स्मृतियों-इतिहास की समाधि

अरविन्द मोहन
रेत समाधि
रेत समाधि

अरविन्द मोहन
यह उपन्यास ऐ लड़की की निरंतरता लगता है, हर तरह से उसका विस्तार और उसको नई ऊंचाई पर लाने वाला भी।

सिर्फ साक्षर अपनी पहली गुरु तथा बूढ़ी और बीमार मां को उनकी मौत से कुछ समय पहले जब इस समीक्षक ने अर्सा पहले सामान्य से कुछ ज्यादा मोटे अक्षरों में छपा लघु-उपन्यास या दीर्घ कथा पढ़ने को दी थी तो शंका बनी हुई थी कि रामायण-महाभारत पढ़ने वाली मां को यह पसंद आएगा भी या नहीं। मृत्यु शैय्या पर पड़ी मां और बेटी के संवाद के सहारे जीवन और दुनिया को जीवंत ढंग से देखने-दिखाने वाली इस किताब को उसने लगभग एक सांस में पढ़ने के बाद यही शिकायत की कि कुछ कम लिखा है। इतना बढ़िया उपन्यास इतनी जल्दी क्यों खत्म हो गया।

गीतांजलि श्री का पौने चार सौ पन्नों का नया उपन्यास रेत समाधि पढ़ते हुए भी यही भाव आता है और एक अफसोस उभरता है, काश मां के रहते यह किताब आ गई होती। बेहद दिलचस्प, ठोस गढ़ा हुआ और पर्याप्त विस्तार वाला यह उपन्यास गीतांजलि श्री की अन्य रचनाओं से ही ऊपर नहीं गया, बल्कि कई समकालीन कथा लेखकों की रचनाओं से अच्छा बना है। कई बार उपन्यास खंडकाव्य का आनंद देता है तो कई बार इतिहास को जीवित पकड़ लाने का।

दो औरतों के इर्द-गिर्द चलने वाला यह उपन्यास तीन खंडों में बंटा है, कथ्य, कथानक और काल। इसी हिसाब से इसकी भाषा का सौंदर्य है और विशिष्टता भी। मां-बेटी कभी उम्र और जीवन के फासले घटाती हैं तो कभी बढ़ाती हैं। उसमें रोजी बुआ जैसा दिलचस्प पात्र आकर कथा को अपने तरीके से आगे बढ़ाने में मदद करता है। जब तीसरी पीढ़ी आती है तो सबकुछ नए दौर में पहुंचने लगता है। यानी कथ्य, कथानक और भाषा बदलने लगती है। वैसे भी गीतांजलि श्री को भाषा का जादूगर कहा जा सकता है। वे अपने शब्दों से दृश्य रचती हैं। उनकी भाषा की रवानी उनकी रचनाओं की ताकत बन कर उभरती है। उनके कथ्य तो शानदार होते ही हैं, भाषा उसमें चार चांद लगता देती है। मार्च,मां और साकुरा इसका उदाहरण है। बेटी अपना जीवन जीते हुए भोग और जीवंतता की सारी सीमा लांघना चाहती है पर लांघने से डरती है। वहीं, मां सबकुछ भोग चुकने के बाद भी किसी सीमा को नहीं मानती। यही कहानी नदी की तरह बहती है और बीच-बीच में कहीं द्वीप उभरते हैं तो कहीं टीले। स्नेह, प्रेम और बिना स्वार्थ के रिश्तों की कहानी बहुत ही दिलचस्प और रोचक अंदाज में बढ़ती जाती है। इतने रोचक तरीके से कि पुस्तक का अंत आने पर स्वप्न टूटने जैसा झटका लगता है।

उपन्यास का एक और रंग तीसरे खंड में उभरता है। विभाजन की मार झेलने वाली औरत की तीसरी पीढ़ी की कहानी के रूप में। घर-परिवार की चर्चा और स्मृतियों के ब्यौरों से विभाजन और खासकर औरतों पर बीते जुल्म और सितम का किस्सा लेखिका ने खूबसूरती से उभारा है। यहां पात्र ही नहीं बोलते, माहौल और वहां उपस्थित हर चीज बोलती है। इसमें पाकिस्तान यात्रा भी होती है, तब की स्मृतियों और इतिहास को लगभग जस का तस लाने का प्रयास भी होता है। उपन्यास के इस हिस्से को पढ़ते हुए महिला इतिहासकार उर्वशी बुटालिया की किताब खामोशी एक उस पार की याद आती है।

पर सबसे ज्यादा याद आता है कृष्णा सोबती का उपन्यास ऐ लड़की। लेखिका ने ‘हमारी गुरु, प्रेरणा और बेहद अजीज’ कहकर यह उपन्यास कृष्णा सोबती को समर्पित किया है। यह उपन्यास ऐ लड़की की निरंतरता लगता है, हर तरह से उसका विस्तार और उसको नई ऊंचाई पर लाने वाला भी। दो लोगों का संवाद अगर ऐ लड़की की खूबसूरती और सीमा है तो यहां आया संयुक्त परिवार, तीन पीढ़ियों का किस्सा, विभाजन और उसकी त्रासदी को नए ढंग से देखने-दिखाने की कोशिश ताजमहल गढ़ने का प्रयास लगता है। वैसे यह बताना दिलचस्प है कि मैंने अपनी मां को ऐ लड़की ही पढ़ने को दिया था।

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