चुनाव में स्त्रीः नारी द्वेष के चुनावी खेत-खलिहान

भावना विज-अरोड़ा और जी.सी. शेखर
सितारों की सत्ताः चुनाव प्रचार के दौरान बंगाल भाजपा की हुबली उम्मीदवार और नामचीन अभिनेत्री लॉकेट चटर्जी
सितारों की सत्ताः चुनाव प्रचार के दौरान बंगाल भाजपा की हुबली उम्मीदवार और नामचीन अभिनेत्री लॉकेट चटर्जी
संदीपन चटर्जी

भावना विज-अरोड़ा और जी.सी. शेखर
प्रचार के दौरान महिला उम्मीदवार जो सहती हैं वह दुःस्वप्न से कम नहीं, इसका एक ही समाधान है, महिला सांसदों-विधायकों में इजाफा

हमें अली चाहिए, हमें बजरंग बली चाहिए,लेकिन हम अनारकली नहीं।” -अब्दुल्ला आजम खान

ये लफ्ज देश की संसद में पहुंचने के लिए चुनाव लड़ रही महिलाओं में एक, रामपुर से भाजपा की उम्मीदवार जयाप्रदा के बारे में समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार आजम खान के बेटे के हैं, जो खुद बोलने में सावधानी नहीं बरतते। इससे एक बात तो साफ है कि ‘धर्मनिरपेक्ष’ राजनीति खुद-ब-खुद स्‍त्री समर्थक या कहिए स्‍त्री-भेदभाव विरोधी होने की गारंटी नहीं देती है। यही नहीं, ‘नाचनेवाली’ जैसा फिकरा भी जाहिर तौर पर जयाप्रदा के फिल्म करिअर पर निशाना था। हालांकि किसी को इससे यह गफलत भी हो सकती है कि ऐसे पुरुष वर्चस्ववादी जुमले तो उन्हीं महिला उम्मीदवारों को अगंभीर राजनीतिक साबित करने के लिए उभरते हैं, जो अपनी ‘ग्लैमरस छवि’ के सहारे राजनीति चमकाना चाहती हैं। लेकिन अच्छी वक्ता और लोकसभा बहसों में पूरी गंभीरता से हिस्सा लेने वाली रंजीत रंजन को ही लीजिए। अपनी ताकत का एहसास दिलाने के लिए हर्ले डेविडसन मोटरसाइकिल की सवारी कर संसद पहुंचने वाली, रंजीत रंजन स्वीकारती हैं कि वे बिहार में अपने पिछड़े हुए संसदीय क्षेत्र सुपौल में ऐसा करने के बारे में सोच भी नहीं सकतीं।   

निष्कर्ष अपिरहार्य हैः यह नजरिया गहरे बैठा हुआ है। सार्वजनिक जीवन में हर दूसरे क्षेत्र की तरह, राजनीति में भी महिलाओं के खिलाफ एक तरह की मजबूत भावना काम करती है, जिसका सामना पुरुषों को कभी नहीं करना पड़ता। ‌स्त्रियों के प्रति यह दुराग्रह हमेशा से रहा है, आज भी जारी है...और इसके नतीजे सामान्य उपेक्षा से लेकर गहरे विद्वेष के रूप में दिखते हैं। भारत में यह हमेशा से रहा है और आज भी कायम है, इसलिए इस तथ्य को नेतृत्व की ऊपरी पांत में पहुंचीं ताकतवर महिला के होने से भी शायद ही कभी नकारा जा सका। इंदिरा गांधी से लेकर जयललिता और अब मायावती तक, सभी को इसका सामना करना पड़ा है। महिलाओें की सबसे ज्यादा तौहीन तो तब होती है जब वे चुनाव अभियान की कठिन और ऊबड़-खाबड़ डगर पर पैर रखती हैं। शक्तिशाली महिलाओं को सार्वजनिक जीवन में जो झेलना पड़ता है, वह आम महिलाओं को तो रोज ही सहना पड़ता है। 2004 में नगमा-मोरारजी का मेरठ का अनुभव बुरे सपने की तरह था। राबड़ी देवी को कहा गया था कि उन्हें “घूंघट में रहना चाहिए”, बीजू जनता दल की चंद्रानी मुर्मू को हाल ही में एक मार्फ्ड वीडियो के कारण बदनामी झेलनी पड़ी।

भाजपा की प्रवक्ता, महाराष्ट्र की मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस की सलाहकार श्वेता शालिनी आउटलुक से कहती हैं कि यूं तो कोई भी क्षेत्र महिलाओं के लिए आसान नहीं है लेकिन राजनीति तो सबसे कठिन है क्योंकि यह अभी भी पूरी तरह पुरुष वर्चस्व का क्षेत्र है। हर महिला नेता को उसके स्‍त्री-पक्ष की नजर से देखा जाता है और वही उसकी मूल काबिलियत मानी जाती है।

शालिनी कहती हैं, “क्यों प्रियंका गांधी की साड़ी और अपनी दादी की तरह दिखना ही खबर बननी चाहिए? किसी महिला नेता की पहचान उसकी नेतृत्व क्षमता के लिए पहले होनी चाहिए, स्‍त्री के रूप में बाद में। उसके काम पर चर्चा होनी, न कि उसके चेहरे-मोहरे या कपडों पर। भारत में तो देवियों के सकारात्मक गुणों की चर्चा है, लक्ष्मी समृद्घि, सरस्वती ज्ञान और दुर्गा शक्ति के लिए जानी जाती हैं. हमें स्त्रियों की ऐसे और महिमामंडन की दरकार है।”

महिला उम्मीदवारों को चुनाव प्रचार में गहरे उतरना पड़ता है, कुछ अतिरिक्त क्षमताओं को उभारना पड़ता है। जयाप्रदा कहती हैं, “मुझे समझ नहीं आता कि हंसूं या रोऊं। उनके (अब्दुल्ला के) पिता मुझे आम्रपाली बुलाते हैं, वे अनारकली कहते हैं।” लेकिन सार्वजनिक रूप से “अंडरवियर” जैसे बेहद अपमानजनक फिकरे के बावजूद वे रामपुर में डटी रहीं।

ओछापनः 2014 लोकसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस विधायक ने नगमा को चूम लिया था

महागठबंधन के उम्मीदवार के रूप में कांग्रेस के टिकट पर अपनी सीट बचाए रखने के लिए चुनावी समर में मौजूद तेजतर्रार रंजन कहती हैं, “मैं अपने निर्वाचन क्षेत्र में बाइक नहीं चला सकती। एक महिला होने के नाते, मुझे अपनी छवि के बारे में बहुत सावधान रहना होगा।” राजद के कुछ असंतुष्ट नेता उनके चुनाव में अड़चन पैदा करने का संकेत दे रहे हैं लेकिन वे बेफिक्र हैं। रंजीत रंजन ने आउटलुक से कहा, “उन्हें लगता है कि वे लोग मुझे डरा लेंगे, क्योंकि मैं औरत हूं लेकिन मुझे जानते नहीं हैं। मैं किसी से नहीं डरने वाली।”

खुशबू सुंदर भी किसी की धौंस में नहीं आने वाली हैं। हाल ही में एक चुनावी रैली में उनकी ओर एक आदमी लपका तो उन्होंने उसे झापड़ रसीद कर दिया। बेंगलूरू की इस घटना के बारे में अभिनेत्री से हिम्मती राजनीतिक बनीं खूशबू कहती हैं, “उसे उम्मीद रही होगी कि मैं कुछ नहीं करूंगी। लेकिन मैं तो उन लोगों में से हूं जो फौरन जवाब देते हैं। जब मैं द्रमुक में थी तब भी ऐसी ही घटना हुई थी, मैंने पलट कर उस आदमी को खींच के धर दिया था।”

यौन दुर्व्यवहार तो इंतहा है मगर स्‍त्री-विरोधी धारा के विपरीत निरंतर तैरना तो रोजना की बात है।  रंजन कहती हैं कि उन्हें इस मुकाम पर पहुंचने के लिए पुरुषों के मुकाबले “दोगुनी” कोशिश करनी पड़ी है। लंबे-चौड़े संसदीय क्षेत्र की धूलभरी गलियों को नापती रंजीत रंजन कहती हैं, “जब आप नौसिखिया होते हैं, तो पार्टी कार्यकर्ता आप पर हावी होने की कोशिश करते हैं। शुरुआती दिनों में पार्टी कार्यकर्ता तो मेरे बेडरूम में घुस आते थे।” 

विधानसभाओं और संसद में 33 प्रतिशत आरक्षण का वादा यदि अमली जामा पहन लेता है तो यह महिलाओं के प्रति खुलमखुल्ला या छुपे हुए दोनों ही तरह के हिंसक रवैए के लिए तूफान साबित होगा। सोशल मीडिया के इस नए जमाने में आज की नई महिला उम्मीदवारों को खुद ही अपने आसपास घेरा खींचना होगा। केवल कठोर महिलाएं ही भारतीय राजनीति के अस्थिर वातावरण में सुरक्षित रह पाएंगी। हाल तक कांग्रेस प्रवक्ता रहीं प्रियंका चतुर्वेदी ने, यूपी के कुछ स्थानीय नेताओं के कारण पार्टी छोड़ दी। उन लोगों ने इस महीने की शुरुआत में मथुरा में उनके साथ दुर्व्यवहार किया था। लेकिन चुनाव के वक्त उन्हें बहाल कर दिया गया। उन्होंने आउटलुक से कहा, “मैं अपनी गरिमा से समझौता करने को तैयार नहीं थी।”

महिला उम्मीदवार और प्रचारक राजनीतिक आकाओं के पितृसत्तात्मक व्यवस्था के चलते हमेशा कमजोर रहती हैं। उनके पुरुष सहयोगियों को जो नहीं सहना पड़ा, चुनाव प्रचार के दौरान महिलाओं का साबका उन स्थितियों से भी पड़ता है। भीड़ में उनके घिर जाने के खतरे के साथ उन्हें जलती हुई स्‍त्री विरोधी टिप्पणियां भी सुननी पड़ती हैं। प्रियंका कहती हैं, “आजम खान ने बहुत ही अपमानजनक टिप्पणी की है। उससे भी खराब बात यह है कि वहां मौजूद लोगों ने इसका आनंद उठाया। किसी पर सिर्फ इसलिए निशाना साधा जाए कि वह स्‍त्री है, उसका चरित्र हनन किया जाए और मतदाताओं के बीच उसकी छवि धूमिल करने के लिए उसकी साख पर सवाल उठाए जाएं।”

ममता बनर्जी, जयललिता, मायावती यहां तक कि सोनिया गांधी जैसी महिलाओं के नेतृत्व वाली पार्टियों ने भी, महिला उम्मीदवारों को कमजोर रूप में देखने, पुरुषवादी व्यवहार के खिलाफ या स्थानीय क्षत्रपों की दादागीरी के खिलाफ जाकर स्थिति खत्म करने की कोशिश नहीं की। एक कारण यह भी है कि जमीनी स्तर पर, यहां तक कि महिला नेता भी अपनी पार्टियों को चलाने के लिए पुरुष प्रतिनिधियों पर बहुत निर्भर करती हैं। इससे पुरुष उम्मीदवारों की पसंद में दबदबा रहता है, उनके प्रचार अभियान को अपने हिसाब से करने की छूट मिलती है, जो उनका राजनैतिक भविष्य निर्धारित करता है। 

इसके अलावा जब ज्यादातर पार्टियां, साफ प्रतिनिधित्व से ऊपर ‘जिताऊ’ उम्मीदवार चुनती हैं तब महिलाएं सौदेबाजी में हार जाती हैं। हालांकि पार्टियों के पास जो आंकड़े हैं वे इसे झुठलाते हैं। उदाहरण के लिए, 1991 में जब जयललिता पहली बार जीती थीं तब उनके साथ 24 महिला विधायक थीं, तमिलनाडु के इतिहास में यह सर्वाधिक संख्या थी। 1996 की हार के बाद इस संख्या में कमी आती गई क्योंकि उन्हें ज्यादा से ज्यादा ‘जिताऊ’ उम्मीदवारों की तलाश थी। 2001 के बाद महिला मंत्रियों के बारे में पूछे जाने पर उनका पसंदीदा रटा-रटाया वाक्य था, “मैं राज्य की सभी महिलाओं का प्रतिनिधित्व करती हूं।” नवीन पटनायक ने लोकसभा चुनावों के लिए महिलाओं को 33 प्रतिशत सीटें देकर एक उदाहरण स्थापित करने की मांग की है, लेकिन उन्होंने विधानसभा चुनावों में उस विशेषाधिकार का विस्तार नहीं करने का फैसला किया, जो वह एक साथ लड़ रहे हैं।

जोर का झटकाः भीड़भाड़ वाली चुनावी रैली में खुशबू ने एक शोहदे को जड़ा तमाचा

विभिन्न स्तरों पर जीत के लिए क्षमता आंके जाने की बाधा पार करने और अलग-अलग लॉबी की पैंतरेबाजी करना टिकट पाने के लिए संघर्ष की तरह है। 2014 में मेरठ से चुनाव लड़ने का एक अनुभव याद करते हुए नगमा कहती हैं, “एक महिला को कमजोर सीट से टिकट की पेशकश की जाती है, जहां पार्टी का काडर मजबूत नहीं है। वह इसे चुनौती के रूप में स्वीकार कर लेती हैं, सिर्फ खुद को साबित करने के लिए।” टिकट मिलने के बाद चुनाव अभियान पर निशाना साधा जाता है...जैसे खुशबू। नगमा को भी रैली में एक व्यक्ति को उनके साथ दुर्व्यवहार करने के लिए थप्पड़ मारना पड़ा था।

किसी महिला उम्मीदवार के अभियान पर बारीक निगाह सभी विरोधाभासों को सामने लाती है। तमिलनाडु के करूर से कांग्रेस उम्मीदवार एस. ज्योतिमणि कहती हैं, “विधायक या सांसद का पद सुरक्षा चक्र लिए होता है लेकिन इस यात्रा का व्यावहारिक नुकसान भी है। यह स्वीकार करना होगा कि हम पुरुष-प्रधान क्षेत्र में काम कर रहे हैं, जहां महिला को नेता के रूप में आसानी से स्वीकार नहीं किया जाएगा। आपको संदेश देना होगा कि आप किसी पुरुष के समान ही सम्मान की उम्मीद करते हैं।”

अपने पारिवारिक संबंधों के कारण (कनिमोझी, सुप्रिया सुले, मीसा भारती, डिंपल यादव और अनिता कुमारस्वामी) या अपने सेलेब्रिटी स्टेटस (जया प्रदा, हेमा मालिनी, स्मृति ईरानी और अब उर्मिला मातोंडकर) के कारण राजनीति में आने वाली महिलाओं के विपरीत ज्योतिमणि जमीनी स्तर पर काम कर यहां तक पहुंची हैं। 22 साल की उम्र में उन्होंने राजनीति में कदम रखा था और वह करूर जिले में के. परमार्थी पंचायत संघ के सदस्य के रूप में निर्वाचित हुई थीं। कांग्रेस के टिकट पर विधानसभा चुनाव (2011) और लोकसभा चुनाव (2014) हारने के बाद वह तीसरी बार भाग्यशाली होने की उम्मीद कर रही हैं।

शांत मुस्कान और सहज व्यवहार वाली लंबी, सांवली और दुबली ज्योतिमणि (44) ग्रामीण तमिल लड़की लगती हैं। गांव वाले उनमें ‘पड़ोस में रहने वाली लड़की’ की छवि देखते हैं। उनमें ऐसा कुछ नहीं है जिससे सेलेब्रिटी होने जैसा आभास हो। ज्योतिमणि ने पूरा दिन परमार्थी संघ के साथ बिताया और उनकी आवभगत में या उनके प्रति गर्मजोशी में कहीं कोई कमी नहीं थी। पालमपुरम गांव की राज लक्ष्मी कहती हैं, “हमें उनकी सादगी पसंद है। हम संकट के समय कभी भी उन्हें फोन कर सकते हैं। इसके विपरीत, वर्तमान सांसद (लोकसभा उपाध्यक्ष थम्बीदुरई) बहुत ही घमंडी और पकड़ में न आने वाले व्यक्ति हैं। भावनात्मक जुड़ाव से इतर इस बात में कोई शक नहीं है कि ज्योतिमणि के चुनावी अभियान की पूरी कमान पुरुषों के हाथ में है। अभियान का मार्ग और वह कहां ठहरेंगी, यह स्थानीय डीएमके पदाधिकारी करुणानिधि द्वारा निर्धारित किया गया था, जबकि डीएमके के दो स्थानीय मजबूत पूर्व मंत्री के. चिन्नास्वामी और सेंथिल बालाजी उनके साथ चलते हैं। लेकिन ऐसा हमेशा नहीं होता।

संकरी गलियों वाला पूर्वी दिल्ली का दलित बहुल निर्वाचन क्षेत्र कोंडली, जहां बमुश्किल कार जा सकती है, वहां सारिका सावधानी से आम आदमी पार्टी की उम्मीदवार आतिशी की एसयूवी को चलाते हुए गुजरती हैं। 37 साल की मृदुभाषी आतिशी कहती हैं कि सारिका उनके लिए सिर्फ “सारथी” नहीं हैं, वह प्रचार के दौरान उनकी साथी और सहयोगी भी हैं। रिहायशी बस्ती आते ही जैसे ही आतिशी कार से उतरती हैं, सारिका सुनिश्चित करती हैं कि उनके चारों ओर केवल भरोसेमंद पार्टी कार्यकर्ता ही हों, ताकि वह एक सुरक्षात्मक घेरा बना सकें। आउटलुक से बात करते हुए आतिशी ने कहा कि महिला होने के नाते उन्होंने कभी कोई बड़ी परेशानी का सामना नहीं किया। शायद इसलिए कि “दूसरी राजनैतिक पार्टियों से ‘आप’ अलग तरह की पार्टी है।” वह कहती हैं कि भीड़ भरी राजनैतिक रैलियों में कुछ लोगों से बचने के लिए सुरक्षा की जरूरत होती है।

आतिशी का मानना है कि “सड़क पर रहने के दौरान एक व्यावहारिक समस्या, यूरिनल खोजने की होती है क्योंकि सार्वजनिक शौचालय आसानी से उपलब्ध नहीं होते। लेकिन यह समस्या सिर्फ महिला राजनेताओं की नहीं है बल्कि हर महिला की है।” आतिशी कहती हैं, दरअसल, ये ऐसे तथ्य हैं, जिन पर पार्टियों को महिलाओं को ज्यादा से ज्यादा टिकट देने चाहिए। सारिका उन्हें अगली बैठक में चलने की याद दिला रही हैं। इस बीच वह कहती हैं, “महिलाएं महिलाओं की चिंताओं को बेहतर तरीके से समझती हैं। यह एक सत्य अनुभव है, इसका कोई विकल्प नहीं है। जैसे एक दलित, उसके समुदाय के सामने आने वाली समस्याओं को बेहतर तरीके से समझ सकता है। एक महिला सुरक्षा, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी चिंताओं को सुनिश्चित कर सकती है। पुरुष इन मामलों को पर्याप्त ढंग से नहीं देख सकते।”

इन सब के बीच शारीरिक और व्यक्तिगत बाधाओं को भी पार किया जा सकता है। मुंबई की उत्तर मध्य सीट से कांग्रेस की सांसद रह चुकीं प्रिया दत्त को ही लीजिए। उन्हें पिता सुनील दत्त की राजनीति विरासत में मिली लेकिन उन्होंने इसे सुरक्षित अपने पसीने खून और मां के दूध से किया। प्रिया उस दौर को याद कर कहती हैं, “2005 में जब मैं अपना पहला चुनाव लड़ रही थी मैं गर्भवती थी। नामांकन दाखिल करने के बाद ही मुझे अस्पताल में भर्ती होना पड़ा। दो दिन के अंदर ही ऑपरेशन से बच्चा हो गया। लगभग तुरंत ही मुझे अस्पताल से बाहर आना पड़ा और प्रचार में हिस्सा लेना पड़ा, क्योंकि हमारे पास सिर्फ 15 दिन का समय था। मैंने खुद को जीप पर सवार होकर लोगों का अभिवादन करते पाया। मैंने वह सब किया जो चुनाव प्रचार में होता है।”

प्रिया ने सीखा कि महिला और मां होने के भी अपने लाभ थे। उनके निर्वाचन क्षेत्र की महिलाओं ने उनकी नाजुक स्थिति को समझा (नवजात को दूध पिलाने के लिए उन्हें हर दो घंटे में घर जाना पड़ता था)। वे हैरान थीं कि प्रिया अपने स्वास्थ्य को खतरे में डाल रही हैं। वे कहती थीं, “इस हालत में आप ये सब क्यों कर रही हो? हम आपका प्रचार संभाल लेंगे। आप घर पर रहो।” वह याद करते हुए कहती हैं, “लेकिन मुझे पता था कि यह तरीका काम नहीं करेगा और यह संभव भी नहीं है। वह बहुत मुश्किल समय था और मुझे लगता है कि मैं उस दौरान ही समझ पाई कि महिलाएं किन परिस्थितियों से जूझती हैं, खासकर कामकाजी महिलाएं। उनके पास घर पर बैठने का समय नहीं होता है। शायद मुझे उनकी तकलीफों का एहसास करना था।”

ज्योतिमणि के लिए, पंचायत संघ के सदस्य के रूप में अपने पहले कार्यकाल के दौरान, राजनीति और परिवार के बीच चुनने का एक विकल्प था और उन्होंने पहले को चुना। “स्थानीय समस्याओं को लेकर लोग सुबह छह बजे से मेरे घर आ जाते थे। अक्सर मैं पंचायत और पार्टी के काम के बाद देर से घर लौटती थी। मैंने कामकाज का रास्ता चुना, लोगों पर पूरी तरह से ध्यान देने के लिए अकेले रहो।” वह कहती हैं कि वर्ना वह अच्छी पत्नी, अच्छी नेता, मां, बहू के रूप में संघर्ष करती रहतीं। या तो परिवार खराब होता या उनका राजनैतिक जीवन। 44 साल की उम्र में उन्होंने मेहनती अविवाहित राजनेता होना चुना है। 

फिल्म के बाद राजनीति में प्रवेश करने वाली खुशबू की दो छोटी बच्चियां अभी स्कूल में ही थीं लेकिन वह मानती हैं कि उन्हें परिवार से ताकत मिलती है। वह कहती हैं, “अपनी सास और मां के सहयोग की वजह से ही मैं यह कर सकी। अब बेटियां बड़ी हो गई हैं और अपना ध्यान खुद रख सकती हैं। लेकिन दस साल पहले परिवार का सहयोग बहुत जरूरी था।”

अक्सर, एक महिला की राजनीतिक महत्वाकांक्षा को पारिवारिक सहमति के माध्यम से देखने की आवश्यकता होती है। अगर कोई महिला उम्मीदवार सेलेब्रिटी हो तब भी। उड़िया अभिनेत्री और टीवी प्रस्तोता पिंकी प्रधान बीजापुर उपचुनाव के दौरान वहां रहीं और वहां प्रचार किया। लेकिन यह पहली बार हुआ जब उन्होंने डिगापहांडी में बीजेपी उम्मीदवार के रूप में, अस्का लोकसभा क्षेत्र के विधानसभा क्षेत्र में अपने लिए प्रचार किया। अपने निर्वाचन क्षेत्र के रूढ़िवादी सांस्कृतिक मानदंडों को देखते हुए, जहां हर महिला अपने सिर को घूंघट से ढकती है, उसके ससुराल वालों को उसके नामांकन की खबर कैसी लगी? वह बताती हैं, “खुशकिस्मती से मेरे सास-ससुर उदार और नए जमाने के हैं। वे इस सब से बहुत खुश थे। पहली बार मुझे यह महसूस हुआ कि मैंने उन्हें गर्व महसूस कराया है।”

एक सेलेब्रिटी उम्मीदवारों के बारे में विचार मिले-जुले हो सकते हैं। खासकर तब जब ग्लैमर व्यक्तित्व का हिस्सा हो। लेकिन वे अलग अर्थ में इसे शुरू करते हैं। इसलिए जब, टॉलीवुड स्टार और बशीरत से तृणमूल कांग्रेस की उम्मीदवार, नुसरत जहां, “तोमे हिरद मझारे रखिबो चेरो देबो ना...” (मैं आपके दिलों में रहूंगी और आपको कभी जाने नहीं दूंगी) गाती हैं तो, अनजाने से मालतीपुर गांव में हजारों की भीड़ उत्तेजित हो जाती है।

अपनी गुरु और पार्टी बॉस, ममता बनर्जी की तरह डायस संभाले, पतली लाल किनारी वाली क्रीम तंगेल सूती साड़ी और मैच करते लाल बैकलेस ब्लाउज पहने नुसरत हर तरफ से एक ग्लैमरस फिल्म स्टार लगती हैं। उनके हर पॉज पर केवल सीटियां, चिल्ला चोट और तालियों की गूंज तेज और तूफानी होती जाती है। ममता ने पांच फिल्मी सितारों पर चुनावी दांव खेला है, जिसमें तीन महिलाएं और दो पुरुष हैं। जाहिर सी बात है, यह व्यावहारिक चुनावी बढ़त है।

जहां स्वीकारती हैं कि भीड़ जुटने का कारण उनकी स्टार वैल्यू है। वह कहती हैं, “वास्तव में यही हो रहा था। लेकिन अब वे मुझे इस इरादे से देखने आ रहे हैं कि मैं उनके लिए एक नेता और बेहतर प्रतिनिधि साबित होऊं।” वरना इतिहास अक्सर अलग साबित हुआ है। फिल्मी सितारे हमेशा अच्छे सांसद या विधायक साबित नहीं होते। हेमा मालिनी और जया प्रदा जैसे बॉलीवुड सितारों के प्रदर्शन रिकॉर्ड सबसे ज्यादा खराब हैं।

सड़कों पर प्रशंसकों के साथ ट्रोल्स भी आते हैं। उम्मीदवारी को घोषणा के बाद ही नुसरत ने “बिकनी” में अपनी ऑनलाइन तस्वीरें देखीं। नुसरत ने आउटलुक से कहा, “वो बिकनी वाली फोटो मेरी नहीं थीं। जाओ यार, मेरे पास दिखाने के लिए बिकनी बॉडी नहीं है। जाहिर सी बात है वो मॉर्फ्ड फोटो हैं।” वह भीड़ को इस बात के लिए भी चेताती हैं कि सोशल मीडिया पर उनके बारे में फैलाई जा रही बकवास बातों पर भरोसा न करें।

लेकिन सेलेब्रिटी होना ही काफी नहीं है। असम के गुवाहाटी निर्वाचन क्षेत्र से 52 वर्षीय, कांग्रेस की उम्मीदवार बॉबीता शर्मा टेलीविजन पर लोकप्रिय चेहरा रही हैं। सौंदर्य प्रतियोगिता की विजेता होने के अलावा उन्होंने कई टीवी शृंखलाओं का निर्देशन और निर्माण किया है। लेकिन वो राजनैतिक काम ही था जो उन्हें यहां तक लाया। वह कहती हैं, “उम्मीदवारी लेना चुनौती की तरह है। कई सालों बाद भी यह भाग्य का मामला है। लेकिन मुझे लगता है कि उस चरण के बाद, यह लिंग के कारण उतना मुश्किल नहीं है। लोगों के लिए, वास्तव में यह मायने नहीं रखता कि उम्मीदवार महिला है या पुरुष। यह बात मैं अनुभव से कह रही हूं। आखिर यह प्रदर्शन ही है जो मायने रखता है। वास्तव में कई अवसरों पर फील्ड में महिला होने के नाते कुछ फायदे हैं। महिला के तौर पर किसी के घर में प्रवेश करना आसान है, जहां परिवार आपका स्वागत करेगा। पुरुषों के लिए यह कठिन हो सकता है।”

दुर्लभ अवसरों पर, चुनावी क्षेत्र में महिलाओं का प्रवेश अन्य क्षेत्रों से होता है। तमिलनाडु की दलित पार्टी वीसीके ने  2016 के विधानसभा चुनावों में आर.के. नगर सीट से जयललिता के खिलाफ विश्वविद्यालय की भूतपूर्व कुलपति डॉ. वासंती को उतारा था। वह अकेले चुनाव लड़ी थीं। लेकिन यह बेकार की कवायद साबित हुई। वासंती देवी का पॉलिटिकल ग्राफ गिर गया और जैसा कि होता है, वीसीके भी गठबंधन की राजनीति में उलझ गया।

तमिल फिल्म निर्देशक से राजनेता बने सीमन की गौण करार दे दी गई पार्टी, नाम तमिलर इय्यक्कम ने इस बार 20 महिलाओं को चुनावी रण में उतारा है। सीमन ने उन कार्यकर्ताओं को चुना है जिन्होंने जमीनी स्तर पर विरोध प्रदर्शन किया है। उनकी उत्तरी चेन्नै की उम्मीदवार कालिअम्मल नागापट्टिनम की मछुआरिन हैं और वह नेदापुसालम में हाइड्रोकार्बन के निष्कर्षण के खिलाफ किसान आंदोलन में सबसे आगे थीं। स्पष्ट और विवेकपूर्ण तर्क करने वाली कालिअम्मल प्रचार के दौरान ध्यान खींचती हैं। वह सतत विकास को बढ़ावा देने, पर्यावरण की रक्षा करने के लिए सुरक्षित पेयजल सुनिश्चित करने और विशाल कूड़े के पहाड़ से छुटकारा दिलाने का वादा करती हैं, जिसे जयललिता भी नहीं हिला पाईं।

कालिअम्मल कहती हैं, “पारिस्थितिक प्रभाव की अवहेलना करके बंदरगाह के विस्तार को आजीविका की गारंटी नहीं दी जाएगी। केवल हमारे पर्यावरण की रक्षा सख्ती से होगी। जब एक महिला तथ्यों, आंकड़ों और तर्क के साथ इस बारे में बात करती है तो लोग ज्यादा ध्यान से सुनते हैं।” उनका दृष्टिकोण पंचायती राज अध्ययन के साथ मिलता है, जिसमें पाया गया कि निर्वाचित महिला प्रतिनिधि स्वास्थ्य, शिक्षा, महिला और बाल कल्याण और पर्यावरण के मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करने की अधिक संभावना है जो सीधे आबादी की आजीविका को प्रभावित करते हैं। वह स्वीकार करती हैं कि वह इस बार नहीं जीत सकतीं लेकिन विश्वास दिलाती हैं कि वह यहां लंबी दौड़ के लिए हैं और कोशिश करती रहेंगी। जैसे-जैसे अधिक महिलाएं निर्वाचित हो कर जाएंगी उनकी संख्या का वजन और उनके प्रदर्शन से व्यवहार परिवर्तन होगा।

ज्योतिमणि का कहना है कि पुरुष मनोवृत्ति पहले के मुकाबले बदल रही है। असम में मैं जब पुरुषों से जीप से उतरने के लिए कहती थी ताकि सैनेटरी पैड बदल सकूं तो वो मुझे ऐसे देखते थे कि पता नहीं मैंने कौन सा विशेष लाभ मांग लिया है। लेकिन अब पुरुष ज्यादा संवेदनशील हो गए हैं। अब कहीं जाते हुए वे खुद सड़क किनारे के साफ रेस्ट रूम के यहां गाड़ी रुकवा देते हैं।”

समाज विज्ञानी शिव विश्वनाथन को लगता है कि संसद प्रतीक्षा में है क्योंकि महिलाएं ही समूचे तंत्र में अलग तरह की न्याय-व्यवस्था ला पाएंगी। वह कहते हैं, “सामाजिक जीवन में कई तरह की महिलाएं हैं। प्रियंका चतुर्वेदी से लेकर प्रियंका गांधी और जया प्रदा तक। उनकी अपनी उपस्थिति है। उदाहरण के लिए प्रियंका गांधी को ही लीजिए, जितनी चुनौती उन्हें नरेंद्र मोदी से मिलती है, उससे कहीं ज्यादा अच्छी तरह से वह उन्हें लौटा देती हैं। कुछ महिलाएं ऐसी भी हैं जो अपने पति की प्रतिनिधि हैं। कुछ पति का अनुकरण करती हैं।”

विश्वनाथन चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा दलित महिलाएं संसद में पहुंचें ताकि वे नई न्याय-व्यवस्था बना सकें। उनका कहना है कि अगर इला भट्ट जैसी गांधीवादी महिला संसद में होती तो भारत अब तक शांति आंदोलन कर चुका होता। वह अपनी बात आगे बढ़ाते हुए कहते हैं, “अरुणा रॉय और मेधा पाटकर जैसी महिलाएं संसद में शानदार योगदान कर सकती हैं। उन्हें लोकसभा या राज्यसभा में लाया जाना चाहिए। उनकी लड़ाई में, ये महिलाएं एक बेहतर दुनिया बनाएंगी। साध्वी प्रज्ञा जैसी महिलाएं राजनीति के लिए शर्मिंदगी हैं।”

 (साथ में प्राची पिंगले-प्लंबर, प्रबीर प्रमाणिक, संदीप साहू और अब्दुल गनी)

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