देखो तो कितनी है रोशनी?

चेन्नै से जी.सी. शेखर
एमएनएम के चुनाव चिह्न टॉर्च लाइट के साथ कमल हासन
एमएनएम के चुनाव चिह्न टॉर्च लाइट के साथ कमल हासन
पीटीआइ

चेन्नै से जी.सी. शेखर
तमिलनाडु की सियासत में अभिनेताओं के दखल को नया मुकाम दे पाएंगे कमल हासन या साबित होंगे फिसड्डी

अदाकार नेतागीरी से भले तौबा कर लें, लेकिन नेता अदाकारी से कभी परहेज नहीं करते। अदाकारों से भरी तमिलनाडु की सियासत के नए सितारे कमल हासन ने 24 मार्च को इसे बखूबी साबित किया। कोयंबत्तूर की जिस सभा में उन्होंने अपनी पार्टी का घोषणा-पत्र जारी किया और लोकसभा चुनाव के लिए उम्मीदवारों के नाम का ऐलान किया, उसका मंच ‘टी’ के आकार में बनाया गया था, ताकि लंबे रैंप पर वे अवतरित हो सकें। बिलकुल सिनेमाई अंदाज में रैंप पर चलते हुए वे हाथ लहराकर भारी भीड़ का अभिवादन कर रहे थे। नेता के किरदार में आने में उन्हें दो घंटे लगे और तब भाजपा और अन्नाद्रमुक की सरकारों की ‘नाकामी’ गिनाई तथा द्रमुक-कांग्रेस के गठबंधन को “अपवित्र” करार दिया।

दो बड़ी द्रविड़ पार्टियों और उनके साझेदारों के बीच बंटी राज्य की सियासी पिच पर खुद की पार्टी मक्कल निधि मय्यम (एमएनएम) बनाने के साल भर बाद चुनाव चिह्न ‘टॉर्च लाइट’ के साथ कमल हासन ने करीब-करीब अकेले ही शानदार तरीके से दस्तक दी है। चुनावी मैदान में केवल एक छोटी दलित पार्टी और एक किसान संगठन से मिलकर उन्होंने तमिलनाडु की सभी 39 लोकसभा सीटों के साथ-साथ 18 विधानसभा सीटों पर उप-चुनाव के लिए उम्मीदवार उतारे हैं। अंडमान और निकोबार में उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार को समर्थन दे रही है। अपने घोषणा-पत्र में कमल ने नौकरी में महिलाओं के लिए 50 फीसदी आरक्षण, समान वेतन और किसानों को उपज के भारी मुनाफे वाले दाम दिलाने की घोषणा की है। तमिलनाडु के सबसे बड़े फिल्मी सितारे रजनीकांत के राजनैतिक संकोच (राजनीति में आने का इरादा जताने के बावजूद रजनी ने अपनी पार्टी के नाम का ऐलान नहीं किया है) के उलट उन्होंने बड़ा राजनैतिक दांव खेला है। लेकिन, खुद लोकसभा चुनाव नहीं लड़ने का उनका फैसला उनकी पार्टी की साख को प्रभावित कर सकता है।

इस बार राज्य में अदाकार से नेता बने अन्य लोग उतने प्रासंगिक नहीं दिख रहे। फिल्म और सियासत दोनों में छाप छोड़ने वाले विजयकांत, जो विकल्प के तौर पर देखे जा रहे थे, बीमार हैं। अपनी पत्नी और साले के साथ उन्होंने जिस तरीके से राजनैतिक समझौते किए, उसने भी उनकी पार्टी डीएमडीके की भूमिका को सीमित कर दिया है। उनकी पार्टी का वोट शेयर जो 2009 में 11 फीसदी से ज्यादा था, अब चार फीसदी के करीब सिमट चुका है। इसी तरह, शरत कुमार जिन्होंने खुद के नाडर समुदाय का वोट बटोरने के लिए एआइएसएमके बनाई, एआइएलडीएमके बनाने वाले टी. राजेंदर (अब एम.के. स्तालिन के साथ हैं) और थेवर समुदाय को लुभाने के लिए एमयूकेके अभिनेता कार्तिक, सब किनारे हो चुके हैं। अभिनेत्री खुशबू ने खुद को कांग्रेस के प्रचारक और प्रवक्ता की भूमिका तक सीमित कर लिया है। असल में, एक अभिनेत्री के लिए सफल नेता बनने का मतलब है, जयललिता की बराबरी करना- जो करीब-करीब नामुमकिन है।

तो क्या, तीन बार राष्ट्रीय पुरस्कार जीत चुके कमल हासन वैसी ही सियासी सफलता हासिल कर पाएंगे जो करुणानिधि, एमजीआर और जयललिता ने हासिल की। फिल्मी शख्सियत के तौर पर तो वे उनकी बराबरी के हैं, पर सियासी दुनिया में अब परीक्षा होगी। लेकिन, खुद चुनाव नहीं लड़ने के फैसले से उनकी रणनीति पर संदेह पैदा होने लगा है। दक्षिण चेन्नै से एमएनएम के उम्मीदवार पूर्व आइएएस अधिकारी के.एच. रंगराजन का कहना है, “कमल आसानी से कह सकते थे कि उनकी पार्टी केवल साल भर पुरानी है और 2021 के विधानसभा चुनावों का इंतजार करेगी। इसके बजाय उन्होंने चुनाव लड़ने का साहसिक फैसला लिया। वे पार्टी का चेहरा हैं, इसलिए खुद को किसी एक सीट तक सीमित रखने की जगह उन्होंने प्रचार में अपनी ऊर्जा लगाने का फैसला किया है। यकीनन 2021 का विधानसभा चुनाव वे लड़ेंगे और मुख्यमंत्री पद का चेहरा होंगे।”

लेकिन, कांग्रेस नेता पीटर अल्फोंस का कहना है कि फिल्मी दुनिया से आए लोग राजनीतिकों की तरह प्रभावी नहीं होते। उनका कहना है, “हम चुनाव हारने के बाद भी काम करते रहते हैं। लेकिन, बॉक्स ऑफिस पर हिट के आदी अभिनेता दो चुनावों में अपने करिश्मे को वोट में नहीं बदल पाते हैं तो सियासत में उनकी दिलचस्पी खत्म हो जाती है। एमजीआर और जयललिता फिल्मी सितारों की पिछली पीढ़ी से थे, जो राजनीति में आए और उनके साझा प्रतिद्वंद्वी करुणानिधि थे, जिसके कारण वे सियासत में डटे रहे।”    

इस कसौटी पर रजनीकांत का खुद की पार्टी बनाने और 2021 का चुनाव लड़ने का ऐलान महज तुक्के जैसा है। वे 68 साल के हैं। उनकी उम्र भी उनके पक्ष में नहीं है और उनके स्वास्थ्य को लेकर अफवाहें भी उड़ी हैं। उनकी राजनैतिक अपील को लेकर तमिलनाडु में वर्षों से अटकलें लग रही हैं। इससे सहमति जताते हुए एमजीआर के जीवनीकार आर. कन्नन कहते हैं, “कमल हासन की राजनैतिक पहल से ज्यादा रजनीकांत के प्रदर्शन पर सितारों की सियासत का भविष्य टिका है। अभिनेता जाने-पहचाने होते हैं, इसलिए जनता से जुड़ने में उन्हें राजनीतिकों के मुकाबले सहूलियत होती है। लेकिन, वे कायमाब तभी हो सकते हैं जब सही समय पर लोकप्रियता भुनाएं। एमजीआर अनूठे थे। राजनीति में रहते हुए भी वे हीरो थे, जबकि जयललिता को उनकी विरासत ने आगे बढ़ाया। नवागंतुकों के लिए राह आसान नहीं होगी।” 

अभिनेताओं के करिश्मे को खारिज करने के बावजूद गंभीर राजनीतिक उन्हें खतरे के तौर पर देखते हैं। स्तालिन राजनीति में कमल के प्रवेश को भाव नहीं देते। उन्होंने इसे सनक करार दिया। इस पर कमल हासन का जवाब था कि एमजीआर ने द्रमुक को दशक भर सत्ता से बाहर कर दिया था और अब भी पार्टी सदमे में है, इसलिए उनकी झुंझलाहट समझी जा सकती है। इससे पहले जब अभिनेता विजय ने राजनीति में दिलचस्पी दिखाई थी तो द्रमुक ने उन्हें भी निशाने पर लिया था।

ऐसा नहीं है कि द्रमुक ने खुद को सितारों की सियासत से दूर रखा है। पार्टी हमेशा से अभिनेता और अभिनेत्रियों के करिश्मे का इस्तेमाल अपने अभियानों को धार देने के लिए करती रही है लेकिन, उनकी महत्वाकांक्षाओं पर भी करीने से अंकुश लगा कर रखती है। कांग्रेस में जाने से पहले खुशबू का खुद करुणानिधि ने गर्मजोशी से स्वागत किया था और द्रमुक के एक मौजूद विधायक अभिनेता भी हैं। स्तालिन के बेटे उदयनिधि इसके अपवाद हैं, लेकिन वे पार्टी के प्रथम परिवार से ताल्लुक रखते हैं। फिल्म निर्माता से अभिनेता बने उदयनिधि अब द्रमुक के महत्वपूर्ण प्रचारक हैं। उन्हें स्तालिन के राजनैतिक उत्तराधिकारी के तौर पर भी तैयार किया जा रहा है।

राजनैतिक विश्लेषक और चाणक्या डिजिटल मीडिया के संस्थापक-सीईओ रंगराज पांडे कहते हैं, “उदयनिधि की स्टार अपील बहुत ज्यादा नहीं है, लेकिन इसमें उनकी पारिवारिक विरासत जोड़ दें तो यह प्रभावशाली हो जाता है। अभिनेता के तौर पर वे जनता में लोकप्रिय हैं और स्तालिन के बेटे के तौर पर द्रमुक में उनका प्रभाव बढ़ रहा है। इसलिए, उदयनिधि फिल्म हीरो से पॉलिटिकल हीरो और अब शायद जनता के हीरो के तौर पर उभरते दिख रहे हैं।”

कमल और रजनी ने 2017 में सियासी दिलचस्पी दिखानी शुरू की थी, तब जयललिता और करुणानिधि के निधन से शून्य था, जो अब नहीं रहा। स्तालिन का पूरी तरह अपनी पार्टी पर नियंत्रण है और वे एक मजबूत गठबंधन की अगुआई कर रहे हैं। चुनाव में जीत उन्हें एक मजबूत नेता के तौर पर स्थापित कर देगी। दो साल सरकार चलाने और एक व्यापक गठजोड़ बनाने के कारण मुख्यमंत्री पलनीसामी चतुर रणनीतिकार के तौर पर उभरे हैं। अन्नाद्रमुक से बगावत कर एएमएमके की स्थापना करने वाले टी.टी.वी. दिनकरन भी नए तरीके की राजनीति से युवाओं को प्रभावित करने में लगे हैं। सियासत के ये बड़े खिलाड़ी नवागंतुकों को कोई मौका नहीं देना चाहते। ऐसे में कमल हासन और रजनीकांत कितनी छाप छोड़ पाएंगे, यह तो वक्त ही बताएगा।

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