सच की जांच या बदले की आंच

रायपुर से रवि भोई
साजिश किसकी? झीरम घाटी में नक्सल हमले की जांच के लिए एसआइटी का गठन
साजिश किसकी? झीरम घाटी में नक्सल हमले की जांच के लिए एसआइटी का गठन
देवशरण तिवारी

रायपुर से रवि भोई
बघेल सरकार ने पूर्ववर्ती भाजपा सरकार के दौर के बड़े कांडों पर जांच बैठाई तो पूर्व मुख्यमंत्री ने बदले की कार्रवाई बताकर उठाए सवाल

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने जांच के बहाने पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह और उनके खास अफसरों पर शिकंजा कस दिया है। झीरम कांड, नान घोटाला, ई -टेंडरिंग में गड़बड़ी और सरकार के प्रचार-प्रसार में बजट से अधिक राशि खर्च करने के मामले में पिछली सरकार की परेशानी बढ़ती दिख रही है। इससे राज्य की राजनीति गरमा गई है। विपक्षी दल भाजपा जांच को बदले की भावना से प्रेरित बता रही है। खुद डॉ. रमन सिंह बघेल सरकार के फैसलों पर सवाल उठा रहे हैं। दरभा की झीरम घाटी में 25 मई 2013 को हुए नक्सली हमले में कांग्रेस के तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार पटेल, आदिवासी नेता महेंद्र कर्मा और वरिष्ठ नेता विद्याचरण शुक्ला समेत 29 लोगों की मौत हो गई थी। इस घटना की राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआइए) जांच कर चुकी है। हाइकोर्ट जज भी जांच कर रहे हैं। अब इसकी जांच के लिए बघेल सरकार ने बस्तर के पुलिस महानिरीक्षक (आइजी) के नेतृत्व में एसआइटी का गठन किया है।

मुख्यमंत्री भूपेश बघेल का कहना है कि एनआइए ने हमले के पीछे षड्यंत्र की जांच नहीं की है। यह हमला किनकी साजिश थी और इसके पीछे कौन लोग थे, यह पता लगाने के लिए एसआइटी से जांच कराने का फैसला किया गया है। इस घटना के एक प्रत्यक्षदर्शी कवासी लखमा मौजूदा सरकार में मंत्री हैं। 

पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी की पार्टी छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस के विधायक धर्मजीत सिंह ने आउटलुक को बताया, “घटना की जांच और षड्यंत्र का खुलासा होना चाहिए। लेकिन, एक मंत्री से आइजी सवाल-जवाब कैसे करेगा?” जांच पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा कि जब एनआइए से जांच कराने का फैसला किया गया था तब केंद्र में मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली सरकार थी। ऐसे में हमले के पीछे की साजिश का जांच में शामिल न होना समझ से परे है। धर्मजीत सिंह ने बताया, “एसआइटी जांच का कोई मतलब नहीं है। झीरम कांड की जांच सुप्रीम कोर्ट के जज की निगरानी में होनी चाहिए।”  

इसी तरह बघेल के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने नान घोटाले की जांच के लिए भी एसआइटी गठित की है। इसका मुखिया आइजी एस.आर.पी. कल्लूरी को बनाया गया है। 2015 में एंटी करप्शन ब्यूरो की टीम ने नागरिक आपूर्ति निगम के दफ्तरों में छापा मारा था। इस दौरान ब्यूरो ने भारी मात्रा में नगद और एक डायरी बरामद की थी। डायरी में कुछ रसूखदार लोगों के नाम थे। बाद में इस मामले में ब्यूरो ने भारतीय प्रशासनिक सेवा के दो अधिकारियों आलोक शुक्ला और अनिल टुटेजा समेत 18 लोगों को आरोपी बनाया था। कई लोग जेल भेजे गए। इनमें से कुछ अब भी बाहर नहीं आ पाए हैं। इस मामले में दोनों आइएएस को बचाने के आरोप पूर्ववर्ती रमन सिंह की सरकार पर लगते रहे हैं। नई सरकार ने आरोपी अधिकारी अनिल टुटेजा के आवेदन पर ही एसआइटी से जांच कराने का फैसला किया है।

"अभी तो हमने पिछली सरकार की फाइलों से धूल हटाई है और चीख निकलने लगी"

-भूपेश बघेल, मुख्यमंत्री, छत्तीसगढ़

प्रदेश कांग्रेस कमेटी के मीडिया विभाग के अध्यक्ष शैलेष नितिन त्रिवेदी ने बताया, “नागरिक आपूर्ति निगम (नान) घोटाला लगभग 36 हजार करोड़ रुपये का है। इसमें शामिल कई लोगों को पिछली सरकार ने बचाने की कोशिश की थी। अब एसआइटी जांच से सच सामने आ सकेगा।” हालांकि पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह इन आरोपों को सिरे से खारिज कर रहे हैं। उनका कहना है कि ऐसे आदमी के कहने पर नान घोटाले की जांच के लिए एसआइटी का गठन किया गया है जो खुद इस मामले में मुख्य आरोपी है। उन्होंने कहा, “बघेल सरकार जानबूझकर बदले की राजनीति कर रही है। लोकायुक्त से बड़ी कोई एजेंसी नहीं होती। उसने इस मामले की जांच की। करोड़ों की राशि जब्त की गई और दर्जनों गिरफ्तारियां हुईं।”

प्रदेश सरकार ने 4,601 करोड़ रुपये के ई-टेंडर घोटाले की जांच आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो (ईओडब्ल्यू) को सौंपी है। छत्तीसगढ़ के महालेखाकार की सालाना रिपोर्ट से राज्य शासन की एजेंसी चिप्स के ई- टेंडर में अनियमितता का खुलासा सामने आया था। रिपोर्ट में बताया गया है कि जिस कंप्यूटर से टेंडर खोले गए, उसी कंप्यूटर के जरिए न केवल ठेकेदारों ने टेंडर भरा, बल्कि अधिकारियों ने मंजूर भी किए।

भाजपा विधायक शिवरतन शर्मा का कहना है कि ईओडब्ल्यू को इस मामले की जांच सौंप कांग्रेस की सरकार ने गलत परंपरा शुरू कर दी है। उनके अनुसार, पहले महालेखाकार की रिपोर्ट जांच के लिए विधानसभा की लोकलेखा समिति को सौंपी जानी चाहिए थी और उसकी सिफारिश पर जांच एजेंसी तय की जानी चाहिए थी। लेकिन, कांग्रेस के वरिष्ठ विधायक सत्यनारायण शर्मा का कहना है कि जांच से पिछली सरकार की पोल खुलने वाली है। इसलिए, भाजपा नेता आपत्ति जता रहे हैं।  

बघेल ने 250 करोड़ रुपये के स्वीकृत बजट के मुकाबले पिछली सरकार के प्रचार-प्रसार पर 400 करोड़ रुपये खर्च करने के मामले की जांच भी ईओडब्ल्यू को दी। जनसंपर्क विभाग डॉ. रमन सिंह के पास ही था। इसलिए, इस मामले में उन्हें भी घेरा जा सकता है। भाजपा नेता नरेश गुप्ता ने बताया कि मौजूदा सरकार सभी जांच बदले की भावना से करा रही है। जांच ईओडब्ल्यू को सौंपी गई है जो मुख्यमंत्री के अधीन काम करती है और इसका मुखिया कल्लूरी को बनाया गया है।

"यह बदलाव नहीं, बदले की राजनीति है। छत्तीसगढ़ में यह नहीं चलेगा"

-डॉ. रमन सिंह, पूर्व मुख्यमंत्री, छत्तीसगढ़

दीगर है कि कल्लूरी को आर्थिक अनुसंधान और एसीबी का मुखिया बनाने के बाद से ही बघेल सरकार के फैसले पर सवाल उठ रहे हैं। असल में विपक्ष में रहते हुए बघेल ने कल्लूरी पर बस्तर के आइजी रहते कई आरोप जड़े थे और कहा था कि कांग्रेस सरकार बनने पर उन्हें जेल में डाल दिया जाएगा। उनकी नियुक्ति पर विवाद बढ़ने के बाद सफाई देते हुए बघेल ने कहा था, “कल्लूरी को एसीबी और ईओडब्ल्यू का चीफ नहीं बनाया गया है। वे डीजीपी डी.एम. अवस्थी के मातहत होंगे।” कल्लूरी की नियुक्ति पर जारी विवाद के बीच 12 साल की सेवा वाले आइएएस अधिकारी अंकित आनंद को छत्तीसगढ़ विद्युत मंडल का चेयरमैन बनाने के सरकार के फैसले पर भी सवाल उठ रहे हैं। इसे मुख्य सचिव स्तर का पद माना जाता है। पिछली सरकार में मलाईदार पदों पर बैठे कुछ अफसर जस के तस बने हैं, तो कुछ को नई सरकार में भी प्रभावशाली भूमिका मिलने पर भी विवाद है।

बघेल के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के एक महीने पूरे होने पर राजधानी रायपुर में जगह-जगह ‘छत्तीसगढ़वासियों का पहला भोर, अब फैसलों का दौर’ होर्डिंग लगाई गई है। असल में बघेल ने शपथ लेते ही जिस तरह ताबड़तोड़ फैसले लिए उससे प्रशासनिक अमले में बदलाव की उम्मीद  भी बंधी थी। लेकिन एक के बाद एक जांच के फैसलों और विवादित अधिकारियों की नियुक्ति ने विपक्षी दल को बघेल सरकार की नीयत पर सवाल उठाने का मौका थमा दिया है। हालांकि, भाजपा की राष्ट्रीय महामंत्री सरोज पांडेय का कहना है, “अभी छत्तीसगढ़ सरकार का हनीमून पीरियड चल रहा है।” लेकिन, लोकसभा चुनाव इतना करीब है कि भाजपा बघेल सरकार को घेरने का कोई मौका नहीं छोड़ेगी। ऐसे में बघेल के सामने विपक्ष के दांव को बेअसर कर आम चुनावों में भी हालिया विधानसभा चुनाव की तरह शानदार नतीजे हासिल करने की तगड़ी चुनौती है।

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