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खबरदार! सरकार देख रही है

गृह मंत्रालय के नए आदेश से निजता के अधिकार के घोर उल्लंघन की उठीं आशंकाएं
जांच एजेंस‌ियां शक के आधार पर जब चाहें आपके लैपटॉप, कंप्यूटर वगैरह को खंगाल सकती हैं

अभी डेढ़ साल भी पूरे नहीं हुए कि सुप्रीम कोर्ट ने निजता के अधिकार को मौलिक अधिकारों में शुमार कर दिया था। लेकिन केंद्रीय गृह मंत्रालय के एक हालिया आदेश से इस पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। गृह मंत्रालय ने 20 दिसंबर 2018 को एक आदेश के जरिए सूचना-प्रौद्योगिकी कानून 2000 के सेक्शन-69 के तहत किसी भी व्यक्ति के लैपटॉप, कंप्यूटर में मौजूद सामग्री को खंगालने का अधिकार 10 एजेंसियों को दे दिया। मंत्रालय के इस आदेश से जांच एजेंसियां जब चाहें आपके लैपटॉप, कंप्यूटर वगैरह को निगरानी के दायरे में ला सकती हैं, बस उन्हें इस बात का शक होना चाहिए कि आपके ई-मेल और दूसरे माध्यमों से भेजे जाने वाले मैसेज या सिस्टम में रखा डेटा राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा है। यानी आपकी जासूसी बेधड़क हो सकती है। सरकार का यह आदेश इन सवालों को आमंत्रित कर रहा है कि क्या निजता का अधिकार अब सुरक्षित नहीं रह जाएगा, जिसे अगस्त 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने मौलिक अधिकार होने का फैसला सुनाया था? सरकार के इस आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में 24 दिसंबर को एक जनहित याचिका भी दायर हो गई है।

गृह मंत्रालय ने खुफिया ब्यूरो (आइबी), नॉरकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो, प्रवर्तन निदेशालय (ईडी), केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी), डायरेक्टरेट ऑफ रेवेन्यु इंटेलिजेंस (डीआरआइ), केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआइ), राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआइए), कैबिनेट सचिवालय (रॉ), सिग्नल इंटेलिजेंस निदेशालय (केवल जम्मू-कश्मीर, पूर्वोत्तर और असम के सेवा क्षेत्रों के लिए), दिल्ली पुलिस आयुक्त को किसी भी व्यक्ति के कंप्यूटर में मौजूद सामग्री की जांच करने का अधिकार दिया है। इस आदेश पर विपक्ष भी भड़क गया है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने ‌ट्वीट किया, “वे डरे हुए तानाशाह हैं। प्रधानमंत्री देश को पुलिस राज्य बनाना चाह रहे हैं।” माकपा महासचिव सीताराम येचुरी ने ट्वीट किया “क्यों हर भारतीय को अपराधी माना जा रहा है। सरकार इस फरमान के जरिए सभी लोगों की जासूसी कराना चाहती है।”

हालांकि सरकार का दावा है कि देश की सुरक्षा के लिए जो लोग या संस्थाएं खतरा बन सकते हैं, केवल उन्हीं पर नजर रखी जाएगी। उसका कहना है कि निगरानी का अधिकार सूचना-प्रौद्योगिकी एक्ट-2000 के सेक्शन-69 में दिया गया है, जिसके आधार पर यूपीए सरकार के कार्यकाल में 2009 में कंप्यूटर डेटा की निगरानी का कानून बनाया गया था। इसमें सारा जिम्मा केंद्रीय गृह मंत्रालय के जिम्मे था। सो, बोझ घटाने के लिए विभिन्न एजेंसियों को अधिसूचित कर दिया गया है। बाकी सब पुराना है।

लेकिन कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कपिल सिब्बल ने आउटलुक को बताया कि “यह सीधे तौर पर निजता के अधिकार का उल्लंघन है। जब यूपीए सरकार के समय कानून बना था। तब सुप्रीम कोर्ट का निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार मानने का फैसला नहीं आया था। नए आदेश से सरकार अपने विरोधियों पर नजर रखना चाहती है। सरकार का राष्ट्रीय सुरक्षा का तर्क बेबुनियाद है।” सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ वकील और साइबर एक्सपर्ट पवन दुग्गल ने आउटलुक को बताया, “सुप्रीम कोर्ट ने निजता के अधिकार को मौलिक अधिकारों में शुमार किया है। नए आदेश से आम आदमी के निजता के हनन का खतरा बढ़ गया है। ऐसे में नए आदेश की न्यायालय समीक्षा कर सकता है।”

सूचना-प्रौद्योगिकी कानून 2009 में यह प्रावधान किया गया है कि आपात स्थिति में पहले से स्वीकृति लिए बिना भी किसी भी व्यक्ति के कंप्यूटर वगैरह को निगरानी में रखा जा सकता है लेकिन इसके तीन दिन के अंदर उपयुक्त अथॉरिटी से मंजूरी लेनी होगी। अगर अथॉरिटी ने सात दिन के अंदर स्वीकृति नहीं दी तो निगरानी करने का अधिकार खत्म हो जाएगा। जबकि सामान्य स्थिति में निगरानी के प्रत्येक मामले के लिए गृह सचिव की मंजूरी लेनी होगी। इसी तरह केंद्र में कैबिनेट सचिव और राज्य में मुख्य सचिव की अध्यक्षता में हर दो महीने पर निगरानी में रखे गए मामलों की समीक्षा भी होगी। हालांकि भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता शाहनवाज हुसैन की सफाई है, “फैसले का मतलब लोगों की जिंदगी में ताकझांक करना नहीं है। मकसद केवल यही है कि जो लोग देश के खिलाफ साजिश कर रहे हैं, उन पर नकेल कसी जा सके। पता नहीं कांग्रेस क्यों डरती है, वह कौन-सी बात छुपाना चाहती है।”

सीबीआइ के पूर्व ज्वाइंट डायरेक्टर एन.के. सिंह के अनुसार मेरे समय में सीबीआइ सीधे तौर पर ऐसा नहीं कर सकती थी। किसी भी व्यक्ति की निगरानी के लिए काफी सबूत जुटाने पड़ते थे। यह काला कानून है, इसमें निर्दोष के फंसने की आशंका है।”

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