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साख संदिग्ध, भ्रामक संदेश

नीति आयोग की दखल से सीएसओ पर भी सवाल, दुनिया चीन की तरह हमारे आंकड़ों पर भी करेगी संदेह
आंकड़ों की बाजीगरी

किसी भी देश की अर्थव्यवस्था के आंकड़े कई मायने में खास होते हैं। उन आंकड़ों के आधार पर न केवल वहां के लोगों के लिए सरकार ठोस प्लानिंग करती है, बल्कि दुनिया भर के निवेशक और नीति-निर्धारक उस देश को लेकर अपनी प्लानिंग भी करते हैं। ऐसे में अगर उन आंकड़ों पर ही संदेह हो जाए, तो सोचिए क्या होगा। न तो सही दिशा में देशवासियों के लिए प्लानिंग हो पाएगी और न ही वैश्विक निवेशक और नीति-निर्धारक सटीक फैसले ले पाएंगे। इसका सीधा असर देश के विकास और छवि पर पड़ेगा। आज हमारे सामने भी ऐसी ही परिस्थितियां खड़ी हो रही हैं।

हाल ही में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के जो आंकड़े जारी हुए उन पर कई सवाल खड़े हो रहे हैं। नीति आयोग और केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय (सीएसओ) ने 2005-06 से लेकर 2011-12 की अवधि के नए आंकड़े आधार वर्ष 2011-12 के हिसाब से जारी किए, जिसमें इस अवधि की ग्रोथ रेट 1.8 फीसदी तक कम हुई है। मसलन, 2010-11 में ग्रोथ रेट 10.3 फीसदी दर्ज की गई थी, वह अब नई विधि से घटकर 8.5 फीसदी हो गई है। इसके पहले आधार वर्ष 2004-05 के हिसाब से आंकड़े जारी किए गए थे। ऐसा ही हाल दूसरी अवधि के जारी किए गए आंकड़ों में भी हुआ है। इसका असर यह हुआ है कि यूपीए सरकार के पहले चार साल के कार्यकाल की ग्रोथ रेट, मौजूदा सरकार के पहले चार साल के कार्यकाल की तुलना में घट गई है।

इसके बाद से नए आंकड़ों को लेकर राजनीति भी शुरू हो गई है। लेकिन देश के सामने जो यह अविश्वास की परिस्थिति खड़ी हुई है, उसकी सबसे बड़ी वजह केवल आंकड़ों में बदलाव आना नहीं है। उससे भी बड़ा कारण जीडीपी आंकड़ों को जारी करते वक्त सीएसओ के साथ नीति आयोग का आना है। नए आंकड़ों को जारी करते हुए जो प्रेस कांफ्रेंस हुई है उसमें सीएसओ के साथ नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार भी मौजूद थे। यहीं से शक की गुंजाइश शुरू होती है, और सीएसओ की स्वतंत्रता पर भी सवाल उठते हैं। यह बेहद गंभीर है।

ऐसा पहली बार हुआ है कि जीडीपी के आंकड़ों को सीएसओ ने नीति आयोग के साथ मिलकर जारी किया है। यह कदम समझ से परे है, क्योंकि आंकड़ों को एकत्र कर और उनके विश्लेषण का काम सीएसओ ही करता रहा है। सही मायने में यही उसका काम है। इसलिए सीएसओ को नीति आयोग के साथ की क्यों जरूरत पड़ी यह अपने आप में कई सारे सवाल खड़े करता है। नीति आयोग की सफाई आई है कि उसे सीएसओ ने ऐसा करने को कहा था। अगर यह बात सही है तो यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है, क्योंकि ऐसा पहले कभी नहीं हुआ।

अभी तक की जो परंपरा रही है, उसमें आकड़ों की गोपनीयता काफी मायने रखती थी। मेरे समय में केवल दो घंटे पहले सीएसओ वित्त मंत्रालय और प्रधानमंत्री कार्यालय को बंद लिफाफे में अपनी रिपोर्ट देता था, ताकि आंकड़े समय से पहले सार्वजनिक न हों। प्रधानमंत्री कार्यालय और वित्त मंत्रालय को भी आंकड़े सिर्फ इसलिए दिए जाते थे कि सीएसओ द्वारा प्रेस कांफ्रेंस करने के बाद ये मीडिया को उस संबंध में अपनी प्रतिक्रिया दे सकें। इस बार ऐसा नहीं हुआ है, जिसकी वजह से गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। मुझे यह समझ नहीं आ रहा है कि जीडीपी के आंकड़ों को जारी करने में नीति आयोग का क्या काम है? उसका काम तो न्यू इंडिया के लिए भविष्य की तैयारी करना है। उसकी इस क्षेत्र में विशेषज्ञता कैसे हो गई? उसका तो काम ही दूसरा है।

दूसरी आशंका नए आंकड़ों को जारी करने की टाइमिंग को लेकर है। सरकार ने तीन साल पहले बेस ईयर में बदलाव किया था। ऐसे में 2005-06 से लेकर 2011-12 की अवधि के आंकड़ों को नए बेस ईयर के आधार पर उसके 8-9 महीने बाद जारी कर दिया जाना चाहिए था। तरीके से इससे ज्यादा समय नहीं लगना चाहिए। फिर सरकार को तीन साल क्यों इंतजार करना पड़ा, यह काम तो काफी पहले हो जाना चाहिए था। सरकार को इतनी देर क्यों लगी, यह भी समझ से परे है। इसकी वजह से अब आंकड़ों की टाइमिंग पर राजनीति शुरू हो गई है। कोई कह रहा है कि चुनावों को देखते हुए सरकार ने ऐसा किया। यानी मामला अब राजनैतिक हो गया है, जिसकी वजह से तरह-तरह की बातें होंगी। ऐसा होना किसी भी लिहाज से सही नहीं है। आज तक आंकड़ों को लेकर इस तरह की बहस नहीं हुई है।

इस पर भी सवाल उठ रहे हैं कि अगर 2011-12 में ग्रोथ रेट 10.3 फीसदी थी, तो वह कैसे घटकर अब 8.5 फीसदी हो गई। वैसे तो सीएसओ और नीति आयोग का दावा है कि नई पद्धति के आंकड़े ज्यादा सटीक हैं। लेकिन मुझे जो बात समझ में आ रही है, वह यह है कि आंकड़ों की गणना करते वक्त केवल प्रोडक्शन को पैमाना माना गया है। सीएसओ ने प्रोडक्टिविटी को इसमें शामिल नहीं किया है, जिसकी वजह से ग्रोथ रेट में कमी आई है। अगर प्रोडक्टिविटी को भी विश्लेषण में शामिल किया जाता तो शायद ग्रोथ रेट ज्यादा होती। यानी 8.5 फीसदी की जगह आंकड़े कुछ और होते। लेकिन अपने बचाव में नीति आयोग जिस पद्धति के आधार पर सटीक आंकड़ों की बात कर रहा है, वह तकनीकी रूप से सही भी है। संयुक्त राष्ट्र के जो अंतरराष्ट्रीय मानदंड हैं, उसमें किसी भी देश को यह छूट दी गई है कि वह अकेले प्रोडक्शन के आधार पर जीडीपी आंकड़ों की गणना कर सकता है। लेकिन ऐसा करने की छूट इसलिए दी गई है कि यह माना जाएगा कि वह देश प्रोडक्टिविटी का आकलन नहीं कर सकता है। शायद सीएसओ और नीति आयोग ने भी ऐसा ही किया है। इसलिए नीति आयोग का यह दावा कि नए आंकड़े संयुक्त राष्ट्र के मानदंडों के अनुरूप हैं, बिलकुल सही है। लेकिन जब आपके पास प्रोडक्टिविटी के आंकड़े हैं और यह भी मालूम है कि उस दौर में प्रोडक्टिविटी कहीं ज्यादा थी, तो फिर उन आंकड़ों को शामिल नहीं करना सवाल खड़े करता है। इसके साथ ही मंडल कमेटी ने भी जीडीपी के आंकड़ों के लिए प्रोडक्शन और प्रोडक्टिविटी दोनों को शामिल करने की सलाह दी थी। ऐसे में उसे नजरअंदाज करने से सही तस्वीर सामने नहीं आएगी। इसकी वजह से भी शंका पैदा हो रही है।

"2010-11 में ग्रोथ रेट 10.3 फीसदी थी, तो घटकर 8.5 फीसदी कैसे हो गई? शायद सिर्फ प्रोडक्शन को आंका गया, प्रोडक्टिविटी को नहीं"

इन आंकड़ों में एक बात और कई सवाल खड़े करती है। वह यह है कि जब भी बेस ईयर में बदलाव होता है तो ग्रोथ रेट करेंट प्राइस सीरीज के आधार पर घटती है और कॉनस्टेंट प्राइस सीरीज के आधार पर बढ़ती है। पर, यहां ऐसा नहीं हुआ है। ऐसे में आंकड़ों को लेकर शक होना स्वाभाविक है। ऐसा क्यों हुआ इस बात का जवाब सीएसओ ही दे सकता है। अगर वह ऐसा नहीं करेगा, तो संदेह और बढ़ेगा।

ये सवाल भी उठ रहे हैं कि बेस ईयर में बदलाव की क्या जरूरत थी। मेरा मानना है कि ऐसा करना जरूरी है क्योंकि उस दौर से अभी तक गुड्स और सर्विसेज में कई सारे बदलाव हुए हैं। मसलन, 2008 के पहले भारत में मोबाइल की मैन्युफैक्चरिंग नहीं होती थी, लेकिन उसके बाद से होने लगी। ऐसे में हम उस बदलाव को नजरअंदाज नहीं कर सकते हैं। इसलिए समय-समय पर बेस ईयर में बदलाव तो करना ही चाहिए। लेकिन ऐसा क्यों किया जाता है, वह इसलिए होता है कि नीति-निर्धारकों को इकोनॉमी की सही तस्वीर पता चल सके, ताकि वे आगे की प्लानिंग कर सकें। अभी जिस तरह से सवाल खड़े हुए हैं, उससे तो यही लग रहा है कि हम चीन की दिशा में जा रहे हैं। चीन के आंकड़ों को दुनिया में हमेशा शक की नजर से देखा जाता है। इसलिए केवल जीडीपी आंकड़ों के आधार पर चीन के लिए कोई फैसला नहीं किया जाता। निवेशक, नीति-निर्धारक चीन के संबंध में फैसला लेते वक्त निर्यात, रेलवे सहित इकोनॉमी के दूसरे आंकड़ों पर भी नजर रखते हैं। जिस तरह से इस बार भारत के आंकड़ों को लेकर सवाल उठे हैं, उससे मुझे इस बात का डर है कि कहीं भारत की स्थिति चीन जैसी न हो जाए।

आज तक भारत के आंकड़ों पर किसी ने सवाल नहीं खड़े किए थे। लेकिन अब ऐसा होने लगा है। लोग शक करने लगे हैं कि कहीं आकड़ों में हेर-फेर तो नहीं किया गया। अगर यह शक विश्वास में बदल जाता है तो यह इकोनॉमी के लिए अच्छा नहीं होगा। चीन के आंकड़ों को लेकर जिस तरह से पूरी दुनिया में शक किया जाता है, वैसा भारत के साथ

नहीं होना चाहिए, क्योंकि अगर ऐसा होता है तो निवेश से लेकर दूसरी कई चीजों पर असर पड़ सकता है। अभी मुसीबत यह है कि पूरे मामले पर राजनैतिक रंग चढ़ गया है।

बहरहाल, नीति आयोग के शामिल होने से लोग हजार सवाल पूछेंगे। लोगों को यह शक हो रहा है कि यह असलियत बताने के लिए किया है या फिर राजनैतिक इस्तेमाल के लिए किया गया है। पूरी तरह से गलत संदेश जा रहा है। कुल मिलाकर साख पर सवाल खड़े हो रहे हैं, ऐसा कतई नहीं होना चाहिए। अभी कोई भी अपनी गलती मानने को तैयार नहीं है। लेकिन इस मामले में जल्द से जल्द स्पष्टीकरण आना चाहिए, जिससे साख बची रहे। अब यह सरकार के हाथ में है कि वह किस दिशा में आगे बढ़ती है।

(लेखक भारत सरकार में पूर्व चीफ स्टैटिशियन रह चुके हैं। यह लेख प्रशांत श्रीवास्तव से बातचीत पर आधारित है)

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