कांटों का ताज

हरवीर सिंह
अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर चुनौतियों का पहाड़
अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर चुनौतियों का पहाड़

हरवीर सिंह
जो नई सरकार केंद्र में सत्ता संभालेगी उसे एक लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था मिलेगी। उसके पास 'न्याय' और दूसरी लोकलुभावन योजनाओं के लिए पैसा नहीं होगा

सत्रहवीं लोकसभा के चुनावों के दौरान उठे राजनीतिक धूल-गुबार के छंटने के दिन करीब हैं और 23 मई को तय हो जाएगा कि देश में कौन सा राजनैतिक दल या गठबंधन सरकार बनाएगा। दावों-प्रतिदावों के बीच देश के आम नागरिक और सरकार के लिए आने वाले दिन बहुत सुकून भरे नहीं रहने वाले हैं। काफी समय के बाद पहली बार नई सरकार के सामने देश की अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर चुनौतियों का पहाड़ खड़ा होगा। थोड़ा पीछे जाकर केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली पहली एनडीए सरकार की बात करें तो भले ही 'इंडिया शाइनिंग' का नारा राजनैतिक रूप से उसे भारी पड़ा हो, लेकिन वह सरकार एक तेज वृद्धि दर के दौर के लिए तैयार अर्थव्यवस्था छोड़कर गई थी। उसके बाद सत्ता में आई यूनाइटेड प्रोग्रेसिव एलायंस (यूपीए) की सरकार को बेहतर मौका मिला और अर्थव्यवस्था दो अंकों की तिमाही वृद्धि दर तक पहुंची, जो 2008 के वैश्विक आर्थिक संकट को भी झेल गई। लेकिन यूपीए-2 के दौरान 2013 तक अर्थव्यवस्था निचले स्तर पर पहुंच गई थी और उसके बाद सुधार का रुख कर चुकी थी।

इस तरह से देखें तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार को एक सुधरती अर्थव्यवस्था मिली थी। साल 2014-15 तो बेहतर रहा ही, 2015-16 और बेहतर रहा। लेकिन उसके बाद हालात सुधरने के बजाय बिगड़े और पहला झटका 2016-17 में लगा। भले ही सरकार कितने ही दावे करे लेकिन सच्‍चाई यह है कि अर्थव्यवस्था कमजोर वृद्धि दर के दौर में फंस गई है। पिछले दिनों खुद प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनेंस ऐंड पॉलिसी (एनआइपीएफपी) के डायरेक्टर रथिन रॉय ने स्वीकार किया कि अर्थव्यवस्था के कमजोर विकास दर के दौर में फंसने की स्थिति बन गई है। इसी तरह की जानकारी वित्त मंत्रालय ने ताजा समीक्षा में भी दी है। अब सवाल उठता है कि राजनैतिक मोर्चे पर राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे और राष्ट्रवाद की बैसाखी के सहारे चुनाव जीतने की कोशिश कर रही नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार को आर्थिक मोर्चे पर पैदा हुई परिस्थिति का जवाब देना होगा, क्योंकि देश का हर नागरिक एक बेहतर भविष्य की उम्मीद में ही सरकार चुनता है। उसके सामने 2014 में गुजरात मॉडल और अच्छे दिन का वादा रखकर वोट हासिल किए गए थे। लेकिन मौजूदा चुनावी माहौल में यह दावे गायब हैं। असल में कमजोर होती अर्थव्यवस्था की आहट ही नहीं, अब कई सारे तथ्य इसे साबित कर रहे हैं कि देश में उपभोक्ता मांग सुस्त पड़ रही है। यानी लोगों के पास या तो खर्च करने के लिए पैसे नहीं हैं या फिर वह संकोच कर रहे हैं। देश की बड़ी एफएमसीजी कंपनियां हिंदुस्तान यूनिलीवर और डाबर इंडिया की बिक्री से संकेत मिल रहे हैं कि रोजमर्रा की जरूरत के सामान में भी लोग कटौती कर रहे हैं। इसके अलावा जिस तरह से ऑटो सेक्टर की बिक्री के अप्रैल, 2019 के आंकड़े  करीब एक दशक बाद सबसे बड़ी गिरावट दिखा रहे हैं, कि स्थिति काफी खराब हो गई है। वहीं, स्टॉक मार्केट में हाल के दिनों में लगातार नौ सत्रों की गिरावट ने भी दशकों का रिकॉर्ड बनाया है। औद्योगिक उत्पादन सूचकांक 21 महीने के निचले स्तर पर ही नहीं, बल्कि ताजा आंकड़ों में यह ऋणात्मक हो गया है। इसलिए केवल राजनीतिक बयानबाजी में ही 70 साल में पहली बार या 65 साल में पहली बार की बात नहीं की जा रही है। आर्थिक मोर्चे पर भी दो साल, 10 साल, 45 साल में पहली बार ऐसे रिकॉर्ड बन रहे हैं। रोजगार के मोर्चे पर सरकार द्वारा रोकी गई एनएसएसओ की रिपोर्ट 45 साल में सबसे अधिक बेरोजगारी की बात कह रही है। इस बीच आंकड़ों की विश्वसनीयता को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। लेबर ब्यूरो और एनएसएसओ के रोजगार के आंकड़े जारी नहीं किए गए। सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की नई सीरीज और बैक सीरीज को लेकर सवाल उठे और राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग (एनएससी) लगभग निष्क्रिय स्थिति में पहुंच गया है। हाल में जब जीडीपी के आकलन के लिए उपयोग किए गए एमसीए-21 के आंकड़ों को लेकर सवाल उठे तो उसके चलते जीडीपी के मौजूदा स्तर पर ही सवाल उठ गया है।

बात केवल घरेलू मोर्चे की नहीं है, अर्थव्यवस्था के वाह्य क्षेत्र भी हमारे लिए मुश्किलें बढ़ाने वाले हैं। अमेरिका और चीन के बीच ट्रेड वार से पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। इसके अलावा अमेरिका के ईरान पर प्रतिबंधों के चलते हमें कच्चे तेल की कीमतों के मोर्चे पर संकट का सामना करना पड़ सकता है। अब जो नई सरकार केंद्र में सत्ता संभालेगी उसे एक लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था मिलेगी। असल में, उसे कांटों का ताज पहनना होगा। उसके लिए न तो 'न्याय' जैसी किसी योजना की फंडिंग के लिए खजाने में पैसा मिलेगा और न ही दूसरी लोकलुभावन नीतियां लागू करने का माहौल मिलेगा। साथ ही सिर उठाती महंगाई से भी उसे जूझना होगा। नई सरकार जब अपना पहला बजट पेश करेगी तो उसी से उसकी अग्निपरीक्षा शुरू होगी जो आने वाले दिनों में उसके राजनैतिक भविष्य को भी तय करेगी। 

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