अंत में सेल

आलोक पुराणिक
मोदी प्रिंट साड़ी
मोदी प्रिंट साड़ी

आलोक पुराणिक
आखिर में शौर्य अगर कपड़े का एक ब्रांड बेचने के काम आ रहा है, तो यही माना जाना चाहिए कि आखिर में सब बिकना है और सेल के लिए जाना है

पीएम मोदी की छवि साड़ियों पर छप गई है और ये बेची जा रही हैं। साड़ी के एक डिजाइन में सर्जिकल स्ट्राइक के लिए जा रहे सैनिकों का फोटू साड़ी प्रिंट पर छाप दिया गया है। कुछ भी ना बचा अब ऐसा जिसे बेचना संभव ना हो, या यूं कहें सबकुछ होता ही इसलिए है कि बाद में उसकी सेल लगाई जा सके।

सेल, सेल, सेल सब कुछ सेल!

सैनिक वीरता इसलिए दिखाता है कि बाद में उसके शौर्य का फोटू लगाकर कोई ज्वैलरी वाला अपने आइटमों पर दस परसेंट देशभक्ति डिस्काऊंट दे सके और डिस्काऊंट से सेल बढ़ा सके। शौर्य की श्रेष्ठ सेल परंपराएं रही हैं हमारे मुल्क में। बांग्लादेश युद्ध के हीरो एक जनरल बाद में एक कपड़े के ब्रांड एंबेसडर बने पाए गए। जैसे कपड़े का वह ब्रांड ही उनके शौर्य का जनक हो! नेशनल डिफेंस अकादमी, इंडियन मिलिट्री स्कूल ये सब तो जैसे फालतू के संस्थान हैं। उस कपड़े की फैक्ट्री के मालिकों, कर्मियों को ही सेना का जनरल या कर्नल बना दिया जाना चाहिए।

आखिर में शौर्य अगर कपड़े का एक ब्रांड बेचने के काम आ रहा है, तो यही माना जाना चाहिए कि आखिर में सब बिकना है और सेल के लिए जाना है। विज्ञापन मूर्ख बनाते हैं, आप यह बात किसी समझदार से कहिए। वे परम समझदारी भरा जवाब दे सकते हैं, “आप को तो नेता भी मूर्ख बना जाते हैं और निरमोल बाबा भी। थोड़ा सा मूर्ख इश्तिहारों ने बना दिया, तो काहे बुरा मान रहे हैं जी।” ‘बुरा ना मानो होली है’ टाइप आह्वान पूरे साल चलता रहता है। होली ना हो तब भी यह आह्वान हमेशा चालू रहता है। बेचने वाले बहुत चालू हैं, बेचते रहते हैं कुछ न कुछ पूरे साल।

आम आदमी की आफत यह है कि उसे मूरख बनाने के लिए बहुत टोलियां घूम रही हैं। एक टोली के हाथों मूरख बन जाओ और दूसरी टोली के हाथों मूरख बनने से इनकार कर दो तो मूरख निर्माण टोली बुरा मान जाती है। वो वाले बना गए आपको, तो आप बन गए। कोई जनरल साहब कभी कपड़े का एक ब्रांड आपको शौर्य के नाम पर बेच गए, तो वह ब्रांड खरीद लिया। अब कोई साड़ी में देशभक्ति छाप कर बेच रहा है, तो आपको दिक्कत हो रही है।

लोकतंत्र के समान अधिकार का तकाजा है कि बंदा हरेक के हाथों बेवकूफ बने। नेता बेवकूफ बनाएं, फिर निरमोल बाबा भी बेवकूफ बनाएं और फिर निरमोल बाबा अपने इश्तिहारों के जरिए और बेवकूफ बनाएं। बनाते ही जाएं। हरेक के हाथों मूर्ख बनना आम आदमी का लोकतांत्रिक दायित्व है, कोई चूक ना जाए, कोई रह ना जाए, आम आदमी को मूर्ख बनाने से। हरेक को मूर्ख बनाने का अधिकार है, हरेक आम आदमी का दायित्व है कि वह शांति से मूर्ख बने।

हाल में कुछ भारतीय बैडमिंटन खिलाड़ियों ने स्टारडम हासिल की है। स्टारडम मिलते ही ये एक चीनी बनाने वाले के ब्रांड एंबेसडर होने की डील कर चुके हैं। बंदा मेहनत, लगन से कुछ उपलब्धि हासिल करता है, फिर वह उसका क्रेडिट किसी चीनी कंपनी को दे देता है। प्लीज यह बताइए कि कितनी मेहनत की, कैसी लगन से सुबह चार बजे उठकर प्रैक्टिस की। आमिर खान हमारे बच्चों को यह बताएं कि किस तरह के फोकस से अपना नाम और काम बड़ा करते हैं, पर वह यह बता रहे हैं कि चीन में बने उस वाले फोन को लेना चाहिए। आमिर खान से कहें कि भइया कुछ अच्छी-अच्छी बातें बताओ बच्चों को। आमिर खान पलट कर कह सकते हैं कि मुझे ही क्यों कह रहे हैं? आप अमिताभ बच्चन को कहिए वह भी दूसरे चाइनीज फोन वन प्लस के बारे में बता रहे हैं। हर बड़ा आदमी किसी ना किसी ब्रांड के बारे में ही बता रहा है। जो किसी ब्रांड के बारे में नहीं बता पा रहा है, उसके बारे में संवेदनाएं व्यक्त की जा रही हैं कि हाय कितना दुखी जीव है कुछ भी ना है बेचने को। टेस्ट मैचों के शानदार बैट्समैन चेतेश्वर पुजारा की उपलब्धियों के बारे में यह कहकर शक किया जाता है कि हाय बताओ उसके पास ब्रांड ही नहीं है, बेचने के लिए। कोई ना बिकवाता उससे माल, फिर कामयाब हम उसे कैसे मान लें। क्यूं मान लें। अगर आखिर में कोई सेल के काम ना आ रहा है तो बताओ कि उसे हम कामयाब क्यों मान लें। कामयाबी अब सेल पर तुल रही है और आखिर में सेल के ही काम आ रही है। जो सेल के काम ना आ रहा है, उससे पूछा जाता है। जैसे, चेतेश्वर पुजारा से पूछा जाता है कि अगर आप इतने ही बड़े बैट्समैन हो, तो बताओ कुछ बेचते क्यों नहीं हो।

बेचो, बेचो, बेचो, सेल सेल सेल!

सबकुछ बेचो, सबको बेचो, बेचे ही जाओ। साड़ी से लेकर कपड़े तक, फिल्म से लेकर न्यूज तक। क्या कहा आप नहीं देखेंगे! गलत बात, आपको मूर्ख बनाने का हक सबका है। सिर्फ नेता और निरमोल बाबा ही आपको मूर्ख बनाकर नहीं जा सकते।

 

 

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