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भारतीय राजनीति का आदि विद्रोही

खामोशी से चले गए समाजवादी राजनीति के अथक और विवादित योद्धा
वे दिनः इमरजेंसी में गिरफ्तार जॉर्ज

समाजवादी नेता, प्रखर सांसद, कभी बंबई, अब मुंबई, के सबसे बड़े ट्रेड यूनियन लीडर, जिनकी एक आवाज पर बंबई ठप हो जाती थी, रेल का चक्का जाम हो जाता था, इमरजेंसी की तानाशाही के विरुद्ध संघर्ष के सबसे बड़े नायक (बड़ौदा डायनामाइट कांड के हीरो), बेजोड़ वक्ता जॉर्ज फर्नांडिस 29 जनवरी की सुबह बड़ी खामोशी से इस दुनिया को अलविदा कह गए। पिछले एक दशक से अलजाइमर और पार्किंसंस जैसी असाध्य बीमारियों के कारण शैया पर खामोश पड़े 88 वर्षीय जॉर्ज जैसे मौत का ही इंतजार कर रहे थे। न कुछ बोल-समझ पाते थे और न ही किसी को पहचान सकते थे।

बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी, दर्जन भर भाषाओं के ज्ञाता जॉर्ज फर्नांडिस के साथ मेरा जुड़ाव सत्तर के दशक के शुरुआती वर्षों में हुआ था, जब वे सोशलिस्ट पार्टी के अध्यक्ष थे और मैं समाजवादी युवजन सभा का कार्यकर्ता था। बाद के वर्षों में एक पत्रकार के रूप में भी हमारा उनसे गहरा जुड़ाव रहा। हमने 1980 में नई दिल्ली के 26 तुगलक क्रीसेंट स्थित उनके निवास पर रहकर फीचर एजेंसी, ‘लेबर प्रेस सर्विस’ का काम किया था।

जॉर्ज फर्नांडिस बंबई के मजदूर आंदोलन में साठ के दशक में ही बड़ा नाम बन चुके थे। निगम पार्षद और विधायक भी चुने गए, लेकिन उनकी ख्याति 1967 में हुई, जब वे बंबई के बेताज बादशाह कहे जाने वाले कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सदोबा कानोजी पाटिल को हराकर लोकसभा में पहुंचे थे। तब अखबारों ने उन्हें ‘जॉर्ज द जाइंट किलर’ लिखा था।

बंबई वे मंगलोर, आज के मंगलूरू, से अपना घर परिवार छोड़ भाग आए थे। उनका जन्म मंगलोर में 3 जून 1930 को हुआ। उनकी मां एलीस मार्था फर्नांडिस किंग जॉर्ज पंचम की प्रशंसक थीं, जिनका जन्म भी 3 जून को ही हुआ था, इस कारण उन्होंने उनका नाम जॉर्ज रखा था। मंगलोर के एलॉयसिस स्कूल से 12वीं की पढ़ाई के बाद परिवार की रूढ़िवादी परंपरा के चलते बड़े पुत्र के नाते उन्हें धर्म की शिक्षा के लिए बंगलोर, आज के बेंगलूरू, में सेंट पीटर सेमिनरी भेज दिया गया। 16 वर्ष की उम्र में उन्हें 1946-1948 तक रोमन कैथोलिक पादरी का प्रशिक्षण दिया गया। लेकिन चर्च में गैर-बराबरी के माहौल से खिन्न होकर वे वहां से भाग खड़े हुए और फिर नौकरी की तलाश में 1949 में बंबई, आज की मुंबई, में पहुंच गए। शुरुआती जीवन बहुत ही कष्टकर रहा। जब तक उन्हें काम नहीं मिला था, वे चौपाटी के फुटपाथ पर सोया करते थे। बाद में उन्हें एक अखबार में प्रूफ रीडर की नौकरी मिल गई। आगे चलकर उनका संपर्क अनुभवी समाजवादी, ट्रेड यूनियन नेता पी डीमेलो और फिर समाजवादी नेता राममनोहर लोहिया से हुआ, जिनका उनके जीवन पर बड़ा प्रभाव रहा। बाद में वे समाजवादी ट्रेड यूनियन आंदोलन और फिर समाजवादी राजनीति की मुख्यधारा से भी जुड़ते गए। समाजवादी राजनीति में लोहिया के कट्टर अनुयायियों में मधु लिमये, राजनारायण और जॉर्ज फर्नांडिस की तिकड़ी बहुत मशहूर रही।

बाद में वे सोशलिस्ट पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और फिर ऑल इंडिया रेलवेमेंस फेडरेशन के अध्यक्ष भी चुने गए। उन्होंने 1974 में लाखों कामगारों के साथ ऐतिहासिक रेल हड़ताल करवाई। जॉर्ज समेत हजारों आंदोलनकारियों को जेल में डाल दिया गया।

इसी दौरान उन्होंने प्रतिपक्ष के नाम से साप्ताहिक अखबार भी निकाला, जो उस समय प्रतिरोध का मुखपत्र बन गया। इसका संपादकीय कामकाज कमलेश शुक्ल और गिरधर राठी देखते थे। प्रतिपक्ष की चर्चा 1974 में उस समय संसद और उसके बाहर भी जोर-शोर से हुई थी, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के जमाने में आयात लाइसेंस घोटाला हुआ था। 8 सितंबर 1974 के अंक में प्रतिपक्ष के मुख्य पृष्ठ का शीर्षक था ‘संसद या चोरों और दलालों का अड्डा?’ इस धमाकेदार स्टोरी और उसके तीखे शीर्षक को लेकर लोकसभा में सत्ता पक्ष ने ही नहीं, बल्कि विपक्ष के पीलू मोदी और राज्यसभा में लालकृष्ण आडवाणी ने विशेषाधिकार हनन का प्रस्ताव पेश किया। इसके पीछे विरोधी दलों की रणनीति आयात लाइसेंस घोटाले को एक बार फिर से उजागर और चर्चा का विषय बनाने की थी। लेकिन तभी किसी ने इंदिरा गांधी को विपक्ष की इस चाल के बारे में बता दिया। फिर क्या था, पहले आग बबूला कांग्रेसी सांसद लोकसभा अध्यक्ष गुरुदयाल सिंह ढिल्लों से गुजारिश करने लगे कि प्रतिपक्ष के खिलाफ मामले को आगे नहीं बढ़ाना चाहिए। मामला न तो विशेषाधिकार समिति को भेजा गया और न ही लाइसेंस घोटाले को तार्किक परिणति तक पहुंचाया जा सका। लेकिन पूरा देश जान गया कि लाइसेंस घोटाले को उच्चतम स्तर से दबा दिया गया।

जब देश में इमरजेंसी लगी, फर्नांडिस भूमिगत हो गए। उन्होंने समाजवादी नेता कर्पूरी ठाकुर, लाड़ली मोहन निगम, सीजीके रेड्डी, पत्रकार के. विक्रम राव और कुछ अन्य सहयोगियों को साथ ले भूमिगत संघर्ष किया। बाद में वे गिरफ्तार हुए। उन पर ‘बड़ौदा डायनामाइट कांड’ के रूप में सशस्‍त्र विद्रोह और राजद्रोह का मुकदमा शुरू हुआ। जेल में उन्हें और उनके करीबी मित्रों, सहयोगियों को कठोर यातनाएं दी गईं। जेल में उनके भाई लारेंस और सहयोगी अभिनेत्री स्नेहलता रेड्डी की इस कदर पिटाई और यातना हुई कि लारेंस के पैर की हड्डी टूट गई, जबकि स्नेहलता रेड्डी की तो जान ही चली गई।

बड़ौदा डायनामाइट कांड का मुकदमा मार्च 1977 में इमरजेंसी के हटने और जेल से ही जार्ज फर्नांडिस के बिहार के मुजफ्फरपुर से प्रचंड मतों से लोकसभा चुनाव जीतने के बाद और केंद्र सरकार में मंत्री बनने से ठीक पहले ही बंद हुआ। जनता पार्टी की सरकार में उद्योग मंत्री रहते उन्होंने कोका कोला और आइबीएम जैसी मल्टीनेशनल कंपनियों को देश से बाहर करने जैसे कुछ अच्छे कार्य किए। एक समय ऐसा भी आया जब उन्होंने दोहरी सदस्यता के सवाल पर संघ और जनसंघ का विरोधी होने के बावजूद मोरारजी देसाई की सरकार के मंत्री के रूप में लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव पर सरकार का जमकर बचाव किया और अगले ही पल सरकार से अलग हो मधु लिमये, राजनारायण, कर्पूरी ठाकुर जैसे पुराने समाजवादी साथियों की कतार में शामिल होकर चौधरी चरण सिंह के साथ हो गए। 1980 का चुनाव भी वे लोकदल के टिकट पर मुजफ्फरपुर से ही लड़े और जीते।

लेकिन 1984 में वे अपने गृह प्रांत कर्नाटक में बेंगलूरू उत्तरी से चुनाव लड़ने चले गए, जहां कांग्रेस के सी.के. जाफर शरीफ से बहुत कम मतों से हार गए। बाद में वे फिर बिहार लौटे और बांका संसदीय उपचुनाव में पूर्व मुख्यमंत्री चंद्रशेखर सिंह के विरुद्ध चुनाव लड़े। उस उपचुनाव में जबरदस्त धांधली और बूथ कैप्चरिंग हुई थी, जिससे उनके समर्थकों का मानना था कि जॉर्ज जीता हुआ चुनाव हार गए। हमने उस समय रविवार में ‘चंद्रशेखर सिंह की जाली जीत’ शीर्षक से आमुख कथा लिखी थी। चंद्रशेखर सिंह के निधन के बाद बांका में फिर उपचुनाव हुआ, जिसमें धांधली करके उनकी विधवा मनोरमा सिंह चुनाव जीत गई थीं।

बहरहाल, 1989 में जनता दल के उम्मीदवार के रूप में जॉर्ज फर्नांडिस ने एक बार फिर मुजफ्फरपुर से ही लोकसभा का चुनाव जीता। वे वी.पी. सिंह की सरकार में रेल मंत्री भी बने। रेल मंत्री के रूप में उन्होंने देश को कोंकण रेल और बिहार को छितौनी बगहा पुल दिया। लेकिन बाद के दिनों में लालू प्रसाद की उपेक्षा से नीतीश कुमार और साथियों के दबाव में उन्होंने 1994 में पहले जनता दल (जॉर्ज) और फिर समता पार्टी का गठन किया। लेकिन 1995 के बिहार विधानसभा के चुनाव में बुरी तरह हार जाने के बाद नीतीश कुमार और साथियों के दबाव में उन्होंने समता पार्टी का भाजपा के साथ चुनावी तालमेल मंजूर किया। और उसके बाद तो वे गैर-कांग्रेसवाद के सबसे बड़े प्रवक्ता बन गए। उसी गैर-कांग्रेसवाद का, जिसके प्रस्ताव के लिए कभी 1963 में कलकत्ता में सोशलिस्ट पार्टी के सम्मेलन में उन्होंने अपने नेता डॉ. लोहिया का कड़ा विरोध किया था। डॉ. लोहिया की पहल पर पेश उस प्रस्ताव पर जॉर्ज ने कहा था, ‘‘इस प्रस्ताव के चलते हम लोग जिस रास्ते पर जाएंगे, वहां से अपना मुंह काला करके लौटेंगे।’’

बहरहाल, 1998-99 में समता पार्टी केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में सत्तारूढ़ भाजपा नीत एनडीए की सरकार में सहयोगी बनी। फर्नांडिस उसमें रक्षा मंत्री तथा एनडीए के संयोजक बने। रक्षा मंत्री के रूप में जॉर्ज ने कई अच्छे कार्य किए। पोकरण का परमाणु विस्फोट उनके समय में हुआ। करगिल युद्ध में विजय के बाद वे सियाचिन ग्लेशियर की दुरूह बर्फीली पहाड़ियों पर वहां तैनात सैनिकों की दशा-दुर्दशा जानने के लिए 18 बार गए। हालांकि, बार-बार सियाचिन जाते रहने के कारण वे अलजाइमर की चपेट में आ गए, जो उनकी मौत का कारण भी बना। 

अपने राजनीतिक जीवन के उत्तरार्ध में जॉर्ज कई तरह के विवादों से भी घिरे। परिवार में भी उथलपुथल हुई। इससे पहले रक्षा मंत्री रहते उन पर तहलका टेप कांड और ताबूत घोटाला कांड में लिप्तता के आरोप भी लगे। वे एनडीए सरकार के संकटमोचन भी थे। उनके दबाव में ही भाजपा अयोध्या विवाद, समान नागरिक संहिता और अनुच्छेद 370 को हटाने से संबंधित अपने विवादित मुद्दों को ‘कोल्ड स्टोरेज’ में रखने को राजी हो गई थी। लेकिन संकटमोचन के क्रम में उन्होंने गुजरात के सांप्रदायिक दंगों के लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी का अनावश्यक बचाव भी किया।

सुरक्षा के नाम पर उन्होंने कभी तामझाम नहीं किया। पी.वी. नरसिंह राव के प्रधानमंत्री रहते गृह मंत्री शंकरराव चव्हाण का बंगला जॉर्ज के बंगले के ठीक सामने पड़ता था। जब भी गृह मंत्री आते-जाते, तो उनके सुरक्षाकर्मी जॉर्ज के बंगले का गेट बाहर से बंद कर जाते, क्योंकि जॉर्ज के घर कई तरह के लोगों का आना-जाना ठहरना लगा रहता था। इनमें कश्मीर, पंजाब और पूर्वोत्तर के ‘उग्रवादी’ भी होते थे और नक्सली भी। इससे तंग आकर एक दिन जॉर्ज ने खुद बंगले का गेट उखाड़ फेंका।

सक्रिय राजनीति के अंतिम वर्षों में जिस तरह से उन्हें जनता दल (यू) के अध्यक्ष पद के लिए नीतीश कुमार और शरद यादव की जोड़ी ने हाशिए पर धकेला, 2009 के आम चुनाव में उन्हें लोकसभा के टिकट से वंचित किया गया, उसके विरोध में वे स्वास्थ्य ठीक न रहने के बावजूद निर्दलीय चुनाव लड़े और हारे। यह सब उनके राजनैतिक जीवन के दुखद प्रसंग हैं। उनके निधन से समाजवादी आंदोलन की वह पीढ़ी विदा हो गई, जिसने राजनीति में ‘सिविल नाफरमानी’ को एक हथियार के रूप में इस्तेमाल करके गरीब, शोषित, पीड़ित, किसानों, मजदूरों और सर्वहारा वर्ग के हक के लिए सतत संघर्ष किया।

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