ब्राह्मणवादी पितृसत्ता के वर्चस्व से बढ़ीं चुनौतियां

सतीश देशपांडे
बदलाव हो रहा है लेकिन अभी मानसिकता नहीं बदल रही है। अच्छी बात यह है कि लोगों में असंतोष बढ़ा है, जो बदलाव लाएगा
बदलाव हो रहा है लेकिन अभी मानसिकता नहीं बदल रही है। अच्छी बात यह है कि लोगों में असंतोष बढ़ा है, जो बदलाव लाएगा
मंजुल

सतीश देशपांडे
समाज के हर वर्ग और स्त्रियों में बढ़ती आकांक्षाओं के बीच पितृ-सत्ता को कायम रखने की कोशिशों से समाज में भारी विस्फोटक स्थिति

सबरीमला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर विवाद और हाल के महीनों में शुरू हुआ मी-टू कैंपेन, ये दो ताजा उदाहरण हैं, जिनसे एक बार फिर ब्राह्मणवादी पितृसत्ता का चेहरा खुलकर सामने आ गया है। यह धारणा भले बनी है कि हम आधुनिक बन गए हैं, लेकिन हकीकत यह है कि पितृसत्ता का प्रभुत्व करीब-करीब हर जगह कायम है। वैसे तो पितृसत्ता मानव सभ्यता के उसी दौर से अस्तित्व में आ गई जब मनुष्य घुमंतू और शिकार के दौर से खेती-किसानी की ओर मुड़ा। उसी दौर से पितृसत्ता भी जड़ें जमाने लगी और लगातार मजबूत होती गई। बस उसका स्वरूप बदलता गया है।

ब्राह्मणवादी पितृसत्ता को किसी जाति, धर्म या राष्ट्र के दायरे में रखकर नहीं देखना चाहिए। इसका वजूद समाज, संस्थान और सामाजिक रीति-रिवाजों में है। यह एक मानसिकता है, जो कुछ जातियों में व्याप्त है। लेकिन ऐसा नहीं है कि जाति के सभी लोगों में यह पाई जाती है। कुल मिलाकर यह वर्चस्ववादी प्रवृत्ति ही है। कई बार तो यह मानसिकता महिलाओं में भी उतनी ही तीव्र गति से काम करती है, जितना पुरुषों में। किसी विचारधारा की यही खासियत भी होती है कि वह व्यक्ति को आभास तक नहीं होने देती कि उसकी सोच और आचरण विचारधारा से प्रभावित है। पितृसत्ता तो प्राचीन काल से है लेकिन जब हम उसमें ब्राह्मणवाद को जोड़ते हैं तो हम जाति के पदानुक्रम को स्‍त्री–पुरुष पदानुक्रम से मेल कराते हैं। उसके बाद ब्राह्मणवादी पितृसत्ता वजूद में आती है। यह समाज को बांटने वाले मुख्य खांचों जाति और वर्ग के अनुसार अलग-अलग होती है। कुछ हद तक यह जनजातियों में भी पाई जाती है। लेकिन सभी के अलग-अलग आयाम हैं। ऐसे में इसका असर भी अलग-अलग पड़ता है।

मोटे तौर पर आज समस्या, जिसे स्‍त्री प्रश्न कहा जाता है, एक अजीब चरण में है। अजीब इसलिए क्योंकि स्‍त्री-सशक्तीकरण के जो आधार होने चाहिए, उसमें निर्विवाद रूप से इजाफा हो रहा है। महिलाओं की उच्च शिक्षा में भागीदारी करीब 47 फीसदी पहुंच गई है, जो पुरुषों के करीब-करीब बराबर है। लेकिन इसके बावजूद स्‍त्री-सशक्तीकरण नहीं हो रहा है। ऐसा इसलिए है क्योंकि इतनी शिक्षित आबादी होने के बावजूद भारत कुछ चंद देशों में है जहां महिलाओं की श्रम जगत में भागीदारी कम है। विकास के साथ भागीदारी की दर जो बढ़नी चाहिए, वह या तो स्थिर है या फिर घट रही है। ऐसा दुनिया के कुछ ही देशों में हो रहा है। उनमें से एक हम हैं। हमारी गिनती सऊदी अरब और अफगानिस्तान जैसे देशों में हो रही है। खास बात यह है कि महिलाओं के काम करने की दर ग्रामीण क्षेत्रों के साथ-साथ शहरी क्षेत्रों में भी घट रही है।

अब सवाल यह उठता है कि ऐसा कैसे और क्यों हो रहा है। समाज में यह दबाव तो बन रहा है कि बेटियों को शिक्षित किया जाय। लेकिन शिक्षित करने का दबाव स्‍त्री-सशक्तीकरण के लिए नहीं, बल्कि उन्हें शादी के लिए तैयार करने के लिए है, ताकि वैवाहिक बाजार में उनका मूल्य बढ़े। ऐसे में विवाह योग्य युवती का कॉलेज जाना जरूरी बन गया है लेकिन उसको नौकरी कराना न तो माता-पिता चाहते हैं, न ही ससुराल वाले चाहते हैं। इस तरह हमारे यहां घर बैठी उच्च शिक्षित महिलाओं की तादाद दुनिया में सबसे ज्यादा होती जा रही है। यहां तक कि डॉक्टर, इंजीनियर भी घर बैठी हैं। ऐसे में पितृसत्ता कई बार बहुत सौम्य-सी लगती है, लेकिन जितना अवसर महिलाओं को मिलना चाहिए, उन्हें नहीं मिल पाता है।

आज के दौर में उच्च वर्ग, जो सबसे ज्यादा साधन संपन्न है, में भी पितृसत्ता अपनी पैठ जमाए हुए है। देश के विभिन्न कॉरपोरेट घराने में बिजनेस का हस्तांतरण पुरुषों को हो रहा है। ऐसे उदाहरण आपको बहुत कम मिलेंगे, जब बेटी उत्तराधिकारी बन रही है। अगर ऐसा होता है तो वह बड़ी खबर बन जाती है। जबकि पुरुष को प्रमुख पद मिलना सामान्य कायदा माना जाता है। ज्यादातर लड़कियों की बचपन से ऐसी परवरिश होती है कि वे संपत्ति के अधिकार का भी उपयोग नहीं करती हैं। उन पर इस तरह के सामाजिक दबाव होते हैं कि वे इसका उपयोग नहीं कर पाती हैं, खासकर उत्तर भारत के राज्यों में ऐसे उदाहरण ज्यादा मिलते हैं।

यह सही है कि देश में मध्य वर्ग बहुत तेजी से उभरा है, जिसके तहत आर्थिक और सामाजिक कारणों से महिलाओं को आगे बढ़ने के मौके तो मिले हैं, लेकिन पितृसत्ता वहां भी हावी है। जो महिलाएं काम कर रही हैं, उनके साथ भी भेदभाव जारी है। सबसे अहम है कि निजी क्षेत्र में समान काम के लिए समान वेतन की व्यवस्‍था लागू नहीं हो पा रही है। यह धारणा भी बनी हुई है कि महिलाओं को एक हद के बाद उस तरह की ग्रोथ नहीं मिलती है, जैसा वैसी ही काबिलियत पर पुरुषों को मिलती है। यह मान लिया जाता है कि ‌स्त्रियों से काम नहीं संभलेगा। मुश्किल से ही कोई महिला ऊंचे पद पर पहुंच पाती है। महिलाओं के लिए तय नौकरियों में भी नजर डालें तो वहां भी पितृसत्ता का प्रभाव दिखता है। निजी क्षेत्र में कुछ खास विभागों में ही महिलाओं के लिए नौकरियां तय होती हैं। इसमें भी एक नया ट्रेंड है। जिन विभागों में महिलाओं की संख्या ज्यादा है, उनमें वेतन कम होता है। या कहिए कि कम वेतन वाले विभागों में ही महिलाओं की संख्या ज्यादा होती है। देश में करीब 93-94 फीसदी तंत्र असंगठित क्षेत्र में है, जहां नियम-कायदों से ज्यादा मनमानी चलती है। इस वजह से भी भेदभाव ज्यादा है। लिहाजा, अगर छंटनी होनी है तो सबसे पहले महिलाओं की ही की जाती है। कुल मिलाकर पितृसत्ता का प्रभाव ऐसा है कि उन्हें उसकी भारी कीमत चुकानी पड़ती है।

निम्न मध्यम वर्ग में कामकाजी महिलाओं पर खास तौर से बोझ बढ़ गया है। शहरी परिवारों में जीवन-स्तर बेहतर बनाए रखने के लिए जरूरी हो गया है कि पति और पत्नी दोनों काम करें। महिलाएं बाहर काम करने के साथ-साथ घर पर भी काम कर रही हैं। उन पर घर की देखभाल के साथ-साथ बच्चों की परवरिश की भी जिम्मेदारी है। ऐसे में उन पर दोहरा दबाव है। उनके इस दोहरे काम को इस नजर से देखा जाता है कि यह तो उनको करना ही चाहिए।

हाल में यौन उत्पीड़न को लेकर काफी जागरूकता बढ़ी है, लेकिन उसकी वजह से एक नई समस्या सामने आई है। जागरूकता बढ़ने से कानून सख्त हुआ है। लेकिन जब कानून सख्त होते हैं, तो सजा होने की दर कम हो जाती है। वहां भी पितृसत्ता हावी होती है। न्यायाधीश को भी लगता है कि इतनी सख्त सजा क्यों दी जाए। झूठे आरोप और कानून के दुरुपयोग की बातें अमूमन वहीं उठती हैं, जहां किसी कमजोर को अधिकार मिलता है।

मध्यम वर्ग की तरह निम्न वर्ग में भी इस दौर में पितृसत्ता का प्रभाव ज्यादा दिख रहा है। निम्न वर्ग की सबसे बड़ी परेशानी है कि वह अपनी रोजमर्रा के जीवन की आधारभूत जरूरतों में फंसा हुआ है। वहां महिलाओं के साथ घरेलू हिंसा के ज्यादा मामले हो रहे हैं। वह यह सब सहने के लिए कहीं न कहीं तैयार भी रहती हैं। लेकिन अभी निम्न वर्ग में संबंधों की घनिष्ठता है, क्योंकि इसके बिना उसका जीवनयापन असंभव है। इस समाज के लोग अर्थव्यवस्था से भी पिटे हुए हैं। इसीलिए कहा जाता है कि इस वर्ग में पितृसत्ता पिटी हुई है। इसी वजह से पितृसत्ता अपना हक हिंसा के रूप में प्रकट करती है। इसलिए संदर्भ पर ध्यान देना हमेशा बेहद जरूरी है।

लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि कुछ भी नहीं बदला है। पहले पितृसत्ता को कोई चुनौती नहीं थी, उसमें अब अड़चन आने लगी है। लोग डरने लगे हैं कि बात मीडिया में आ जाएगी। पुलिस, प्रशासन भी संवेदनशील हो रहा है, लेकिन ये स्थितियां लंबे संघर्ष के बाद आई हैं।

आधुनिक दौर में खासकर पिछले 15-20 साल में नव-उदारवाद का जोर बढ़ा है। उसकी वजह से समाज में एक बड़ा बदलाव आया है। आज अमीर कहीं ज्यादा अमीर हो गए हैं जबकि गरीबों का जीवन स्तर उतना बेहतर नहीं हुआ है जैसा होना चाहिए था। पित्तृसत्ता का एक स्वरूप यह भी दिख रहा है कि मानव सभ्यता के इतिहास में पहली बार अमीरी की खुलकर नुमाइश हो रही है। अब डॉलर में अरबपति, खरबपति पैदा हो रहे हैं।

नव-उदारवाद से मजदूर वर्ग को ज्यादा नुकसान हुआ है। वास्तविक आय घटी है, जिसकी वजह से संघर्ष और बढ़ रहा है। इसके अलावा पहली बार यह भी हो रहा है कि आम आदमी तक सूचनाओं का प्रवाह तेज हो गया है। इन दोनों वजहों से नए टकराव पैदा हो रहे हैं। इसीलिए मेरा मानना है कि हमारा समाज एक विस्फोटक दौर की ओर बढ़ रहा है। लोगों में अपने अधिकार के प्रति जानकारी बढ़ी है। ऐसे में जिसे पहले चुपचाप नियति मान लिया जाता था, वह अब खत्म हो रहा है। अब चुपचाप सहते रहने वाली महिलाओं का अनुपात भी कम हो रहा है।

तिस पर यह भी कहा जाता है कि हमारा पश्चिमीकरण हो रहा है, धर्म भ्रष्ट हो रहा है। लेकिन सवाल यह उठता है कि परंपरा स्थिर तो नहीं होती है। ऐसे में बदलाव तो होगा। लेकिन पितृसत्ता ऐसी कोशिश करती है कि समय इतनी तेजी से न बदले। पितृसत्ता की जड़ें अभी इतनी गहरी हैं कि वर्ग की तरह जातियों में भी पूरी तरह से अपनी पैठ बनाए हुए हैं। यह सवाल उठता है कि दलित आंदोलन से पितृसत्ता का प्रभाव कम क्यों नहीं हुआ? तो, इस पर बड़ी साफगोई से कोई कह सकता है कि यह आंदोलन जाति संघर्ष पर आधारित था, कभी भी पितृसत्ता विरोध उसका लक्ष्य नहीं रहा। लेकिन अच्छी बात यह है कि वहां भी संघर्ष चल रहा है। कई पैमाने टूट रहे हैं। जिसे हम पहले एक इकाई कहते थे उसमें भी कई सारी दरारें आ गई हैं। जो लोग शक्तिशाली हो गए हैं, उनके लिए पितृसत्ता को बनाए रखना बेहद जरूरी है, लेकिन उन्हें दबे-कुचले तबके से चुनौती मिल रही है। अब नए-नए किरदार उभर रहे हैं। हर वर्ग में विभाजन हो रहा है।

ऐसा ही हाल उन दलों में भी आप देख सकते हैं, जहां नेतृत्व महिलाओं के हाथ में है। नेतृत्व शुरू में तो महिला हितों पर ज्यादा तवज्जो देता है। लेकिन सत्ता में बने रहने के लिए उसे समझौते करने पड़ते हैं। ऐसे में धीरे-धीरे वहां भी पितृसत्ता के अनुसार व्यवहार होने लगता है। यह एक तरह से उनकी मजबूरी है। अच्छी बात यह है कि ये सक्रियताएं पित्तृसत्ता को चुनौती देकर ऊपर तक पहुंची हैं।

नव-उदारवाद के दौर में पितृसत्ता का प्रभाव ऐसा रहा है कि जिन समाजों में मातृसत्ता थी, वहां भी पितृसत्ता बदलाव ला रही है। उदाहरण के तौर पर केरल का नायर समाज और पूर्वोत्तर का खासी समाज, जो मातृसत्ता के आधार पर चल रहा था, अब वहां भी बदलाव आ रहा है। उन पर इस तरह का दबाव बन गया है कि ये भी अब अपनी मातृसत्ता को उचित नहीं मान रहे हैं।

इन उदाहरणों से साफ है कि समाज में एक संघर्ष चल रहा है, जिसमें पितृसत्ता हावी है। लेकिन उसे चुनौती भी मिल रही है। महिलाएं अब केवल घर तक सीमित नहीं हैं। वे राजनीति से लेकर हर क्षेत्र में आगे आ रही हैं। कॉरपोरेट जगत में भी वे अपना स्थान बना रही हैं। राजनीति में भी उनकी पहचान बन रही है। हालांकि, अभी पितृसत्ता के प्रभाव के कारण उनकी सफलता को कमतर आंका जाता है लेकिन शुरुआत तो हो गई है। इन संघर्षों की वजह से समाज में विस्फोटक स्थिति बन रही है।

यह सवाल नहीं पूछना चाहिए कि पितृसत्ता कब खत्म होगी, क्योंकि यह उसी तरह का सवाल है कि पूंजीवाद कब खत्म होगा। हमें यह देखना चाहिए कि क्या बदल रहा है और क्या नहीं बदल रहा है। बदलाव हो रहा है लेकिन अभी मानसिकता नहीं बदल रही है। कुल मिलाकर विकास एक चिरस्थायी असंतोष है, क्योंकि आपकी उम्मीद हमेशा हासिल की हुई चीज से आगे होती है। उसी से ऊर्जा मिलती है। अच्छी बात यह है कि लोगों में असंतोष बढ़ा है, और यही बदलाव लाएगा।

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में समाजशास्‍त्र के प्रोफेसर हैं। कंटेंपरेरी इंडियाः ए सोशिओलॉजिकल व्यू उनकी चर्चित कृति है। लेख प्रशांत श्रीवास्तव से बातचीत पर आधारित) 

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