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भारत भूषण पुरस्कार सौम्य मालवीय को

25 मई 1987 को इलाहाबाद उत्तर प्रदेश में जन्मे सौम्य मालवीय को इश साल का प्रतिष्ठित भारत भूषण अग्रवाल...
भारत भूषण पुरस्कार सौम्य मालवीय को

25 मई 1987 को इलाहाबाद उत्तर प्रदेश में जन्मे सौम्य मालवीय को इश साल का प्रतिष्ठित भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार दिया जा रहा है। लंबे समय से हिंदी में कविताएं लिख रहे सौम्य अनुवाद में भी गहरी रुचि रखते हैं। कवि से इतर सौम्य समाजशास्त्री भी हैं। दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के समाजशास्त्र विभाग से गणितीय ज्ञान के समाजशास्त्र पर पीएचडी की डिग्री लेने वाले सौम्य की कविताओ में अनोखो बिंब ही उनकी विशेषता है। सौम्य अंग्रेजी में लगातार समाजशास्त्र गणितीय ज्ञान पर लेखन करते रहे हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय के कई महाविद्यालयों में अध्यापन के बाद, करीब दो वर्ष अहमदाबाद विश्वविद्यालय से सम्बद्ध रहे और अब मंडी, हिमाचल प्रदेश के भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान के मानविकी एवं समाज विज्ञान विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में काम कर रहे हैं।

रजा फाउंडेशन इस वर्ष का भारतभूषण पुरस्कार सौम्य मालवीय को उनके पिछले वर्ष प्रकाशित कविता संग्रह ‘घर एक नामुमकिन जगह है’ के लिए दे रहा है। यह उनका पहला कविता संग्रह है। संग्रह का चयन अष्टभुजा शुक्ल ने किया है। पुरस्कार स्वरूप उन्हें 21,000 रुपये प्रदान किए जाएंगे।

गणित में आधुनिकता के विषय पर जारी शोध के अलावा, सौम्य हिंदी साहित्य के समाजेतिहास पर एक और शोध योजना के तहत गजानन माधव मुक्तिबोध के टेक्स्ट ‘एक साहित्यिक की डायरी’ का अंग्रेजी में अनुवाद कर रहे हैं। साथ ही वे मुक्तिबोध की ही ऐंथ्रोपोलॉजिकल जीवनी की रूपरेखा पर भी काम कर रहे हैं।

श्री अष्टभुजा शुक्ल अपने निर्णय में लिखते है, “सौम्य की कविताओं के युवकोचित संवेदन और अभिव्यक्ति रूपों की ऐसी विकलता है, जिसके लिए वे जरूरत भर कविता के शिल्प और उसकी भाषा की वल्गा को तानते या मुक्त करते रहते हैं। इसीलिए वे कविता की कोई नियत पद्धति या ठौर-ठिकाना तय करने से सतत असहमत हैं। बल्कि इस विलोम के बावजूद वे किसी विलोमवादी छवि के कवि नहीं। आज के उन्मादी उच्चाटन अथवा स्तुतिनम्र युवा कविता से अलग संवाद करने को उद्विग्र इस संग्रह की कविताएं संस्कृति के स्कंध पर चढ़ी हिंसकता से हिले कवि की भाषा को कभी तिर्यक तो कभी मुक्तिबोधी चेतना के साथ पाठक से रूबरू होना चाहती हैं। बेआवाज बारिश को, दोस्त की शक्ल को, सूरज को चखने और चांद के उतरने को, एक बच्चे की आंख से कविता को पढ़ने के लिए समुत्सुक आज की कविता को अपनी उपस्थिति से उकसाने वाले सौम्य को शुभकामनाएं। इस उम्मीद के साथ कि वे आगे चलकर अपनी अभिव्यक्ति के इस बिखराव को और सघन और पुंजीभूत करने की कोशिश निरंतर जारी रख सकेंगे।”

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