न परंपरा का साथ, न योजनाओं में खरा

एम. गोविंद राव
बजट पेश किए जाने के दौरान सदन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी
बजट पेश किए जाने के दौरान सदन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

एम. गोविंद राव
चुनावी बजट में नकद हस्तांतरण योजना और आयकर में रिबेट देने का तो ऐलान पर इसकी भरपाई के लिए पूंजीगत खर्च घटाकर राजकोषीय संतुलन रखने का कोई ख्याल नहीं किया गया

एक फरवरी को ‘कार्यवाहक’ वित्त मंत्री ने संसद में जो बजट पेश किया, वह अंतरिम और पूर्ण बजट का मिला-जुला स्वरूप था। यानी उसमें दोनों के तत्व शामिल थे। इसके पहले इस तरह के मौके पर चाहे 2004 में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की सरकार हो या फिर 2009 और 2014 में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) की सरकार, उसने पूर्ण बजट पेश करने की जगह अंतरिम बजट ही पेश किया। इनमें नई नीतियों के ऐलान से बचा गया। इन सरकारों ने लेखानुदान पेश कर चुनाव में जाने का फैसला किया। लेखानुदान का मुख्य उद्देश्य जरूरी खर्च के लिए संसद की मंजूरी लेना होता है।

हालांकि, कानूनी रूप से ऐसा कोई प्रावधान नहीं है कि कोई सरकार ऐसे समय में नई योजनाओं से संबंधित ऐलान नहीं कर सकती है। फिर भी इस तरह के ऐलान से अभी तक बचने की परंपरा रही है। इस बजट में नीतिगत घोषणाएं और टैक्स को लेकर कई तरह के बदलाव के ऐलान किए गए हैं। ऐलान में प्रमुख रूप से छोटे और सीमांत किसानों को निश्चित आय की सहायता और निम्न आय वर्ग के लोगों को इनकम टैक्स में छूट देना बहुत अहम है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इन घोषणाओं को तो अभी ट्रेलर बताया है। यानी अगर दोबारा उनके नेतृत्व में सरकार बनती है तो उनके पास देने के लिए बहुत कुछ होगा। सत्ता में लौटने पर निश्चित तौर पर बहुत कुछ निकलेगा।

ज्यादातर लोगों की नजर में यह चुनावी बजट है। असल में सभी लोकतांत्रिक देश चुनावी साल में इस दौर से गुजरते हैं। इस तरह के बजट की महत्वपूर्ण विशेषता यह होती है कि सरकारें टैक्स में छूट देती हैं, सब्सिडी और डायरेक्ट ट्रांसफर पर अपने खर्च बढ़ा देती हैं। इन बढ़े खर्चों की भरपाई के लिए पूंजीगत खर्च उन्हें घटाना पड़ता है। इन कदमों से उनके खजाने पर बोझ बढ़ता है यानी उनका घाटा बढ़ जाता है। सरकार द्वारा बजट को पेश करते वक्त यह साफ दिख रहा था कि यह चुनावों को साध रही है। इसी वजह से बजट भाषण में न केवल पिछले चार साल की उपलब्धियां गिनाई गईं बल्कि भविष्य का खाका भी पेश किया गया। सरकार की पिछले चार साल की उपलब्धियों की बात की जाय तो जीएसटी, इनसाल्वेंसी ऐंड बैंकरप्सी कोड (आइबीसी), डूबते कर्ज की समस्या से बैंकिंग सिस्टम को उबारने के लिए उठाए गए कदम, जनधन, आधार तथा मोबाइल टेलीफोन (जेएएम) के जरिए वित्तीय समावेशन निश्चित रूप से उनमें शामिल हैं। इसमें कई प्रगति की ओर हैं। हालांकि, इनमें से कुछ को लेकर विवाद हो सकता है, लेकिन सरकार के लिए उन्हें गिनाने का मौका जरूर है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि प्राकृतिक संसाधनों की नीलामी में सरकार ने अपेक्षित पारदर्शिता सुनिश्चित की है। इस साल बजट के जरिए समाज के विभिन्न वर्गों तक लाभ पहुंचाने का प्रयास किया गया है। इसके तहत किसान, पशुपालन और मत्स्य पालन से जुड़े किसानों को फायदा पहुंचाने के अहम प्रयास किए गए हैं। इसके अलावा असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों के लिए पेंशन, सरकारी कर्मचारियों और मध्यम वर्ग के करदाताओं के लिए नई पहलें भी की गई हैं। इनमें से दो महत्वपूर्ण पहल हैं, (1) छोटे किसानों को निश्चित आय सहायता (प्रधानमंत्री कृषि सम्मान निधि) मुहैया कराना और (2) पांच लाख रुपये तक आय वाले वर्ग को पूरी तरह से टैक्स छूट देना अहम है। जिस तरह से तीन राज्य मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में सत्तादल को हार मिली, उसे देखते हुए इस तरह के कदमों का उठाया जाना अपेक्षित था। लेकिन, सरकार को इस बात के लिए श्रेय देना चाहिए कि बेहद उदारता दिखाने का दबाव होने के बावजूद उसने सीमित कदम उठाए। उसने ऐलान करते वक्त राजकोषीय प्रबंधन को भी थोड़ा ध्यान में रखा। किसानों की स्कीम के लिए इस साल 20 हजार करोड़ रुपये और अगले वित्त वर्ष में 75 हजार करोड़ रुपये का प्रावधान करना बहुत ज्यादा अतिरिक्त व्यय नहीं माना जा सकता है।

सरकार का कैश ट्रांसफर की दिशा में बढ़ना महत्वपूर्ण कदम है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि सब्सिडी देने की तुलना में कैश ट्रांसफर में लाभार्थी तक लाभ पहुंचाने में विसंगतियां कम होती हैं। हालांकि अभी भी वास्तविक तौर पर न्यूनतम आय बढ़ाना आसान नहीं है। यह एक बड़ी चुनौती है। अगर केवल गरीबी रेखा के नीचे रहने वाली देश की 30 फीसदी आबादी को केवल एक हजार रुपये की भी बेसिक इनकम दी जाए तो 3.6 लाख करोड़ रुपये की जरूरत होगी। अब अगर बेसिक इनकम को मूर्त रूप देना है तो निश्चित तौर पर सब्सिडी और कैश ट्रांसफर को धीरे-धीरे खत्म करना होगा, जिसमें उर्वरक सब्सिडी, खाद्य सब्सिडी से लेकर मनरेगा जैसी योजनाओं को दिया जाने वाला पैसा बेसिक इनकम स्कीम में लगाना होगा। हालांकि यह काम इतना आसान नहीं है। अगर पंजाब, हरियाणा और अविभाजित आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों की बात करें तो वहां के 75 फीसदी से अधिक किसानों को मदद सब्सिडी और डायरेक्ट ट्रांसफर जैसी योजनाओं से ही मिलती है। किसानों को 6000 रुपये सालाना कैश ट्रांसफर की जो योजना लागू की गई है उसमें खेती करने वाले बंटाईदार और मजदूर जैसे कमजोर वर्ग का ख्याल नहीं रखा गया।

इन सबके बावजूद 2019-20 में प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना के लिए 75,000 करोड़ रुपये तक खर्च सीमित रखने के लिए सरकार की अवश्य प्रशंसा की जानी चाहिए। हालांकि चुनाव के बाद पूर्ण बजट में इसे बढ़ाने का निश्चित तौर पर दबाव होगा। इसी तरह पांच लाख रुपये तक की आय वाले लोगों को टैक्स छूट देने से खजाने पर 20,000 करोड़ रुपये का भार पड़ने का अनुमान है। उच्च मध्य वर्ग को टैक्स छूट की सीमा नहीं बढ़ाने से निराशा हुई है। स्टैंडर्ड डिडक्शन बढ़ाने, दो घरों पर आयकर छूट और सोर्स पर टैक्स डिडक्शन में सीलिंग से खजाने पर ज्यादा भार पड़ने की संभावना नहीं है। दुर्भाग्य से नोटबंदी और जीएसटी की मार सहने वाले छोटे और मझोले कारोबारियों को इससे निराशा हुई होगी। उनके दुख पर मरहम लगाने के लिए इसमें कुछ खास नहीं है। प्रधानमंत्री की तरफ से 59 मिनट में एक करोड़ के लोन की योजना, इंक्रीमेंटल लोन पर ब्याज में दो फीसदी छूट से लेकर, सरकारी खरीद में 25 फीसदी हिस्सेदारी देने के ऐलान किए गए हैं। साथ ही सरकारी खरीद में महिलाओं की तीन फीसदी हिस्सेदारी तय की गई है। चुनावी बजट को देखते हुए यह ऐलान तो अहम हैं लेकिन राजकोषीय घाटा बढ़ने की संभावना चिंताजनक है। 2018-19 में राजकोषीय घाटा जीडीपी का 3.4 फीसदी बने रहने की अनुमान है। अहम बात यह है कि जब साल 2018-19 में जीएसटी के जरिए होने वाली आय में एक लाख करोड़ रुपये की कमी रहने का अनुमान है। सरकार इसकी भरपाई ज्यादा कॉरपोरेशन टैक्स और सीमा शुल्क से करने की उम्मीद जता रही है। उसका अनुमान है कि कॉरपोरेशन टैक्स से 50 हजार करोड़ रुपये और सीमा शुल्क से 17,500 करोड़ रुपये की अतिरिक्त आय होगी। इससे कर संग्रह में केवल 23,000 करोड़ रुपये की कमी रहेगी। साथ ही आरबीआइ के डिविडेंड से होने वाले आय में महत्वपूर्ण बढ़ोतरी का अनुमान है। मौजूदा वित्त वर्ष में यह बजट अनुमान 54,817 करोड़ रुपये से बढ़कर 74,140 करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है। वह अगले वित्त वर्ष में बढ़कर 82,912 करोड़ रुपये होने का अनुमान है।

2019-20 में राजकोषीय घाटे को जीडीपी के 3.4 प्रतिशत के बजटीय स्तर पर सीमित रख पाने में संशय है। क्योंकि, नेट टैक्स रेवेन्यू में 14 फीसदी के इजाफे का अनुमान है। खासकर, जीएसटी से 22 फीसदी और पर्सनल इनकम टैक्स में 17.2 फीसदी की वृद्धि का अनुमान लगाया गया है।इसके अलावा, अंतरिम बजट में घाटा 3.4 फीसदी तक सीमित रखने के लिए पूंजीगत व्यय में केवल छह फीसदी की वृद्धि की गई है। यानी बेहतर वित्तीय प्रबंधन के लिए अभी इंतजार करना होगा।

हालांकि कुछ दशमलव अंकों की गिरावट के साथ राजकोषीय घाटे के लक्ष्य को हासिल करने के फेर में हमें आंकड़ों की विश्वसनीयता को बड़ी कसौटियों पर परखने से नहीं बचना चाहिए। मसलन, बीते महीने संसद में पेश 2016-17 की एफआरबीएम पर कैग रिपोर्ट में फर्टिलाइजर सब्सिडी 39,057 और फूड सब्सिडी 81,303 करोड़ रुपये बताया गया था। फूड कॉरपोरेशन इंडिया की वेबसाइट बताती है कि 2017-18 में उसने राष्ट्रीय लघु बचत कोष से 1.2 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का कर्ज लिया। पूरे पब्लिक सेक्टर की देनदारी जीडीपी का 8.5 फीसदी तक पहुंच चुकी है। वहीं, परिवार की वित्तीय बचत इस समय केवल सात फीसदी के स्तर पर है। ऐसे में अब समय आ गया है कि सरकार आर्थिक सुधारों के एजेंडे पर बढ़ती रहे, साथ ही राजकोषीय परिषद का गठन किया जाए, जिससे संसद की निगरानी में नियम आधारित राजकोषीय नीति लागू की जा सके।

(लेखक एनआइपीएफपी के पूर्व निदेशक और चौदहवें वित्त आयोग के सदस्य रहे हैं

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