मीडिया का पतन

सुधीश पचौरी
प्रतीकात्मक तस्वीर
प्रतीकात्मक तस्वीर

सुधीश पचौरी
इन दिनों मीडिया जनता को सच्‍चाई बताने की जगह ताकत और घृणा की भाषा के जरिए बदलाखोर बना रहा

एक अखबार, जो कल तक मोदी सरकार का घोर आलोचक था, पुलवामा के बाद घोर प्रशंसक हो उठा है। पिछले पंद्रह दिनों से विपक्ष अवाक हुआ पड़ा है। जिसने जरा भी किंतु-पंरतु की उसे मीडिया ने देशद्रोही, राष्ट्रविरोधी या सीधे राष्ट्रद्रोही करार दे दिया। उसके बाद सोशल मीडिया पीछे लग लेता है। ये काम मीडिया का तो नहीं। मीडिया का काम होता है जनता को सच्‍चाई बताना। लेकिन इन दिनों अपना मीडिया जनता को वास्तविक सच्‍चाई बताने की जगह ताकत और घृणा की भाषा के जरिए बदलाखोरी की दिशा में हांकता रहता है। वह सच का निर्माण करने की जगह सिर्फ अस्वाभाविक बदलाखोरी का निर्माण करता है। आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई जरूरी है, लेकिन उसके लिए तैयारी भी जरूरी है। पुलवामा के आतंकी हमले में भारत ने अपने चालीस वीर सैनिक खोए। कुछ दिन बाद हमारी सेना ने पाकिस्तान के कई आतंकी अड्डों को एयर फोर्स की ‘सर्जिकल स्टाइक टू’ से नष्ट किया और इस तरह शहीदों का प्रतिशोध लिया। हमारे दो लड़ाकू जहाज गिरे लेकिन हमारे एक पायलेट अभिनंदन ने उनके एफ-16 को मार गिराया और पाकिस्तान द्वारा पकड़े गए। फिर अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय दबाव में पाक को अभिनंदन को छोड़ना पड़ा। यह सब हमारे देश की नई ताकत नई छवि को बताता है।

पिछले पंद्रह दिनों की कहानी सिर्फ इतनी ही है लेकिन इसे टीवी और सोशल मीडिया में अब तक उसी उत्तेजक भाषा में बजाया जा रहा है जिस तरह 26 फरवरी के दिन और उसके बाद बजाया जाता रहा। पुलवामा की कहानी तेरहवें दिन संपन्न हो गई थी। बदला ले लिया गया था। सत्तारूढ़ दल इसे अपनी उपलब्धि बताए यह स्वाभाविक था, लेकिन मीडिया इसे अपनी उपलब्धि की तरह बताने लगे तो आप क्या कहेंगे? क्या मीडिया भी ‘सत्तारूढ़’ है? पुलवामा के बाद के 12 दिन तक मीडिया का सबसे बड़ा नारा रहा, “बदला लो, बदला लो, बदला लो! पाकिस्तान को नेस्तनाबूद करो! उसे पानी न दो प्यासा मार दो!” इसके लिए मीडिया को किसी ने ब्रीफ किया हो न किया हो, हमें तो मीडिया इस बदलाखोरी की भाषा में ‘स्वयं दीक्षित’ नजर आया। जब दूसरी सर्जिकल स्ट्राइक की खबर आई तो पहली बार एंकरों और रिपोर्टंरों के चेहरे खिले दिखे, जैसे यह स्ट्राइक उन्होंने ही की हो! यह एंकरों और रिपोर्टरों की युद्ध प्रियता और वीरता की नई मुद्रा थी, “बदला ले लिया! बदला ले लिया! पाकिस्तान ने मुंह की खाई!”

एक से एक बड़े रिटायर्ड सैन्य अधिकारियों की सारी वीरताएं साथ बरसने लगीं। वे जो सेना में रहते हुए नहीं कर सके उसे करने के लिए कहने लगे। कभी-कभी लगता सरकार वे ही चला रहे हैं, जनता की चुनी हुई नागरिक सरकार देश नहीं चला रही। ऐसा लग रहा था मानो उन्हीं के निर्देश पर बदला लिया गया है। “तनाव को शिथिल करना चाहिए,” “बातचीत के रास्ते बनने चाहिए”, जैसा सुझाव कोई गलती से भी देता तो स्टूडियो में ही धराशायी कर दिया जाता। सत्तारूढ़ दल के प्रवक्ता तो उसे कोसते ही एंकर भी उसे प्रवक्ताओं से आगे बढ़कर कोसते। जरा सा कोई इधर-उधर करता तो कुछ एंकर उसे तुरंत देशद्रोही बताने लगते, पाकिस्तान का एजेंट बताने लगते। इस बीच पाकिस्तान के साथ संभावित क्रिकेट वर्ल्डकप मैचों की चर्चा आई तो अधिकांश एंकरों और चर्चाकारों ने तय कर दिया कि पाक के साथ खेलना देशद्रोह होगा। राष्ट्रद्रोहियों के साथ खेलना सीधे ‘राष्ट्रद्रोह’ होगा। सचिन तेंदुलकर से लेकर सुनील गावस्कर जैसे नामी खिलाड़ियों तक को नहीं बख्शा गया। पिछले पंद्रह-बीस दिनों की टीवी खबरों ने देशभक्ति, राष्ट्रभक्ति को लंबी और दैनिक कहानी की तरह कहा है।

24x7 के खबर चैनल 24x7 के हिसाब से दर्शकों को आकर्षित करने के लिए एक से एक गरम नारे देते रहे, “पाक को मुंहतोड़ जवाब दो! सबक सिखाओ! अब बचके न जाने पाए! उसको पानी न दो! उसको प्यासा मार दो! आतंकवादी संगठनों समेत कश्मीर में उनके पक्षधरों को ठिकाने लगा दो।” सोचिए दो-ढाई खबर चैनल 24x7 के हिसाब से दिन-रात ऐसी भाषा बोलें, पब्लिक के बीच आकर उससे ऐसी ही भाषा बुलवाएं, ताली बजवाएं और बिना किसी कुर्बानी के बनाई जा रही इस देशभक्ति, राष्ट्रभक्ति को बड़े तमाशे या शो की तरह दिखाने लगें तो क्या होगा? साधारण पब्लिक अपने सच्चे अभाव और दुख-दर्द भूल कर देशभक्ति के उन्माद का वरण करेगी और उनको मिला उन्माद अपनी अभिव्यक्ति मांगेगा। इसीलिए जब जगह-जगह से खबरें आने लगीं कि कश्मीर के छात्रों को जनता द्वारा पीटा जा रहा है और निकाला जा रहा है तो इस उन्माद का कारण मीडिया का प्रचारित उन्माद ही हो सकता है। वो तो सरकार ने बीच में एडवाइजरी जारी कर ऐेसे उन्माद पर लगाम लगाई और राज्य सरकारों ने चौकन्नापन बरता। पिछले पंद्रह दिन, मीडिया के बदलते मिजाज के सबसे ज्वलंत उदाहरण पेश करते हैं। अपना मीडिया एक सैन्य एक्शन का किस तरह ‘तमाशा’ (स्पेक्टेकिल) बनाता है, किस तरह भव्य ‘शो’ बनाता है, इसके उदाहरण भी इन्हीं दिनों देखने को मिले।

जब आइएएफ के जहाजों ने पाकिस्तान के आतंकी ठिकानों पर बम बरसाए और जहाजों के भिड़ने की खबरें आईं तो कई चैनलों ने उसे तमाशे में बदलने के लिए कुछ पुराना स्टॉक और कुछ बॉलीवुड युद्ध फिल्मों के फुटेज मिक्स कर ऐसे सीन दिखाए मानो आइएएफ के जहाजों ने उसी तरह बम गिराए होंगे जैसे ये दिखा रहे हैं। हमें तो एक सीन में हवाई जहाज के कॉकपिट में बैठता जिमी शेरगिल तक दिखा! हां, सिर्फ एक चैनल ने समझाया कि जब तक सरकार प्रामाणिक फुटेज न दे, चैनलों को ऐसे नकली सीन नहीं दिखाने चाहिए लेकिन सुने कौन? देशभक्ति के नाम पर चैनलों को तो टीआरपी चाहिए थी और वह ऐसे युद्ध के दृश्यों को दिखाकर ही मिल सकती थी, क्योंकि जनता के राष्ट्रप्रेम और वीरता की भावना का इसी तरह के सीनों और गरम कमेंटरी से ही दोहन किया जा सकता था। उन्होंने इसका खूब दोहन किया और टीआरपी बढ़ाई। प्रसारणों के बीच में खूब विज्ञापन भी बेचे।

क्या यह पत्रकारिता थी? जो हुआ उसे प्रामाणिक तरीके से दिखाना बताना पत्रकारिता है लेकिन यों फिल्मों के टुकड़े जोड़-तोड़कर एक आकर्षक ‘युद्ध’ बनाना और जनता में उन्माद बढ़ाना किस किस्म की पत्रकारिता है? वह तो ‘उकसावेबाज’(एजेंट प्रोवोकोत्योर छाप) पत्रकारिता है। जब हमारे एक मिग के पायलेट के पाक द्वारा गिरफ्तार होने की खबर आई तो एंकरों, रिपोर्टरों की वीरता की असलियत खुली। इस खबर के आते ही सबके खिले चेहरे बुझ गए और देर तक बुझे रहे। एंकरों की गर्जन-तर्जन रिरियाहट में बदल गई। अब वे ‘युद्ध बंदियों’ के लिए रेडक्रॉस की व्यवस्थाओं को याद करने लगे-पाक को पायलेट अभिनंदन को वापस करना ही होगा। अगर सऊदी अरब और अमेरीका का दबाव न होता तो अभिनंदन अभी तक पाक की कैद में यातना झेल रहे होते। इतनी ही गहरी थी हमारे चैनलवीरों की वीरता!

जब अभिनंदन आए तो हमारे एंकरों और रिपोर्टरों की बनावटी देशभक्ति थकी-थकी नजर आई। पहले अभिनंदन को चार बजे आना था। फिर समय छह बजे बताया गया, फिर रात के आठ बजे और जब साढ़े आठ बजे तक कोई खबर नहीं आई तो एक परम देशभक्त एंकर ने झल्लाकर कहा, “यह क्या घपला हो रहा है? पता नहीं अभिनंदन लौटेंगे कि नहीं?” हर चैनल सुबह से वाघा-अटारी बॉर्डर पर खड़ा था और दोपहर बाद तक तरह-तरह की वीरता की जोशीली जुगाली करता आ रहा था। लेकिन एक तो कड़ाके की ठंड, दूसरे सुरक्षा बलों द्वारा मीडिया को ऐन एक्शन की जगह से दूर कर देना मीडिया के वीरों को भूमिका-विहीन कर रहा था, इसलिए वे झल्लाने लगे। वीर रस की रटी-रटाई एक कविता को दस-बीस बार रिपीट किया जा सकता है लेकिन आठ-दस घंटे एक जैसी ताजा और दमदार आवाज में कुछ बेचा नहीं जा सकता। अपने रिपोर्टरों और एंकरों के पास कोई बहुत बड़ा शब्दकोश नहीं होता। वे बेहद सीमित भाषा जानते हैं। घंटों तक कौन क्या-क्या कहे, कैसे-कैसे कहता रहे? कहां से नए विशेषण लाए? कहां तक अपने गाल बजाए? इसीलिए वह परम देशभक्त एंकर तक बौखलाने लगा था! यह थी एंकरों की देशभक्ति, राष्ट्रभक्ति और असली वीरता!

दस-बीस लाख रुपये महीने पाने वाले एंकरों और उससे कम पगार पाने वाले रिपोर्टरों द्वारा जो देशभक्ति बनाई जाएगी वह न अभिनदंन की पक्की देशभक्ति की तरह होगी न उन चालीस-पचास शहीदों की देशभक्ति की तरह, जो आतंकवादियों की घात के सीधे शिकार हुए। वे कश्मीर में किसी फिल्मी सीन को शूट करने नहीं गए थे। वे देश की सचमुच की रक्षा में तैनात थे। वे अपने को ‘वीर’ सिद्ध करने, अपनी तस्वीर खिंचवाने या अपना शो देने के लिए नहीं गए थे, वह उनकी ड्यूटी थी। वे ‘इन द लाइन ऑफ ड्यूटी’ पर थे। जब गए थे तभी उनको मालूम था कि वे कहां जा रहे हैं, क्यों जा रहे हैं और उनके साथ क्या-क्या हो सकता है? वे देश की रक्षा के लिए प्रशिक्षित किए गए थे। उनका हर पल जोखिम में था।

अपने एंकरों और रिपोर्टरों की जान को कौन सा जोखिम था? घृणा बेचकर, उन्माद बढ़ाकर और एक युद्ध लाइव दिखाकर वे अपना भविष्य उज्‍ज्‍वल ही कर सकते थे। स्पष्ट है कि पिछले कुछ बरसों में मीडिया ने अपना रोल काफी बदल लिया है। सत्ता व्यवस्था के ‘वाचडॉग’ की भूमिका की जगह मीडिया ने ‘हिज मास्टर्स वॉयस’ की जगह ले ली है। इन दिनों वह कभी ‘मास्टर्स’ से अधिक ‘मास्टर्स का वफादार’ बन जाता है।

पिछले दिनों से कुछ चैनल अपने को ‘राष्ट्र’ मानकर चलते हैं। कुछ अपने को ‘जनता’ मानकर चलते हैं। कुछ देश का पर्याय मानते हैं। कुछ अपने को सरकारों से ऊपर सुपर सरकार मानते हैं। कभी सरकार बोले न बोले, एंकर तुरंत सरकार का पक्ष लेने लगते हैं जैसे, सरकार में उनका भी ‘शेयर’ हो। पिछले दिनों में मीडिया ने एक निराली आलोचना पद्धति विकसित की है। यह माना जाता था कि मीडिया का एक काम सरकारों को कठघरे में खड़ा करने का है। लेकिन इन दिनों का मीडिया, प्रसंग हो न हो, हर बार विपक्ष को ही कठघरे में खड़ा करता रहता है। सत्तारूढ़ दल और विपक्षी दल एक दूसरे की टांग खींचें यह समझ में आता है लेकिन कोई एंकर ही स्वयं सरकार बनकर विपक्ष पर बरसने लगे तो उसे कौन सा एंकर या रिपोर्टर कहेंगे? हम उसे एंकर या रिपोर्टर कहने की जगह किसी दल का ‘एक्टिविस्ट’ ही कहेंगे। ‘अभियानकर्ता’ ही कहेंगे!

इन दिनों अक्सर एंकर और रिपोर्टर अपनी ही बनाई गई भूमिका में होते हैं। एंकरों, रिपोर्टरों के नाम पर हम या तो किसी दल के ‘एक्टिविस्ट’ को दहाड़ते देखते हैं या किसी दल के कार्यकर्ता या अभियानकर्ता को किसी एक पक्ष की वकालत करते देखते हैं। इन दिनों हम अक्सर एंकरों से नहीं, ‘एडवोकेसी’ वालों से रूबरू होते हैं। यह सोशल मीडिया का रोल है जिसे मुख्यधारा के मीडिया यानी टीवी ने अपना लिया है।

टीवी का एंकर, रिपोर्टर देशभक्त हो सकता है लेकिन जब एंकर का काम करे तो उसे तटस्थ होना चाहिए। आजकल बहुत कम एंकर ऐसे हैं जो तटस्थ रहते हैं। सोशल मीडिया पर बहुत से लोग अपने अवचेतन की भड़ास निकालते रहते हैं। लेकिन टीवी एंकर भी सोशल मीडिया की भाषा अपना ले तो टीवी भी सोशल मीडिया की तरह उच्छृंखल बन जाएगा! चुनाव राजनीतिक दलों को लड़ना है, जीत या हार उनकी होनी है। ऐसे में मीडिया को सिर्फ मीडिया की तरह रहना चाहिए। लेकिन इन दिनों मीडिया का बड़ा हिस्सा किसी एक पक्ष के लिए लठैत की तरह काम करता दिखता है। दल एक-दूसरे की निंदा करें तो करें लेकिन मीडिया का एक हिस्सा और उसके कई एंकर स्वयं पार्टी बन जाते हैं। आजकल अधिकतर टीवी चैनल में एंकर-रिपोर्टर पार्टी वाले नजर आते हैं। ऐसा लगता है, सोशल मीडिया में बैठे बहुत से घृणा उत्पन्न करने वाले टीवी में आ बैठे हों। घृणा, प्रतिशोध, बदला, हिंसा, युद्ध से दर्शक उत्तेजित होते हैं। जितनी युद्धोन्मादी भाषा बोली जाती है उतना ही उन्माद बढ़ता है। शांति या बातचीत से सुलह की बात कहने वाला तुरंत देशद्रोही बना दिया जाता है। एक दल ऐसा करे तो दूसरा दल जवाब दे सकता है। लेकिन मीडिया भी उसे अपनी भाषा बना ले तो फिर शांति की जगह कहां बचेगी? अब इस सारे कांड को आगामी चुनाव की ओर मोड़ दिया गया है। अपने मीडिया को देख कबीर का वह दोहा याद आता है, ‘जाका गुरु है आंधला चेला निपट निंरध, अंधे आंधर ठेलिया दोउ कूप परंत!’

  (लेखक वरिष्‍ठ आलोचक, साहित्यकार और मीडिया समीक्षक हैं)     

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