दलित स्‍त्री विरोधी चेतना

कुलदीप कुमार
मायावती और साधना सिंह
मायावती और साधना सिंह

कुलदीप कुमार
मायावती पर होने वाले अधिकांश प्रहारों के पीछे दलित-विरोधी मानसिकता काम करती रही है

भारतीय जनता पार्टी जिस हिंदुत्ववादी वैचारिक कुनबे की सदस्य है, उसकी विशिष्टता ही पुरातनपंथी, अतीतोन्मुखी और दकियानूसी सोच है। इसलिए कोई आश्चर्य नहीं हुआ जब यह खबर आई कि उत्तर प्रदेश में भाजपा की महिला विधायक साधना सिंह ने बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख और राज्य की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती के लिए कहा कि “ऐसी महिला किन्नर से भी बदतर है। वह न पुरुष है, न महिला। उसकी किस श्रेणी में गिनती करनी है?”

यह बयान जहां इस बात का प्रमाण है कि संघ परिवार किस प्रकार की पितृसत्तात्मक मूल्य व्यवस्था के प्रति प्रतिबद्ध है, वहीं इस दुर्भाग्यपूर्ण सच्चाई को भी उजागर करता है कि किस तरह महिलाएं भी महिला-विरोधी चेतना की गिरफ्त में आ जाती हैं। इन दिनों चल रहे स्‍त्री विमर्श में भी इस प्रश्न पर गहराई से विचार किया जा रहा है कि परिवार के भीतर हो या बाहर, महिला ही महिला की दुश्मन क्यों हो जाती है? साधना सिंह के बयान के पीछे उनकी सवर्ण मानसिकता तो है ही, प्रकृति-प्रदत्त लिंग विभिन्नता से युक्त व्यक्तियों— जिन्हें हिजड़ा, किन्नर या ट्रांसजेंडर के नाम से भी जाना जाता है— के प्रति हिकारत और अपमान का भाव भी है। यानी उनके इस एक बयान के पीछे उनकी दलित-विरोधी, महिला-विरोधी और ट्रांसजेंडर-विरोधी सोच है।

‘महाभारत’ की एक प्रसिद्ध कथा है कि अप्सरा उर्वशी ने अर्जुन को श्राप दिया था कि एक वर्ष तक वह अपना पुरुषत्व खोकर किन्नर के रूप में रहेंगे। इस श्राप का लाभ उन्हें विराटनगर में बिताए अज्ञातवास में मिला और वे वृहन्नला के नाम से किन्नर के रूप में राजकुमारी को संगीत-नृत्य की शिक्षा देने लगे। लेकिन इतने प्राचीन ग्रंथ में भी कहीं वृहन्नला जैसे किन्नरों के प्रति हिकारत या अपमान का भाव नहीं है। ‘महाभारत’ में शिखंडी भी इसी प्रकार का पात्र है जिसकी आड़ लेकर अर्जुन ने भीष्म पितामह पर बाणवर्षा की थी। पिछले कुछ दशकों के दौरान तो भारत समेत विश्व के अनेक देशों में इस संबंध में जागरूकता बहुत बढ़ी है और लिंग-विभिन्नता संपन्न व्यक्तियों को समाज और कानून, दोनों की निगाह में सम्मान के साथ देखा जाने लगा है। हाल ही में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने ट्रांसजेंडर अप्सरा रेड्डी को अखिल भारतीय महिला कांग्रेस का राष्ट्रीय महासचिव नियुक्त करके समय के साथ चलने की जागरूकता और प्रगतिशील सोच का परिचय दिया है। लेकिन भाजपा की महिला विधायक उभयलिंगियों या किन्नरों को हिकारत की नजर से देखती हैं।

जाति व्यवस्था के अभिशाप का शिकार हमारा समाज तो यूं भी दलित पर अत्याचार करने को एक स्वाभाविक और नैसर्गिक क्रिया मानता है। और यदि वह दलित महिला हो तो फिर कहना ही क्या? जब से मायावती राजनीति में आई हैं, तभी से उन पर होने वाले अधिकांश प्रहारों के पीछे यही दलित-विरोधी मानसिकता काम करती रही है। एक समय पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मशहूर किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत ने बहुत अपमानजनक ढंग से उनका उल्लेख उनके जातिसूचक नाम के साथ किया था। जिस लखनऊ गेस्ट हाउस कांड की चर्चा भाजपा की महिला विधायक ने की है, उसमें समाजवादी पार्टी के समर्थकों ने मायावती के साथ जिस किस्म की शर्मनाक अभद्रता की थी, उसके पीछे भी महिला-विरोधी और दलित-विरोधी मानसिकता ही काम कर रही थी। उच्च जाति गौरव और निम्न समझी जाने वाली जातियों के प्रति नफरत और हिकारत की भावना परिवारों के भीतर ही बच्चों में भरी जाती है और ये बच्चे ही बड़े होकर निचली जातियों का उत्पीड़न करते हैं। इस दृष्टि से साधना सिंह अपवाद नहीं हैं।

"जाति व्यवस्था के अभिशाप का शिकार हमारा समाज तो यूं भी दलित पर अत्याचार करने को एक स्वाभाविक और नैसर्गिक क्रिया मानता है। और यदि वह दलित महिला हो तो फिर कहना ही क्या?"

लेकिन उनका अपराध इसलिए कहीं अधिक बड़ा है क्योंकि वे न केवल एक महिला हैं, बल्कि इसके साथ ही सार्वजनिक जीवन में विधायक होने की जिम्मेदारी भी उन पर है। लेकिन जातीय और सांप्रदायिक तनाव फैलाने का जैसा माहौल पिछले सालों में तैयार हुआ है, उसे देखते हुए उनका बयान एक लंबी शृंखला की एक कड़ी ही लगता है।

हमारे गांवों में दलित ‌स्त्रियां ऊंची जातियों द्वारा यौन शोषण का शिकार भी बनती रही हैं। अब स्थिति में कुछ सुधार भले ही हुआ हो, लेकिन आज भी इस प्रकार की घटनाएं अक्सर देखने में आती हैं। इस मामले में भी ऊंची जातियों के पुरुषों का दोगला रुख ही सामने आता है क्योंकि जिन जातियों को वे अछूत और नीच मानते हैं, उनकी ‌स्त्रियों के साथ संबंध बनाने में उन्हें किसी प्रकार की जातीय या धार्मिक मर्यादा आड़े नहीं आती। लगभग नौ दशक पहले छपे उपन्यास ‘गोदान’ में प्रेमचंद ने पंडित दातादीन के बेटे मातादीन और दलित सिलिया के संबंध का चित्रण किया और दिखाया था कि सारे गांव को इसके बारे में पता होते हुए भी कोई इस पर आपत्ति नहीं करता। सिलिया को रखैल का दर्जा प्राप्त है लेकिन मातादीन उसके साथ शारीरिक संबंध तो बना सकता है पर साथ बैठकर खाना नहीं खा सकता क्योंकि वह अछूत है। दलित ‌स्त्रियों को आज भी ऊंची जातियां उपभोग की वस्तु समझती हैं और हिकारत से देखती हैं। यह दलित-विरोधी मानसिकता ऊंची जाति के पुरुषों में तो है ही, महिलाएं भी इसके चंगुल में हैं।

लेकिन अब स्थिति पहले जैसी नहीं रही और देश भर में व्यापक पैमाने पर लोगों की चेतना में परिवर्तन हो रहा है। सुदूर दक्षिण में केरल के सबरीमला से लेकर उत्तर प्रदेश के गांवों-कस्बों तक दलितों और महिलाओं में अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता बढ़ रही है। ऐसे में प्रतिगामी और दलित और महिला-विरोधी विचार हर जगह मुंह की खाएंगे। इसीलिए साधना सिंह को भी अगले दिन ही खेद प्रकट करते हुए बयान जारी करना पड़ा।

(लेखक वरिष्‍ठ पत्रकार हैं, राजनीति और कला-संस्कृति पर लिखते हैं)

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