सबको बुनियादी आय की गारंटी ही बेहतर विकल्प

संतोष मेहरोत्रा
भूमिहीन मजदूर, जनजाति समूह, परित्यक्त अकेली महिला, विकलांग और बंधुआ मजदूरों को नकद हस्तांतरण की जरूरत
भूमिहीन मजदूर, जनजाति समूह, परित्यक्त अकेली महिला, विकलांग और बंधुआ मजदूरों को नकद हस्तांतरण की जरूरत

संतोष मेहरोत्रा
बंटाईदारों और भूमिहीन खेत मजदूरों का तबका खेत मालिक किसानों की तुलना में काफी बड़ा, इसलिए कुछेक खेत मालिकों को ही रकम मुहैया कराना पर्याप्त नहीं, न्यूनतम आय गारंटी के लिए संसाधनों का टोटा भी नहीं

वाकई अब सब के लिए न्यूनतम आय गारंटी योजना को बड़े पैमाने पर शुरू करने की वाजिब और ठोस वजहें हैं। छोटी और मामूली जोत के किसानों तथा खेतिहर मजदूरों की बेहद कम आमदनी से पता चलता है कि गरीब बिरले ही धन-संपत्ति जोड़ पाते हैं। अगर उनकी थोड़ी-बहुत पूंजी या संपत्ति जुड़ती भी है, तो उसे वे सूखे, बाढ़, विभिन्न परियोजनाओं से विस्‍थापन वगैरह की वजह से गंवा बैठते हैं। छोटे और मामूली जोत के किसानों तथा भूमिहीन खेतिहर मजदूरों को अपनी रोजमर्रा और आकस्मिक जरूरतों को पूरा करने के लिए नकदी कर्ज की आवश्यकता होती है। इसका मतलब है कि उनकी मजदूरी की कमाई संपत्ति जोड़ने की जगह कर्ज चुकाने में ही खत्म हो जाती है। यही बुनियादी वजह है कि बहुत-से छोटे कर्जदारों की कर्ज अदायगी की दरें अधिक होती हैं, और कई बार कर्ज मिलने के बावजूद वे शायद ही गरीबी रेखा से ऊपर उठने के काबिल हो पाते हैं।

हर ग्रामीण परिवार बुनियादी आय गारंटी का हकदार

2001 और 2011 की जनगणना के मुताबिक, बीच की अवधि में ग्रामीण भारत में पेशागत बदलाव देखा गया है, जिससे पता चलता है कि संस्थागत कर्ज मुहैया कराने के लिए वित्तीय समावेश की जरूरत है। ग्रामीण श्रम बल में खेतिहरों की हिस्सेदारी 31.7 फीसदी से घटकर 24.7 फीसदी (6 फीसदी) हो गई और भूमिहीन खेतिहर मजदूरों की संख्या 26.5 फीसदी से बढ़कर 30 फीसदी हो गई। दूसरे शब्दों में, खेतिहरों की तुलना में भूमिहीन मजदूरों की संख्या अधिक है, जिससे जोत के घटते आकार और ग्रामीण संकट की गंभीरता का अंदाजा लगता है।

कृषि और गैर-कृषि पेशों से जुड़े लगभग 6.57 करोड़ ग्रामीण श्रमिक परिवारों में 34 फीसदी कर्जदार हैं, जबकि 66 फीसदी कर्जदार नहीं हैं। सर्वे के आंकड़ों से हमें यह पता नहीं चलता है कि वे जानबूझकर या अनजाने में वित्तीय समावेशन से बाहर हैं। चंद्रशेखर (2014) का अनुमान है कि प्रति व्यक्ति मासिक क्रय-शक्ति में निचले चार पायदान के लोग वित्तीय समावेशन से अपनी मर्जी से बाहर नहीं हैं। यानी 40 फीसदी ग्रामीण श्रमिक परिवार वित्तीय समावेशन से मजबूरियों के चलते बाहर हैं। संभावना यही है कि ये परिवार एससी-एसटी तबके के हैं।

बुनियादी आय गारंटी योजना शुरू करने की दलील इस तथ्य से भी मजबूत होती है कि गरीबी, कुपोषण, कर्जदारी, खासकर गैर-संस्‍थागत स्रोतों (सूदखोरों) से बड़े पैमाने पर कर्जदारी के मामले मिलेजुले हैं। मतलब यह कि जो गरीब है, वह कुपोषित भी है और सूदखोरों का कर्जदार भी है। दरअसल, मामूली जोत वाले 12.2 करोड़ किसान और छोटी जोत के 2.9 करोड़ किसान अल्पपोषित श्रेणी में हैं (केंद्र सरकार, 2007)। इसी तरह, 2009-10 में 51 फीसदी भूमिहीन खेतिहर श्रमिक गरीबी रेखा के नीचे थे, जबकि कृषि स्वरोजगार में प्रति व्यक्ति गरीबी का अनुपात 26 फीसदी (और गैर-कृषि स्वरोजगार में 29 फीसदी) था (राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण, 2009-10)। जाहिर है, ग्रामीण संकट की सबसे बड़ी वजह गरीबी, कर्ज और कुपोषण है। कर्ज अमूमन बेटी की शादी, अंतिम संस्कार या सूखा/बाढ़ जैसे आम और आकस्मिक खर्चों के लिए लिया जाता है।

प्रस्तावित योजना

प्रस्तावित योजना बिना शर्त नकद हस्तांतरण (यूसीटी) की है, जिसके दायरे में ग्रामीण एससी, एसटी और उस तबके के परिवार हों, जो सामाजिक-आर्थिक जातिगत जनगणना के मुताबिक इस गणना में शामिल हैं। यूसीटी योजना गरीबों की श्रेणी तय करके संभव होनी चाहिए। इस गणना में कुछ तबके तो खुद-ब-खुद शामिल हो जाते हैं। मसलन, भूमिहीन मजदूर, आदिम जनजाति समूह, परित्यक्त अकेली महिला, विकलांग सदस्य वाले परिवार और जिस परिवार में एक भी सदस्य बंधुआ मजदूर हो, ऐसे तमाम परिवारों को बिना शर्त नकद हस्तांतरण की जरूरत है, ताकि वे कर्ज से बाहर निकलें, भविष्य में आम और आकस्मिक खर्चों के लिए कर्ज लेने से बचें और न्यूनतम बचत कर सकें।

गरीब परिवारों को आम खर्चों के मद में कर्ज मुहैया कराने की भी दरकार है, ताकि बिना आमदनी वाले दिनों में या इलाज और आकस्मिक पारिवारिक जरूरतों में वह उनके काम आ सके। यानी उन स्थितियों में ‌जिनमें गरीब साहूकार के पास जाने को मजबूर होता है। हमारा प्रस्ताव है कि हर लाभार्थी परिवार के खाते में हर महीने 500 रुपये इलेक्ट्रॉनिक रूप से नकद हस्तांतरण किया जाए।

नई न्यूनतम आय गारंटी योजना के संसाधन कहां से ?

न्यूनतम आय गारंटी योजना की लागत का अनुमान इस प्रकार लगाया जा सकता है। बीपीएल आबादी की वर्तमान संख्या लगभग 30 करोड़ है (गरीबी रेखा के नीचे 2011-12 में 26.8 करोड़ लोगों के तेंडुलकर समिति के अनुमान के मुताबिक)। दूसरे शब्दों में, देश में छह करोड़ बीपीएल परिवार हैं और मान लें कि प्रजनन दर के मद्देनजर हर घर में पांच सदस्य हैं।

अगर इस तरह हर परिवार 500 रुपये प्रति माह का हकदार बनता है, तो खर्च कुल 36 हजार करोड़ रुपये प्रतिवर्ष तक बढ़ जाता है। यह सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का (2018-19 के आधार पर) 0.26 फीसदी है। यानी यह रकम 2019-20 में मनरेगा पर हम जो खर्च करेंगे, उसकी आधी ही बैठती है।

यह कई कारणों से 2019-20 के बजट की घोषणा (दो हेक्टेयर से कम भूमि वाले किसानों के लिए छह हजार रुपये प्रति वर्ष) से भी बेहतर है। केंद्र सरकार की योजना में सिर्फ खेत मालिक किसान शामिल हैं। इसमें बंटाईदार और भूमिहीन मजदूर शामिल नहीं हैं। उपरोक्त आंकड़ों को देखें, बंटाईदारों और भूमिहीन खेत मजदूरों का तबका खेत मालिक किसानों की तुलना में काफी बड़ा है। केंद्र की यह योजना समावेशी नहीं है। हम जो प्रस्ताव दे रहे हैं, वह एक व्यापक समावेशी योजना है।

यह तेलंगाना के रैयत बंधु योजना से भी बेहतर है, जिसमें केंद्र सरकार की योजना जैसी ही खामियां हैं। इसमें सिर्फ खेत मालिकों को ही शामिल किया गया है। इससे भी बदतर यह है कि इसमें हर खेतिहर को रकम एक ही पैमाने (प्रति हेक्टेयर चार हजार रुपये) से मिलती है, यानी जिसके पास ज्यादा जमीन, उसे ज्यादा रकम। इस तरह छोटे किसान घाटे में ही रहते हैं।

कैसे लागू हो नकद हस्तांतरण

नकद हस्तांतरण योजना की कामयाबी के लिए कम-से-कम तीन आवश्यकताएं पूरी करनी होंगी। एक, गरीब लाभार्थियों की सही पहचान। दूसरे, लाभार्थियों की बॉयोमेट्रिक पहचान। और तीसरे, लाभार्थियों के लिए बैंक खाते। सबसे पहले, यूसीटी का लक्ष्य बीपीएल आबादी की मदद होनी चाहिए। इसलिए बीपीएल परिवारों की पहचान सही ढंग से करनी होगी। पिछले दो दशकों में ग्रामीण जनगणना के तीनों आंकड़ों (1992, 1997 और 2002) में बड़े पैमाने पर त्रुटियों के प्रमाण हैं। यानी बड़े पैमाने पर कुछ लोग शामिल कर लिए गए या अलग कर दिए गए। केंद्र सरकार ने राज्य सरकारों के साथ पूरी तरह से नई पद्धति के आधार पर ग्रामीण आबादी की जनगणना 2013 में पूरी की।

ग्रामीण क्षेत्रों की पहचान करने की नई कार्यप्रणाली सटीक, सरल, पारदर्शी और गरीबी के प्रत्यक्ष लक्षणों पर आधारित है। इसके तहत पारदर्शी मानदंडों के जरिए पहले गरीबी रेखा से ऊपर के लोगों को अलग किया जाता है। दूसरे, सीधे सत्यापन योग्य मानदंडों के जरिए अति गरीबों को लाभार्थी सूची में किया जाता है। बाकी आबादी के लिए कई गैर-धन-मीट्रिक मानदंडों का उपयोग किया जाता है। इसके तहत उस आबादी का पता लगाया जाएगा, जिन्हें न तो गरीबी की सूची से अलग किया गया है और न ही वे अपने आप शामिल होते हैं। लाभार्थियों की सूची में आबादी की सीमा क्या हो, यह केंद्र और राज्य सरकारों को राजकोषीय संसाधनों की उपलब्धता और कार्यक्रम की प्रकृति के आधार पर तय करना होगा। दूसरे शब्दों में, राज्य सरकार अपने संसाधनों के आधार पर केंद्र सरकार के नकद हस्तांतरण में अपनी तरफ से जोड़ सकती है। इसी तरह शहरी गरीबों की भी पहचान की जा सकती है।

दूसरे, ऐसी योजना की कामयाबी के लिए बॉयोमीट्रिक पहचान प्रणाली की आवश्यकता होगी, ताकि यह पता लग सके कि सही लाभार्थी को ही मदद मिल रही है। केंद्र या राज्य सरकार आधार कार्ड से ऐसी योजनाओं को जोड़ सकती है।

तीसरे, गरीब लाभार्थियों के लिए नकद हस्तांतरण प्रणाली के लिए जरूरी है कि हर लाभार्थी का बैंक या डाकघर में खाता हो। वित्त मंत्रालय के मुताबिक 2013 में देश की गैर-बैंकिंग आबादी शहरी क्षेत्रों में 45 फीसदी और ग्रामीण आबादी का 55 फीसदी थी। हालांकि, जन धन खाता योजना के बाद लगभग सभी परिवारों के बैंक खाते हैं। फिर भी ऐसा तंत्र विकसित किया जाना है, जिससे बैंक/डाकघर की दूरी लाभार्थी से अधिक न हो, ताकि बैंक तक आवाजाही में उसे अधिक खर्च न करना पड़े। इसलिए कामयाब नकद हस्तांतरण प्रणाली को लागू करने से पहले सहायक बैंकिंग प्रणाली पर तेजी से अमल करना होगा। मतलब यह कि बैंक लाभार्थी के पास जाए, न कि लाभार्थी बैंक की तलाश में भटके।

(लेखक जेएनयू में इकोनॉमिक्स के प्रोफेसर और सेंटर फॉर लेबर के चेयरपर्सन हैं)      

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