चाहिए सांस्कृतिक पुनर्जागरण

संजीव
प्रतीकात्मक चित्र
प्रतीकात्मक चित्र

संजीव
पार्टियां अंधविश्वासों-रूढ़ियों को कैश करती हैं, जरूरत है इनसे निकलकर रोजगार, आय के स्रोतों की

कभी-कभी मैं अवाक होकर सोचने लगता हूं कि आखिर इस हिंदी पट्टी की निर्मिति क्या है, केमिस्ट्री क्या है। सोचने पर लगता है, हिंदी पट्टी मुख्यतः तुलसीदास की निर्मिति है। वह तुलसी नहीं जो परहित सरिस धर्म ‌नहिं भाई, पर पीड़ा सम नहिं अधमाई या कादर मन कर एक अहारा, दैव-दैव आलसी पुकारा या खेती न किसान को, भिखारी को न भीख बलि/ बनिक को न बनिज, न चाकर को चाकरी/ जीविका विहीन लोग सीदमान सोच बस/ कहैं एक एकनसों कहां जाई, का करी या वह तुलसी जो मांग के खइबो मसीत में सोइबो में ‘राममंदिर’ नहीं ‘मसीत’ अर्थात मस्जिद में सोने की बात करते हैं।

अब उस तुलसी की बात करते हैं, जिनके नाम से ‘हनुमान चालीसा’ है। वह तुलसी जिनके ‘रामचरित मानस’ में बिप्र, धेनु, सुर, संत हित लीन्ह मनुज अवतार में राम के अवतार लेने का कारण ‘ब्राह्मण, गाय, देवता और साधु-संन्यासी के हित-रक्षार्थ’ बताया गया है या पूजिय बिप्र सकल गुणहीना, सूद्र न गुण गण ज्ञान प्रवीणा का संदेश है।

हिंदी पट्टी में रामचरित मानस साहित्यिक नहीं, धार्मिक ग्रंथ के रूप में ही समाद्रित है। उत्तर प्रदेश, बिहार के लोग जहां भी हैं, बिना पूरा समझे इसका नित्य पारायण करते हैं। अखंड रामायण भी-आंधी की तरह पाठ करके पूर्णाहुति होती है। आज की हिंदी पट्टी के सांस्कृतिक परिवेश को यही गाइड करता है। बिप्र, धेनु, सुर और संत के साथ इसमें गंगा और पुराणों के मिथक भी जुड़ जाते हैं। अरसे तक यहां पुरुषों के नाम में ‘राम’ जुड़ता रहा। जरूरत तो ‘कबीर’ की थी, जो इसी हिंदी पट्टी की चेतना और विवेक हैं, पर हिंदी पट्टी ने उन्हें हाशिए पर डाल रखा है।

हमें लगता है, हिंदी पट्टी इस मिथकीय सांस्कृतिक बॉटलनेक में फंसा पड़ा है, बाहरी दबाव या विवेक से वह जो कुछ भी पॉजिटिव सोचता है, यही अवरोध उसके सामने आकर खड़ा हो जाता है, वापस वह फिर अपनी जगह। वह मॉरीशस, फीजी, सूरीनाम, त्रीनिदाद आदि जहां भी जाता है, साये की तरह ये शक्तियां चली आती हैं। ऐसा नहीं है कि इनसे उबरने की उसकी कोई भी कोशिश नहीं हुई। कबीर के बाद भी जयप्रकाश नारायण, डॉ. राममनोहर लोहिया, भगत सिंह, डॉ. आंबेडकर, स्वामी सहजानंद सरस्वती, राहुल सांकृत्यायन, ललई सिंह यादव, विनोद मिश्र, अखिलेन्द्र प्रताप सिंह, संतराम बीए, रामस्वरूप वर्मा या देश-प्रदेश के अंदर-बाहर की परिवर्तनकारी शक्तियों और आंतरिक तथा बाहरी दबाव और टूटन ने इसे न झकझोरा ही, मगर उन्हें प्रणाम कर यह हिंदी पट्टी वापस उसी बॉटलनेक के बॉटल में!

वही उसका कॅम्फर्ट जोन है। उसे वह 'आस्‍था' के नाम से महिमामंडित करता है। हर दिन हर पल पक्षपात और पाप करता है। अभी तक धर्म और जाति की समस्या थी, अब संप्रदायवाद और आतंकवाद का जहर भी इससे आ मिला है। बकौल चंबल के एक लोक कवि-

का पानी में घुलि गयो, या माटी का भूल

गुठली रोपी आम की, फिरि-फिरि फरत बबूल।

रत्नागिरि में जन्मे मराठी ब्राह्मण बाबा रामचंद्र दास जब उत्तर प्रदेश में किसान आंदोलन का सूत्रपात करते हैं तो मानस की जनधर्मी चौपाइयों और उपमाओं का इस्तेमाल करते हैं, कारण उन्हें जमीनी हकीकत मालूम है कि वहां मार्क्स, लेनिन या अन्य नहीं चलेंगे, न उन्होंने यहां की मिट्टी को पूरी तरह समझा है, न यहां के लोग पूरी तरह उनकी ‘भाषा’ समझ सकते हैं, उनके अंदर रामचरित मानस गहरे पैठा हुआ है। जो भी हो, जैसा भी हो। यद्यपि बाबा रामचंद्र दास स्वयं में मानस के जातिवादी असर से मुक्त थे। उन्होंने जाति प्रथा को धता बताकर प्रतापगढ़ की अपनी प्रयोगभूमि में एक पिछड़ी जाति (शूद्र या ओबीसी) की महिला से विवाह किया। महात्मा गांधी, जो जाति-पांत मानते थे, को ‘मानस’ अनुकूल लगा, इसका ‘राम राज्य’ भी। वहीं पं. जवाहरलाल नेहरू मार्क्स-लेनिन से परिचित थे, पर रामचरित मानस से अपरिचित, सो अवध के किसानों से न जुड़ पाए और बाबा रामचंद्र दास के आंदोलन से लौट गए।

गंगा नदी यहां मां हैं, पापनाशिनी, मोक्षदायिनी हैं, दूसरी कोई नदी नहीं। स्वच्छ जल भी अगर छुआ जाए या उसमें छींटे पड़ जाएं तो वह अपवित्र है। मेरी पत्नी उसे गंदा जल मानती है और कुंभ के गंगा के करोड़ों लोगों द्वारा प्रदूषित जल में नहा कर अपना परलोक संवारती है। किसी के मरते समय मुख में गंगाजल देते हैं, ताकि वह स्वर्ग जाए, भले ही हमने जहां-तहां गंगाजल में कीड़े बिलबिलाते देखे हैं, वे मानने को तैयार ही नहीं होते कि गंगाजल में कीड़े पड़ सकते हैं। सवाल है गंगा ही क्यों, सभी नदियां मां हैं, गाय अगर माता है तो भैंस, बकरी, ऊंट, भेड़, गधी क्या हैं, जिनका दूध, पीया जाता है (कई आदिवासी सूअर तक का भी दूध पीते हैं)। इसी तरह ‘कर्मनाशा’ और ‘चंबल’ का जल क्यों कर पुण्य क्षय करता है, वे भी तो मां ही हैं, खासकर उस अंचल के लिए, पर नहीं, ‘कर्मनाशा’ में तो लोग भी मिलते हैं, बिना स्पर्श किए पार कराने के लिए। ‘चंबल’ का पानी पीने से मुझे रोका गया, कारण ः वह मिथकीय रूप में गाय के चमड़े का पानी (नृगप्रकरण) (चर्मणवती) होने के कारण पुण्य क्षय करती है। यद्यपि मैंने पीया, कहीं से भी अलग नहीं लगा। शानदार नदी है।

यहां ‘रामायण’ का अर्थ रामचरित मानस है, वाल्मीकि कृत ‘रामायण’ नहीं। यहां ‘सच्ची रामायण’ के नाम से प्रकाशित पेरियार ई.वी. रामासामी नायकर की वाल्मीकि रामायण आधारित, ललई सिंह द्वारा प्रकाशित पुस्तक जब्त कर ली गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने बाद में इलाहाबाद हाइकोर्ट के निर्णय को उलट कर ललई सिंह यादव को तथा पुस्तक को मुक्त किया। संपूर्ण हिंदी पट्टी में चंद गिने-चुने लोग ही होंगे जिन्होंने वाल्मीकि रामायण यानी मूल रामायण को पढ़ा होगा। जिन्होंने पढ़ा होगा, वे भी प्रायः सच्चाई के प्रति मौन साधे रहते हैं। इतने गहरे धंसा हुआ है तुलसी का ‘मानस’ और ‘हनुमान चालीसा’ कि लोगों ने मिथकीय हनुमान जी और ऐतिहासिक महान क्रांतिकारी चंद्रशेखर ‘आजाद’ तक को जनेऊ पहना दिया (जबकि चंद्रशेखर ‘आजाद’ क्रांतिकारी समाजवादी सेना के कमांडर-इन-चीफ थे, जो ऐसी चीजों से मुक्त था)। मुक्ति के शॉर्ट-कट और भय निवारण के आभासीय यथार्थ रचने का श्रेय इसे अवश्य जाता है।

अंधश्रद्धा और भावनाओं का खेल हमें अंततः अंधश्रद्धा और भावनाओं की खोल में बंद कर देता है।

हिंदी पट्टी का अधिसंख्य एक आत्ममुग्‍ध और आत्मतुष्ट, जाति जर्जरित, रूढ़ियां और अंधश्रद्धा विजड़ित असाध्य रोग से पीड़ित समुदाय है, जो यह मान कर गर्वित है कि सारे भगवान राम, कृष्‍ण, गौतम, महावीर और अशोक जैसे सम्राट उनकी धरती में उत्पन्न हुए हैं। यद्धपि अं‌ितम तीन सिर्फ शोभा की वस्तु हैं, अनुकरण की नहीं। सारे तीर्थ उन्हीं के यहां हैं-प्रयाग, काशी, कुरुक्षेत्र, अयोध्या, मथुरा, पुष्कर, गया, सारनाथ आदि-आदि। सर्वाधिक पवित्र नदियां गंगा, यमुना, गोमती, नर्मदा, सरयू उन्हीं के पास हैं, (गंगा-यमुना को सर्वाधिक प्रदूषित कह कर उनका जायका न बिगाड़ें)। दो-तीन अपवादों को छोड़कर सारे ही प्रधानमंत्री उनके यहां के, सबसे उर्वर शस्य श्यामला भूमि उनके यहां, देश की राजधानी का रास्ता वहीं से होकर जाता है। हिमालय उनका (अफसोस, उत्तराखंड ने खंडित कर दिया)! गीता का उपदेश भगवान ने यहीं दिया।

इन्हें किसी ज्ञान-विज्ञान की क्या जरूरत, सारा कुछ तो वेद, कुरानशरीफ, गीता और रामचरित मानस में है। साहित्य तक में यहां परिचय जाति, कुल, गोत्र से दिया जाता है। प्रायः सारी ही नियुक्तियां, पुरस्कार जाति पर होते हैं-‘जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी', या ‘जाति ही पूछो साधु की, पड़ा रहन दो ज्ञान!’ चाहे व्यक्ति लाख चोर, डकैत, खूनी, बलात्कारी और भ्रष्ट हो, है तो हमारी जाति का! मिशेल फूको के पावर प्वाइंट में जो चीज भारतीय संदर्भ में छूट गई है, वह है जाति। जाति ही सत्ता, ताकत है!

वैसे तो हिंदी पट्टी ही नहीं, पूरे देश का आलम यह है कि कोई कुछ नहीं समझता, वह वही समझता है, जो वह समझना चाहता है। खुद को जस्टिफाइ करने के लिए वह हर तर्क को अनुकूलित कर लेता है। पर हिंदी पट्टी की जमीनी हकीकत यह है कि यहां रोजगार के अवसर निरंतर घटते चले गए। डेढ़ सौ साल से लोगों का आंतरिक और बाह्य विस्‍थापन या पलायन जारी रहा। आंतरिक दिल्ली, गुजरात, महाराष्ट्र, (पहले बड़े और मझोले शहरों में) और बाह्य फीजी, गायना, मॉरीशस, त्रीनिदाद (ब्रिटेन, अमेरिका) आदि में। कितनी चीनी मिलें बंद पड़ी हैं, कितनों ने बकाया पेमेंट नहीं किया, करीब हर जिले में एक औद्योगिक क्षेत्र खोला गया था, जो प्रायः बंद या बीमार है। पुलिस, सेना या रेलवे, जहां भी नौकरियां निकलती हैं, एक-एक पद के लिए लाख-लाख आवेदन हजारों किलोमीटर की यात्रा, हजारों रुपये के फॉर्म-वॉर्म आदि-आदि! सरकारें आती हैं, सरकारें जाती हैं, मगर इस मरीचिका में भटक-भटक कर दम तोड़ना ही उनकी (बेरोजगारों की) नियति बनती जा रही है। ट्रेनों में नीचे-ऊपर लदे ये खतरों के खिलाड़ी, दिल्‍ली, मुंबई, गुजरात, बंगाल, राजनीतिक पार्टियों द्वारा ‘बिहारी’ कह कर अपमानित होने को अभिशप्त! घूमकर तुलसी के पूछें एक एकन सों, कहां जायीं का करीं, उन्हें उपदेश और सुझाव न दें, रोजगार दें, आय के स्रोत दें-

नदी की कहानी किसी दिन सुनाना

मैं प्यासा हूं, दो घूंट पानी पिला दो।

कभी-कभी सोचता हूं, रोजी-रोजगार के बंद द्वार खुल भी जाएं तो क्या हिंदी पट्टी की बदहाली दूर हो जाएगी। नहीं, भाईचारा और आपसी सौहार्द्र तब भी कायम नहीं हो पाएगा। जब तक हमारे तथाकथित धर्मग्रंथ हमें लड़ मरने, दूसरे से घृणा करने के लिए, अंधश्रद्धा के प्रसार के लिए कार्य करते रहेंगे, तब तक कभी नहीं। ‘गीता’ में ‘चतुर्वर्णं मया स्रष्टम’ स्वयं भगवान से कहलाया जाता है, राम क्षत्रिय जाति के हैं, शबरी भील जाति की, तब तक जाति कहां जाने वाली! भगवान का अवतार ही ‘बिप्र’ जाति, गाय, देवता संतों के हित रक्षार्थ हुआ है, तब तक जाति कहां जाने वाली? ऐसी ही नस्लीय या अन्‍य असंगतियां दूसरे धर्मों में होंगी।

मस्जिद तो बना ली पल भर में ईमान के पैरोकारों ने

दिल अपना पुराना पापी था, वर्षों में नमाजी हो न सका!

तो, सवाल आर्थिक तो है पर मूलतः सांस्कृतिक है।

इन धार्मिक अंतर्विरोधों और आस्‍थाओं के निराकरण के बजाय हमारी नेतृत्वकारी शक्तियां (दल) भी इन्हें कैश करती हैं, फिर जाति-संप्रदाय, जाए कैसे? अंधविश्वास दूर कैसे हो? वैसे, मात्र हिंदी पट्टी को इसके लिए आप दोषी करार नहीं दे सकते! प्रायः सारा देश और सभी धर्म वाले ही इसके शिकार हैं। आवश्यकता है एक सांस्कृतिक नवजागरण की। कब होगा, कैसे होगा? ‘छूटहि मल कि मलहि के धोये?’

प्रसंगवश मुझे सावरकर के दो वक्तव्य याद आते हैं ः

1. गाय हमारी मां कैसे हो सकती है, वह तो एक पशु है।

2. जिस मनुष्य को धर्म का केवल दूरध्वनि यंत्र या भोंपू नहीं बनना है, मनुष्य के रूप में उसे स्वयं को बुद्धिनिष्ठ मन चाहिए तो उसे शब्दनिष्ठा का उन्मूलन कर वेद, अवेस्ता, बाइबिल और कुरान जैसे सभी प्रतिष्ठित ग्रंथों को मानव रचित मानना पड़ेगा और ऐसे ठोस विचारों को सार्वजनिक बनाना होगा। चार सदियों पूर्व यूरोप धर्म की अपरिवर्तनीय सत्ता का ऐसा ही गुलाम बन गया था, लेकिन उसने बाइबिल को दूर हटाकर विज्ञान का हाथ पकड़ लिया, श्रुति-स्मृति, पुराणों की बेड़ियां तोड़कर आधुनिक बन गया, अपटुडेट बन गया और विगत चार सौ वर्षों में हमसे चार हजार वर्ष आगे निकल गया, त्रिखंड विजयी बन गया। हमारे राष्ट्र को ऐसा बनना हो तो पुराने ग्रंथों को बंद कर प्राचीन श्रुति-स्मृति और पुराणों का शासन लपेट कर रख देना होगा या केवल ऐतिहासिक ग्रंथों के रूप में संग्रहालयों में ससम्मान रख कर विज्ञान-युग का पन्ना पलटना होगा। आज क्या उचित है और क्या अनुचित यह बताने का अधिकार प्रायोगिक विज्ञान का है।

सावरकर का उदाहरण यहां जान-बूझ कर इसलिए रखा जा रहा है कि कतिपय अंतर्विरोधों के बावजूद देशभक्ति और आस्‍था के क्षेत्र में वे एक प्रतिमान रहे हैं। यह उद्धरण हुतात्मा डॉ. नरेंद्र दाभोलकर की पुस्तक का है। पांच वर्ष पूर्व ‘आस्‍था’ वालों ने पुणे में उनकी हत्या करा दी थी। हत्यारे आज तक नहीं पकड़े गए। उनके जीते जी न सही, उनकी मृत्यु के बाद उनका प्रयास रंग लाया, महाराष्ट्र में अंधश्रद्धा के विरुद्ध बिल पास हुआ।

दूसरा उदाहरण बंगाल के विद्रोही कवि काजी नजरूल इस्लाम का है, जिन्होंने मुसलमानों को इसी बात के लिए धिक्कारा था, कि वे वैज्ञानिक चेतना संपन्न नहीं, मौलवीवादी क्यों हैं?

तीसरा उदाहरण भी बंगाल से कविगुरु रवींद्रनाथ टैगोर का, “जब तक जीवित हूं, कभी मानवीयता वाद पर ‘देशभक्ति’ की जीत नहीं होने दूंगा।”

हिंदी पट्टी वाले जिस सती की आज भी पूजा करते हैं, उस बर्बर प्रथा को राजा राममोहन राय ने लार्ड विलियम बेंटिक की सहायता से 1834 में ही कानूनन बंद करवाया था, और इधर 2019 में बांदा में कुछ लोग इसलिए मायूस हो गए कि सती होती औरत को देखने और पुण्यसंचय करने पन्ना (मध्य प्रदेश) से आए थे, उसे सती नहीं होने दिया गया। ईश्वरचंद्र विद्यासागर विधवा विवाह के भगीरथ प्रयत्नों के असफल रह जाने पर कलकत्ता त्याग करमाटांड (झारखंड) में आदिवासियों के बीच चले आए।

(लेखक प्रख्यात साहित्यकार हैं

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