसा पकड़ा जा रहा है, वह चुनाव में पैसे के कुल खेल का 10 फीसदी ही होगा। तो, क्या इस चुनाव में 50 हजार करोड़ रुपये खर्च होने जा रहे हैं। इससे यह सवाल उठता है कि क्या चुनाव लड़ने के लिए सभी प्रत्याशी को समान अवसर मिल पा रहा है? इस समय एक उम्मीदवार को 70 लाख रुपये खर्च करने की इजाजत है लेकिन खर्च 10-15 करोड़ रुपये से कम नहीं हो रहे हैं। जो पैसा जब्त हो रहा है, क्या उसे कोई मांग रहा है? उसका कोई मां-बाप है क्या? मेरा कहने का मतलब है कि खर्च करने की सीमा और वास्तविक खर्च में कितना अंतर है। ऐसे में समान अवसर कहां रह जाता है? तीसरे, सबसे बड़ा मुद्दा फेक न्यूज और पेड न्यूज है। समझ में नहीं आता कि ट्विटर और फेसबुक से आ रही किस न्यूज पर भरोसा किया जाए। हम सभी जानते हैं कि 2016 में अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव में कैसे सोशल मीडिया के जरिए खेल किया गया था। हमारे पास इससे निपटने के लिए पर्याप्त मशीनरी नहीं है, ऐसे में इस पर नियंत्रण करने की आवश्यकता है।

तो, क्या अमेरिका की तरह यहां भी सोशल मीडिया की भूमिका की जांच होनी चाहिए?

पिछले 22 साल से चुनाव आयोग ने कई सरकारों को चुनाव सुधारों के संबंध में सुझाव दिए हैं, लेकिन किसी सरकार ने कुछ नहीं किया। 22 साल से कहा  जा रहा है कि पारदर्शिता बढ़ाने के लिए 20 हजार रुपये से कम लिए गए चंदे का खुलासा होना चाहिए लेकिन कुछ नहीं हुआ। इलेक्टोरल बांड को लेकर जब से सुप्रीम कोर्ट ने स्रोत सार्वजनिक करने की बात कही है, उस वक्त से बांड कम खरीदे जा रहे हैं। आखिर  50 हजार करोड़ रुपये कहां से आ रहा है? प्रत्याशी पर तो प्रतिबंध है लेकिन पार्टी पर कोई बंदिश नहीं है। चुनाव आयोग ने सुधार के लिए जो प्रस्ताव अभी तक दिए हैं, उसको लागू करने के लिए कोई भी राजनैतिक दल गंभीर नहीं है। मतलब साफ है कि राजनैतिक दल इसलिए चुनाव सुधार नहीं चाहते हैं क्योंकि उन्हें पता है कि जब वे सत्ता में आएंगे, तो उन्हें ये नियम फायदा पहुंचाएंगे। ऐसे में चुनाव आयोग को चाहिए कि सभी पक्षों के साथ बातचीत शुरू करे और एक रोडमैप तैयार करे। अगर चुनाव आयोग नहीं करेगा तो कौन करेगा? जैसे हमने संविधानसभा के जरिए संविधान बनाया, उसी तरह हमें कदम उठाना होगा। 72 साल बीत गए हैं, हमारे पास पर्याप्त अनुभव हो चुका है। संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत चुनाव आयोग को जो शक्तियां दी गई हैं, उनकी भी समीक्षा होनी चाहिए। अच्छी बात यह है कि आजादी के बाद से देश में समय से चुनाव होते आ रहे हैं जबकि दुनिया के बहुत से देशों में ऐसा नहीं हो पाया है। यह कोई छोटी उपलब्धि नहीं है। लेकिन अब समय आ गया है कि चुनाव सुधार लागू किए जाए।

एक मामला राजस्थान के राज्यपाल कल्याण सिंह का है, जिन्होंने सत्ताधारी दल के पक्ष में वोट डालने की बात कही है फिर भी उनके खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई। लेकिन ऐसे ही एक मामले में हिमाचल प्रदेश के एक राज्यपाल को कुर्सी गंवानी पड़ी थी। अब हम कैसी पंरपरा डाल रहे हैं?

मैं आपको अपने समय की घटना बताता हूं। उस दौर में चार मुख्यमंत्रियों पर आचार संहिता के उल्लंघन का मामला बना था। एक मुख्यमंत्री ने गोली चलने के मामले में केंद्र से भेजे गए पर्यवेक्षक के खिलाफ केस दर्ज कर दिया था। मैंने उनसे कहा कि यह गलत है, आप केस वापस नहीं लेंगे तो मुझे राष्ट्रपति को लिखना पड़ जाएगा। उसके बाद एक और मामला आया जिसमें मुख्यमंत्री राजनैतिक रैली के लिए जा रहे थे। मैंने उनसे कहा था कि आप चुनावी रैली के लिए राज्य की गाड़ी, गेस्ट हाउस, हेलीकॉप्टर वगैरह का इस्तेमाल नहीं कर सकते हैं। तीसरे मामले में भी मुझे मुख्यमंत्री को कहना पड़ा कि आप नहीं मानेंगे तो मुझे राष्ट्रपति को लिखना पड़ेगा। कहने का मतलब यह कि आपको कदम उठाने पड़ेंगे।

विपक्षी दल लगातार ईवीएम को लेकर सवाल उठा रहे हैं। आपका क्या कहना है?

मेरे समय में लालकृष्ण आडवाणी और सुब्रह्मण्यम स्वामी ने पत्र लिखकर इस मामले को उठाया था। उन लोगों ने कहा कि ईवीएम को हैक किया जा सकता है। उनको भरोसा दिलाने के लिए मैंने कहा कि आप अपनी टीम के साथ आइए और उसे हैक करके दिखाइए। मैंने 100 मशीनें मंगवाई हैं और एक तरह से पोलिंग स्टेशन तैयार कर दिया है। वे ईवीएम को हैक नहीं कर पाए। फिर कुछ लोगों ने कहा कि ईवीएम को घर ले जाने की इजाजत दें। मैंने कहा कि ऐसा मैं नहीं कर सकता, क्योंकि आप घर ले जाकर रिवर्स इंजीनियरिंग कर सकते हैं। एक हफ्ते तक बातचीत चलती रही, उसके बाद स्वामी ने कहा कि हम संतुष्ट हैं, लेकिन पेपरट्रेल की व्यवस्था करिए। उसी के बाद से मैंने वीवीपैट की शुरुआत की। वीवीपैट अच्छी तरह से काम कर रहा है। जहां तक 50 फीसदी वीवीपैट काउंटिंग की बात है तो यह तर्कसंगत नहीं है। इसे 5-10 फीसदी किया जा सकता है। अगर 50 फीसदी करना है तो फिर ईवीएम की क्या जरूरत है? चुनाव आयोग को सभी पक्षों को तर्कसंगत रूप से संतुष्ट करना जरूरी होता है।

नमो टीवीविवाद पर आयोग के रवैए को आप कैसे देखते हैं, खास तौर पर जब यह पता नहीं है कि टीवी का लाइसेंस कब लिया गया, उसका मालिक कौन है?

देश में 500 न्यूज चैनल आ गए हैं, कई चैनल  राजनैतिक दलों के हैं। जब एक न्यूज चैनल 24 घंटे एक राजनीतिक दल का लगातार संदेश दे रहा है, तो क्या इससे आचार संहिता का उल्लंघन नहीं होता है? आपको मैं मैक्सिको के उदाहरण से समझाता हूं, कि वहां 95 फीसदी चैनल एक ही बिजनेसमैन के हैं। वहां चुनाव आयोग सभी चैनल से राजनीतिक दलों की संख्या के आधार पर समय दिलवाता है। निर्दलीय प्रत्याशियों को भी समय मिलता है। उसे हमें कानूनी तरीके से लागू करना चाहिए।

कश्मीर में केवल पांच फीसदी मतदान हुआ है, इसे क्या लोकतंत्र की सफलता मानते हैं?

जब 2002 में तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त जे.एम. लिंग्‍दोह ने चुनाव कराया था तो कश्मीर में तीन से चार फीसदी मतदान हुआ था। उसके बाद कई कदम उठाए गए, जिससे मतदान प्रतिशत 22 फीसदी तक पहुंच गए। यह मायने नहीं रखता है कि मतदान कितना हुआ, हमें चुनाव कराते रहना चाहिए।

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