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आजादी लो, पैसा जुटाओ

नई तरह की स्वायत्तता उच्च शैक्षणिक संस्थागनों में विचार की बची-खुची जगह को नए दबावों से घेरेगी
कागजी स्वायत्तताः विश्वविद्यालय अनुदान आयोग जैसे संस्थानों के फैसलों पर स्पष्ट दिखती है सरकार की छाप

नई दिल्ली के बहादुशाह जफर मार्ग पर, जहां कुछ वर्ष पहले तक उसे पैदल पार करने के लिए एक पुल हुआ करता था, वहीं यूजीसी अर्थात विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की इमारत सड़क से थोड़ा हटकर खड़ी है। यहां से शास्‍त्री भवन की कुल दूरी लगभग चार किलोमीटर ठहरेगी। इसी भवन में कई अन्य मंत्रालयों के साथ मानव संसाधन विकास मंत्रालय स्थित है। यूजीसी और शास्‍त्री भवन के बीच का फासला पिछले दो दशकों में इतना घट गया है कि किसी भी नए निर्णय की घोषणा होने पर उसका स्रोत बताना मुश्किल होता है।

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग पर यह ऐतिहासिक और सांस्कृतिक जिम्मेदारी रही है कि वह भारत के विश्वविद्यालयों और कालेजों की स्वायत्तता की रक्षा करे। पर, आयोग की अपनी स्वायत्तता की रक्षा तो सरकार को ही करनी है। यदि आयोग के कई बड़े फैसलों पर शास्‍त्री भवन की छाया नजर आती हो तो स्वायत्तता के मूल्य की रक्षा के लिए जरूरी प्रशासनिक संतुलन के प्रति शंका उठना स्वाभाविक है। यह शंका इस समय विशेष प्रासंगिक है जब आयोग ने 62 संस्थानों को अन्य से ज्यादा स्वायत्तता देने की घोषणा की है। इस घोषणा के पेच समझना आसान नहीं है।

लोकतंत्र के ढांचे में उच्च शिक्षा की संस्थायी स्वायत्तता का विचार नया नहीं है। तार्किक दृष्टि से यह स्वाभाविक और आवश्यक भी लगता है क्योंकि उच्च शिक्षा का संबंध ज्ञान और अनुसंधान से है और इनकी बढ़त के लिए विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता उपयोगी ही नहीं, जरूरी है। अतः जिस संस्था में पढ़ाई-लिखाई और शोध किया जाना है, उसे स्वयं को इस तरह संचालित करने की छूट मिलनी चाहिए कि कोई बाहरी दबाव उसे महसूस न हो। खासकर, पैसा देने वाले का दबाव या राजनैतिक दबाव। इनमें से पहला दबाव नई आर्थिक नीति के चलते तेजी से बढ़ा है और दूसरा दबाव आजादी के एक-दो दशक बाद ही शुरू हो गया था। उच्‍च्‍ा शिक्षा की व्यवस्‍था भारी और नियमित रकम मांगती है।

लंबे समय तक यह सहमति रही कि उच्च शिक्षा के लिए पैसे का प्रबंध करना राज्य की जिम्मेदारी है। इस सहमति के पीछे यह मान्यता थी कि सार्वजनिक धन का इस्तेमाल दबाव बनाने के लिए नहीं किया जा सकता। इसी मान्यता के चलते यह नीति काम करती रही कि यूजीसी पैसा देगी, पर नियंत्रण नहीं करेगी, बल्कि नियमों के पालन की निगरानी भर करेगी। यही रिश्ता यूजीसी और मानव संसाधन मंत्रालय के बीच बना रहा। राज्यों में स्थिति कुछ अलग और कमजोर रही। ऐसे विश्वविद्यालय जिन्हें केंद्र नहीं राज्यों ने शुरू किया, राजनैतिक दबाव की चपेट में आने लगे। उनके पास केंद्रीय विश्वविद्यालयों से पैसा कहीं कम था और विद्यार्थियों की संख्या कहीं ज्यादा। इस असंतुलन के चलते उच्च शिक्षा का संकट पहले प्रांतीय विश्वविद्यालयों में प्रकट हुआ।

अब यह संकट पूरी व्यवस्‍था में फैल गया है। 1990 के दशक से जारी नई आर्थिक नीति ने उच्च शिक्षा के निजीकरण को बढ़ावा दिया। प्राइवेट विश्वविद्यालय खुलने लगे और सार्वजनिक विश्वविद्यालयों में भी ऐसे कोर्स पढ़ाए जाने लगे जिनके लिए आवश्यक पूरा पैसा छात्रों की फीस से आता था। उदारीकरण की विचारधारा पर आधारित नई आर्थिक नीति ने कई नए विमर्शों को जन्म दिया। इन विमर्शों ने नए-नए दबाव और उलझाव पैदा किए। इनमें दो बड़े विमर्श थे ‘नॉलेज इकोनॉमी’ यानी ज्ञान पर आधारित अर्थ प्रणाली और ‘वर्ल्ड क्लास’ या विश्वस्तरीय विश्वविद्यालय। एक तरफ ऐसे विचारों का प्रसार हुआ और दूसरी तरफ सरकार अपना मुंह उच्च शिक्षा से मोड़ने लगी। हजारों पद खाली रखकर अस्‍थायी और तदर्थ शिक्षकों से काम चलाने का सिलसिला शुरू हो गया। ‘वर्ल्ड क्लास’ विश्वविद्यालय बनाने के सरकारी प्रचलनों के बीच ‘ग्लोबल रैंकिंग’ में भारत की सांकेतिक उपस्थिति भर रह गई- कभी डेढ़ सौवें स्‍थान पर तो कभी चार सौ स्‍थानों के बाद।

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के नए निर्णय को इसी अंतर्विरोधी परिदृश्य में रखकर देखना जरूरी है। आयोग का फैसला चुने गए 62 संस्‍थानों को कई तरह के बंधनों और नियमों से छूट देकर बता रहा है कि अब इनकी प्रगति के रास्ते में प्रशासनिक रोड़े नहीं रहेंगे। वे नए-नए विषय और उनके पाठ्यक्रम गढ़ सकेंगे। विदेशी विश्वविद्यालयों से संबंध बना सकेंगे और पैसा जुटाने के लिए भी आजाद होंगे। सुनने में ये  बातें मधुर लगती हैं पर, मधुरता में उदारीकरण की विचारधारा की तेज गंध घुली हुई है। आयोग कह रहा है कि इन संस्‍थानों को अब घटते हुए सरकारी निवेश की उदासी सहने की जरूरत नहीं है, वे चाहें तो अतिरिक्त पैसे का जुगाड़ कर लें।

जुगाड़ के स्रोत जिन्हें सरकार लगातार सुझाती रही है मुख्यतः तीन हैं। पहला है उद्योग जगत से नाता। सरकार की अपेक्षा है कि उच्च शिक्षा के संस्थान औद्योगिक घरानों से पैसा मांगें, उनकी वैज्ञानिक और तकनीकी जरूरतों पर शोध करें और बदले में धनार्जन करें। दूसरा स्रोत है विदेशी संस्थाएं। स्वायत्तता का अर्थ है कि हमारे विश्वविद्यालय विदेशी विश्वविद्यालयों से सहयोग करें, उनके शिक्षकों को बुलाएं, अपने शिक्षकों को भेजें, अन्य देशों में अपने कैम्पस खोलें, वगैरह! तीसरा स्रोत है, छात्रों की फीस। उसे बढ़ाएं, ऐसे कोर्स चलाएं जो ज्यादा फीस के बावजूद छात्रों को आकर्षित करें। उच्च शिक्षा का यह वाणिज्य मॉडल है। जमीनी दृष्टि से देखें तो यह अब नया नहीं रहा। मेडिकल, इंजीनियरिंग, मैनेजमेंट जैसे व्यावसायिक क्षेत्रों में पिछले चार दशकों से यह मॉडल फैलता रहा है। मेडिकल और इंजीनियरिंग की शिक्षा में प्राइवेट संस्थानों की धाक के साथ-साथ मनमानी और भ्रष्टाचार की धूम मची रही है। पर, समाज में, खासकर युवाओं में, किसी बड़े विरोध के लक्षण नहीं उभरे हैं। ज्ञान-विज्ञान के अन्य क्षेत्रों में भी जबर्दस्त फीस लेने वाले प्राइवेट विश्वविद्यालय सारे देश में खुलते चले गए हैं और इन्हें भी किसी प्रकार के प्रतिरोध का सामना नहीं करना पड़ा है। इधर सरकार के पैसे से चलने वाले सार्वजनिक विश्वविद्यालयों में भी ‘सेल्फ फाइनेंसिंग’ यानी छात्रों की फीस पर निर्भर पढ़ाई का दायरा बढ़ता रहा है और कोई बड़ी उफ छात्रों की ओर से नहीं सुनाई दी है। यहां तक कि स्थायी शिक्षकों के अभाव और दैनिक वेतन पर नियुक्ति को भी विद्यार्थी जगत ने पचा लिया है। उनके किसी संगठन ने अध्यापन के अवमूल्यन पर चिंता या विरोध के लक्षणों को अभिव्यक्ति नहीं दी है। ऐसी स्थिति में सरकार का यह मान लेना चकित नहीं करता कि उच्च शिक्षा में स्वायत्तता के नाम पर बाजारीकरण की खूराक बढ़ाई जा सकती है।

स्वायत्तता आज के विशेष अर्थ में जिन 62 संस्थाओं को दी जा रही है, क्या वे उसके प्रयोग से अपनी शैक्षिक स्थिति सुधार सकेंगे। यह प्रश्न दो दिशाओं में झांकने का मौका देता है। एक दिशा है वैचारिक स्वतंत्रता की, और दूसरी अकादमिक श्रेष्ठता की। पहली दिशा आज की परिस्थिति में कोहरे से ढंकी नजर आती है। इधर के वर्षों में देश के कई विश्वविद्यालयों में वैचारिक निर्भयता पर दबाव बनाने के लिए दमन और हिंसा का सहारा लिया गया है। नई स्वायत्तता का लाभ पाने वालों में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय शामिल है। पहले भी वह कम स्वायत्त नहीं था पर, अपनी वैचारिक मर्यादा की रक्षा नहीं कर सका। उसकी गरिमा अब एक अलग तरह की स्वायत्तता पाकर बहाल हो जाएगी, यह संभावना एक कल्पना ही लगती है। ज्यादा संभावना इस बात की है कि नए प्रकार की स्वायत्तता विचार के लिए बची जगह को नई तरह के दबावों से घेरेगी। इन नए दबावों के खतरे से रक्षा करने वाला नेतृत्व कहां से आएगा।

यही प्रश्न श्रेष्ठता की तलाश पर उठाया जा सकता है। उच्‍च्‍ा शिक्षा की कौन-सी संस्‍था है जिसकी सामर्थ्य पिछले कई दशकों से चली आ रही वित्तीय तंगी और कोताही से प्रभावित नहीं हुई है? मुंबई का टाटा इंस्टीट्यूट ही लें, जो कभी समाज विज्ञान के क्षेत्र में काफी हैसियत रखता था। आज वहां के छात्र कहीं हास्टल तो कभी कमजोर निर्देशन की शिकायत लिए भटकते रहते हैं। श्रेष्ठता एक दिन में न हासिल की जा सकती है, न एक दिन में बर्बाद होती है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग को इस विषय पर आत्म-शोध करना चाहिए कि उसने अपने नियमों का शिकंजा देश भर की उच्‍च्‍ा शिक्षा पर कसकर कैसे तमाम संस्‍थानों के आत्मविश्वास को तोड़ा और उनकी छटपटाहट की उपेक्षा की। आज जब वह 62 संस्‍थाओं को एक नई तरह की स्वायत्तता देने जा रहा है तो संभव है, बाकी विश्वविद्यालय शुक्र मनाएं कि उन्हें इस नए दौर के अंतर्विरोध नहीं झेलने पड़ेंगे।

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर और एनसीईआरटी के निदेशक रह चुके हैं)

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