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जम्मू में उभरे गुस्से से बदला पैंतरा

जम्मू और लद्दाख के साथ भारी मोहभंग और देश में बन रही प्रतिकूल धारणा ने भाजपा को रणनीति बदलने पर मजबूर किया
जम्मू की चिंताः 23 जून को जम्मू में रैली के दौरान भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह

भाजपा के जम्मू-कश्मीर सरकार से समर्थन वापस लेने के दो दिनों के बाद हिंदू एकता मंच ने इसे छुटकारा पाने का अच्छा कदम बताया। यह वही हिंदू एकता मंच है, जिसने कठुआ दुष्कर्म और हत्या मामले में सीबीआइ जांच की मांग के अभियान की अगुआई की थी। हिंदू एकता मंच के महासचिव कांता कुमार शर्मा ने आरोप लगाया कि पूर्व मुख्यमंत्री और पीडीपी अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती हिंदुओं की पूरी तरह अनदेखी कर मजहबी और क्षेत्र विशेष की नादिर शाह वाली तानाशाही सरकार चला रही थीं। निवर्तमान मुख्यमं‌त्री महबूबा मुफ्ती ने सीबीआइ जांच की मांग को खारिज कर दिया तो जम्मू क्षेत्र में यह धारणा बनी कि भाजपा ने पीडीपी के सामने घुटने टेक दिए हैं।

भाजपा ने पिछले विधानसभा चुनाव में जम्मू क्षेत्र की 37 विधानसभा सीटों में से 25 सीटें जीती थीं। इनमें सभी हिंदूबहुल विधानसभा सीटें हैं। भाजपा की बढ़त की बड़ी वजह यह थी कि जम्मू क्षेत्र के लोगों को (ज्यादातर हिंदू) उससे कश्मीर (मुस्लिम समझें) के जरिए अपने प्रति कथित ‘भेदभाव’ के खिलाफ खड़े होने की उम्मीद थी।

लेकिन तीन साल बाद जम्मू में धारणा बनने लगी कि भाजपा भी कांग्रेस जैसी ही है, और अपनी मुस्लिम विरोधी छवि को सुधारने के लिए पीडीपी के साथ तुष्टिकरण की राह पर है, वह भी जम्मू के हिंदुओं की कीमत पर। कठुआ दुष्कर्म और हत्या भी एकतरफा मामले के रूप में सामने आए। पूर्व नौकरशाह और स्तंभकार केबी जांदियाल ने कहा, “भाजपा ने जम्मू से जुड़े मुद्दों पर समझौता किया। भला सत्ता में रहने वाली पार्टी सीबीआइ जांच के लिए कैसे मुख्यमंत्री को राजी नहीं कर पाई, जबकि वह केंद्र में भी सत्ता में है। वे खुद को दोषमुक्त नहीं कर सकते हैं। जब मामला उबलने लगा तो वे भाग गए।”

पूर्व मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने कश्मीर को लेकर मध्य मार्ग अपनाया था। साथ ही, वे जम्मू और लद्दाख क्षेत्र के प्रति संवेदनशील भी थे। यही वजह थी कि न सिर्फ कश्मीर बल्कि राज्य के अन्य दो क्षेत्रों में भी दोनों के प्रति सम्मान था। लेकिन, महबूबा मुफ्ती और मोदी-शाह की जोड़ी का काम करने का तरीका टकराव वाला था।

मुख्यमंत्री (4 मई 2016) पद की शपथ लेने के कुछ महीने बाद ही महबूबा मुफ्ती सरकार ने श्रीनगर हवाई अड्डे के आसपास सैनिक कॉलोनी बनाने की योजना से पल्ला झाड़ लिया। राज्यपाल एनएन वोहरा ने इस योजना को मंजूरी दी थी और सिर्फ स्थायी निवासी ही राज्य में जमीन खरीद सकते हैं, तो इसमें स्पष्ट रूप से कहा गया था कि यह कॉलोनी जम्मू क्षेत्र के सेनाकर्मियों के लिए होगी।

इसके बाद घाटी में भारी हल्ला-हंगामा हुआ था और इसे घाटी में भाजपा के छिपे एजेंडे को शुरू करने के संकेत के रूप में देखा गया। यह योजना भाजपा के तरुण विजय ने बनाई थी और मुफ्ती मुहम्मद सईद इस पर राजी हो गए थे। यह पहला उदाहरण था, जब जम्मू में यह धारणा बनी कि भाजपा के राज में भी जम्मू के हिंदू ‘दूसरी श्रेणी’ के ही नागरिक बने रहेंगे।

मुफ्ती मोहम्मद सईद जम्मू क्षेत्र से जीतने वाले एकमात्र कश्मीरी नेता थे। उन्होंने 1985 में आरएस पुरा विधानसभा सीट जीती थी। दिलचस्प यह है कि उन्हें जम्मू क्षेत्र की आकांक्षाओं का ख्याल रखने वाला भी माना जाता था।

लेकिन महबूबा के मामले में ऐसा नहीं है। उन्होंने कश्मीर घाटी में नब्बे के दशक में हिंसक हालात से पीड़ितों का दुख-दर्द बांटकर अपनी सियासत को धार दी थी। हालांकि, उन्होंने जम्मू से ग्रेजुएशन की तालीम हासिल की थी। उन्हें ‘सांप्रदायिक’ भी नहीं माना जाता है, लेकिन उनका जोर कश्मीर में अपनी सियासी जमीन कायम रखने पर रहा है।

भाजपा महासचिव राम माधव ने कहा था कि जम्मू और लद्दाख क्षेत्र के साथ भेदभाव हो रहा था। तथ्यों और आंकड़ों को लेकर इस पर बहस की जा सकती है। हालांकि, पार्टी को सात जून को लद्दाख में उस वक्त पहला झटका लगा, जब लद्दाख स्वायत्त पर्वतीय विकास परिषद (एलएएचडीसी), लेह की मुख्य कार्यकारी काउंसलर सोनम दावा के निधन के बाद उपचुनाव हुआ और कांग्रेस ने भाजपा को उसमें हरा दिया। वह भी इस तथ्य के बावजूद कि भाजपा ही एलएएचडीसी चलाती है। भाजपा ने बड़े वादे कर लद्दाख संसदीय सीट जीती थी कि वह लेह को केंद्रशासित प्रदेश का दर्जा देगी। 19 मई को अपनी लेह यात्रा पर प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संबोधन में इसका जिक्र तक नहीं किया। लद्दाख अभी भी कश्मीर क्षेत्र की एक प्रशासनिक इकाई है। कश्मीर में लद्दाख को केंद्रशासित प्रदेश का दर्जा देने की कोई भी बहस क्षेत्र को बांटने के रूप में देखा जाता है। इसलिए भाजपा ने इस पर चुप रहना ही पसंद किया। लेकिन इसे लेह में हल्के में नहीं लिया गया। लेह के पत्रकार रिंचन कहते हैं, “लोगों को भाजपा से बड़ी उम्मीदें थीं, खासतौर पर केंद्रशासित प्रदेश का दर्जा को लेकर। लेकिन जब प्रधानमंत्री मोदी 19 मई को अपनी हालिया यात्रा पर इसके बारे में एक शब्द भी नहीं बोले, तो लोगों को काफी निराशा हुई।”

पीडीपी ने 2014 के विधानसभा चुनाव में जम्मू से केवल तीन विधानसभा सीटें जीती थीं-जीतने वाले तीनों मुस्लिम थे और मुस्लिमबहुल क्षेत्र से जीते थे। एक विचार यह है कि पार्टी यह मानती है कि अगर उसे जम्मू क्षेत्र के मुस्लिमबहुल विधानसभा सीटों पर पकड़ बनानी है तो उसे जम्मू क्षेत्र में मुसलमानों का रक्षक के तौर पर दिखना होगा। जम्मू के सांबा निर्वाचन क्षेत्र में एम्स बनाने के लिए चिह्नित जमीन के अधिग्रहण की प्रक्रिया अभी तक पूरी नहीं हुई है।

जम्मू में यह धारणा भी बनी कि भाजपा सत्ता में रहने के लिए हिंदूबहुल भू-भाग में एम्स जैसे प्रतिष्ठित संस्थान को राज्य में स्थापित करने में असमर्थ है। इसे जम्मू क्षेत्र के साथ ‘भेदभाव’ के बड़े प्रतीक के रूप में पेश किया गया और मामले को हिंदू बनाम मुस्लिम का रंग दे दिया गया। कठुआ मामले को हिंदू बनाम मुसलमान का रंग पहली बार संभवतः उस वक्त दिया गया, जब पीडीपी के पूर्व मंत्री, विधायक दरहल (जम्मू के राजौरी जिला) ने पीड़ित लड़की की पहचान बकरवाल के रूप में करते हुए ट्वीट किया। बहुत से लोग मानते हैं कि पहचान जाहिर करना पार्टी की इसी रणनीति का हिस्सा था। हालांकि, कुछ नेता अलग राय रखते हैं। लेकिन भाजपा सीबीआइ जांच करवाने में नाकाम रही, तो हिंदुओं ने यह आरोप लगाते हुए रसाना गांव से पलायन शुरू कर दिया कि जांच एजेंसी उन्हें प्रताड़ित कर रही है। इसका अलग ही नतीजा सामने आया। प्रदर्शनकारियों ने हीरानगर में सीबीआइ जांच की मांग करते हुए भाजपा के पूर्व मंत्री के जुलूस पर पांच मई को हमला कर दिया।

इसके महज 10 दिन बाद ही मोदी सरकार ने कश्मीर में आंतरिक युद्धविराम की घोषणा कर दी, जबकि पाकिस्तान ने जम्मू क्षेत्र में सीमाओं से सटे इलाकों में फायरिंग जारी रखी, जो एक बार फिर मौत और विध्वंस लेकर आया।

भाजपा खुद को असहज स्थिति में पा रही थी, जहां आने वाले अगले चुनाव में अपनी ही बिसात पर वह पिछड़ रही थी। बहुत से लोग मानते हैं कि इसी कारण पार्टी बीच में ही गठबंधन से अलग हो गई।

कठुआ मामले में रैली में भाग लेने के कारण बर्खास्त होने वाले भाजपा विधायक लाल सिंह कहते हैं, “महबूबा सरकार ने जम्मू में न सिर्फ सांप्रदायिक तनाव भड़काने की कोशिश की, बल्कि भेदभाव के सभी रिकॉर्ड तोड़ दिए। वे बर्बाद हो चुकी हैं और निश्चित रूप से उनकी पार्टी खत्म हो गई है।”

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