“स्‍त्री लेखन में बिखराव चिंता की बात नहीं”

मीना झा
ममता कालिया
ममता कालिया

मीना झा
समाज स्‍त्री और पुरुष दोनों से नि‍र्मि‍त है। अत: कि‍सी को कमतर मानना, समाज के संतुलन को कमजोर करना है।

व्यास सम्मान से सम्मानित प्रसि‍द्ध साहि‍त्‍यकार ममता कालि‍या से मीना झा ने आउटलुक के लिए बातचीत की,

साहि‍त्‍य साधना का सर्वोच्‍च शि‍खर जिसे लेखक की साहि‍त्‍यि‍क मुक्‍ति‍ का शि‍खर माना जा सकता है, व्‍यास सम्‍मान मि‍लने पर आपकी प्रति‍क्रि‍या?

हल्‍का-सा संतोष इस बात का जरूर हुआ कि‍ मेरे लि‍खे को पढ़ा गया। हर लेखक चाहता है, उसकी कि‍ताबों पर धूल न बैठे।

कभी-कभी पुरस्‍कार उन्‍हें नहीं मि‍ले, जो उनके अधि‍कारी होते हैं। आपके वि‍चार?

लेखन में हमें यह खुशफहमी पालने से कोई नहीं रोक सकता कि‍ हम बेहतर हैं। कई बार पुरस्‍कार में अति‍वाद अथवा अल्‍पवाद भी हो जाता है। प्रत्‍येक पुरस्‍कार के अपने नि‍यम और नीति‍यां होती हैं। लेखक इनके प्रति‍ सचेत नहीं होता। होना भी नहीं चाहि‍ए। उसका काम लि‍खना है। हिंदी के अनेक मूर्धन्‍य रचनाकारों को महत्‍वपूर्ण पुरस्‍कार नहीं मि‍ले। इससे वे छोटे या महत्‍वहीन नहीं हो जाते।

साहि‍त्‍य की धाराएं हो सकती हैं, मगर कि‍सी वाद से जुड़ना साहि‍त्‍य के लि‍ए श्रेयस्‍कर है?

साहि‍त्‍य में समय-समय पर वाद और धाराएं प्रचलन में रही हैं। वाद जहां होते हैं वहां वि‍चारधारा भी अवस्‍थि‍त होती है। वाद के साथ वि‍वाद का भी गहरा संबंध है। जब हम छात्र थे, प्रयोगवाद की धूम थी। हमें उससे पूर्व के सभी वाद इति‍हास की वस्‍तु जान पड़ते थे। प्रयोगवाद का ही अगला चरण यथार्थवाद रहा। वाद, लेखन को गति‍ और संगति‍ देते हैं। ऐसा नहीं कि‍ वे रचनात्‍मकता को अवरुद्ध करते हैं। जब कोई वाद कठि‍न, कठोर बनने लगता है, रचनाकार स्‍वयं उसके चौखटे से बाहर आने को छटपटाता है और अंत में मुक्‍त हो जाता है।

प्रसि‍द्धि‍ मि‍लने के बाद उसे कायम रखना एक जद्दोजहद है। इस वि‍षय में ‘उसने कहा था’ के संदर्भ में आपका दृष्‍टि‍कोण?

लेखन के क्षेत्र में अपनी स्‍थि‍ति‍ बनाए रखने के लि‍ए सतत सृजनशील रहना पहली शर्त है। मैं उन साहि‍त्‍यकारों से सहमत नहीं, जो मानते हैं कि‍ प्रसि‍द्धि‍ के लि‍ए पराक्रम का भी प्रयोग उचि‍त है। इस रोशनी में हमें चंद्रधर शर्मा गुलेरी जी की कहानी ‘उसने कहा था’ सहज स्‍मरण हो आती है। कालजयी रचना अपने आप समय पर वि‍जय पाती है। गुलेरी जी की रचना आज भी जीवि‍त है। आपकी जद्दोजहद वाली आशंका इससे ध्‍वस्‍त हो जाती है।

यह सच है कि‍ समाज में स्‍त्रि‍यों को दोयम दर्जा दि‍या गया है, लेकिन साहि‍त्‍य में इसके वि‍रुद्ध प्रति‍रोध नहीं बल्‍कि‍ स्‍त्री वि‍मर्श बनाम देह वि‍मर्श जैसी अराजकता फैलाई गई है। 

 स्‍त्री अपने अधि‍कारों और अस्‍ति‍त्‍व के लि‍ए अंतहीन संघर्ष की भूमि‍का में रहती है। इसीलि‍ए स्‍त्री लेखन को प्रति‍रोध का लेखन कहा जाता है। शि‍क्षा के प्रसार और रोजगार के अवसरों ने स्‍त्रि‍यों का जीवन काफी हद तक बदला है। इसके कारण कई नए कि‍स्‍म के खतरे भी पैदा हो गए हैं। लेकिन अराजकता वाली स्‍थिति‍ से मैं इनकार करती हूं। यदि‍ स्‍त्री मुक्‍ति‍ के नाम पर, बतौर फैशन स्‍त्री लेखन में कुछ बि‍खराव आया है तो उसकी चिंता नहीं करनी चाहि‍ए। समय सबसे बड़ा नि‍र्णायक है जो ऐसी गर्द-धूल आसानी से साफ कर देगा।

सपनों की होम डि‍लीवरी’ में आधुनि‍क दांपत्य के खोखलेपन पर आपकी क्‍या राय है?

लेखक केवल अपने नि‍जी दुख-सुख नहीं लि‍खता। इतना वि‍राट संसार है, इसमें असंख्‍य कि‍स्‍म के लोग हैं, तरह-तरह के परि‍वार और आचार-वि‍चार हैं। सपनों की होम–डि‍लीवरी उपन्‍यास की मूल प्रेरणा एक समाचार था जि‍समें इस घटना का उल्‍लेख था। मुझे कभी कोई खबर बि‍जली की तरह छू जाती है। ऐसा ही हुआ जब नाइजैला लॉसन और उसके पति‍ साची वाली खबर के आधार पर मैंने रुचि‍ और सर्वेश की कहानी लि‍खी।

आपको कौन सी वि‍धा सबसे प्रिय है?

कहानी मेरी प्रि‍य वि‍धा है।

कबीर, तुलसी कई विद्वानों ने नारी को नरक का द्वार कहा है। क्‍या यह पुरुषों की स्‍वयं अपनी कमजोरी की व्‍याख्‍या है?

ये बहुत पुरानी कहावतें हैं। इन्‍हें समाज ने स्‍त्री का मनोवि‍ज्ञान नष्‍ट करने के लि‍ए समय-समय पर दोहराया है। पराजयवादी सूक्‍ति‍यों को खारि‍ज करना चाहि‍ए और अगर कभी कोई इनसे स्‍त्री का शि‍कार करना चाहे तो उसका प्रति‍रोध करना चाहि‍ए।

स्‍त्री या पुरुष लेखन अपने अनुभवों का वि‍स्‍तार होता है। आपके प्रि‍य रचनाकार और लेखकों के लि‍ए आपका वि‍शेष संदेश?

पढ़ते-पढ़ते प्रि‍य रचनाकारों का बहुत बड़ा खजाना मेरे हाथ लग गया है। कि‍तने नाम गि‍नाऊं। हिंदी साहि‍त्‍य के सागर में मुक्‍ता-माणि‍क अनगि‍नत हैं। सभी लि‍खने-पढ़ने में संलग्‍न रहे। लेखन, आने वाली पीढ़ी में पठन-पाठन के प्रति‍ अनुराग पैदा करे, यही कामना है।

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