Advertisement

कर्बला और हुसैनी ब्राह्मण

एक ऐसा हिंदू समुदाय जिनके धार्मिक रीति-रिवाजों पर आज भी इस्लाम का प्रभाव है
बांग्ला उपन्यास विषाद सिंधु का अनुवाद ओशन ऑफ मेलनकोली

ये मुहर्रम के दिन हैं। हमारा दुर्भाग्य है कि यद्यपि इस देश में मुसलमान पिछले एक हजार साल से अधिक समय से रह रहे हैं लेकिन उनके पड़ोस में रहने और उनसे रोजमर्रा के कामकाज में जुड़े होने के बावजूद अधिकांश हिंदुओं को उनके रीति-रिवाजों और धर्म के बारे में कम जानकारी है। यही हाल मुसलमानों के बीच हिंदुओं के बारे में जानकारी का है। मुझे नहीं लगता कि अधिकांश हिंदुओं को यह पता है कि चंद्रमा की कलाओं पर आधारित इस्लामी पंचांग में मुहर्रम वर्ष का पहला महीना और धर्म की दृष्टि से रमजान के बाद दूसरा सबसे पवित्र महीना माना जाता है। इसके दसवें दिन सुन्नी मुसलमान उपवास करते हैं और शिया हजरत अली के पुत्र और पैगंबर हजरत मुहम्मद के नाती हुसैन की कर्बला के युद्ध में हुई शहादत का शोक मनाते हैं।

अली मुहम्मद साहब के चचेरे भाई थे। उन्हें सबसे पहले ईश्वर का दूत मानने वालों में अग्रणी थे और पैगंबर की पुत्री फातिमा के साथ विवाह के बाद उनके दामाद भी बन गए थे। उत्तराधिकार की लड़ाई में हुसैन और उनके साथ के थोड़े से साथियों ने यजीद की विशाल सेना के सामने आत्मसमर्पण करने के बजाय आत्मोत्सर्ग करना बेहतर समझा और 680 ईसवीं में वे कर्बला की लड़ाई में शहीद हो गए। इस मर्मस्पर्शी घटना ने जाने कितने लेखकों और कवियों को प्रेरित किया। हिंदी में प्रेमचंद ने भी कर्बला नामक एक नाटक लिखा। नवंबर 1931 में प्रकाशित लेख, ‘हिन्दू-मुस्लिम एकता’ में उन्होंने कहा, “शिव और राम, कृष्ण और विष्णु जैसे हमारे देवता हैं, वैसे ही मुहम्मद, अली और हुसैन आदि मुसलमानों के देवता या पूज्य पुरुष हैं। हमारे देवता जैसे त्याग, आत्मज्ञान, वीरता और संयम के लिए आदरणीय हैं, उसी भांति मुस्लिम देवता भी हैं। अगर हम श्री रामचंद्र को स्मरणीय समझते हैं तो कोई कारण नहीं कि हुसैन को उतना ही आदरणीय न समझें।”

प्रेमचंद के जमाने में हिंदू और मुस्लिम सांप्रदायिकता उग्र रूप धारण करने लगी थी। उनकी धर्मनिरपेक्षता और न्यायप्रियता को दरकिनार कर मुस्लिम सांप्रदायिक तत्वों ने इस आधार पर उनकी कड़ी आलोचना की कि हिंदू होकर वह इस्लामी कथावस्तु का इस्तेमाल कैसे कर सकते हैं। मुंशी दयानारायण निगम को 22 जुलाई, 1924 के अपने पत्र में प्रेमचंद ने बहुत पीड़ा के साथ लिखा, “अगर मुसलमानों को यह भी मंजूर नहीं कि किसी हिंदू की जुबान-ओ-कलम से उनके किसी मजहबी पेशवा या इमाम की मद्हसराई (स्तुति) भी हो तो मैं इसके लिए मुसिर (आग्रही) नहीं हूं।” यह स्थिति 1980 के दशक तक नहीं बदली और न आज तक बहुत बदली है। 1987-1988 में जब बी. आर. चोपड़ा दूरदर्शन के लिए धारावाहिक महाभारत का निर्माण कर रहे थे, तब भी इसी तरह की आलोचना की गई थी। इस बार आलोचना करने वाले हिंदू सांप्रदायिक तत्व थे। आज भी इस प्रकार की आलोचना सुनने में आ जाती है।

एक मान्यता है कि महाभारत के युद्ध के बाद द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा अरब में जाकर बस गए। जिस समय कर्बला का युद्ध हुआ, तब उस इलाके में अनेक भारतीय रहते थे और रहाब दत्त नामक एक ब्राह्मण कारोबारी का पैगंबर मुहम्मद और उनके परिवार के साथ घनिष्ठ संबंध था। कर्बला की लड़ाई में वह हुसैन के पक्ष में लड़ा और उसके सात बेटे इस युद्ध में मारे गए। हुसैन के उत्तराधिकारियों ने इस परिवार के लोगों को ‘हुसैनी ब्राह्मण’ की उपाधि दी और बहुत सम्मानित किया। उनकी सलाह पर ये बाद में भारत लौट आए और लाहौर के पास बस गए। आज भी उनके अनेक धार्मिक रीति-रिवाजों पर इस्लाम का प्रभाव देखा जा सकता है। इस तरह वे हिंदू धर्म और इस्लाम को जोड़ने वाली कड़ी के रूप में मौजूद हैं।

बांग्ला साहित्य में मीर मुशर्रफ हुसैन द्वारा लिखित उपन्यास ‘विषाद सिंधु’ का महत्वपूर्ण स्थान है। 1885 में प्रकाशित यह उपन्यास संस्कृतनिष्ठ बांग्ला भाषा में है और आधुनिक क्लासिक माना जाता है। यह कर्बला के युद्ध और अली के पुत्रों की त्रासद मृत्यु की कथा को हृदयविदारक ढंग से बयान करने वाला उपन्यास है। प्रकाशित होते ही यह इतना लोकप्रिय हो गया कि  एक वर्ष के भीतर ही इसका पांच बार पुनर्मुद्रण करना पड़ा। हाल ही में नियोगी बुक्स ने आलो शोम द्वारा किया गया इसका अंग्रेजी अनुवाद ओशन ऑफ मेलनकोली नाम से प्रकाशित किया है। इस उपन्यास के दूसरे भाग के दूसरे अध्याय में हुसैनी ब्राह्मणों का जिक्र है।

शिया-सुन्नी विवाद अपनी जगह है, लेकिन हुसैन की शहादत इतिहास में उसी प्रकार के करुण प्रसंग के रूप में अमर हो गई है जैसे ईसा मसीह का सलीब पर लटकाया जाना। दोनों ही असाधारण क्रूरता के सामने विलक्षण साहस और आत्मोत्सर्ग की अदम्य भावना के अप्रतिम उदाहरण हैं। दोनों ने ही सदियों से विश्व भर के विचारकों, दार्शनिकों, लेखकों और कवियों को प्रभावित और प्रेरित किया है। महात्मा गांधी ने हुसैन के बारे में लिखा है, “मैंने हुसैन से सीखा कि उत्पीड़ित होते हुए भी कैसे विजय प्राप्त की जा सकती है।” मुहर्रम के इन दिनों में हुसैन के जीवन से सभी सीख और प्रेरणा ले सकते हैं, चाहे वे किसी भी धर्म को मानने वाले हों। महापुरुषों से प्रेरणा लेने के लिए उन्हीं के धर्म का होना जरूरी नहीं है वरना मार्टिन लूथर किंग जूनियर और नेल्सन मंडेला जैसे अश्वेत और ईसाई धर्मावलंबी नेता महात्मा गांधी से प्रेरणा न ले पाते।

(लेखक वरिष्‍ठ पत्रकार हैं, राजनीति और कला-संस्कृति पर लिखते हैं)

Advertisement
Advertisement
Advertisement