प्रवासी भारतीय जीवन के अंतर्द्वंद्व

ओम निश्चल
कौन देस को वासी
कौन देस को वासी

ओम निश्चल
सूर्यबाला ने अमेरिका की यात्राएं कर प्रवासी भारतीयों के जीवन और संस्कृति की बारीक से बारीक बात को कथानक में जिस तरह पिरोया है, वैसा चित्रण किसी भी उपन्यास में पहली बार सामने आ सका है

अपनी धरती छोड़ विदेश में बस जाने की लालसा आज लगभग हर उच्च शिक्षित युवा की है। अमेरीका की सिलीकॉन वैली भारतीय ट्रेक्नोक्रेट युवाओं से भरी है। जानी-मानी कथाकार सूर्यबाला ने वेणु के बहाने प्रवासी भारतीय जीवन के संघर्ष और महत्वाकांक्षाएं बयान की हैं।

भारत में नब्बे के बाद विश्व व्यापार की खिड़कियां खुल रही थीं। विदेशों में सूचना प्रौद्योगिकी एवं अन्य क्षेत्रों में भारत के तकनीकी रूप से कुशल लोगों की मांग बढ़ने लगी थी। कौन देस को वासी में वेणु के अमेरिका जाने, वहां की आबोहवा में रमने और  नई दुनिया में फलने-फूलने का वृत्तांत है। वेणु उसी मध्यमवर्गीय चाहत का साकार रूप है, जिसमें होनहार युवा उच्च पढ़ाई के लिए अमेरिका जाता है और वहीं नौकरी हासिल कर लेता है। वेणु वहां व्यवस्थित होने और मेधा से विवाह के बाद पराए देश में अपनी शक्ति सामर्थ्य और शिक्षा के बल पर अहम स्थान हासिल करने में कामयाब भी होता है। तब केवल वेणु के ही नहीं, उसके मां-पिता के सपने भी कुलांचे भरने लगते हैं।

सूर्यबाला ने अमेरिका की यात्राएं कर प्रवासी भारतीयों के जीवन और संस्कृति की बारीक से बारीक बात को कथानक में जिस तरह पिरोया है, वैसा चित्रण किसी भी उपन्यास में पहली बार सामने आ सका है। हालांकि इसके नैरेटिव लंबे हैं और पात्र भी बहुतेरे हैं। लेखिका ने इसे वेणु की डायरी कहा भी इसलिए है कि कहानी के साथ डायरी का शिल्प भी यहां है। पाठक वेणु की आंखों, मां-पिता, दोस्त, परिवार, नाते-रिश्तेदारों के आपसी संवाद और क्रिया-कलापों के जरिए वहां की हलचल का जायजा लेते हैं, जिससे अमेरिका में भारतीयों को गुजरना पड़ता है।

प्रवासी भारतीयों के जीवन को लेकर इससे पहले भी उपन्यास लिखे गए हैं। उषा प्रियंवदा के उपन्यास अंतर्वंशी और रुकोगी नहीं राधिका की पृष्ठभूमि भी यही है। अभिमन्यु अनत के लाल पसीना और कई उपन्यासों में प्रवासी भारतीय गिरमिटिया परिवारों के संघर्ष की कथा दर्ज है। हाल ही में आया पुष्पिता अवस्थी का उपन्यास छिन्न मूल सूरीनाम के भारतवंशियों की संघर्षगाथा को उद्‍घाटित करता है। नीना पॉल का उपन्यास कुछ गांव शहर कुछ शहर शहर भी इंग्लैंड के लेस्टर शहर में आ बसे गुजरातियों की तीन पीढ़ियों के संघर्ष की दास्तान है। पर कौन देस को वासी इनसे अलग है। सघन संवेदना के साथ लिखे गए इस उपन्यास में प्रवासी जीवन के सुखद पल हैं, यात्राएं हैं, रोमांच है, अपने देस को याद करने की तमाम वजहें हैं जो बिना जीवन में धंसे संभव नहीं है। पश्चिमी देशों में बदलावों के साथ प्रवासी भारतीय परिवारों में आने वाले बदलावों की कहानी भी यह उपन्यास कहता है।

लेखिका पूछती हैं, “लालसाओं के चक्रवात में फंसे जब हम अपनी धरती को छोड़ते हैं तो कब तक और कितनी छूट पाती है वह हमसे?” वह आगे कहती हैं, “कहां किस बिंदु पर मिलती हैं सुख और सुविधाओं, सच और झूठ, सफलता और असफलता की विभाजक रेखाएं? और वहां पहुंच कर सबकुछ पाने, अघाने के बाद भी जीवन छूंछा नजर आने लगता है? कहां पूरी होती है जीवन की असली तलाश?” वेणु और मेधा का दांपत्य अमे‌िरका की इसी पूंजीवादी संस्कृति में सांस लेता है। वेणु का बेटा और उसकी सहचरी सैंड्रा भारत लौटने का निर्णय करते हैं। उपन्यास का आखिरी वाक्य जैसे किसी कविता की तरह हमारे अंत:करण को रोशन करने के लिए है, “इस पूरे विश्व में हम कहीं रहें, किसी जाति धर्म या वर्ण के नाम से, क्या फर्क पड़ता है, सिवा इसके कि हम कितने मनुष्य बने रह पाए हैं...।”

एक कवि ने कहा है, “पैदा तुम कहीं भी हो, बिकना तो तुम्हें अमेरिका में ही है।” इस सच्‍चाई के बावजूद जिनके योग्य बेटे अमेरिका जैसे देशों में बस गए हैं, उनके भव्य वर्तमान के पीछे मां-पिता का असह्य अकेलापन भी झांकता है।  आदमी आकाश में उड़ान तो भरे पर अपनी जमीन न छोड़े। निस्संदेह, यह उपन्यास प्रवासी भारतीयों की महत्वाकांक्षाओं के साथ-साथ मां-पिता के अकथ अवसाद का अवगाहन भी है।

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