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हाथरस तो सिर्फ एक, पिछले कुछ साल में दलित नारी उत्पीड़न में यूपी अव्वल

उत्तर प्रदेश के हाथरस में दलित बच्ची के साथ दोहरी हिंसा से पूरा देश सन्न है। उसके साथ कथित तौर पर...
हाथरस तो सिर्फ एक, पिछले कुछ साल में दलित नारी उत्पीड़न में यूपी अव्वल

उत्तर प्रदेश के हाथरस में दलित बच्ची के साथ दोहरी हिंसा से पूरा देश सन्न है। उसके साथ कथित तौर पर सामूहिक बलात्कार और बर्बर हिंसा जिन अपराधियों ने की, उसके बाद पुलिस-प्रशासन ने जो किया, वह भला किस मायने में कम कहा जा सकता है। यह तो पहली बार सुना जा रहा है कि जिस परिवार की बच्ची मरी और जिसे अंतिम संस्कार भी नहीं करने दिया गया, उसी का नार्को टेस्ट हो रहा है। इससे क्या निष्कर्ष निकल रहा है?पुलिस-प्रशासन का अपराध इसलिए बड़ा हो जाता है क्योंकि उस पर संवैधानिक दायित्वों को पूरा करने की जिम्मेदारी होती है। इसलिए यह बेशक बड़े राजनैतिक विमर्श का मामला बनता है। क्या यह सवाल नहीं पूछा जाना चाहिए कि ऐसा क्यों हो रहा है, क्यों दलितों के खिलाफ उत्पीड़न के मामले कम नहीं हो पा रहे हैं? 

हाल में आए राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के मुताबिक पिछले एक दशक में दलितों के खिलाफ मामलों में लगभग 37 फीसदी का इजाफा हुआ है। महिलाओं के खिलाफ अपराधों में पिछले एक दशक में 86 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। इसी अवधि में बलात्कार की वारदातें 50 फीसदी बढ़ गई हैं। इन्हीं आंकड़ों के हिसाब से 2019 में दलितों के खिलाफ अपराध में उत्तर प्रदेश 11, 829 वारदातों के साथ सबसे ऊपर था। उसके बाद राजस्थान में 6,794 वारदातें और बिहार में 6,544 वारदातें दर्ज हुईं। पिछले कुछ साल में उत्तर प्रदेश और राजस्थान इन अपराधों के मामलों में सबसे ऊपर बने रहे हैं। 2017 और 2018 में उत्तर प्रदेश में क्रमश: 11,924 और 11,444 मामले दर्ज हुए, जबकि राजस्थान में 4,607 और 4,238 मामले दर्ज हुए। बाकी राज्यों में भी दलित और महिला उत्पीडऩ के मामले भी बढ़े हैं। एनसीआरबी के 2019 के आंकड़ों के मुताबिक उत्तर प्रदेश और राजस्थान के बाद मध्य प्रदेश और बिहार का नंबर है, जहां क्रमश: 46.7 फीसदी और 39.5 फीसदी मामले दर्ज किए गए हैं। 

लेकिन इन मामलों में सजा की दर बेहद मामूली 2.5 फीसदी ही है। हालात ये हैं कि पिछले साल देश में हर रोज दलित महिलाओं के साथ बलात्कार के औसतन 10 मामले दर्ज हुए हैं। राजस्थान में सबसे ज्यादा 554 मामले जबकि उत्तर प्रदेश में 537 और मध्य प्रदेश में 510 मामले दर्ज हुए हैं। जाहिर है, ये आंकड़े खुद-ब-खुद भयावह तस्वीर की ओर इशारा करते हैं। 

दिसंबर 2012 में दिल्ली में हुए निर्भया कांड के बाद कानून सख्त किए गए, उसके बाद भी उसमें संशोधन करके उसे और सख्त बनाया गया। लेकिन उससे मामले रुके नहीं, बढ़ते ही गए। इसका अर्थ तो यही है कि सिर्फ कानून पर्याप्त नहीं है। इसके साथ सामाजिक-राजनैतिक माहौल नहीं बदलेगा तो इसमें फर्क आने वाला नहीं है। इसलिए सरकार और प्रशासन की जिम्मेदारी बढ़ जाती है। बेशक, इसमें जातियों और जातिगत दबंगई का भी मामला है। यह आरोप भी हवा में उड़ा देने लायक नहीं है कि एक खास किस्म की जातिगत रंजिश सत्ता परिवर्तन के साथ उभर कर आ जाती है। आप याद करें कि मौजूदा सरकार के सत्ता में आते ही राज्य में कई जगहों से जातिगत टकराव की खबरें आने लगी थीं। सबसे चर्चित मामला सहारनपुर का है, जिससे चंद्रशेखर रावण की भीम आर्मी सुर्खियों में आ गई। फिर चंद्रशेखर को राज्य सरकार ने एनएसए और तमाम धाराएं लगाकर जेल भेज दिया, जिससे उनके प्रति एक तरह की सहानुभूति उपजी और वे नेता बनकर उभरे। अब तो उनकी अपनी राजनैतिक पार्टी भी है, जो बिहार विधानसभा चुनावों में भी अपना भाग्य आजमाने जा रही है। 

बेशक, यह सकारात्मक पहलू कहा जा सकता है। इसमें भी दो राय नहीं कि चंद्रशेखर की राजनीति का दावा संवैधानिक मूल्यों को आगे बढ़ाने का है और उसका स्वागत होना चाहिए। लेकिन असली सवाल यह है कि जातिगत टकराव से देश की मुकम्मल राजनीति नहीं उभरेगी। उत्तर प्रदेश सरकार का कुल रुख इन जाति या मजहबी टकरावों को मिटाने के लिए मरहम लगाने का नहीं लगता है। अब तक उसने न सिर्फ अल्पसंख्यकों के मन में भय पैदा किया है, बल्कि जातिगत टकरावों को भी मिटाने के उसके कम ही प्रयास दिखे हैं। 

सिर्फ ‘ठोक दो’ की नीति से न अपराध कम होंगे, न ही समाज को एकजुट करके विकास के रास्ते पर ले जाने की राजनीति की राह प्रशस्त होगी। यह भी देखना लाजिमी है कि खासकर उत्तर प्रदेश में सत्ता परिवर्तन से कैसे अलग-अलग जातिगत दरारें चौड़ी हो जाती हैं। बसपा और सपा के राज्य में कुछ अलग तरह की जातियों के दबदबे के आरोप उछले थे, तो अब भाजपा के राज में अलग तरह की दबंगई उभर रही है। इसलिए उत्तर प्रदेश सरकार को सोचना चाहिए कि पुलिसिया डंडे के जोर से विपक्षी पार्टियों और मीडिया को सुर्खियां बनाने से तो रोका जा सकता है लेकिन दलित और महिलाओं को अपराधों से नहीं बचाया जा सकता। फिर, हाथरस में तो अपराधियों को बचाने और अपराध पर पर्दा डालने के ही आरोप उछले हैं।

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