Advertisement

को बड़ छोट कहत अपराधू...

रविशंकर और विलायत खां दोनों अपनी-अपनी तरह से महान थे और महानता को तराजू में नहीं तौल सकते
द सिक्स्थ स्ट्रिंग

छह वर्ष पहले 11 दिसंबर, 2012 को देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से विभूषित संगीतकार रविशंकर का 92 वर्ष की आयु में निधन हो गया। यूं तो उनका संगीत आने वाली कई सदियों तक जीवित रहेगा और हर दिन उनकी याद दिलाता रहेगा, लेकिन पुण्यतिथि भी एक ऐसा महत्वपूर्ण अवसर है जब उनके जैसी विभूति का स्मरण करना अनिवार्य-सा लगता है। इस बार तो यह इसलिए भी अपरिहार्य हो गया है, क्योंकि पिछले माह के अंत में मूर्धन्य सितारवादक विलायत खां की अंग्रेजी में एक औपन्यासिक जीवनी प्रकाशित हुई है, जिसकी लेखिका नमिता देवीदयाल हैं। जीवनी का शीर्षक है द सिक्स्थ स्ट्रिंग ऑफ विलायत खां। वैसे तो यह विलायत खां की जीवनी है, लेकिन इसके भीतर रविशंकर लगातार उसी तरह उपस्थित हैं जिस तरह किसी सांगीतिक प्रस्तुति में तानपूरे की झंकार अंतर्धारा के रूप में निरंतर प्रवाहमान रहती है।

पुस्तक का आरंभ ही रविशंकर-विलायत खां स्पर्धा वाली घटना से होता है जिसमें माना जाता है कि विलायत खां की तुलना में रविशंकर कुछ उन्नीस रहे, और उसमें बार-बार इस बात का आग्रहपूर्वक उल्लेख भी है कि सितार से गले की हरकतें निकालने और उस पर खयाल गायकी बजाने के कारण विलायत खां रविशंकर के मुकाबले कहीं बेहतर सितारवादक थे। इसलिए भी रविशंकर की पुण्यतिथि पर उनका और उनके योगदान का स्मरण करना किसी भी संगीतप्रेमी का कर्तव्य हो जाता है।

रविशंकर और विलायत खां, दोनों ही सितारवादक के रूप में बेजोड़ थे और उनका कोई सानी नहीं था। न कोई दूसरा रविशंकर पैदा हुआ है और न ही कोई दूसरा विलायत खां। सेनिया-बीनकार परंपरा में दीक्षित रविशंकर जिस तरह का ध्रुपद-आधारित सुव्यवस्थित और भव्य आलाप-जोड़-झाला प्रस्तुत करते थे, वह विलायत खां जैसे गीतात्मक तथा स्वच्छंदतावादी प्रवृत्ति के कलाकार को नसीब नहीं था। सितार पर रविशंकर ने जैसा गहन, लालित्यपूर्ण और ताजमहल के स्थापत्य की याद दिलाने वाला भव्य आलाप बजाया है और जोड़ में प्रवेश करके झाले के उत्तुंग शिखर पर पहुंचने के जैसे-जैसे दुर्गम मार्गों का दर्शन कराया है, वैसा बड़े-बड़े बीनकार (वीणावादक) भी नहीं करा पाए। ध्रुपद के गांभीर्य और गहराई को व्यक्त करने के लिए उन्होंने अपने सितार में एक अति मंद्र का तार भी जोड़ा था। बीन की तरह ही उनके सितार में दो तुंबे होते थे जो उनके वादन के लिए अपेक्षित नाद की सृष्टि करते थे।

रागदारी के मामले में विलायत खां रविशंकर के सामने हल्के पड़ते थे और उनका सितार छोटे खयाल या फिर ठुमरी अंग में जाकर ही अच्छी तरह से खिलता था। लेकिन इसी के साथ यह भी सच है कि विलायत खां सितार को घोल कर पी गए थे। जब वे सितार बजाते थे, तो लगता था कि यह वाद्य उनके सामने दासभाव से हाथ जोड़े खड़ा है और उनके हर हुक्म की तामील करने के लिए तत्पर है। ऐसी कोई चीज नहीं थी जो वे सितार पर न निकाल सकते हों। बड़े-बड़े उस्ताद गायकों के गले से निकली कोई हरकत ऐसी नहीं थी जिसे वे हूबहू अपने सितार के माध्यम से प्रस्तुत न कर सकते हों। विलायत खां का अपने वाद्य पर असाधारण अधिकार था, लेकिन इस कारण वे रविशंकर की तुलना में श्रेष्ठतर संगीतकार थे, यह कहना अनुचित और अतिशयोक्तिपूर्ण होगा।

रविशंकर केवल एक सितारवादक ही नहीं थे, बल्कि वे एक विराट सांगीतिक व्यक्तित्व थे, जिसने अपनी प्रतिभा के आलोक से अनेक क्षेत्रों को प्रकाशित किया था। उन्हें सच्चे अर्थों में क्लासिकल आधुनिकतावादी कहा जा सकता है, क्योंकि उन्होंने नितांत आधुनिक दृष्टि से हिंदुस्तानी शास्‍त्रीय संगीत को देखा और विश्व के सामने प्रस्तुत किया। उनका बचपन अपने बड़े भाई और अंतरराष्ट्रीय ख्याति के नर्तक उदय शंकर की छत्रछाया में यूरोप में बीता और फ्रांस में उनकी स्कूली शिक्षा हुई। नौ-दस साल की उम्र में ही उन्होंने घर में रोम्यां रोलां, आंद्रे सेगोविया और पाब्लो कासाल जैसे लेखकों, चित्रकारों और संगीतकारों को बातें करते देख लिया था और स्‍त्राविंस्की तथा तोस्कानिनी जैसे पाश्चात्य संगीत के जाने-माने कंडक्टरों को सुन लिया था। किशोरावस्था में वे उदय शंकर के नृत्यदल के सदस्य के रूप में मंच पर नृत्य करते थे और जब उन्होंने अलाउद्दीन खां से हिंदुस्तानी शास्‍त्रीय संगीत तथा सितार वादन की विधिवत शिक्षा लेनी आरंभ की तब उनकी उम्र अठारह साल हो चुकी थी।

धरती के लाल, नीचा नगर और पाथेर पांचाली जैसी कालजयी फिल्मों में संगीत देने के साथ ही युवा रविशंकर ने अपने सामाजिक सरोकारों के कारण वामपंथी-प्रगतिशील रुझान वाले इंडियन पीपुल्स थिएटर एसोसिएशन (इप्टा) की गतिविधियों में भाग लिया। बाद में उन्होंने अनुराधा, गोदान, मीरा और गांधी जैसी फिल्मों में संगीत निर्देशन किया। विश्वविख्यात वायलिनवादक यहूदी मेनुहिन के साथ उनकी घनिष्ठ व्यक्तिगत और सांगीतिक मित्रता रही और दोनों ने एक साथ कई बार रिकॉर्डिंग की। जब बीटल्स समूह के सदस्य जॉर्ज हैरिसन उनके शिष्य बने तो बीटल्स की तरह ही रविशंकर भी पूरे  विश्व के युवाओं के बीच शिखरपुरुष बन गए। हिंदुस्तानी शास्‍त्रीय संगीत, विशेषकर वाद्य संगीत, को दुनिया भर में लोकप्रिय बनाने का सबसे अधिक और सबसे पहला श्रेय रविशंकर को ही जाता है। 

रविशंकर और विलायत खां में तुलना करना बेमानी ही नहीं है, दोनों की प्रतिभा के साथ अन्याय करना भी है। दोनों ही अपनी-अपनी तरह से महान थे और महानता को तराजू में नहीं तौला जा सकता। उनके बारे में विचार करते हुए रामचरितमानस के ‘बालकांड’ की यह चौपाई याद आती है, “को बड़ छोट कहत अपराधू, सुनि गुन भेदु समुझिहहिं साधू”।

(लेखक वरिष्‍ठ पत्रकार हैं, राजनीति और कला-संस्कृति पर लिखते हैं)

Advertisement
Advertisement
Advertisement