खेतिहर तो फिर भी खाली

प्रवीण
आ​र्थिक आरक्षण से कृषक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों को शायद ही कोई लाभ हो
आ​र्थिक आरक्षण से कृषक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों को शायद ही कोई लाभ हो

प्रवीण
आर्थिक आरक्षण से मुख्य फायदा गैर-कृषक समुदाय को, कृषि पृष्ठभूमि से आने वालों की राह में कई अड़चन

जनवरी 2019 में सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों को दस फीसदी आरक्षण देने के लिए 124वां संविधान संशोधन किया गया। प्रावधानों के अनुसार, जिस परिवार की सकल वार्षिक आय आठ लाख रुपये से कम है, वे इसके हकदार हैं। कृषक परिवारों के लिए आय के बजाय खेतिहर भूमि को आर्थिक पिछड़ेपन का पैमाना माना गया है। जिन परिवारों के पास पांच एकड़ या उससे कम कृषि योग्य भूमि है वे इसका लाभ ले सकते हैं। आर्थिक कमजोरी के अन्य मानक मसलन, मकान का आकार वगैरह, कृषक और गैर-कृषक परिवारों के लिए समान हैं। दावा किया जा रहा है कि इससे न केवल ‘उच्च जातियों’ बल्कि मुख्य रूप से कृषि पर निर्भर समुदायों को भी लाभ होगा। हाल के समय में कई कृषक जातियां आरक्षण के लिए आंदोलनरत रही हैं।

करीबी पड़ताल से पता चलता है कि इससे मुख्य तौर पर फायदा गैर-कृषक समुदायों को ही होगा। कृषक पृष्ठभूमि से आने वाले उम्मीदवारों को शायद ही कोई लाभ हो। इसके कई कारण हैं। पहला, दस फीसदी कोटे के लिए कृषक पृष्ठभूमि से आने वाले अभ्यर्थियों को अपने से कई गुना अधिक आर्थिक रूप से सबल प्रत्याशियों से स्पर्धा करनी होगी। यह पक्षपात नीति में अंतर्निहित है। जैसा कि ऊपर बताया गया है, गैर-कृषक तबकों के आर्थिक कमजोरी के सूचकांक (आठ लाख रुपये सालाना आय) को कृषकों के पांच एकड़ के बराबर मान लिया गया है। राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण कार्यालय (एनएसएसओ) के सर्वे के मुताबिक राष्ट्रीय स्तर पर जुलाई 2012 से जून 2013 के बीच 2.5 से पांच एकड़ जमीन वाले किसान परिवार की वार्षिक आय 88,176 रुपये और 5 से 10 एकड़ जमीन वाले किसान परिवारों की 1,28,760 रुपये थी। यहां तक कि 10 से 25 एकड़ जमीन वाले किसान परिवारों की आमदनी भी केवल 2,35,644 रुपये सालाना थी। पंजाब जैसे कृषि उन्नत राज्य में भी इनमें से किसी भी वर्ग के किसान परिवार की सालाना आमदनी आठ लाख रुपये के करीब भी नहीं थी। देश जिस तरह के कृषि संकट से गुजर रहा है, यह माना जा सकता है कि इन हालात में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया होगा।

इस नीति में गैर-कृषकों के लिए आठ लाख रुपये की सीमा अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के ‘क्रीमी लेयर’ से छोटे-मोटे बदलावों के साथ आयात कर ली गई, पर कृषक समुदायों के लिए ऐसा नहीं किया गया। ओबीसी में कृषकों के लिए ‘दोहरी फसल वाली सिंचित भूमि’ के मामले में ‘क्रीमी लेयर’ उस राज्य के भूमि हदबंदी कानून के अनुसार तय होती है। जिन कृषकों के पास ‘दोहरी फसल वाली सिंचित भूमि’ उस राज्य की हदबंदी का 85 प्रतिशत या उससे अधिक है, वे ‘क्रीमी लेयर’ में आते हैं। उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा जैसे कृषि उन्नत राज्यों में हदबंदी कानून की सीमा 18 एकड़ या उसके आसपास है। कम उर्वर भूमि वाले कृषकों के मामले में क्रीमी लेयर की सीमा और उदार है। इससे जाहिर है कि यह नीति विशुद्ध आर्थिक दृष्टि से भी ‘दौड़’ के शुरू में ही पांच एकड़ को आठ लाख रुपये का पर्याय मानकर, गैर-कृषक पृष्ठभूमि के अभ्यर्थियों (जो कि आम तौर पर वेतनभोगी, व्यापारी या शहरी तबकों से आते हैं) को कृषक पृष्ठभूमि से आने वाले अभ्यर्थियों के मुकाबले कई गुना बढ़त पर रखती है ।

दूसरा, कृषि या ग्रामीण पृष्ठभूमि से आने वाले शैक्षणिक, सामाजिक, आर्थिक पैमानों पर भी पिछड़े हैं। ‘पृष्ठभूमि’, जिसके लिए समाजशास्‍त्रीय शब्द ‘हबितुस’ है, व्यक्ति के दृष्टिकोण, जीवन विधा, व्यवहार, शिष्ट चाल-ढाल वगैरह तय करती है। इनसे ही किसी की ‘सांस्कृतिक पूंजी’ तय होती है, जो आधुनिक हलकों में ‘मेरिट’ और कामयाबी तय करती है। कृषि/ग्रामीण पृष्ठभूमि के अभ्यर्थी एक भिन्न ‘हबितुस’ से आने के कारण, जिसे अक्सर कमतर माना जाता है, कामयाबी के इस सांचे के अनुसार अपने आप को नहीं ढाल पाते। ग्रामीण इलाकों में शिक्षण सुविधाओं का अभाव इनकी अक्षमता को और बढ़ा देता है। 

इसका प्रभाव कृषि-पृष्ठभूमि से आने वाले उम्मीदवारों के बेहद कम प्रतिनिधित्व के रूप में कहीं भी देखा जा सकता है। मसलन, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (आइआइटी) ने उम्मीदवारों के पैतृक व्यवसायों के आंकड़े प्रस्तुत किए हैं, जो महत्वपूर्ण शिक्षण संस्थान अक्सर नहीं करते। इन संस्थानों की 2011, 2012, 2013 और 2014 की रिपोर्टों से पता चलता है कि कृषि पृष्ठभूमि के अभ्यर्थियों की संख्या, सभी वर्गों के किसानों को सम्मिलित करके भी, हमेशा कुल चयनित उम्मीदवारों के 10 फीसदी से भी कम रही है। इसमें वे अभ्यर्थी भी शामिल हैं जो आरक्षित श्रेणियों से आते हैं, जबकि कृषकों की संख्या देश की कुल जनसंख्या में इससे कई गुना अधिक है। इन रिपोर्टों ने ये भी बताया ‌कि लगभग 60 फीसदी स्थानों पर केवल वेतनभोगी-पेशेवर (सेलरीड-प्रोफेशनल) वर्ग से आने वाले छात्रों का कब्जा है। कमोबेश यही स्थिति हर मह्त्वपूर्ण शिक्षण संस्थान या हर महत्वपूर्ण महकमे की है।

कृषि पृष्ठभूमि के अभ्यर्थियों का यह न्यूनतर प्रतिनिधित्व न केवल न्याय के सिद्धांतों के प्रतिकूल है, बल्कि यह कृषि-देहात के विरुद्ध पूर्वाग्रहों को पालिसी-सर्कल में और अधिक मजबूत बनाता है। इसके कारण नीति निर्धारकों और अभिजात्य वर्ग के मनोभावों और संवेदनाओं से कृषि-देहात या तो अक्सर अनुपस्थित रहता है या उसकी गलत समझ कायम रहती है। 10 फीसदी आरक्षण नीति में आर्थिक दुर्बलता के लिए कृषक और गैर-कृषकों के लिए विषम और दोषपूर्ण सूचकों का इस्तेमाल इसका ही उदहारण है।

यह नीति, कृषि-पृष्ठभूमि से आने वाले प्रत्याशियों का सबलीकरण तो दूर उनके रहे-सहे प्रतिनिधित्व को और घटा देगी। ऐसे में कृषक पृष्ठभूमि से आने वाले अभ्यर्थियों का उचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए नीतियों पर नए सिरे से सोचने की आवश्यकता है।  

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं)

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