नक्शे में खिंची दोस्ती-दुश्मनी की लकीरें

राजेंद्र धोड़पकर
पचास या सौ साल पहले कोई आदमी नक्शे पर लकीर खींच गया और करोड़ों लोग आज भी एक-दूसरे से दुश्मनी निभाने को अपना पवित्र राष्ट्रीय कर्तव्य माने हुए हैं
पचास या सौ साल पहले कोई आदमी नक्शे पर लकीर खींच गया और करोड़ों लोग आज भी एक-दूसरे से दुश्मनी निभाने को अपना पवित्र राष्ट्रीय कर्तव्य माने हुए हैं

राजेंद्र धोड़पकर
ड्राइवर की सीट पर बैठा आदमी दिल्ली में है और बगल की सीट पर बैठा आदमी यूपी में। ठीक ऐसा ही हो यह भी जरूरी नहीं क्योंकि अपने यहां ज्यादातर सड़कें ऐसी होती हैं कि उनमें और कच्ची मिट्टी के बीच ठीक ठीक फर्क करना बड़ा मुश्किल होता है

जब भी मैं दुनिया या देशों के नक्शे देखता हूं तो मुझे एक बात बड़ी हैरत में डालने वाली लगती है कि आखिर देशों की या राज्यों की सीमाएं कैसे बनाई जाती हैं। अब मेरी उम्र ऐसी हो गई है कि मेरी अक्ल के बढ़ने की कोई उम्मीद नहीं है और मेरे अब तक के जीवन का ब्योरा भी यही साबित करता है कि मेरे पास किसी भी दौर में अक्ल बढ़ने का कोई प्रमाण नहीं है। ऐसे में मैं सोचता हूं कि यह सवाल मैं अक्लमंद लोगों से पूछ ही लूं कि सीमाएं कैसे खींची जाती हैं। क्या कोई आदमी हाथ में चूना लिए लकीर खींचता चला जाता है जैसे खेल के मैदानों में लकीरें खींची जाती हैं? अगर ऐसा होता है तो हजारों मील की लकीरें खींचना बड़ा मुश्किल काम रहता होगा। अच्छा अगर ऐसा हो भी तो उसे कैसे पता चलता है कि लकीर कहां खींचनी है, कौन बताता है कि लकीर यहां से यहां जाएगी?

या शायद ऐसा होता होगा कि कोई आदमी नक्शा लेकर उस पर पेंसिल से लकीर खींचता होगा और फिर दूसरे लोग उस नक्शे के मुताबिक जमीन पर निशान बनाते होंगे? यह भी काफी गड़बड़झाले का काम है। जैसे मैं जहां रहता हूं वह इलाका उत्तर प्रदेश में आता है और यहां से करीब एक-डेढ़ किलोमीटर दूर दिल्ली की सीमा लग जाती है। सीमा पर यह समझना बड़ा मुश्किल होता है कि कहां यूपी है कहां दिल्ली। लोग बताते हैं कि यह सड़क तो दिल्ली में है लेकिन इसके किनारे यूपी है। यानी अगर आपकी कार सड़क पर है तो वह दिल्ली में है लेकिन अगर किसी वजह से उसके दो पहिए सड़क के किनारे कच्ची मिट्टी में उतर गए तो आपकी आधी कार दिल्ली में है और आधी उत्तर प्रदेश में।

यानी ड्राइवर की सीट पर बैठा आदमी दिल्ली में है और बगल की सीट पर बैठा आदमी यूपी में। ठीक ऐसा ही हो यह भी जरूरी नहीं क्योंकि अपने यहां ज्यादातर सड़कें ऐसी होती हैं कि उनमें और कच्ची मिट्टी के बीच ठीक ठीक फर्क करना बड़ा मुश्किल होता है। कहीं यह भी होता है कि कोई इलाका यूपी में है उसके आगे दिल्ली है और उसके आगे फिर यूपी।

देशों की सीमाओं के साथ भी ऐसा ही होता होगा। मैं यह भी समझ नहीं पाता कि जब लाइनें खींची जाती हैं तो सीधी-सीधी लाइनें क्यों नहीं खींचते। आड़ी-टेढ़ी लड़खड़ाती हुई लाइनें क्यों खींचते हैं जैसे, हाथ कांप रहा हो। इससे बड़ा फर्क पड़ जाता है। पता लगता है कि आपने एक थरथराती हुई लाइन खींच दी तो लाइन के इधर रहने वाला आदमी लाइन के उधर रहने वाले का दुश्मन हो गया। अगर लाइन थोड़ी सीधी होती तो हो सकता था कि वे दोनों दोस्त होते और किसी और के साझा दुश्मन होते।

पचास या सौ साल पहले कोई आदमी नक्शे पर लकीर खींच गया और करोड़ों लोग आज भी एक-दूसरे से दुश्मनी निभाने को अपना पवित्र राष्ट्रीय कर्तव्य माने हुए हैं। जहां प्रकृति ने ही लकीरें खींच दी हैं वहां भी लोग बवाल करने से बाज नहीं आते। जैसे, भारत और

श्रीलंका के बीच कोई सीमा विवाद संभव नहीं है, लेकिन वहां अपनी समुद्री सीमाओं को लेकर भाई लोग झगड़ते हैं। कहते हैं तुम्हारे मछुआरे हमारी समुद्री सीमा के अंदर मछली मार रहे थे। अब समुद्र में लकीरें कैसे खींची गईं यह ज्यादा जटिल सवाल है। मुझे तो कुछ समझ में नहीं आता, किसी को आता हो तो समझाए।

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