दक्खिनी कलाओं के व्याकरण

रवीन्द्र मिश्र
कला यात्राः विभिन्न नृत्य रूपों का प्रदर्शन (बाएं) और चेतन जोशी का बांसुरी वादन (दाएं)
कला यात्राः विभिन्न नृत्य रूपों का प्रदर्शन (बाएं) और चेतन जोशी का बांसुरी वादन (दाएं)

रवीन्द्र मिश्र
दक्षिण भारत की समृद्ध परंपरा से अछूते उत्तर भारत ने एक सेमिनार से जाना वहां की नृत्यकला को

जिसे हम भारतीय संस्कृति कहते हैं, कला उसकी निरंतरता का विशाल कैनवास है। पूरे देश के सांस्कृतिक परिदृश्य पर संगीत-नृत्य की छाया बहुत गहरी है। सदियों पुरानी कला विधाएं हमारी सामाजिक परंपरा, आपसी व्यवहार और खानपान से लेकर अध्यात्म, बंधुत्व भाव को दर्शाती रही हैं। कोई भी देश हो उसके विकास के ऐजेंडे में संस्कृति की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। भारत में तो समृद्धशाली कलाओं का गौरवशाली इतिहास है, जिसने पूरी दुनिया में इस देश को बड़ी पहचान दी। भूमंडलीकरण की उथल-पुथल के बावजूद हमारी कला-संस्कृति की अविरल धारा आज भी बह रही है।

दुनिया की जितनी भी कलाए हैं उनमें अधिकांश ईश्वर की आराधना से शुरू हुईं। हमारा संगीत, खासकर नृत्य शैलियां भरतनाट्यम, ओडिसी, कुचिपुड़ी, कथकलि, मोहिनीअट्टम, मणिपुरी से लेकर कथक पर नजर डाली जाए तो हम पाते हैं कि उनकी जड़ में ईश्वर की भक्ति और आराधना है। तमाम पौराणिक कथाओं का मर्मस्पर्शी चित्रण इन नृत्यों में दिखता है। यह सच है कि काफी हद तक भारतीय नृत्यों का जुड़ाव मंदिरों से रहा। लेकिन इन विकसित नृत्य शैलियों का उद्‍गम और विकास कब और कैसे हुआ, इसके ठोस ऐतिहासिक प्रमाण नहीं मिलते। पर गणित और व्याकरण की दृष्टि से हर नृत्य पूर्ण है और इनमें अभिव्यक्ति की काफी गुंजाइश है। समय के बदलाव के साथ हर नृत्य अपना परिष्कार करता रहा। वह लोक प्रचलन के शास्‍त्र बनाता रहा, उसका व्याकरण तैयार करता रहा और आवश्यकता पड़ने पर रूढ़िवादी परंपरा को तोड़कर आगे बढ़ने के लिए अपने को तैयार करता रहा। लेकिन मध्ययुग में मुस्लिम आए और उनकी सल्तनत उत्तर भारत में कायम हुई, तो अपनी अभिरुचि के अनुसार उन्होंने भारत की धार्मिक प्रवृत्ति से जुड़ी पारंपरिक कलाओं को भी प्रभावित किया। मुस्लिम साम्राज्य दक्षिण भारत में नहीं फैला इसलिए वहां कला विधाएं उनके प्रभाव से अछूती रहीं। उत्तर भारत के बाहर दक्षिण के भरतनाट्यम, कुचिपुड़ी और बंगाल के गुडिया नृत्य परंपरा की कालजयी यात्रा से अवगत कराने और उसकी ठोस जानकारी मुहैया कराने के लिए चंडीगढ़ के प्राचीन कला केंद्र ने इन नृत्यों की मर्मज्ञ, अनुभवी और वरिष्ठ नृत्यांगनाएं डॉ. महुआ मुखर्जी, डॉ. पी. रमादेवी, सुश्री वानश्री रविशंकर के साथ ही प्रखर मृदंगम वादक मन्नरकोचिल जे. बालाजी और बांसुरी वादक चेतन जोशी को स्पंदन के सेमिनार में व्याख्यान और कार्यक्रम देने के लिए आमंत्रित किया।

संगोष्ठी में दक्षिण और बंगाल की सदियों पुरानी पारंपरिक नृत्य शैलियों की खूबियां और उनके नए रूपों में ढलने पर सारगर्भित व्याख्यान और प्रदर्शन को देखना कलानुरागियों के लिए रोमांचक अनुभव था। कार्यक्रम का आरंभ बंगाल के दुर्लभ गुडिया नृत्य की वरिष्ठ नृत्यांगना महुआ मुखर्जी ने व्याख्यान और प्रदर्शन के जरिए किया। सैकड़ों साल पुरानी यह नृत्य शैली अपने उद्‍गम और प्रचलन के साथ कब और कैसे शास्‍त्रीय नृत्य की श्रेणी में आई उसकी शोधपरक जानकारी देने में उन्होंने इस नृत्य के रहस्यात्मक तत्वों को बखूबी उजागर किया। संभवतः वे गुडिया नृत्य की एकमात्र कलाकार हैं जिन्होंने लुप्त हो रही इस नृत्य परंपरा पर शोध किया है। इस नृत्य को पुनर्जीवित करने के अहम प्रयास में उन्होंने साबित किया कि गुडिया शैली पूरी तरह से भरत मुनि के नाट्यशास्‍त्र पर आधारित है। अन्य नृत्यों की तरह इसकी शुरुआत भी मंदिरों से हुई और देवदासियां इसे प्रस्तुत करती थीं। इसमें विभिन्न परिष्कृत मुद्राएं, अंग संचालन और पद विन्यास हैं। भ्रमरी नृत्य इसमें खास है। गुडिया में वैष्‍णव और शैव दोनों परंपराओं की धारा का प्रवाह है। यह शैली संत कवि जयदेव के गीत गोविंद से भी प्रेरित है। गीत गोविंद के अष्टपदी में उद्धृत राधा-कृष्‍ण प्रसंग, खंडित नायिका, दशावतार आदि की प्रस्तुति का अनोखा रसास्वादन है। बंगाल की अाराध्य महादेवी काली की आराधना में चंडी वंदना बहुत प्रभावी है। इस नृत्य को प्रचार-प्रसार और लोकप्रियता दिलाने में अहम भूमिका निभा रही महुआ मुखर्जी इस कला में अनगिनत छात्रों को प्रशिक्षण प्रदान कर रही हैं।

आंध्रप्रदेश में विकसित और लयात्मक गति से भरपूर कुचिपुड़ी नृत्य की अपनी पहचान है। व्याकरणबद्ध होते हुए भी यह बड़ा लचीला है। अध्यात्म से जुड़े इस नृत्य में पौराणिक कथाओं रामायण, महाभारत जैसे महाकाव्यों के प्रसंगों की प्रस्तुति की परिपाटी रही है। बुनियादी तौर पर इसकी नींव नाट्य परंपरा पर पड़ी, जिसे नाट्य मेला कहा जाता था। इस शैली का चलन भी नाट्यशास्‍त्र पर आधारित है। इसे घुमक्कल ब्राह्मण प्रस्तुत करते थे। कहते हैं कि वे वैदिक मंत्र, पौराणिक साहित्य-संगीत और नृत्य के पारखी कलाकार थे, जो आंध्र के कुचिपुड़ी गांव में बस गए। इस गांव में कुचिपुड़ी के नाम से नृत्य नाट्य की शुरुआत भागवत मेला के रूप में हुई जिसकी प्रस्तुति पूरी रात होती थी। शुरू में इसे भगवततूतू कहते थे। धर्म की टेक पर प्रस्तुतियां भगवान की कथाओं पर आधारित थीं। आगे चलकर कई गुरुओं ने सार्थक प्रयास से इस शैली को शास्‍त्रीय रूप प्रदान किया। इसमें तांडव और लास्य का सुंदर रूप अभिनय-नृत्य में दिखता है। अभिनय में नाट्यशास्‍त्र का सम्युत और असम्युत हस्तकों का कलात्मक प्रदर्शन रोमांचक और दर्शनीय है। कुचिपुड़ी नृत्य की विद्वान और श्रेष्ठ नृत्यांगना डॉ. पी. रमादेवी के वक्तव्य और प्रदर्शन से इस नृत्य शैली का इतिहास और खूबियां बखूबी उजागर हुईं। उन्होंने बताया कि 14वीं-16वीं सदी में कुचिपुड़ी के पितामह सिद्धेन्द्र योगी ने एक नई पारिजात कथा लिखी, जिसे भामा कलापम के नाम से जाना जाता है। इसमें नाट्य और अभिनय का अद्‍भुत रूप है। योगी के समय युवा लड़के ही स्‍त्री वेश में महिला का रोल करते थे। इन युवा कलाकारों को द्विज कुमारुलू कहते थे। हर नृत्य कलाकार में वेद-शास्‍त्र और कर्नाटक संगीत की समझ का होना अनिवार्य था। वाचक, अंगिका, आहार्य, सतविका अभिनय और नवरस की प्रस्तुति में तिलस्मी रंग भरे गए हैं। कुचिपुड़ी नृत्य में कौतवम, शब्दम कीर्तन, पद, जावली के शास्‍त्रीय चलन से लेकर सत्यभामा चरित्र, तरगम, कृष्‍ण लीला तरंगिनी आदि की जो रोमांचक प्रस्तुति है वह सटीक तरीके से रमादेवी के नृत्य और अभिनय में प्रसूत हुई।

दक्षिण का समृद्धशाली नृत्य भरतनाट्यम अपने इतिहास, परिष्कृत रूप और चलन के कारण उच्चस्तरीय है। नृत्यांगना वानश्री रविशंकर के अनुसार यह नृत्य बहुत विकसित और भाव प्रधान है। पुराने गुरुओं ने अपने गहरे चिंतन और प्रयोग से इस नृत्य को नए-नए रूपों में संवारा और विस्तार दिया। मनुष्य के सामान्य जीवन में घटित होने वाली घटनाओं पर नृत्य संरचना, भक्ति मार्ग पर पौराणिक कथाओं की नृत्य-अभिनय में प्रस्तुति को रसपूर्ण बनाने में गुरुओं की दूरदर्शिता गजब की है।

शास्‍त्रीय नृत्य में शुद्ध नृत्य, अलारिपु जावली सुर लय, ताल और अभिनय में संरचित वरनम, शब्दम, पदम, वीर, शृंगार, वियोग रस के संचार से नृत्य का तकनीकी पक्ष बहुत उत्कृष्ट है। नटुवांगम पर जातिया नृत्य के चलन को जिस गहराई से तराशा गया, वह इस शैली को अलग ऊंचाई प्रदान करता है। देवदासियों की पुरानी परंपरा से लेकर आधुनिक मंच पर पहुंचे इस नृत्य के क्रमिक इतिहास की उपयोगी जानकारी वानश्री ने अपनी प्रस्तुति में दी और इसकी तकनीक, खंडित नायिका की प्रस्तुति के चलन को खूबसूरती से दर्शाया। दक्षिण भारतीय वाद्य मृदंगम के महारथी वादक मन्नरकोचिल जे. बालाजी ने इसकी वादन शैली पर टिप्पणी करते हुए कहा कि ताल के लिहाज से यह परिपूर्ण वाद्य है। जातिया की मुश्किल ‘बोलों’ को निकालने में अंगुलियों के काम लयकारी आदि में कई सार्थक प्रयोग पुराने वादकों ने किए। बालाजी ने ताल निबद्ध कई विकट चलनों को दर्शाते हुए लय के विभिन्न प्रकारों को प्रस्तुत किया। सीधी, आड़ी, तिरछी, अनाद, अघात लयात्मक गतों के प्रदर्शन से मृदंगम पर दाएं-बाएं का गठजोड़ देखने वाला था।

स्पंदन का समापन बांसुरी वादक चेतन जोशी के व्याख्यान और बांसुरी वादन से हुआ। उन्होंने शुरू में बजने वाली छोटी बांसुरी को लंबा करके शास्‍त्रीय संगीत के मुताबिक विकसित करने में इस वाद्य के पितामह पन्नालाल घोष के योगदान पर विस्तार से चर्चा की। गायिकी के अंग से तंत्रकारी को जोड़ने में जो नया आयाम पंडित हरिप्रसाद ने दिया, वह विमर्श में महत्वपूर्ण था। परिचर्चा में सबसे रोमांचक बात थी, सदियों पहले पक्षी के पैरों की हड्डी में छेद कर बांसुरी का अविष्कार। दुर्लभ चित्र और वह कैसे बजती थी, यह जानना वाकई चकित करने वाला था।

(लेखक वरिष्ठ कला समीक्षक हैं)

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