मुद्दे, बेचैनी और छात्र संगठन

चंदन कुमार
हक की मांगः यंग इंडिया अधिकार मार्च के बैनर तले छात्रों का दिल्ली में प्रदर्शन
हक की मांगः यंग इंडिया अधिकार मार्च के बैनर तले छात्रों का दिल्ली में प्रदर्शन
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चंदन कुमार
शिक्षा, रोजगार, शिक्षकों के मुद्दे अनेक और बेचैनी भी जबरदस्त, मगर बड़ी पार्टियों से जुड़े छात्र संगठनों का रवैया कुछ सुस्त

हाल में इलाहाबाद विश्वविद्यालय में छात्रसंघ के शपथग्रहण समारोह में जाने को तैयार समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव को उत्तर प्रदेश की आदित्यनाथ सरकार ने लखनऊ में रोका तो सुर्खियां चीखने लगीं। यूं तो देश में नए निजाम की यह भी एक मिसाल थी, मगर तब उतनी जोरदार सुर्खियां नहीं बनीं, जब शिक्षा के अधिकार, उच्च शिक्षा के मसलों, रोजगार की मांग को लेकर एक नहीं कई बार देश के कई हिस्सों और राजधानी दिल्ली में बड़े-बड़े प्रदर्शन और आंदोलन हुए। तो, क्या इसलिए कि इनमें मुख्यधारा या बड़ी राजनैतिक पार्टियों के नेता और छात्र संगठन नदारद थे? आखिर क्यों ऐसे मुद्दों और मांगों में बड़ी राजनैतिक पार्टियों के छात्रसंघों की रुचि नहीं दिखती? पिछले कुछ वर्षों में छात्रों और युवाओं के कई मुद्दे सामने आए। यूजीसी दफ्तर के सामने कई सर्द रातों तक चला प्रदर्शन हो, एसएससी पेपर लीक या फिर हालिया ‘यंग इंडिया अधिकार मार्च’ और 13 प्वाइंट रोस्टर का मामला।

इन मुद्दों को लेकर बेचैनी की वाजिब वजहें भी हैं। हाल के वर्षों में देश की शिक्षा व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई है और मौजूदा सरकार खास कुछ कर ही नहीं पाई, वह तो पिछले पांच साल से नई शिक्षा नीति लाने का वादा भी पूरा नहीं कर पाई है। फिर, रोजगार का संकट ऐसा है कि सरकार राष्ट्रीय सैंपल सर्वे (एनएसएसओ) की वह रिपोर्ट जाहिर करने से बच रही है जिसके मुताबिक देश में बेरोजगारी दर 6.1 फीसदी पर 45 साल में सबसे अधिक है।

सो, आज छात्र और युवाओं के सामने गंभीर मुद्दों के बारे में जेएनयू छात्रसंघ के अध्यक्ष एन. साई बालाजी का कहना है कि हम गुणवत्ता वाली शिक्षा, रोजगार, सामाजिक और लैंगिक समानता की मांग करते हैं। उनकी मांग है कि फैकल्टी की नियुक्ति में 13 प्वाइंट रोस्टर व्यवस्‍था खत्म की जाए, सभी सरकारी नौकरियों में भर्ती हो, भर्तियों में पेपर लीक और भ्रष्टाचार खत्म हो और शिक्षा पर कुल बजट का 10 फीसदी खर्च किया जाए। इन मुद्दों पर केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा और संघ परिवार से जुड़े अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के जेनरल सेक्रेटरी आशीष चौहान युवाओं और छात्रों के हक की लड़ाई के लिए एक कॉमन प्लेटफॉर्म पर संवाद-चर्चा करने की बात करते हैं। वे कहते हैं, “हमने स्कॉलरशिप के मुद्दे पर आंदोलन किया। एससी/एसटी छात्रों को समय पर स्कॉलरशिप नहीं मिल रही, तो हमने देश भर में आंदोलन किया और यूजीसी के चेयरमैन और मानव संसाधन विकास मंत्री से भी मुलाकात की।”

हम युवाओं और छात्रों के मुद्दे को लगातार उठाते आए हैं और आगे भी उठाते रहेंगे- अंकित डेढ़ा, जेनरल सेक्रेटरी, एनएसयूआइ

ऐसा नहीं है कि छात्र संगठन छात्रों के हक की मांग को लेकर प्रदर्शन नहीं करते लेकिन बड़ी राजनैतिक पार्टियों से जुड़े छात्रसंघों पर पार्टी के सियासी हितों और राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं के अनुसार सक्रियता या निष्क्रियता के आरोप लगते हैं। इस पर कांग्रेस की छात्र शाखा एनएसयूआइ के जेनरल सेक्रेटरी अंकित डेढ़ा का कहना है, “दिल्ली में हमारी सक्रियता भले कम दिखे लेकिन राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़  जैसे राज्यों में हम लगातार युवाओं और छात्रों के हितों में आवाज उठा रहे हैं।” हालांकि, एबीवीपी के चौहान का दावा है कि ऐसा नहीं है कि हम किसी राजनैतिक दल के पिछलग्गू हैं। बकौल उनके, “विद्यार्थी परिषद का आंदोलन किसी भी सरकार के खिलाफ होता है।”

यह पहला मौका नहीं है, जब देश के युवाओं को अलग-अलग मोर्चा बनाकर रोजगार और शिक्षा के लिए सड़कों पर उतरना पड़ा है। इससे पहले 2018 में परीक्षाओं के लिहाज से महत्वपूर्ण मार्च में राजधानी दिल्ली की सड़कों पर छात्र और पुलिस आमने-सामने थे। केंद्रीय कर्मचारी चयन आयोग (एसएससी) की परीक्षा का पेपर लीक हुआ, तो 27 फरवरी से 16 मार्च तक दिल्ली के सीजीओ कॉम्प्लेक्स ‌स्थित एसएससी मुख्यालय के सामने छात्रों का हुजूम डटा रहा। प्रदर्शनकारियों ने फिर संसद मार्ग पर “हल्ला बोल” मार्च निकाला। रोजगार के मुद्दे पर अंकित बताते हैं कि मध्य प्रदेश में हमने हाल में बेरोजगारी फॉर्म भरवाए। विधानसभा चुनाव के दौरान लगभग ढाई लाख बेरोजगार युवाओं का फॉर्म भरकर सरकार को दिया था। सरकार कहती थी कि हमारे पास आंकड़े नहीं हैं, तो हमने ये आंकड़े मुहैया कराए।


हमारा किसी दल से नाता नहीं है और हमारा आंदोलन हर सरकार के खिलाफ होता है। -आशीष चौहान, जेनरल सेक्रेटरी, एबीवीपी

मगर यह उदाहरण दलगत हितों से ऊपर उठकर मुद्दों को उठाने का संकेत नहीं देता। तो, क्या बड़ी पार्टियों से जुड़े छात्रसंघ उनके इस्तेमाल का औजार भर बनकर रह गए हैं? भाकपा-माले लिबरेशन से संबद्ध छात्र संगठन आइसा के जेनरल सेक्रेटरी संदीप सौरभ कहते हैं, “आइसा छात्रों और युवाओं के मुद्दे पर लगातार मुखर रही है, खासकर पिछले चार-साढ़े चार साल से। अलग-अलग सवालों पर हम सड़क पर उतरे और आंदोलन किए। बात यह है कि जो भाजपा सरकार शिक्षा और रोजगार को तबाह कर रही है, तो उसका ही छात्र संगठन क्यों विरोध करेगा?” संदीप बताते हैं, “यूपीए सरकार के दौर में शिक्षा का निजीकरण चल रहा था, तो एनएसयूआइ चुप रही। आज भी बहुत ज्यादा नहीं बोल पा रही है। लेकिन यह सच है कि छात्र और युवा आज किसी भी दौर से ज्यादा बेचैन और आंदोलनरत हैं। सात फरवरी को यंग इंडिया मार्च निकला था। हमलोगों ने यही मांग उठाई थी कि शिक्षा का बजट लगातार घटने से स्थिति बहुत खराब हो गई है। पिछले चार साल में शिक्षा बजट की हिस्सेदारी 4.77 फीसदी से घटकर 3.48 फीसदी हो गया है। इसे बढ़ाया जाना चाहिए।”

मार्चः शिक्षा अधिकार मंच के तहत 18 फरवरी को विभिन्न छात्र संगठनों ने निकाली रैली

इन मुद्दों पर दिखी खामोशी

मौजूदा केंद्र सरकार के तहत देश में छात्र और युवा रोष की शुरुआत 16 सितंबर 2014 को पश्चिम बंगाल के जादवपुर यूनिवर्सिटी में एक छात्रा से बदसलूकी की जांच की मांग से हुई। छात्रों की मांगें नहीं मानी गईं, तो उन्होंने भूख हड़ताल शुरू कर दी और करीब 100 छात्रों ने वाइस चांसलर की मौजूदगी में कॉन्‍वोकेशन समारोह में अपनी डिग्री लेने से इनकार कर दिया।

फिर, दिल्ली की जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में 2016 में कथित भारत विरोधी नारे को लेकर विवाद शुरू हुआ, जिसमें पूर्व छात्र संघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार, उमर खालिद, अनिर्बान भट्टाचार्य वगैरह पर राजद्रोह का मामला दर्ज किया गया। 2016 में ही हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी में आंबेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशन समेत कुछ अन्य छात्र संगठनों ने अफजल गुरु की फांसी सहित कुछ अन्य मुद्दों पर विरोध किया। एबीवीपी इसका विरोध कर रही थी। इस मामले में विवाद बढ़ने के बाद रोहित वेमुला सहित पांच छात्रों को हॉस्टल से सस्पेंड कर दिया गया। उनकी फेलोशिप भी रोक दी गई। अपने निलंबन को लेकर पांचों छात्रों ने भूख हड़ताल शुरू की। तीन दिनों की भूख हड़ताल के बाद रोहित वेमुला ने आत्महत्या कर ली। इस घटना के बाद दिल्ली की सड़कों पर छात्रों के विशाल प्रदर्शन शुरू हो गए।

इसके बाद शिक्षा अधिकार मंच के बैनर तले एसएफआइ और कई छात्र संगठनों ने 18 फरवरी को दिल्ली में ही रामलीला मैदान से संसद मार्ग तक मार्च निकाला। इसी महीने सात फरवरी को रोहित वेमुला एक्ट, 13 प्वाइंट रोस्टर खत्म करने और नजीब की खोज जैसी मांग को लेकर 50 से अधिक छात्र संगठनों ने ‘यंग इंडिया अधिकार मार्च’ के बैनर तले राजधानी दिल्ली में लाल किला से लेकर संसद मार्ग तक जुलूस निकाला था।

13 प्वाइंट रोस्टर पर बवाल

हाल में 13 प्वांइट रोस्टर को लेकर दिल्ली सहित देश के कई हिस्सों में विरोध-प्रदर्शन देखने को मिला। दरअसल, इलाहाबाद हाइकोर्ट ने अप्रैल 2017 में उच्च शिक्षा संस्थानों में फैकल्टी की नौकरी से जुड़ी आरक्षित सीटों का हिसाब लगाने की व्यवस्था बदलने का फैसला दिया। इससे पहले 200 प्वाइंट रोस्टर चलता था, जिसके तहत कॉलेज और यूनिवर्सिटी को एक यूनिट मानकर आरक्षित सीटों का हिसाब लगाया जाता था। 200 में 101 अनारक्षित वर्ग के हिस्से जाता था, जबकि बाकी 99 सीटों को एससी, एसटी, ओबीसी उम्मीदवारों को दिया जाता था। हाइकोर्ट के फैसले के बाद मार्च 2018 में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने सभी सेंट्रल और स्टेट यूनिवर्सिटी को नोटिस जारी किया कि यूनिवर्सिटी के हर विभाग को स्वतंत्र यूनिट माना जाएगा।

इस सिस्टम की वजह से हर श्रेणी के लिए आरक्षित सीटों में भारी कमी आ जाएगी। फिलहाल, मानव संसाधन विकास मंत्रालय की तरफ से इस व्यवस्था पर रोक लगा दी गई है। यानी अगले आदेश तक किसी तरह की भर्ती नहीं निकाली जाएगी। इस मामले में दिल्ली विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर अवनीश मिश्र का कहना है कि अगर 13 प्वाइंट रोस्टर लागू होता है, तो सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व बिलकुल कम हो जाएगा और नई व्यवस्था के बाद नौकरियों के जो विज्ञापन आए, उसमें एसटी को बिलकुल प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाएगा। ओबीसी को भी नुकसान होगा, क्योंकि नई व्यवस्था के हिसाब से चौथी सीट ओबीसी की और आठवीं सीट एससी की बनती है। ऐसे में समझा जा सकता है कि इन वर्गों का प्रतिनिधित्व यूनिवर्सिटी में कितना कम हो जाएगा। संदीप सौरभ 13 प्वाइंट रोस्टर को सिर्फ टीचर्स से जुड़ा मसला नहीं मानते। उनका कहना है कि एससी और एसटी की वह पीढ़ी जो उच्च शिक्षा हासिल कर रोजगार के मुहाने पर है यानी अब उसे रोजगार में घुसना था, तो उसे रोकने के लिए यह सिस्टम लाया गया। इस लिहाज से यह टीचर्स का मामला नहीं, बल्कि छात्रों का भी है।

प्रदर्शन की राजनीति

छात्रों के हितों को अनदेखा करने के आरोप पर स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (एसएफआइ) के जेनरल सेक्रेटरी मयूख बिश्वास का कहना है, “मुझे नहीं लगता कि छात्र संगठन अपने-अपने संबंधित राजनैतिक दलों के टूल बन गए हैं। यह गलत बात है। लोकतांत्रिक देश में हर किसी की अलग-अलग सोच है। पिछले कुछ वर्षों से हर जगह हमारा आंदोलन चल रहा है। दिल्ली में हम किसान मुक्ति मार्च की तर्ज पर शिक्षा को लेकर बड़ा आंदोलन करने वाले हैं। सिर्फ छात्र ही नहीं, शिक्षक भी परेशान हैं। अभी सरकार हर जगह अस्थायी शिक्षकों की बहाली कर रही है, जिससे गुणवत्ता प्रभावित हो रही है। इसे लेकर हम सड़कों पर उतर रहे हैं और पूरे देश में इन मुद्दों को उठा रहे हैं।” शिक्षा और रोजगार के मुद्दे पर एबीवीपी के चौहान का कहना है कि विद्यार्थी परिषद सरकार और नीति-निर्धारकों के सामने रोजगार और तमाम विषयों को लेकर लगातार मांग करती रही है कि वह इसके लिए स्पष्ट नीति लाए। हमने यह मांग भी की है कि 200 प्वाइंट रोस्टर पर सरकार ऐसा नया फॉर्मूला लेकर आए, जिसमें सारे मुद्दों का समाधान हो। उनका कहना है कि विद्यार्थी परिषद तो यहां तक मांग करती है कि रोजगार एक मूलभूत अधिकार होना चाहिए। हालांकि, वे यह भी कहते हैं कि अगर कोई संगठन अलग से अपना समूह बनाकर इन मुद्दों पर विरोध प्रदर्शन करता है, तो ठीक है और करना भी चाहिए।

शिक्षा सहित तमाम मुद्दों पर हमारा रुख साफ है और हर जगह आंदोलन चल रहा है। -मयूख बिश्वास, जेनरल सेक्रेटरी, एसएफआइ

लेकिन क्या सरकार को फिक्र है। उच्च शिक्षा का ही मामला लें। सच्चाई यह है कि यूजीसी ने 2016 में नोटिस जारी कर 2017-18 सत्र के लिए जेएनयू में एमफिल और पीएचडी में सीटों की संख्या में भारी कटौती की थी। 2016-17 में लगभग 970 छात्रों ने इन कोर्स में दाखिला लिया था, जबकि 2017-18 सत्र के लिए यह संख्या 102 हो गई। इसी तरह 10 फीसदी आर्थिक आरक्षण के बाद 25 फीसदी सीटों को बढ़ाने की बात कही गई है, लेकिन इनके लिए फंड का जिक्र नहीं है।

बहरहाल, मुद्दे अनेक हैं और बेचैनी भी जबरदस्त है। इसका इजहार कई तरह से हो रहा है। विश्वविद्यालयों में माहौल अशांत है। छात्र और युवा स्वतंत्र समूहों और संगठनों में सक्रिय हैं। यह तपिश छोटी पार्टियों से जुड़े छात्र संगठनों में भी दिख रही है। मगर बड़ी पार्टियों से जुड़े छात्र संगठन शायद राजनैतिक हितों का ख्याल पहले करते हैं।

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