रेणु के गांव से आगे

आकांक्षा पारे काशिव
अंधेरा कोना
अंधेरा कोना

आकांक्षा पारे काशिव
यह उपन्यास स्याहपन की नहीं स्याह परिस्थिति की बात करता है जो आज के दौर की हकीकत है

यह उपन्यास स्याहपन की नहीं स्याह परिस्थिति की बात करता है जो आज के दौर की हकीकत है। कुछ समय से ये परिस्थिति जैसे सबका साझा अंधेरा है। नागो के बहाने उमा शंकर चौधरी गांव की कहानी ही नहीं कहते बल्कि उस जमाने की कहानी कहते हैं जिसे नया-पुराना नहीं कहा जा सकता। क्योंकि हर दौर में सरकार और सरकार के नुमाइंदे एक जैसे रहते हैं। सरकार बदल भर जाने से आम बाशिंदों की हालत में कोई बदलाव नहीं आता। भाषा और पृष्ठभूमि के लिहाज से भले ही यह कहानी बिहार के किसी गांव की लगती हो लेकिन दरअसल ये कहानी भारत के हर गांव की है। जाति में बंटी राजनीति और राजनीति के कारण बंटी हुई जातियां इस उपन्यास में साफ नजर आती हैं। जिसे हम ‘कास्ट डायनामिक्स’ कहते हैं उसे उमा शंकर चौधरी ने सटीक ढंग से पकड़ कर उपन्यास की मूल कथा में गूंथा है। इससे मूल कहानी पर इसका साया नहीं पड़ता और कहानी निर्बाध गति से चलती रहती है। उमा शंकर चौधरी कहीं कहीं तो दृश्यों का इतना जीवंत वर्णन करते हैं कि वह हिस्सा किसी शब्द चित्र की भांति लगने लगता है। वह ‘चमकती सड़क और उस पर सरपट दौड़ता गांव’ में टॉपअप चार्ज का वर्णन करते हैं। 10 रुपये के फुल टॉकटाइम और अलग-अलग कंपनियों के रीचार्ज पर लंबा तफसरा है, जो जाने-अनजाने ही मौजूदा डेटा वॉर की याद दिला देता है। स्मार्ट फोन के जाल में अटक गई नई पीढ़ी और मोबाइल को ही दुनिया समझने वाले युवा सिर्फ शहर ही नहीं गांव में भी आसानी से मिल जाते हैं। लेखक का गांव कई मूलभूत सुविधाओं से वंचित है, लेकिन उसके गांव में ‘डेटा’ की कोई कमी नहीं है। 10 रुपये में एचडी फिल्म मिलना पीने के साफ पानी मिलने से कहीं आसान है। उस गांव में नियमित बिजली नहीं आती लेकिन मोबाइल चार्ज करने का जुगाड़ है।  तांगेवाले की कथा कहने का उनका अनूठा ढंग ही इस उपन्यास को पठनीय बनाता है। उन्होंने उपन्यास को अध्यायों में बांटने के बजाय उप-शीर्षक में बांटा है। उप-शीर्षक भी ऐसे कि याद रह जाएं। जैसे, ‘माधुरी नहीं, हेमा के गाल और पोखर में बत्तखें,’ ‘इस दुनिया में घोड़े के साथ वह और अंधेरा’ और ‘दिनकर की कविता, शिकायती खत और लोकतंत्र।’ यह उपन्यास फिर रेणु के गांव की याद दिलाता है। लेकिन रेणु के गांव से ये गांव बढ़ कर है। यहां तकनीक पैठ बना चुकी है। लड़के लैपटॉप से चुनावी मंजर पर नजर रखते हैं। ये गांव याद दिलाते हैं कि यहां सुविधा देने के लिए अभी सरकारों को लंबा सफर तय करना है।  सरकारें हैं कि लोकतंत्र पर भरोसा करने वाले लोगों के विश्वास पर चल रही हैं।

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