शिक्षा पर संदेह का परिणाम

राजेंद्र धोड़पकर
प्रतीकात्मक चित्र
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राजेंद्र धोड़पकर

राजेंद्र धोड़पकर
अज्ञान की मार्केटिंग आसान होती है, वह फास्ट सेलिंग आइटम है, देखते-देखते ही बिक जाता है

शिक्षा को लेकर मेरे मन में बहुत बचपन से ही संदेह रहा है और इसका परिणाम मेरी शिक्षा पर भी पड़ा। फिर भी मुझे ज्ञान को लेकर संदेह नहीं रहा और ज्ञान और ज्ञानियों को लेकर मेरे मन में एक आदर का भाव रहा है। चूंकि मैं कभी ज्ञानी रहा नहीं, इसलिए यह आदर का भाव भी बना रहा। मैं सोचता ही रहा कि ज्ञानी होकर कैसा लगता होगा। अब उम्र के छह दशक पार हो गए हैं और मुझे ज्ञान को लेकर भी संदेह पैदा होने लगा है। मुझे आजकल यह दिख रहा है कि ज्ञान का कोई खास मूल्य नहीं है।

इसकी वजह मैं जरा विस्तार में बताना चाहता हूं। अब यह घोषित हो गया है कि प्रधानमंत्री ही सरकार हैं और सरकार ही देश है यानी बुनियादी रूप से प्रधानमंत्री ही देश हैं। यह भी साफ हो गया है कि यह व्यवस्था वर्तमान प्रधानमंत्री के संदर्भ में ही की गई है यानी वर्तमान प्रधानमंत्री ही देश हैं, यह बात किसी पूर्व या भावी प्रधानमंत्री के लिए लागू नहीं है। इसलिए वर्तमान प्रधानमंत्री की आलोचना करना या उनकी किसी बात पर संदेह करना देशद्रोह के तहत आता है। चूंकि वर्तमान प्रधानमंत्री का ज्ञान पर कुछ खास भरोसा नहीं है इसलिए देश के हर नागरिक का कर्तव्य है कि वह भी ज्ञान पर संदेह करे। जो भी ज्ञान पर भरोसा करे वह देशद्रोही कहलाया जा सकता है। प्रधानमंत्री ने ही नोटबंदी के संदर्भ में बताया था कि “हॉर्वर्ड” और “हार्डवर्क” में कौन बड़ा है। नोटबंदी की अपार सफलता से जाहिर है, प्रधानमंत्री ने सच कहा था।

ज्ञान से होने वाली हानियों और अज्ञान के लाभों के मद्देनजर सरकार की और वफादार नागरिकों की कोशिश है कि ऐसी तमाम संस्थाओं और व्यवस्थाओं को खत्म किया जाए जिनका संबंध ज्ञान से है। चाहे वे विश्वविद्यालय हों या राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग जैसे व्यर्थ संस्थान। इनकी जगह अज्ञान को प्रोत्साहित करने वाली संस्थाओं को आगे बढ़ाया जा रहा है। वॉट्सऐप इस नजरिए से बहुत उपयोगी संस्था है और टीवी के खबरिया चैनल भी इस दिशा में अपनी ओर से पूरा-पूरा योगदान दे रहे हैं।

अज्ञान के कई फायदे हैं जो कि आपके वॉट्सऐप या खबरिया चैनलों पर नजर दौड़ाने से साफ हो जाएगा। ज्ञान का स्वभाव लोकतांत्रिक नहीं होता, वह कुछ ही लोगों के पास रह सकता, जो उसे अर्जित करने की क्षमता रखते हैं। अज्ञान पूरी तरह लोकतांत्रिक होता है, वह हर उस व्यक्ति के पास हो सकता है जो उसकी इच्छा करता है। हर व्यक्ति अपना अज्ञान खुद चुन सकता है बल्कि अगर उसे अपना अज्ञान पैदा करना हो तो वह अपना निजी मौलिक अज्ञान पैदा कर सकता है। ज्ञान के साथ यह सुविधा नहीं है।

अज्ञान की मार्केटिंग भी आसान होती है। वह फास्ट सेलिंग आइटम है, देखते-देखते ही बिक जाता है। ज्ञान को बेचना बहुत मुश्किल होता है। इस वजह से अज्ञान बेचने में मुनाफा भी भारी है। यहां तक कि उससे सत्ता भी प्राप्त की जा सकती है। इसका अलग से उदाहरण देने की जरूरत नहीं है।

आजकल चुनावों का माहौल है और अज्ञान की बाढ़ आई हुई है। इसी से प्रभावित होकर मैंने भी राष्ट्रहित में तय किया है कि अपनी दशकों पुरानी धारणा छोड़कर मैं ज्ञान पर विश्वास करना बंद कर रहा हूं।

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