बिना जमीन बेमानी प्रोजेक्ट

संजय उपाध्याय
उद्योग नदारदः कहलगांव में बियाडा की जमीन पर कब्जा कर स्थानीय लोग कर रहे खेती
उद्योग नदारदः कहलगांव में बियाडा की जमीन पर कब्जा कर स्थानीय लोग कर रहे खेती
पवन चौधरी

संजय उपाध्याय
सुशासन बाबू के राज में जमीन अधिग्रहण न हो पाने या दबंगों के कब्जे और घपले-घोटालों में दशकों से लंबित केंद्रीय परियोजनाएं

भूमि अधिग्रहण न होने से बिहार में केंद्र सरकार की दर्जनों विकास परियोजनाओं का कार्य तो धीमा पड़ा ही है, कई औद्योगिक इकाइयां भी सिक्योरिटी मनी वापस लेकर लौट गई हैं। हालात ये हैं कि केंद्र को कई बार बिहार सरकार से कहना पड़ा कि जिलाधिकारियों को सीधे निर्देशत करे कि वे अधिग्रहण प्रक्रिया को तेज कर परियोजनाओं को आगे बढ़ाएं। हद तो यह है कि कहीं भूमि अधिग्रहण हुआ भी तो उस पर दबंगों ने कब्जा जमा लिया या घोटाले-घपले में फंसी हुई है। साल 2000 में बिहार के विभाजन के बाद जब कल-कारखाने झारखंड में चले गए तो स्पष्ट हो गया था कि यहां कृषि आधारित उद्योगों को ही प्रोत्साहित किया जा सकता है। 2015 में हुए बिहार के आर्थिक सर्वेक्षण में भी ये तथ्य उभर कर आए कि आगामी 10 वर्षों तक बिहार में कृषि आधारित उद्योगों की असीम संभावनाएं हैं। 2006 से 2011 के बीच रिकॉर्ड इकाइयां लगीं भी। बिहार इंडस्ट्रीज एसोसिएशन के अध्यक्ष केपीएस केसरी कहते हैं कि उस अवधि में सूबे में करीब अाठ हजार करोड़ रुपये का पूंजी निवेश हुआ, जिसमें करीब 4,800 करोड़ रुपये यानी कुल निवेश का करीब 60 प्रतिशत कृषि उद्योग में ही लगे। वे आगे कुछ भी कहने से कतराते हैं। लेकिन, सच तो यह है कि भूमि अधिग्रहण न हो पाने के कारण पूर्वी बिहार का भागलपुर-कहलगांव का मेगा फूड पार्क सूना पड़ा है। एग्रो प्रोडक्टस की बड़ी कंपनियों में शुमार केलवेनेटर सरकार से 2013 में ही सिक्योरिटी मनी लेकर बैरंग लौट गई। इस संबंध में भागलपुर के जिलाधिकारी वरुण कुमार कहते हैं, “बियाडा में तो जमीन आवंटित की गई थी लेकिन उद्योग न लगाना कंपनी की अपनी मजबूरी रही होगी।” हालांकि हकीकत यह है कि उसे भूमि तो आवंटित कर दी गई थी, लेकिन कब्जा किसी और का था। आज भी कहलगांव स्थित बियाडा की करीब 1000 एकड़ भूमि पर स्थानीय दबंगों का राज है। एक उद्यमी कहते हैं कि केलवेनेटर का वापस जाना ऐसे वायरस की तरह उद्योगपतियों में फैला कि मेगा फूड पार्क में प्रस्तावित अमृत सीमेंट, हैंडलूम पार्क सहित छोटे-बड़े दर्जन भर उद्यमी सिक्योरिटी मनी लेकर बैरंग लौट गए। इसी का असर था कि देश में केन-बॉल (गन्ना क्षेत्र) नाम से मशहूर उत्तर बिहार से करीब आधा दर्जन चीनी मिलों ने भी अपने प्रस्ताव समेट लिए। चीनी मिलों के महज शिलान्यास पट ही जहां-तहां दिखते हैं।

दरभंगा के सांसद कीर्ति झा आजाद कहते हैं, “दरभंगा को तो बिहार सरकार ने अपनी किस्मत पर ही छोड़ दिया।” वे बताते हैं कि वे 2011-12 में केंद्र सरकार से निवेदन कर तारामंडल का प्रस्ताव ले आए थे, मगर जमीन देने के नाम पर बिहार सरकार को दिन में ही तारे दिखने लगे। वे कहते हैं, “हर बजट में इसका जिक्र तो होता है पर जमीन नदारद है।” 2015-16 में सॉफ्टवेयर पार्क टेक्नोलॉजी को दरभंगा के लिए केंद्र सरकार से निवेदन कर सांसद झा ने ही पास कराया। उसके लिए 48 हजार वर्गमीटर भूमि की मांग बिहार सरकार से की गई। कई बार पत्राचार हुए मगर भूमि अधिग्रहण अभी भी समस्या बनी हुई है। नतीजतन, टेक्नोलॉजी पार्क नहीं बन सका।

राजधानी पटना के बाद दूसरे सबसे अधिक जनसंख्या घनत्व वाले शहर दरभंगा में ट्रैफिक जाम की समस्या इतनी भीषण है कि उस रास्ते माल ढुलाई से बचा जाता है। यहां पांच रेलवे ओवर ब्रिज पास हैं, लेकिन काम एक पर भी नहीं शुरू हो पाया है। कारण, बिहार सरकार जमीन ही मुहैया नहीं करा पाई। पंडा सराय से दोनार गुमटी तक रेलवे ओवरब्रिज निर्माण की निविदा 2013 में ही निकाली गई। लेकिन, आज तक एक ईंट भी वहां नहीं गिरी, क्योंकि जमीन ही नहीं दी गई।

इस संबंध में पूर्व केंद्रीय मंत्री तथा रालोसपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा कहते हैं, “करीब दो लाख करोड़ रुपये की केंद्रीय परियोजनाएं लंबित पड़ी हैं। राज्य में डबल इंजन सरकार बनने के बाद से आपसी समझौते के तहत केंद्र सरकार ने लंबित पड़ी योजनाओं के बारे में बोलना बंद कर दिया है।” वे बताते हैं कि उन्होंने केंद्र में मंत्री रहते कई केंद्रीय विद्यालयों के लिए मंजूरी दिलाई, लेकिन भूमि अधिग्रहण न हो पाने के कारण ये अधर में लटके हैं। उन्होंने चुटकी लेते हुए कहा कि केंद्रीय कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह ने मोतिहारी में केंद्रीय विश्वविद्यालय के लिए आंदोलन चलवाया, लेकिन हुआ क्या? कुशवाहा ने भी मंत्री रहते बापू केंद्रीय विश्वविद्यालय के लिए ताकत लगाई। अब जब वहां भूमि अधिग्रहण की बात आई तो भारी घपले की खबर मिल रही है। कुशवाहा की पार्टी के किसान प्रकोष्ठ के प्रदेश अध्यक्ष सुभाष कुशवाहा कहते हैं कि किसानों से औने-पौने दाम पर सैकड़ों एकड़ कीमती जमीन ली गई। किसानों ने महात्मा गांधी के नाम पर स्वेच्छा से जमीन दे भी दी। अब मुआवजा राशि और सरकारी मूल्य को लेकर प्रशासन की मिलीभगत से भारी घपले के आरोप लग रहे हैं। लिहाजा, वहां आंदोलन शुरू हो गया है। इस संबंध में मोतिहारी के जिलाधिकारी अमन कुमार कहते हैं कि जांच शुरू कर दी गई है। करीब दर्जन भर लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई है। उन्होंने स्वीकार किया कि घपले में प्रशासन के निचले स्तर के कुछ अफसर शामिल हैं। 

इसके पड़ोस के कमिश्नरी शहर मुजफ्फरपुर में कई महत्वाकांक्षी परियोजनाएं अटकी पड़ी हैं। वहां भी भूमि अधिग्रहण एक समस्या है। नेपाल से सटे होने के कारण नेपाल का वाणिज्य-व्यापार मार्ग भी वहां से गुजरता है। लेकिन, दिल्ली-काठमांडू राजमार्ग छपवा से रामगढ़वा तक वर्षों से गड्ढे में तब्दील हो गया है। सूत्र बताते हैं कि एक बार नेपाल ने भारत को चेतावनी दी थी कि वह इस मार्ग से व्यापार बंद कर देगा। बाद में, सड़क में कुछ सुधार हुआ भी, पर फिर सड़क की हालत वैसी ही हो गई है। मुजफ्फरपुर से जुड़ने वाले राजमार्ग-77,28 और 102 पर कई जगहों पर जमीन पर विवाद की वजह से भी काम लंबित पड़ा है। राष्ट्रीय राजमार्गों को लेकर केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने जून 2018 में ही बिहार सरकार के खिलाफ टिप्पणी भी की थी। जवाब में सड़क, परिवहन व यातायात मंत्री नंद किशोर यादव ने स्वीकार किया था कि भूमि अधिग्रहण के कारण कुछ परियोजनाएं जरूर लंबित पड़ी हैं। इस सबंध में विभागीय स्तर पर जिलाधिकारियों को निर्देश भी दिया गया। लेकिन, भूमि अधिग्रहण पर्याप्त नहीं हुआ। यादव कहते हैं कि उत्तर बिहार में जनसंख्या का दबाव अधिक होने से किसान मुआवजा राशि अधिक मांगते हैं जबकि बजट सीमित है। बावजूद इसके कई जगहों पर भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया तेज है।

त्रासदी तो यह है कि मुजफ्फरपुर से करीब 18 किमी पूरब कांटी में न्यू मुजफ्फरपुर रेलवे स्टेशन का प्रस्ताव है। उसके लिए एक इंच भी जमीन का अधिग्रहण नहीं हुआ। हाजीपुर से सुगौली रेल खंड का शिलान्यास 2003 में ही तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने किया था, लेकिन भूमि अधिग्रहण न होने के कारण निर्माण कार्य ठप है। इस संबंध में पूर्वी रेल मंडल के अधिकारी कुछ भी कहने से इनकार करते हैं। अधिकारियों ने इतना भर कहा कि संसाधन मिलते ही कार्य शुरू कर दिया जाएगा। बिहार सरकार का दावा है कि राज्य में विद्युत उत्पादन बढ़ा है। गांव-गांव बिजली पहुंच रही है। लेकिन सच्चाई यह है कि प्रति व्यक्ति बिजली खपत के राष्ट्रीय औसत 1149 यूनिट की तुलना में राज्य का औसत चौथाई से भी कम है। बिहार में प्रति व्यक्ति बिजली खपत 272 यूनिट ही है। उद्यमियों का मानना है कि इससे उपभोक्ता वस्तुओं का उत्पादन तथा वितरण संतुलित नहीं हो पाता है। मुजफ्फरपुर से सटे कांटी थर्मल पॉवर के बगल में ही एक विद्युत इकाई प्रस्तावित है पर वहां भी जमीन आड़े आ रही है। बिहार इंडस्ट्रीज एसोसिएशन के अध्यक्ष केसरी कहते हैं कि भूमि अधिग्रहण बड़ी समस्या है। हालांकि बिहार सरकार की योजना में भागलपुर जिले के पीरपैंती में थर्मल पॉवर प्रस्तावित है। वहां अब सोलर पावर प्लांट लगाया जाएगा। दूसरी ओर विद्युत मंत्री विजेंद्र पसाद यादव कहते हैं कि उन्होंने कई चुनौतियों को पार किया है। वे कहते हैं कि पहले जहां लालटेन युग था, वहां अब गांव जगमगाने लगा है। 22 घंटे तक बिजली मिलती है। उन्होंने दावा किया कि भूमि की समस्या नहीं आएगी प्लांट स्थापित करने में। लेकिन हकीकत तो कुछ और ही है। लंबित योजनाओं से नीतीश कुमार के विकास पुरुष की छवि धूमिल हो रही है। केंद्र अभी तो साझा सरकार के नाते चुप है लेकिन राज्य में विकास योजनाओं के लटकने से हालात अच्छे नहीं दिख रहे हैं।

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