हमारे समय और समाज में तेजी से पसरता अंधेरा

अशोक वाजपेयी
निराशा में एक तरह की किंकर्तव्यविमूढ़ता का आ जाना अस्वाभाविक नहीं
निराशा में एक तरह की किंकर्तव्यविमूढ़ता का आ जाना अस्वाभाविक नहीं

अशोक वाजपेयी
लोकतंत्र इस समय एक डरी हुई व्यवस्‍था है जिसमें निडर कम हैं और उनकी आवाज लोकतांत्रिक पद्धतियों का दुरुपयोग कर दबाई जा रही

दीवाली की चकाचौंध के फौरन बाद, बल्कि तब भी लग रहा था और है कि हमारे समय और समाज में अंधेरा बढ़ रहा हैः जहां नहीं भी था वहां पहुंच रहा है। हमारे समय में बहुत सारी चीजों की गति बढ़ गई है... कई की तो इतनी तेज हो गई है कि उनसे कदम मिलाना कठिन होता है। हिंसा की, हत्या की, नफरत और अविश्वास की, झूठ और प्रपंच सबकी गति बहुत तेज हो गई हैः वे हमारे आस-पास तेजी से फैल रहे हैं। हम उनसे लगातार घिर रहे हैं। ध्यान दें तो ये सभी अंधेरे के संस्करण हैं।

अंधेरा हमारे समय में अनेक नामों, प्रकारों, संस्करणों में तेजी से बढ़ रहा है। अंधेरे के शायद इतने अच्छे दिन पहले कभी नहीं थे। हमारे देखते, न देखते अंधेरा इतना फैल जाएगा, यह हमने सोचा न था। हालांकि उसके इस कदर फैलने में हमारी बेखबरी की भी भूमिका हैः हम अपनी जिम्मेदारी से बरी नहीं हो सकते, भले हमें अपने अलावा हर और को जिम्मेदार ठहराने की आदत है। लोकतंत्र इस समय एक डरी हुई व्यवस्‍था है जिसमें निडर कम हैं और उनकी आवाज लोकतांत्रिक पद्धतियों का दुरुपयोग कर दबाई जा रही है।

यह डर अंधेरे की तरह जगह-जगह फैलाया जा रहा हैः जो अब तक डरे नहीं हैं जैसे कि सर्वोच्च न्यायालय, भारतीय रिजर्व बैंक, केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआइ) आदि उन्हें डराया जा रहा है। हर दिन नये ‘दूसरे’ बनाये जा रहे हैं, कभी जाति के, कभी धर्म के, कभी भाषा और क्षेत्र के नाम पर। जो सपने दिखाये गए थे उनमें से लगभग एक भी पूरा नहीं हुआ हैः न कालाधन वापस आया, न उसका होना रुका-थमा, बैंकों को करोड़ों की चपत लगाकर अमीर देश से भाग गए और अब तक उनका बाल भी बांका नहीं हुआ है।

पेट्रोल, डीजल, गैस, डॉलर सबके दाम बढ़ गए हैं और उनके थमने-घटने की कोई उम्मीद नहीं है। छोटे व्यापारी भयानक वित्तीय संकट भुगत रहे हैं, किसानों की आत्महत्या की दर बढ़ती गई है, दलितों और अल्पसंख्यकों के विरुद्ध हिंसा बेलगाम है। युवा लोग करोड़ों की संख्या में बेरोजगार हैं और समाज में गरीबों और अमीरों के बीच खाई और चौड़ी हो गई है। कम से कम 25 करोड़ भारतवासी गरीबी की रेखा के नीचे जीवनयापन कर रहे हैं।

शिक्षा में संकीर्ण विचारधारात्मक हस्तक्षेप बढ़ता गया है और व्यापक शिक्षक समुदाय इसे लेकर अद्‍भुत कायरता दिखाता हुआ चुप है। हर दिन शिखर से दस झूठ बोले जाते हैं और उन्हें सच मानने वाले भक्त उन्हें सच की तरह स्वीकार कर रहे हैं। हमारा राष्ट्रीय आप्‍तवाक्य बदलकर ‘असत्यमेव जयते’ हो गया है। मीडिया अधिकतर गोदी मीडिया होकर संतुष्‍ट है। सार्वजनिक संवाद अभद्र गाली-गलौज में बदल गया है। कुछ और खास नहीं बदल पाये तो नाम बदलकर राजसत्ताधारी यह झांसा देने की कोशिश कर रहे हैं कि कुछ बदल गया है।

ऐसे निराश माहौल में एक तरह की किंकर्तव्यविमूढ़ता का आ जाना अस्वाभाविक नहीं है। पर जैसा कि राममनोहर लोहिया ने दशकों पहले कहा थाः निराशा के भी कर्तव्य होते हैं। आज उनमें से कुछ का जिक्र किया जा सकता है। पहला तो यह कितना ही गाढ़ा, घना फैला अंधेरा क्यों न हो, हमें उम्मीद नहीं छोड़नी चाहिए कि रोशनी आ सकती है, आएगी। दूसरा यह कि भले निडर अल्पसंख्यक हैं और व्यापक समाज ने शायद सच की परवाह करना बंद कर दिया है, निडरों को अंतःकरण की आवाज, सच की चीत्कार उठाने-करने से बचना नहीं चाहिए। तीसरा यह कि इस समाज में, भयभीत और आतंकित समाज में यहां-वहां लोग, संस्‍थाएं और संगठन हैं जो असहमति को आकार देने में सक्रिय हैं-उनकी एक व्यापक बिरादरी बननी चाहिए।

चौथा यह कि साहित्य और कलाएं तो असहमति को हर समय चरितार्थ करती रही हैं और आज भी कर रही हैं। उनके रचयिताओं को अपने वैचारिक मतभेदों को थोड़ी देर के लिए दूर रखकर प्रतिरोध का मुखर-सक्रिय मंच बन सकना चाहिए। पांचवां यह कि किसान, आदिवासी, ‌स्त्रियां, अल्पसंख्यक तालमेल करके नये राजनैतिक विरोध का हरावल दस्ता बन जाएं। छठवां यह कि एक नए तरह की समाजनीति की शुरुआत होनी चाहिए जो पर्यावरण, नदी-जंगल, पशु-पक्षी, जीविका, परस्परता और विश्वास पर आधारित हो और जिसका लक्ष्य सत्ता पाना कतई न हो। सातवां यह कि हम उन शक्तियों की, बिना भय या प्रीति के, शिनाख्त करें जो अंधेरा फैला रही हैं। इन शिनाख्त को हर तरह से जाहिर करें ताकि व्यापक नागरिकता उन्हें पहचान सके। आठवां यह कि तेजी से फैल गए बाजारूपन, ‘हर चीज बिकाऊ है’ की मानसिकता का भी विरोध आवश्यक है। नौंवां यह कि यह गांधी का 150वां जयंती वर्ष है और इसमें हमें एक नए ढंग के सत्याग्रह की बात गंभीरता और जिम्मेदारी से सोचनी और आयोजित करनी चाहिए।

जाहिर है कि इस कर्तव्यपालन में हमें बहुत कठिनाइयां झेलनी होंगी, कई बाधाएं पेश होंगी और कई आरोप-लांछन लगेंगे। पर अगर हम स्वतंत्रता-समता-न्याय के संवैधानिक मूल्यों और भारतीयता-बहुलता की रक्षा में, भारतीय परंपरा और संस्कृति के उदात्त तत्वों के पुनर्वास में कुछ करने को सक्रिय होंगे तो यह कीमत चुकाना हमारा नागरिक के रूप में नैतिक कर्तव्य होगा। लोकतांत्रिक सत्ता, राजनीति आदि भर से नहीं, असल में तो सजग नागरिकता से चलती-बढ़ती है। इस नागरिकता पर इसरार करने का समय आ गया है।

पोलिश कवि ज्वीग्‍न्येव हेबेर्त की पंक्तियां याद आती हैंः

अगर शहर का पतन भी हो जाए

लेकिन एक कोई बचा रहे

तो वह शहर उठाए चलेगा

अपने अंदर देशनिकाले के

रास्तों पर वह शहर होगा

हम भूख का चेहरा देखते हैं

आग का चेहरा मौत का चेहरा

और सबसे बुरा-राजद्रोह का चेहरा

और हमारे सपने पर अपमानित नहीं हुए हैं

( लेखक वरिष्ठ कवि, आलोचक, स्तंभकार हैं। शहर अब भी संभावना है, दुख चिट्ठीरसा है, कविता का गल्प, पाव भर जीरे में ब्रह्मभोज उनकी चर्चित कृतियां हैं)

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