इतिहास में खोई नायिका

प्रियदर्शन
मल्लिका
मल्लिका

प्रियदर्शन
मल्लिका संबंधों के बीच ठिठकी पड़ी स्‍त्री के ऐसे प्रश्नों को रखती हैं, जो समकालीन भी हैं और शाश्वत भी

मनीषा कुलश्रेष्ठ उन समकालीन लेखकों में हैं जिनका औपन्यासिक वैविध्य चौंकाता है। शिगाफ, पंचकन्या और स्वप्नपाश के बाद अब उनका नया उपन्यास मल्लिका जीवनीपरक है। भारतेंदु हरिश्चंद्र की प्रेयसी, रक्षिता या धर्मगृहीता मल्लिका को केंद्र में रखकर उपन्यास लिखना आसान काम नहीं था। सिर्फ इसलिए नहीं कि मल्लिका को लेकर ऐतिहासिक सामग्री बहुत कम मिलती है, बल्कि इसलिए भी कि वह जो दौर था, जैसे भारतेंदु थे और जैसा मल्लिका से उनका रिश्ता था, उन सबके बीच से एक सुसंगत औपन्यासिक सामग्री निकालना अपने-आप में किसी चुनौती से कम नहीं था। 

उपन्यास के दो केंद्रीय चरित्र मल्लिका और भारतेंदु हैं। बचपन में ही ब्याह दी गई और युवा होने से पहले विधवा हो गई मल्लिका परिवार द्वारा लगभग ठुकराए जाने की स्थितियों में बनारस आती है और भारतेंदु के पड़ोस में बसती है। भारतेंदु का व्यक्तित्व तरह-तरह के विपर्ययों का समुच्च्य है। वे एक तरफ हिंदी जाति के जागरण में अपना सर्वस्व होम करने को तैयार हैं और दूसरी तरफ बहुत सारे व्यसनों और दुर्गुणों के मारे हैं जिनमें उनकी संपत्ति भी जाया हो रही है। मल्लिका के अलावा भी उनकी बहुत सारी प्रेमिकाएं हैं, लेकिन वे मल्लिका से एकनिष्ठता चाहते हैं। दूसरी तरफ लगभग एकाकी जीवन जी रही मल्लिका को भारतेंदु में एक बौद्धिक आश्रय मिलता है, वे उसकी रचनात्मक वृत्तियों को प्रेरित करते हैं, उसे लेखन और अनुवाद की ओर प्रवृत्त करते हैं। मल्लिका के भीतर यह प्रश्न खड़ा होता है कि यह कैसा प्रेम है जो इकतरफा एकनिष्ठता की मांग करता है। लेकिन भारतेंदु के भीतर इस पश्चाताप की छाया नहीं दिखती कि वे बहुत सारे संबंधों में अपने लिए प्रेम तलाश रहे हैं।

मनीषा ने भावुक हुए बिना इस संबंध का चित्रण किया है। वह कहीं भारतेंदु को न्यायसंगत ठहराने की कोशिश नहीं करतीं, न ही मल्लिका के मुंह में समकालीन स्‍त्री संदर्भों से जुड़े प्रश्न डालती हैं। एक उपन्यासकार जितना अपने किरदारों के भीतर होता है उतना ही मनीषा भी मल्लिका के भीतर हैं। मल्लिका भारतेंदु की प्रेमिका ही नहीं, मनीषा की रचना भी है जो संबंधों के बीच ठिठकी पड़ी स्‍त्री के ऐसे प्रश्नों को रखती हैं, जो समकालीन भी हैं और शाश्वत भी।

उस समय के इतिहास, भारतेंदु युग और खुद भारतेंदु के लेखन से बहुत अल्प परिचय रखने वाले मेरी तरह के पाठक के लिए यह कहना मुश्किल है कि यह जीवनी कितनी प्रामाणिक है। लेकिन अंततः यह एक उपन्यास है और उपन्यास की एक प्रामाणिकता उसके पाठ से भी बनती है। इस कसौटी पर मनीषा और ‘मल्लिका’ दोनों बहुत दूर तक खरे उतरते हैं। लेखिका ने बहुत जतन से मल्लिका का चरित्र गढ़ा है। सुदूर बंगाल से बनारस तक की उसकी यात्रा विश्वसनीय जान पड़ती है। बंगाल में उसके पारिवारिक ब्योरे बिलकुल स्वाभाविक और असली लगते हैं। मेरे लिए यह जानकारी भी कम विस्मय भरी नहीं थी कि मल्लिका बांग्ला के महत्वपूर्ण उपन्यासकार बंकिमचंद्र चटर्जी की रिश्ते में बहन थीं। उपन्यास में बंकिम भी हैं, ईश्वरचंद विद्यासागर भी। बहुत संक्षेप में, उस समय समाज-सुधार को लेकर चल रही बहसें भी और राष्ट्रीय आंदोलन के समक्ष दिखने वाली दुविधा भी। कृति मल्लिका एक लेखक की पेशेवर कुशलता के साथ इन सबका चित्रण करती है और उस माहौल को लगभग जीवंत कर देती है जिसमें यह सब घटित हो रहा था। उपन्यास की भाषा पर बांग्ला की स्वाभाविक छाया है जो परिवेश देखते हुए खलती नहीं है।

बेशक, उपन्यास पढ़ कर एक तरह की अतृप्ति भी बनी रहती है। शायद यह जीवनी से बंधे रहने की मजबूरी हो कि उपन्यास में न दोनों किरदारों के प्रेम की उत्कटता दिखती है न उनके संबंधों को लेकर उपजे द्वंद्व की तीव्रता। सारी संवेदनशीलता के बावजूद कुछ है जो मन की अतल गहराइयों को छूने से रह जाता है। दूसरी बात यह कि उस समय समाज सुधार से जुड़ी जो बहसें चल रही थीं, उनको कुछ और विस्तार से जानने की इच्छा होती है। लेकिन इसमें संदेह नहीं कि बहुत सारे कोलाहल से भरे करीब पौने दो सौ साल पुराने उस कालखंड के दो किरदारों को मनीषा ने इस तरह सजीव किया है कि सावधानी से उपन्यास पढ़ते हुए व्यक्ति के मन और समाज के स्वभाव के कई सूत्र खुलते हैं।

हिंदी में जीवनीपरक उपन्यासों की एक क्षीण परंपरा रही है। विष्णु प्रभाकर, वृंदावनलाल वर्मा, रांगेय राघव, अमृतलाल नागर, गिरिराज किशोर और संजीव जैसे उपन्यासकार हैं, जिन्होंने तुलसी, कबीर और सूरदास से लेकर झांसी की रानी, शरतचंद्र, गांधी, भिखारी ठाकुर और छत्रपति शाहूजी महाराज तक के जीवन को उपन्यासों में ढाला है। लेकिन यह संभवतः पहली बार है जब किसी ने इतिहास के परिपार्श्व में खोई एक नायिका को अपना विषय बनाया हो।

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