नाम-धाम कमाने से पहले

बेंगलूरू से अजय सुकुमारन
साक्षी तंवर, टेलीविजन स्टार  पहली नौकरीः साड़ी की दुकान में सेल्सगर्ल
साक्षी तंवर, टेलीविजन स्टार पहली नौकरीः साड़ी की दुकान में सेल्सगर्ल

बेंगलूरू से अजय सुकुमारन
साड़ी की दुकान में सेल्सगर्ल से लेकर मामूली क्लर्की तक, कुछ सेलेब्रिटी की जबानी, उनके शुरुआती काम

अब बहुत-से लोग जानते हैं कि महेन्द्र सिंह धोनी रेलवे टिकट कलेक्टर थे। बहुत संभव है 17 साल पहले जो आइआइटी ग्रेजुएट खड़गपुर स्टेशन से गुजरते थे, उन्होंने भी कभी धोनी को देखा हो। रजनीकांत और अक्षय कुमार में रोबोट 2.0  के अलावा क्या समानता है? दोनों ने शुरुआत बेहद साधारण नौकरी से की थी। अक्षय बैंकाक के एक होटल में वेटर थे और मार्शल आर्ट सीख रहे थे, जबकि तमिल सुपरस्टार बेंगलूरू ट्रांसपोर्ट सर्विस में बस कंडक्टर थे। आखिर कितने लोग छोटी-मोटी नौकरी करने वालों से बात करते या बगल से गुजरते हुए उन पर ध्यान देते हैं? उदाहरण के लिए, क्या किसी फैक्ट्री में दुबले-पतले चौकीदार में आपने नवाजुद्दीन सिद्दिकी को देखा है? आप कल्पना कर सकते हैं कि वे ऐसा करते हुए बॉलीवुड स्टार बनने का इंतजार कर रहे थे?

जाहिर है, सिद्दिकी को खुद नहीं मालूम था। यहां तक कि जब वे नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (एनएसडी) में दाखिला ले रहे थे तब भी उन्‍हें शायद ही इसका एहसास रहा हो। एक खिलौना फैक्ट्री में चौकीदार की नौकरी ने उन्हें एनएसडी जाने के लिए प्रेरित किया। इससे पहले उनकी पहली नौकरी बड़ौदा की एक फैक्ट्री में केमिस्ट की थी। आखिरी बार कब आपने किसी अकाउंटेंट को देख कर सोचा कि वह अगला विजय सेतुपति हो सकता है? हॉरर फिल्म पिजा (2012) में तमिल सिनेमा का स्टार बनने से पहले सेतुपति एक टेक्सटाइल शोरूम में हिसाब-किताब देखा करते थे। बॉक्स ऑफिस पर सफलता से पहले वे ऐसे कई छोटे-मोटे काम कर चुके थे।

या फिर निविन पाउले जैसा इन्फोसिस का टेकी अब मलयालम सिनेमा का नया सितारा है। 1950 में प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट समूह में आने से पहले किशन खन्ना ग्रिंडलेज बैंक में बैंकर थे। खन्ना ने भारतीय कला की नई जमीन तैयार की। ऐडमैन पीयूष पांडे पहले कोलकाता में गुडरिक ग्रुप में टी टेस्टर थे। लेकिन वे वहां लंबे समय नहीं टिके। वे मुंबई पहुंचे और फेविकोल के साथ नए प्रतिमान गढ़े।

आसपास नजर डालें: मुंबई की ग्रांट रोड पर चिप्स और शेव-भुजिया फरसाण बेचने वाला कोई व्यक्ति। फोटोग्राफर बनने से पहले बोमन ईरानी ने 14 साल यही किया था। फिर, चालीस की उम्र के बाद उन्होंने बॉलीवुड में दर्शकों को गुदगुदाने वाले अभिनेता के रूप में अपनी पहचान बनाई। वैक्यूम क्लीनर का सेल्समैन? राकेश ओमप्रकाश मेहरा के बारे में सोचिए। यदि शेखर कपूर इंग्लैंड में चार्टेड अकाउंटेंट की अपनी पहली नौकरी नहीं छोड़ते तो शायद बॉलीवुड के दर्शक मासूम, मि. इंडिया, बेंडिट क्वीन और एलिजाबेथ से वंचित रह जाते।

अगर सरोद वादक पंडित राजीव तारानाथ अंग्रेजी साहित्य के प्राध्यापक ही बने रहते तो? तारानाथ को उसी दिन बेंगलूरू के सेंट्रल कॉलेज में नियुक्ति पत्र मिला था जिस दिन साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित साहित्यकार स्वर्गीय यू.आर. अंनतमूर्ति को मिला था। म्यूजिक में अपना करिअर बनाने का निर्णय लेने से पहले वे कुछ और संस्थानों में गए थे।

अब आइए राजनीति की बात करें। जब आप किसी इनकम टैक्स अफसर को देखते हैं तो आपको उसमें दिल्ली का भावी मुख्यमंत्री दिखाई देता है, मफलर बांधे, हाथ में झाड़ू लिए हुए? और प्रधानमंत्री? मिसालें बहुत-सी हैं। कॉन्ट्रेक्टर, चाय बेचने वाला, पायलट, प्रोफेसर। सूची और लंबी हो सकती है। खासकर स्टार्टअप्स, यूट्यूब स्टार और मास्टरशेफ के युग में। आउटलुक ने छह प्रसिद्ध भारतीयों की पहली नौकरी के बारे में जाना।

साक्षी तंवर, टेलीविजन स्टार

पहली नौकरीः साड़ी की दुकान में सेल्सगर्ल

“कक्षा 12वीं के बाद यह समर जॉब था। खजाना (दिल्ली के ताजमहल होटल में साड़ी की दुकान) से कुछ लोग सेल्स ट्रेनी रिक्रूट करने के लिए हमारे स्कूल आए थे। मैं और मेरी सहेली चुन लिए गए। जब मैं वहां काम करती थी हर दिन कोई न कोई सेलेब्रिटी या स्टार आता रहता था। हमें स्टोर रूम में रहने को कहा जाता था, क्योंकि उस तरह के बड़े ग्राहकों को संभालने की हमारी तैयारी नहीं थी। यह 1990 के आसपास की बात होगी। एक बार शर्मिला जी (शर्मिला टैगोर) आई थीं। उनके आने की खूब चर्चा थी, पर मैं उनकी एक झलक भी नहीं देख पाई थी। एक प्रमोशनल इवेंट के लिए मैं होटल में थी और इतने साल बाद खजाना गई। आप सोच ही सकते हैं कि अभी मैं कैसा महसूस कर रही हूं। वहां लोग पूछ रहे थे, “मैम हम आपको क्या दिखाएं?” अब मैं अच्छी साड़ियां खरीद सकती हूं लेकिन अपनी पहली तनख्वाह से दो सूती साड़ियां खरीद कर मुझे खुशी मिली थी उसका अब तक कोई तोड़ नहीं! मुझे 900 रुपये मिले थे, मतलब 30 रुपये प्रतिदिन। एक दिन की छुट्टी का मतलब एक दिन के मेहनताने का नुकसान। मुझे सिर्फ 800 रुपये मिले थे। मैंने पहली साड़ी मां के लिए खरीदी थी। हरे और पीले रंग की बंगाली कॉटन की साड़ी उन्होंने संजो कर रखी है। मैंने अगले महीने अपने लिए गुलाबी सूती साड़ी खरीदी थी।

दो महीने बाद मैंने खजाना छोड़ दिया क्योंकि कॉलेज शुरू हो गए थे। टीवी की पारी की शुरुआत लेडी श्रीराम कॉलेज के अंतिम वर्ष में शुरू हुई, जहां मैं ड्रामेटिक्स सोसाइटी की अध्यक्ष थी। मेरी दोस्त सुप्रिया संगीत पर आधारित कार्यक्रम ‘अलबेला सुर मेला’ होस्ट कर रही थी। एक दिन उसकी को-एंकर नहीं आई उसने मुझे फोन किया कि क्या मैं उसकी जगह आ सकती हूं। मेरा ऑडिशन हुआ। वे ऐसा व्यक्ति चाहते थे जो धाराप्रवाह हिंदी बोल सके और स्क्रिप्ट याद कर सके। और मैं ऑडिशन के तुरंत बाद शूटिंग कर रही थी। यहां 500 रुपये हफ्ते का मेहनताना था। घर से मिलने वाली पॉकेट मनी से चार गुना ज्यादा!

इसके पहले भी हम कुछ अलग ढंग की नौकरी कर चुके थे। 1994 में 15 दिन के लिए मैं दिल्ली व्यापार मेला में बामर लॉरी के स्टॉल पर काम कर चुकी थी। 250-300 रुपये प्रतिदिन पर मैं परीक्षा कक्ष में इनविजिलेटर का काम कर चुकी थी। मैंने कंप्यूटर इंस्टीट्यूट में पढ़ाया भी है। वैसे भी मैं एनआइआइटी में कोर्स कर रही थी। मेरे सभी दोस्त कर रहे थे, क्योंकि 90 के दशक में यह बहुत जरूरी था। अपनी पॉकेट मनी के लिए दूरदर्शन के अलावा और ‘छोटू-मोटू’ असाइनमेंट भी कई किए।”

नंदिता दास, अभिनेत्री

पहली नौकरी : ऋषि वैली स्कूल में पाचवीं कक्षा तक की अध्यापिका

“मेरे कलाकार पिता और लेखक मां दोनों के लिए ही काम कभी पैसे से प्रेरित नहीं था। कामकाज उनकी रुचि और भावनाओं का ही विस्तार था। मैंने बचपन में ही जान लिया था कि जिंदगी में वही करो जो अच्छा लगे और जो करो उसे अच्छा मानो। इसलिए मेरी घुमावदार जिंदगी में कई तरह के अलग-अलग काम पर कभी सवाल नहीं उठे, उल्टा मुझे प्रोत्साहित ही किया गया। मेरे स्कूल के आखरी साल के दौरान मेरी सहपाठी सुधन्वा देशपांडे ने मुझे नुक्कड़ थिएटर समूह जन नाट्य मंच से परिचित कराया। हम लोग सामाजिक मुद्दों जैसे, स्‍त्री-पुरुष समानता, धर्मनिरपेक्षता, लोगों के अधिकार आदि पर चर्चा करते थे और उन पर नुक्कड़ नाटक करते थे। इस समूह और इसके संस्थापक सफदर हाशमी के साथ चार साल, मेरी सामाजिक-राजनैतिक मुद्दों की समझ की शुरुआत थी। कॉलेज से मैं सीधे रिहर्सल में पहुंच जाती थी और थकी-मांदी घर लौटती थी। यह कोई ‘नौकरी’ नहीं, बल्कि आदर्श को व्यक्त करने और लोगों के साथ जुड़ने का अवसर था। मुझे खुशी है कि इतने साल बाद भी आदर्शवाद फीका नहीं पड़ा है।

स्नातक के बाद मैंने तय किया कि एक साल किसी कोर्स में एडमिशन नहीं लूंगी। उसी दौरान मैंने जे. कृष्णमूर्ति फाउंडेशन के ऋषि वैली स्कूल में पढ़ाया। मैंने वहां पाचवीं कक्षा को पढ़ाया, लगभग सभी विषय केवल गणित को छोड़कर! मुझे महसूस हुआ कि मुझे लोगों के साथ काम करते हुए मजा आ रहा है। इसलिए मैंने स्नातकोत्तर डिग्री के लिए सोशल वर्क चुना। वैसे देखा जाए तो मेरी पहली नौकरी एक एनजीओ अंकुर के साथ थी। वहां मैंने किशोर लड़कियों के साथ निचली बस्तियों में काम किया था। अंकुर और अलारिप्पु एनजीओ में पांच साल काम करने के बाद अचानक फायर में काम करने का मौका मिला, जिसका मुझे भी अंदाजा नहीं था। आम लोगों के विपरीत मैं बॉलीवुड की फिल्में देखकर बड़ी नहीं हुई थी इसलिए व्यावसायिक फिल्मों के प्रति दीवानापन था भी नहीं। यही वजह थी कि जब एक्टिंग करना शुरू किया और बहुत सारे ऑफर्स आने लगे तो मैंने स्वतंत्र सिनेमा को चुना, भले ही इसका मतलब उस भाषा की फिल्में करना हो जो मुझे नहीं आती। एक्टिंग और डायरेक्शन अब मेरे जीवन का हिस्सा हैं। ये दोनों काम मुझे  अपनी सामाजिक सोच के इजहार के लिए मंच देते हैं। काम मेरे जीवन को गति देता है। हाल में मंटो यात्रा भी मेरी रचनात्मक और सामाजिक दोनों ही रुचियों की अभिव्यक्ति है। मुझे लगता है कि यह उसी की तार्किक परिणति है जो मैंने नुक्कड़ नाटक और सामुदायिक काम के साथ शुरू की थी।”

पोनप्पा, कार्टूनिस्ट

पहली नौकरी : आर्किटेक्ट

“वह 1969 था। मैं मद्रास में वास्तुकला के अपने अंतिम वर्ष में था। मैं अपने भाई राणा और उनकी प्रतिभाशाली कलाकार पत्नी रानी नंजप्पा, के साथ रह रहा था, जो स्कूल ऑफ आर्ट्स एंड क्राफ्ट्स में पढ़ा रही थीं। उनके कई छात्र कला चर्चा छेड़ कर शाम को जीवंत बना देते थे। जैसे, वासुदेव और उनकी पत्नी अरनवाज, बालन नांबियार, विश्वनाथन और दूसरे भी। स्कूल ऑफ आर्ट्स और क्राफ्ट के प्रमुख के.सी.एस. पणिक्कर पुराने महाबलीपुरम रोड स्थित कलाकारों के गांव चोलमंडल में फिर से रौनक लाए थे। वासु और अरनवाज का वहां प्लॉट था। उन्होंने मुझे एक किफायती घर डिजाइन करने के लिए कहा। यह मेरी पहली नौकरी थी। 

मैंने रफ कागज पर ग्रीक क्रॉस का स्केच बनाया। बीच में एक लंबा हॉल जिसमें एक अटारी, एक बेडरूम और शौचालय, दूसरी तरफ रसोई या डाइनिंग और दूसरे कमरे। जैसा कि उन्होंने कहा था, कम-लागत इसलिए मैंने सुझाव दिया कि वे बांस इस्तेमाल करें और नारियल के पेड़ के पत्तों से छत छा दें। हल्की नींव पर ईंट की आधी ही दीवार उठाएं और वाइट सीमेंट की साधारण छत बना लें। लेकिन वे पक्का घर चाहते थे। उनकी पेंटिंग अच्छी तरह बिकना शुरू हो गई होगी। इसलिए ईंट की आधी दीवार आम घरों की तरह पूरी हो गई और छत लकड़ी की शहतीर पर मैंगलोर टाइल का हो गया।

घर बन कर बहुत सुंदर लगने लगा। अरनवाज ने कहा कि कुछ लोग आते हैं, हमारे घर का नाप-जोख लेते हैं और इसी तरह का घर बनाने की ख्वाहिश रखते हैं। पचास साल बाद आज भी यह घर है। कुछ सालों बाद वासु ने मुझ से फीस के रूप में अपनी किसी भी पेंटिंग को चुनने को कहा था। मैंने एक पेंटिंग चुनी और उनसे कहा कि चूंकि मैं आर्किटेक्ट में स्नातकोत्तर करने के लिए शिकागो जाने की सोच रहा हूं, इसलिए पेंटिंग बाद में ले जाऊंगा। लेकिन मैंने ऐसा नहीं किया। प्रसिद्ध वास्तुकार, जेफ्री बावा ने जल्द ही चोलमंडल का दौरा किया। उन्होंने वो घर देखा और मेरे लिए भारत में अपनी परियोजनाओं पर काम करने के लिए भेजा। तीन साल मैंने इस पर काम किया। मैं अपनी ड्राइंग शीट के कोने पर डूडल किया करता था। जेफरी मजाक में कहते थे, मैं एक अच्छा कार्टूनिस्ट भी बन सकता हूं। मैंने उन्हें गंभीरता से लिया। आखिरकार दस साल बाद भारत और विदेश में आर्किटेक्चर का काम करने के बाद मेरा दूसरा पसंदीदा काम कार्टून बनाना हो गया और अब तक है। उसके बाद मैंने आर्किटेक्ट का कोई काम नहीं किया और मुझे इसका कोई पछतावा भी नहीं है।”

अमीश त्रिपाठी, लेखक

पहली नौकरी : बैंकर

“जब मैं छोटा था मेरे कई शौक थे। मुझे इतिहास से प्यार था। मैं अपने कॉलेज बैंड का मुख्य गायक था। मैं स्कूल और कॉलेज में बॉक्सर भी रह चुका हूं! ये कभी गंभीर करिअर विकल्प थे, न, कभी नहीं। याद रखिए ये 1990 का पूर्वार्द्ध था। 1991 का भारत का उदारीकरण अभी सफल नहीं हुआ था। 1970 के दशक में पैदा हुए एक बच्चे के लिए जिस तरह होता था, मैंने भी व्यावहारिकता के लिए अपने शौक छोड़े और आइआइएम-कलकत्ता से एमबीए करने के बाद वित्तीय सेवा की नौकरी में आ गया। चौदह साल के कॉरपोरेट करिअर में, मैंने एमएनसी/निजी क्षेत्र की कंपनियों में खुदरा बैंकिंग, म्यूचुअल फंड, निजी बैंकिंग और जीवन बीमा के क्षेत्र में काम किया। जाहिर है, यह कहना झूठ होगा कि वित्तीय सेवाओं के प्रति मेरी गहरी लगन थी। लेकिन यह एक करिअर था और इससे पैसे मिलते थे।

एक कॉरपोरेट करिअर में असुरक्षा की अपनी हिस्सेदारी है, हालांकि रचनात्मक करिअर जितनी नहीं। हमारे माता-पिता की पीढ़ी की तुलना में आज वेतन अधिक है, लेकिन अब नौकरी छूट जाने की संभावना भी ज्यादा है। एक वक्त ऐसा भी था जब मैं छह महीने बिना नौकरी के रहा। मैंने आवेश में एक कंपनी से इस्तीफा दे दिया था क्योंकि मैं अपने बॉस के साथ बहुत बड़े झगड़े कर रहा था। मेरा मानना था कि मुझे आसानी से दूसरा काम मिल जाएगा, क्योंकि मुझे विश्वास था कि मेरा सीवी बहुत मजबूत है। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। मुझे कुछ प्रस्ताव मिले, लेकिन वो मेरे लायक नहीं थे, जिन्हें मैंने अस्वीकार कर दिया। मैंने कुछ फालतू के काम भी किए। छोटे संस्थानों और रेस्टोरेंट (जबकि मुझे खाने का जरा शौक नहीं है) के लिए परामर्श दिया। अंततः, एक बहुत ही वरिष्ठ अधिकारी, जिन्होंने पहले मेरे साथ काम किया था, ने मुझे बुलाया और एक अच्छे काम की पेशकश की।

इसने मुझे जीवन के कुछ सबक सिखाए। क्रोध में इस्तीफा देना अपरिपक्वता थी। कभी-कभी, आपको अपने अहंकार को एक तरफ रखना पड़ता है। क्योंकि आपके पास परिवार की जिम्मेदारियां होती हैं। मुझे ऑफिस के उस माहौल से सामना करने की जरूरत नहीं थी, जो वास्तव में मुझे परेशान करती है। अहंकार और स्वाभिमान में अंतर होता है। मुझे दूसरी नौकरी खोजने के बाद इस्तीफा देना चाहिए था। 

इसी के साथ मैंने रिश्तों की अहमियत को भी जाना। मेरा उन वरिष्ठ व्यक्ति के साथ अच्छा रिश्ता था, जिन्होंने मुझे अच्छी नौकरी की पेशकश कर मेरे करिअर को बचाया और मेरे वेतन को कम करने की कोशिश नहीं की (जो वह बहुत आसानी से कर सकते थे क्योंकि मैं हताश था)। हम दोस्त बने रहे। सबसे जरूरी बात है कि आप बुरे समय को भी अच्छे से गुजार सकते हैं यदि आप ‘मैं ही क्यों?’ के जाल में न फंसे रहें। मैं मुड़कर देखता हूं तो पाता हूं कि मेरे खराब समय में छोटे कामों ने भी मेरे बढ़ने में हर संभव मदद की।”

सुब्रतो बागची, आइटी उद्योग के दिग्गज, माइंडट्री लिमिटेड के सह- संस्थापक

पहली नौकरी : अवर श्रेणी लिपिक

“जब मैं आठवीं कक्षा में था तब मेरे पिता ओडिशा में एक छोटे सरकारी कर्मचारी के पद से सेवानिवृत्त हुए थे। तब से लेकर जब तक मैंने 1977 में कला संकाय में स्नातक नहीं कर लिया तब तक मुझे मेरे बड़े भाई ने पाला पोसा। उसके बाद मैं दिल्ली में पढ़ना चाहता था, शोध करना चाहता था और अंतरराष्ट्रीय संबंध पढ़ाना चाहता था। लेकिन मैं अपने परिवार पर बोझ बनना नहीं चाहता था और उस वक्त बैंक सिर्फ इंजीनियरिंग या मेडिकल के छात्रों को ही लोन देते थे। इसलिए मैं एक स्थानीय विश्वविद्यालय ही चला गया। दो महीने बाद मुझे बहुत खालीपन महसूस होने लगा और मैंने भुवनेश्वर में स्टेट इंडस्ट्रीज डिपार्टमेंट में अवर श्रेणी लिपिक (लोअर डिविजन क्लर्क) की एकमात्र उपलब्ध नौकरी ले ली। मेरे अध्यापक सकते में थे, मेरा परिवार चौंक गया था।

सचिवालय में मैं सबसे छोटा था। मेरा वेतन 305.50 रुपये था। मेरे सीनियर अपर डिविजन क्लर्क थे और वह हेड क्लर्क बड़े बाबू को रिपोर्ट करते थे। जब उन्होंने महसूस किया कि मैं उनके लिए खतरा पैदा कर सकता हूं तो वे मुझे बहुत ज्यादा काम नहीं देते थे। लेकिन वहां कई नॉन गजेटेड थे जो मुझे प्यार करते थे और मेरा सम्मान करते थे। उन लोगों ने मुझे अलग रोशनी में देखा और मुझे उनकी व्यर्थ, गहन, गैर-काम-संबंधी बहस का फैसला देने के लिए बुलाया। उस वक्त मैं मुश्किल से 19 बरस का था और उनमें से कई अपने चालीसवें साल में थे। मुझे वहां के चपरासी तक प्रेम करते थे। एक बार उन्होंने मुझे छत पर आमंत्रित किया जहां कुछ चुनिंदा लोगों का गुप्त धूम्रपान क्लब चलता था। मैंने खुद को अलग किया और उसके बाद वहां नहीं गया।

एलडीसी के रूप में मेरे पास एक यादगार है। 1976 में इलेक्शन ड्यूटी के लिए मैं दूर-दराज के एक गांव में गया था। मतदाता अधिकारी के रूप में मैं नंबर दो पर था। उस वक्त मतदान की उम्र 21 साल थी। मैं मतदान के योग्य नहीं था लेकिन चुनाव का संचालन कर सकता था। इसके बाद आइटी इंडस्ट्री आई। सचिवालय ने मुझे मानवीय गरिमा, आपसी देखभाल और जीवन के हिस्से के रूप में कार्य को देखने की आवश्यकता के महत्व को सिखाया। साल भर बाद डीसीएम में मैनेजमेंट ट्रेनी के रूप में मेरा चयन हो गया। कुछ ही समय बाद, मेरे पास एक असफल स्टार्ट-अप था। लेकिन फिर माइंडट्री के सह-संस्थापक के रूप में बड़ी सफलता भी मिली। इसी के साथ-साथ एक लेखक के रूप में भी करिअर खूब फला-फूला। आज 40 साल बाद मैं फिर सचिवालय लौटा हूं। लेकिन इस बार ओडिशा स्किल डेवलपमेंट अथॉरिटी के चेयरमैन के रूप में।  मेरा काम 11 लाख युवाओं के लिए रोजगार के कौशल के अवसर पैदा करना है। ज्यादातर निचले तबके के स्कूल छोड़ने वाले युवाओं के लिए। साथ ही इस प्रक्रिया में, ‘स्किल्ड इन ओडिशा’ नाम के एक ब्रांड का निर्माण करना भी है। यह सैलमन (मछली) की तरह लगता है जो अंडा देने के लिए ऊंचे से ऊंचे पथरीले पहाड़ पर जाती है और गहरे नीले सागर में वयस्क होती है कि अब अपने जन्मस्थान पर लौटना चाहिए।”

 

 

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