सत्ता का दम, दंभ और दर्द

हरिमोहन मिश्र
जवाब तो चाहिएः पटना की रैली में प्रधानमंत्री मोदी के साथ मुख्यमंत्री नीतीश, जो पिछले चुनावों में आमने-सामने थे
जवाब तो चाहिएः पटना की रैली में प्रधानमंत्री मोदी के साथ मुख्यमंत्री नीतीश, जो पिछले चुनावों में आमने-सामने थे
पीटीआइ

हरिमोहन मिश्र
आम चुनाव भावनात्मक मुद्दों का मोहफांस तोड़कर जीवन के असली मुद्दों की उपेक्षा का जवाब तलाशने का वक्त

मन डोले, तन डोले...मन का गया करार! यह फिल्मी गीत मानो हिंदी पट्टी के लोगों की फितरत का ही इजहार करता है। एकाधिक चुनाव इसकी गवाही देते हैं कि कोई धुन सुरीली लगती है तो हिंदी पट्टी ऐसी रम जाती है कि अपने जीवन से जुड़े मुद्दों-मसलों की सुध-बुध खो बैठती है और वादों में ही बह जाती है। वरना उसे यह दंश क्यों नहीं सालता कि आजादी के इतने वर्षों बाद भी उसके लगभग हर तबके के लोग दूसरे राज्यों में स्‍थायी-अस्‍थायी रोजगार के लिए पलायन पर मजबूर हैं? इसके विपरीत आजादी के शुरुआती दशकों में बिहार और उत्तर प्रदेश की प्रति व्यक्ति आय ऊपर के एक-दो नंबरों में हुआ करती थी। तो, बाद के वर्षों में ऐसा क्या हुआ कि ये सबसे पिछड़े राज्यों में शुमार हो गए? वह नेताओं से इसका जवाब क्यों नहीं मांग पाते? उन्हें क्यों भावनात्मक मुद्दों पर भरमाना आसान है? यह पट्टी क्यों जाति और संप्रदाय के जंजालों में फंस कर रह जाती है? क्या कोई सांस्कृतिक गांठ है जो उसे उबरने नहीं देती?

हालांकि 17वीं लोकसभा के चुनावों का असली मैदान यही है। दिल्ली की गद्दी के सभी दावेदारों की नजर इसी पर है। इसी के बूते 2014 में वह लहर परवान चढ़ी, जिसे बाद में मोदी लहर के नाम से जाना गया और तीस साल बाद किसी एक पार्टी भाजपा को बहुमत मिल गया था। जबकि चुनाव ऐसे वादों पर था जो पूरे पांच साल में अधूरे रह गए। सो, उसी को आधार बनाकर इस आम चुनाव में विपक्षी पार्टियां सत्तारूढ़ गठजोड़ को चुनौती देने के लिए हिंदी पट्टी को ही साधने में लगी हुई हैं। खासकर उत्तर प्रदेश और बिहार में क्रमशः सपा-बसपा-रालोद गठबंधन और राजद-कांग्रेस गठजोड़ चुनौती में उतरा तो भाजपा ने भी अपना अहंकार छोड़कर सहयोगियों को मनाया। भाजपा को हराने की गुंजाइश भांपकर कांग्रेस ने भी प्रियंका गांधी के रूप में अपना आखिरी तुरुप चला और उत्तर प्रदेश में गठबंधन न बनने पर एकला चलो की राह पकड़ी।

लेकिन इतने अहम दांव के बावजूद क्या 2019 का आम चुनाव हिंदी पट्टी को अपनी पारंपरिक फितरत से उबरने और अपने जीवन से जुड़े मुद्दों पर राजनैतिक दलों से ठोस मोल-तोल करने का गवाह बनेगा? इसमें संदेह नहीं कि मुद्दे बहुत से हैं और जवाब मांगने का भी यही वक्त है, सिर्फ केंद्र और राज्यों में सत्तारूढ़ पार्टियों से ही नहीं, बल्कि विपक्षी पार्टियों से भी कि वे क्या करने जा रही हैं। लेकिन क्या पार्टियों का रवैया इतना गंभीर है। अगर गंभीर होता तो सबके चुनाव घोषणा-पत्र अब तक आ गए होते। यह भी साफ करता है कि हमारी राजनैतिक पार्टियों के पास न महत्वपूर्ण सवाल के जवाब हैं, न मौजूदा नीतियों का कोई वैकल्पिक मॉडल।

हालांकि हर चुनाव की तरह 2019 की फिजा भी बदली हुई है। कुछ रंग बदरंग हैं तो कई नए रंग खिले हुए हैं। 17वीं लोकसभा तमाम संभावनाएं ऐसी पैदा कर रही है कि 16वीं लोकसभा के मुकाबले उसके तेवर अलग होंगे। भारतीय लोकतंत्र के लिए यूं तो हर चुनाव नई प्रतिश्रुतियां लेकर आते हैं, लेकिन 2014 के चुनावों ने ऐसी बुलंदी तय कर दी थी कि उसमें थोड़े और पारंपरिक बदलावों की गुंजाइश नहीं रह गई। सो, यह मानना बेमानी नहीं है कि बहुत कुछ बदलने वाला है। सिर्फ राजनीति ही नहीं, देश की आर्थिकी और नीतियों के रुख में भी बड़े बदलाव के संकेत उभरने लगे हैं। किसानों और रोजगार के मुद्दे उन समूची आर्थिक नीतियों पर सवाल खड़े कर रहे हैं, जो नब्बे के दशक में उदारीकरण के साथ शुरू हुए थे। उसी तरह 2014 में शुरू हुई राष्ट्रवाद की उस राजनीति पर भी फैसला होने वाला है, जिसकी बुलंदी हाल में पुलवामा आतंकी हमले और बालाकोट में एयरस्ट्राइक के बाद देखने को मिली है। इसी के साथ यह भी तय होने वाला है कि केंद्रीय और एकमात्र निर्णायक नेता की सरकार बेहतर है या गठबंधनों की सामूहिक नेतृत्व वाली।

यकीनन, इसमें ढेरों मुद्दे ऐसे हैं जिनसे हिंदी पट्टी की तस्वीर बदल सकती है। मसलन, सर्वाधिक लोगों को रोजगार देने वाली खेती-किसानी पर अगर देश की नीतियों का फोकस बढ़ता है तो हिंदी पट्टी की हालत सुधर सकती है। याद करें, नब्बे के दशक में हुए महेंद्र सिंह टिकैत जैसे नेताओं के किसान आंदोलनों में कर्ज माफी जैसा मुद्दा नहीं था, न ही फायदेमंद दाम हासिल करने का मुद्दा था। तब मुद्दे मोटे तौर पर बिजली, पानी, खाद सस्ते में सुलभ कराने पर ही केंद्रित थे। लेकिन, क्या हिंदी पट्टी या समूचा देश अब उस ओर वापसी कर सकता है? क्या वह नेताओं को नीतियों का रुख मोड़ने पर मजबूर कर सकता है? जाहिर है, चुनाव ही वह मौका होता है, जब जवाबदेही तय की जाए और नीतियों का रुख मोड़ा जाए। ऐसा हुआ भी है। एक उदाहरण तो 2004 के चुनावों का ही जब ‘शाइनिंग इंडिया’ के नारे पर सवार पहली एनडीए सरकार हार गई थी और यूपीए सरकार को ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना, शिक्षा के अधिकार, सूचना के अधिकार जैसी नीतियां लेकर आनी पड़ी थीं, जिनसे आधा-अधूरा ही सही, फोकस बदला था।

लेकिन, इस बार क्या बुनियादी मुद्दों की वापसी होती दिख रही है? सत्तारूढ़ भाजपा की अगुआई वाली एनडीए सरकार तो ‘राष्ट्रवाद’ को अपना तारणहार मान रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कहते हैं, “राष्ट्र मजबूत हाथों में है। महामिलावट की सरकार उसे कमजोर कर देगी।” वे अपनी उज्‍ज्वला, स्वच्छ भारत, प्रधानमंत्री आवास, आयुष्मान योजना, दो एकड़ तक के किसानों को हर साल नकद 6,000 रुपये देने जैसे कार्यक्रमों का भी जिक्र करते हैं, मगर फोकस सर्जिकल स्ट्राइक, एयर स्ट्राइक पर ही ज्यादा है। दूसरी ओर, कांग्रेस के राहुल गांधी किसानों की कर्जमाफी और सबको बुनियादी न्यूनतम आय मुहैया कराने की बात तो करते हैं, मगर उनका सबसे अधिक जोर “चौकीदार चोर है” जैसा नारा लगवाने पर ही है। राफेल विमान सौदे पर सवाल उठाना और सरकार की पोल खोलना तो ठीक है, लेकिन वैकल्पिक नीतियों पर बात आज सबसे जरूरी है। किसानों को कुछेक रियायतें देना और कुछ नकद राशि मुहैया कराना तो महज टोटके जैसे हैं। अब तो उस पूरी अर्थव्यवस्‍था का रुख ही मोड़ने की दरकार है, जो मुट्ठी भर अमीरों की दौलत में इजाफा करती है और बाकियों की आमदनी घटाती जाती है।

यह सबसे ज्यादा तब सालता है जब दूसरी विपक्षी पार्टियों, जिन्हें क्षेत्रीय दल कहा जाता है, के पास भी कोई वैकल्पिक आर्थिकी या राजकाज चलाने का मुद्दा नदारद है। पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी से लेकर आंध्र के चंद्रबाबू नायडु ही नहीं, हिंदी पट्टी के समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल के नेता भी सिर्फ मोदी को हटाने या “संविधान बचाओ, देश बचाओ, नफरत दूर करो” जैसे नारों पर फोकस कर रहे हैं। ये मुद्दे भी वास्तविक हैं और पिछले पांच साल में जो कुछ हुआ है, उससे यही नहीं, संस्‍थाओं को नष्ट करने, जीडीपी वगैरह के आंकड़ों को अविश्वसनीय बनाने जैसे ढेरों मुद्दे उभरे हैं। लेकिन असली संकट वह है जिससे रोजगार मिटे हैं, खेती-किसानी पर संकट आया है, उस पर कहीं कोई वैकल्पिक सोच नहीं है।

हिंदी पट्टी के नेता उन मुद्दों को भी आधे-अधूरे तरीके से ही उठा रहे हैं जो मोदी सरकार के बड़े आर्थिक फैसलों के कारण पैदा हुए हैं। अब तो यह काफी हद तक साफ हो चुका है कि नोटबंदी, जीएसटी के फैसलों से सबसे ज्यादा मार छोटे उद्योग-धंधों और श्रम-सघन क्षेत्रों पर पड़ी, जो हिंदी पट्टी के अधिकांश लोगों को आजीविका देते हैं। मोदी सरकार के इन फैसलों ने उस असंगठित क्षेत्र को तबाह कर दिया, जिसमें खासकर उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ की बड़ी आबादी स्‍थायी-अस्‍थायी रोजगार पाती है। इसलिए लोगों को भाजपा और एनडीए के नेताओं से तो इसका जवाब मांगना ही चाहिए, विपक्ष के सभी दलों से वैकल्पिक नीतियों की भी मांग करनी चाहिए।  

लेकिन यक्ष प्रश्न यही है कि क्या चुनावी मुद्दे उस दिशा में बढ़ रहे हैं और क्या जनादेश कोई नई दिशा का सबक देगा। दरअसल, यह जिम्मेदारी भी दिल्ली की गद्दी के लिए सबसे अहम हिंदी प्रदेशों के कंधे पर है। लेकिन हिंदी प्रदेशों का चुनावी समीकरण उलझा हुआ है। पिछले चुनाव में भाजपा और उसका गठबंधन ज्यादातर हिंदी प्रदेशों बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, हरियाणा, दिल्ली, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और पंजाब में अधिकांश सीटों पर विजयी रहा था। वैसे, इस बार उसे ज्यादातर सीटों पर सीधे मुकाबले में उलझना पड़ेगा। जहां तितरफा या चौतरफा मुकाबला होने वाला है, वैसी सीटें एक-तिहाई या उससे कुछ ही अधिक होंगी। मसलन, उत्तर प्रदेश की कुल 80 सीटों में से कांग्रेस ने भले सपा-बसपा-रालोद गठबंधन के लिए सात सीट छोड़ बाकी सीटों पर लड़ने का ऐलान किया हो, मगर उसकी व्यावहारिक उपस्थिति दर्जन भर से ज्यादा सीटों पर नहीं होगी। शिवपाल यादव की पार्टी जैसी कुछ छोटी पार्टियां भले मुकाबला बहुकोणीय करना चाहें, मगर उनका हल्का-सा असर गिनती की तीन-चार सीटों तक ही सीमित रहेगा। बिहार की 40 सीटों में तो मुकाबला सीधा ही रहेगा। वहां गिनती की तीन-चार सीटें ही ऐसी होंगी, जहां एनडीए और महागठबंधन के अलावा कोई तीसरा ज्यादा असर दिखा पाएगा। झारखंड की 14 सीटों में मामला लगभग दोतरफा ही होने जा रहा है। मध्य प्रदेश की 29 सीटों में से तकरीबन पांच-छह सीटों पर ही कोई तीसरा प्रभावी उम्मीदवार होगा। छत्तीसगढ़ की 11 सीटों में भी हाल के विधानसभा चुनावों के नतीजे गवाह हैं कि बसपा या अजीत जोगी का असर बेहद घट चुका है, इसलिए तीसरे पक्ष का असर नहीं के बराबर होगा। राजस्थान की 25 सीटें तो सीधे मुकाबले की हैं ही, बसपा एकाध सीटों पर भी शायद ही कोई खास असर डाल पाए। हरियाणा और दिल्ली में जरूर त्रिकोणीय या बहुकोणीय मुकाबला होगा। पंजाब में आम आदमी पार्टी की मौजूदगी में खासी गिरावट से मुकाबला कांग्रेस और टूट की शिकार अकाली दल-भाजपा गठजोड़ के बीच ही होगा। हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में तो भाजपा और कांग्रेस के अलावा बसपा की मौजूदगी भी नाममात्र की ही है।

पिछले आम चुनाव में हिदी प्रदेशों की कुल 240 सीटों में से भाजपा नीत एनडीए को 190 सीटें मिली थीं और करीब-करीब 189 सीटों पर ही तितरफा या बहुतरफा मुकाबला हुआ था। फिर पंजाब को छोड़कर इन सभी प्रदेशों में भाजपा की वोट हिस्सेदारी भी 43-46 प्रतिशत तक थी। लेकिन तब कांग्रेस के खिलाफ ही नहीं, मोटे तौर पर बाकी सभी दलों के खिलाफ नाराजगी और भाजपा और उसके प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के ‘अच्छे दिन’ लाने के वादे ने लहर पैदा की, जिसे बाद में मोदी लहर कहा जाने लगा। लेकिन वे वादे तो अब जुमला साबित हो चुके हैं और एंटी-इंकंबेंसी ही नहीं भारी है, बल्कि सामाजिक तनाव भी तीखे हुए हैं। याद रहे, पश्चिम उत्तर प्रदेश में भीषण दंगों की पृष्ठभूमि में हुए पिछले चुनावों में सिर्फ सांप्रदायिक भावनाओं का ही भाजपा को लाभ नहीं मिला था, बल्कि वादों से उभरी उम्मीदों और आकांक्षाओं ने जातिगत विभाजन की रेखाएं कुछ भोथरी भी कर दी थीं। लिहाजा, लगभग हर तबके के वोटों में भाजपा की हिस्सेदारी बन गई थी। लेकिन वादों के पिटने और सामुदायिक तनाव की खाइयां गहरी होने से नाराजगी और निराशाएं गहरी हुई हैं। मतलब यह कि भाजपा के वोट प्रतिशत में गिरावट स्वाभाविक है। इसी को रोकने के लिए भाजपा पुलवामा और बालाकोट से उभरी भावनाओं के उफान को हवा देने की कोशिश कर रही है, ताकि बहस सरकार के पांच साल के कामकाज पर केंद्रित न हो।

इस गणित के बावजूद भावनात्मक मुद्दे भाजपा के बड़े संबल हैं, बशर्ते लोग उसमें बहने को तैयार हों। एक बात यह भी है कि कई जगह वैकल्पिक मुद्दों के अभाव में लोगों में विपक्षी दल उस कदर भरोसा नहीं पैदा कर पा रहे हैं। इन सब सवालों के इतर अहम मुद्दा हिंदी पट्टी की उस फितरत का है, जो उसे जीवन के असली मुद्दों पर फोकस करने में आड़े आ जाती है। इसी के मद्देनजर अगले पन्नों पर जेएनयू के प्रोफेसर रवि श्रीवास्तव आर्थिक मुद्दों की बात कर रहे हैं, तो प्रख्यात साहित्यकार संजीव उस सांस्कृतिक बॉटलनेक की ओर इशारा कर रहे हैं जो हिंदी पट्टी को आगे नहीं जाने देती। उनकी पुरजोर दलील है कि एक पुनर्जागरण की दरकार है। जेएनयू के ही प्रोफेसर रहे, मशहूर अर्थशास्‍त्री अरुण कुमार अर्थव्यवस्‍था की मौजूदा हालत का बयान कर रहे हैं, जो व्यापक देश के साथ हिंदी पट्टी की दुर्दशा का कारण बन रही है। इसके अलावा अगले पन्नों पर हिंदी प्रदेशों के मुद्दों-मसलों और समीकरणों की रिपोर्टें हैं। इनमें उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्‍थान, दिल्ली, हरियाणा, उत्तराखंड, पंजाब और हिमाचल प्रदेश के मुद्दों और समीकरणों का हाल है, क्योंकि इन्हीं राज्यों से दिल्ली की गद्दी का अगले पांच साल के लिए राजकाज तय होने वाला है। बेशक, बाकी राज्यों की भी अहमियत है और उनके गणित भी केंद्र की सत्ता तय करेंगे, लेकिन हिंदी प्रदेशों का खास जिक्र इसलिए क्योंकि सब कुछ तय करने के बावजूद इनके हाथ खाली ही रहते हैं।

बहरहाल, यह तो नहीं कहा जा सकता कि ये चुनाव पुनर्जागरण की ओर हिंदी पट्टी को ले जाएंगे, लेकिन यह तो उम्मीद की ही जा सकती है कि जनादेश ऐसा आए जिससे कोई नई राह निकले।

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