पद्मश्री प्रो. रवींद्र कुमार सिन्हा

गंगा डॉलफिन का रक्षक एक अथक सेनानी

प्रो. रवींद्र कुमार सिन्हा नालंदा ओपन यूनिवर्सिटी, पटना के कुलपति हैं। मगर यह उनका अधूरा परिचय है। दरअसल प्रो. सिन्‍हा की असली पहचान गंगा में पाई जाने वाली डॉल्फिन मछलियों से जुड़ी है। बतौर पर्यावरण एवं वन्‍यप्राणी संरक्षण विशेषज्ञ उन्‍होंने अपनी पूरी जिंदगी गंगा डाल्फिन के संरक्षण के प्रयासों को अमली जामा पहनाने में गुजारी है। पढ़ाई के बाद पटना यूनिवर्सिटी के प्रा‌िणशास्‍त्र विभाग में पहले व्‍याख्‍याता और फि‍र प्रोफेसर के रूप में नौकरी करने के दौरान उन्‍हें गंगा डॉल्फिन संरक्षण के कार्य से जुड़ने का मौका मिला।

इस कार्य में उनकी दक्षता और अनुभव को देखते हुए बाद में इससे संबंधित अधिकांश कमेटियों और परियोजनाओं में उन्‍हें अनिवार्य रूप से शामिल किया जाने लगा। आज प्रो. सिन्‍हा बिहार में गंगा डॉलफिन संरक्षण के जैसे पर्याय बन गए हैं। गंगा संरक्षण कार्य के लिए भारत सरकार से पद्मश्री सम्‍मान पाने वाले प्रो. सिन्‍हा को नीदरलैंड का सर्वोच्‍च सम्‍मान भी हासिल हो चुका है। इसके अलावा उनके जीवन पर अंग्रेजी और फ्रेंच भाषाओं में दो डॉक्‍युमेंट्री भी बनाई जा चुकी हैं। हालांकि एक बेहद साधारण किसान परिवार से आने वाले प्रो. सिन्‍हा के लिए यह सब इतना आसान नहीं था। रवींद्र कुमार सिन्‍हा का जन्म बिहार के जहानाबाद ज़िले के मखदुमपुर प्रखंड की मखदुमपुर नगर पंचायत में स्थित केओटार गांव के एक साधारण किसान परिवार में एक जुलाई, 1954 को हुआ था। उनकी माता गौरी देवी एवं पिता राम दहिन सिंह पढ़े-लिखे नहीं थे। पिता के हिस्‍से में केवल चार एकड़ जमीन थी जिसकी खेती के दम पर वे अपनी एक पुत्री और चार पुत्रों का पालन कर रहे थे। आर्थिक विपन्‍नता के बावजूद उन्‍होंने बच्‍चों की पढ़ाई से कोई समझौता नहीं किया। रवींद्र सभी बच्‍चों में सबसे छोटे थे। उनके दो भाई रेलवे में कर्मचारी जबकि तीसरे भाई शिक्षक थे। माता-पिता गरीब जरूर थे मगर उन्‍होंने अपने बच्‍चों को पारिवारिक मूल्‍याें एवं सामाजिक मान्‍यताओं की उचित शिक्षा दी थी। रवींद्र करीब 9 वर्ष की उम्र में अपनी दादी के अंतिम संस्‍कार में शामिल होने पटना के बांस घाट आए थे जहां उन्‍होंने पहली बार गंगा डॉलफिन को देखा था जिसे लोग सूँस मछली भी कहते हैं।

रवींद्र कुमार की तीसरी कक्षा तक की शिक्षा गांव में ही हुई और उसके बाद सातवीं तक की पढ़ाई उन्‍होंने मध्‍य विद्यालय मखदुमपुर और फि‍र 12वीं तक की पढ़ाई उच्‍चतर माध्‍यमिक विद्यालय मखदुमपुर से पूरी की। तब बिहार विद्यालय परीक्षा समिति द्वारा आयोजित उच्चतर माध्यमिक परीक्षा 1970 में अपने स्‍कूल से प्रथम श्रेणी लाने वाले वे एकमात्र विद्यार्थी थे। इसके बाद बी.एससी पार्ट वन की पढ़ाई उन्‍होंने बी.एन. कॉलेज पटना से जबकि बी.एससी (ऑनर्स) की शिक्षा प्रा‌िण विज्ञान विषय के साथ 1973 में पटना साइंस कॉलेज से पूरी की। ऑनर्स में उन्‍हें पूरी यूनिवर्सिटी में चौथा स्‍थान मिला। इसके बाद उन्होंने पटना यूनिवर्सिटी से ही प्रा‌िण विज्ञान में एम.एससी की। उनका बैच 1973-75 का था मगर देश में जयप्रकाश आंदोलन चल रहा था जिसके कारण स्‍नातकोत्‍तर का उनका रिजल्‍ट 1977 में आया। उनकी शैक्षणिक प्रतिभा का प्रदर्शन इसमें भी जारी रहा और उन्‍होंने यूनिवर्सिटी में तीसरा स्‍थान हासिल किया। एम.एससी का परिणाम आने के कुछ समय बाद ही 30 मार्च, 1978 को उन्‍हें मुरारका कॉलेज सुल्तानगंज में प्रा‌िणशास्‍त्र के व्याख्याता के रूप में नौकरी मिली। हालांकि कुछ ही महीने बाद उनका स्थानांतरण आर डी एंड डी जे कॉलेज मुंगेर में कर दिया गया। इस बीच 6 जून, 1978 को उनकी शादी भी हो गई। शादी के एक साल के अंदर उनका चयन पटना विश्वविद्यालय में प्रा‌िणशास्‍त्र के व्याख्याता के लिए हो गया और उन्‍होंने पटना साइंस कॉलेज में 17 अप्रैल, 1979 को पदभार ग्रहण कर लिया। इसके बाद रवींद्र कुमार सिन्‍हा ने फैसला कर लिया कि वे अपनी पीएचडी. भी पर्यावरण एवं वन्यप्राणी संरक्षण के क्षेत्र में करेंगे।

उन्‍होंने पीएचडी. थीसिस के लिए गंगा नदी से संबंधित विषय चुना। इसी शोध के दौरान उन्‍हें गंगा डॉलफिन के बारे में कई नई जानकारियां मिलीं। जब वे गंगा में डॉलफिन की संख्या कम होने के कारणों की तह में गए तब पता चला कि दरअसल मछुआरे डॉलफिन की हत्या कर उसके शरीर से तेल निकालते हैं और उस तेल का इस्‍तेमाल दो अन्‍य प्रजाति की मछलियों को पकड़ने में किया जाता था। उनके लिए यह बिलकुल नई जानकारी थी। इसके बाद पटना यूनिवर्सिटी के कुलपति के आदेश पर उन्‍होंने 1983 में गंगा नदी के बारे में एक इंटरडिसिप्लिनरी शोध प्रस्ताव बना कर उनके समक्ष रखा जिसे केंद्रीय योजना आयोग को भेजा गया। इसके बाद 1985 में भारत सरकार के पर्यावरण एवं वन मंत्रालय के तीन विशेषज्ञों की एक टीम पटना यूनिवर्सिटी में इस शोध प्रस्ताव पर विचार-विमर्श के लिए आई। इस मीटिंग में विशेषज्ञों, कुलपति एवं अन्य सभी विभागाध्यक्षों, प्राचार्यों के समक्ष रवींद्र सिन्‍हा ने अपने शोध प्रस्ताव पर एक प्रेजेंटेशन दिया। केंद्रीय टीम इससे इतनी प्रभावित हुई कि इस प्रेजेंटेशन के सिर्फ दो सप्‍ताह बाद 19 मार्च, 1985 को तीन वर्ष के लिए उनकी शोध परियोजना को स्वीकृति मिल गई। तब इस परियोजना का कुल बजट 19 लाख रुपये के करीब था जो बाद में 28 लाख से अधिक हो गया। इस परियोजना में पटना यूनिवर्सिटी के केवल चार विभागों-प्रा‌िणशास्‍त्र, वनस्पति शास्‍त्र, रसायन शास्‍त्र एवं भूगर्भ शास्‍त्र को शामिल किया गया।

यह प्रो. सिन्‍हा के जीवन की बहुत बड़ी उपलब्धि थी। इस शोध परियोजना के तहत गंगा जल की भौतिक-रासायनिक गुणवत्ता, गंगा नदी एवं गंगा के किनारे की जैव विविधता, गंगा का भूगर्भीय अध्ययन तथा गंगा नदी में भारी धातु पर शोध शामिल था। परियोजना के तीन साल पूरे होने पर 1988 में फाइनल टेक्निकल रिपोर्ट पेश की गई जिसमें प्रो. सिन्‍हा ने अन्य विषयों के अलावा गंगा डॉलफिन पर आधारित सभी प्रकार की सूचनाओं एवं तस्‍वीरों को भी शामिल किया।

उन दिनों गंगा प्रोजेक्ट डायरेक्टोरेट के डायरेक्टर डॉ. एम. के. रणजीत सिंह थे जिन्‍हें वन्य प्राणियों से काफी लगाव था। उन्‍होंने प्रो. सिन्‍हा से डॉलफिन कंज़र्वेशन प्रोजेक्ट विकसित करने का अनुरोध किया। प्रो. सिन्‍हा ने यह गंगा प्रोजेक्‍ट विकसित कर जल्‍द ही गंगा प्रोजेक्ट डायरेक्टोरेट, भारत सरकार, नई दिल्ली को भेज दिया। 1991 में उनकी इस परियोजना को भी केंद्र सरकार की मंजूरी मिल गई और काम शुरू हो गया। प्रो. सिन्‍हा ने इस दौरान गंगा डॉलफिन पर इतना शोध किया कि विदेशी विशेषज्ञ भी उनके साथ काम करने लगे थे। 1992 से 1995 तक जापान की एहिमे यूनिवर्सिटी के प्रो. आर. तत्सुकावा ने प्रो. सिन्‍हा के साथ मिलकर गंगा डॉलफिन के शरीर में भारी धातु एवं अन्य प्रकार की क्लोरीनेटेड कीटनाशक दवाओं की मात्रा और इनसे होने वाली बीमारियों के बारे में शोध किया। अन्तरराष्ट्रीय संस्था, अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ के चेयरमैन डॉ. स्टेफेन लेडरवुड ने प्रोफेसर सिन्‍हा के कार्य से प्रभावित होकर उन्‍हें सिटैसिअन स्पेशलिस्ट ग्रुप का सदस्‍य बनाया। इस समूह द्वारा एशियाई नदियों में डॉलफिन के संरक्षण की योजना बनाई गई और इसके लिए गठित कमेटी में भी उन्‍हें शामिल किया गया।

1990 के पूरे दशक में उन्‍होंने विदेशी विशेषज्ञों के साथ मिलकर बहुत-सा शोध कार्य किया। अगस्त 1994 में उन्‍हें यूनिवर्सिटी ऑफ़ मेनचेस्टर, इंग्लैंड में आयोजित अंतरराष्ट्रीय कांग्रेस ऑफ़ इकोलॉजी में दो व्याख्यान-गंगा डॉलफिन एवं गंगा कार्य योजना के ऊपर देने के लिए आमंत्रित किया गया। गंगा डॉलफिन के ऊपर किए गए उनके काम की गुणवत्ता और महत्व को देखते हुए अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ के सिटैसिअन स्पेशलिस्ट ग्रुप ने 1994 में प्रकाशित कंज़र्वेशन एेक्शन प्लान में पटना विश्वविद्यालय के प्रा‌िणशास्‍त्र विभाग में गंगा डॉलफिन के लिए एक रिसर्च केंद्र बनाने के लिए प्रस्ताव शामिल किया। 1995 में डॉ. सैयद जहूर क़ासिम के नेतृत्‍व में योजना आयोग की एकटीम ने फैसला लिया कि पटना विश्वविद्यालय में डॉलफिन रिसर्च केंद्र की स्थापना की जाए। इस समय तक प्रो. सिन्‍हा डॉलफिन संरक्षण को लेकर पूरी दुनिया में प्रसिद्ध हो चुके थे और विदेशी पत्रकार उनकी जिंदगी में द‍िलचस्‍पी लेने लगे थे। फ्रांस के एक बड़े पत्रकार क्रिस्चियन गैलिसिआन 1995 से लेकर 2007 तक लगातार हर वर्ष कुछ समय उनके साथ गुजारकर उनके कामों को शूट करते रहे और 2008 में उन्होंने दो डॉक्यूमेंट्री फिल्म-एक इंग्लिश में 52 मिनट की ‘मिस्टर डॉलफिन सिन्हा-थिंक ग्लोबली एेंड एेक्ट लोकली’ और दूसरी फ्रेंच भाषा में 26 मिनट की ‘अलर्ट ऑन द गंगेज़’ रिलीज़ की।

वैसे इन दोनों डॉक्‍युमेंट्री की रिलीज से पहले जनवरी, 1996 में उन्‍हें विश्व की पहली बायोलॉजिकल सोसाइटी (1788 में स्थापित)-लिनियन सोसाइटी ऑफ़ लंदन का फेलो चुना गया। यह सम्‍मान पाने वाले वे भारत से 16वें और बिहार से पहले वैज्ञानिक थे। फरवरी 1997 में उन्हें बांग्लादेश में आयोजित द्वितीय एशियाई रिवर डॉलफिन समिति का चेयरमैन चुना गया। यह सम्‍मान हासिल करने वाले वे पहले भारतीय थे। जुलाई 1999 में गंगा डॉलफिन और गंगा की जैवविविधता के लिए किए गए उनके कार्यों को देखते हुए उन्हें नीदरलैंड्स के हिज रॉयल हाइनेस प्रिंस बर्नहार्ड द्वारा देश के सर्वश्रेष्ठ सम्‍मान ‘द आर्डर ऑफ़ द गोल्डन आर्क’ से सम्मानित किया गया। यह सम्‍मान हासिल करने वाले वे 12वें भारतीय हैं जबकि भारत के पहले यूनिवर्सिटी शिक्षक हैं। वर्ष 2000 में उन्‍हें नेशनल अकादमी ऑफ़ साइंसेज इंडिया की 70वीं वार्षिक जयंती के अवसर पर बेस्ट रिसर्च पेपर प्रेजेंटेशन के लिए अकादमी के बायोलॉजिकल साइंसेज का स्वर्ण जयंती पुरस्कार दिया गया। गंगा डॉलफिन संरक्षण के हित में उनके द्वारा किया गया सबसे अहम कार्य 2009 में तत्‍कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के द्वारा गंगा डॉलफिन को राष्‍ट्रीय जलीय जंतु घोषित करवाना था। इसके अलावा तत्‍कालीन पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश और बाद में केंद्रीय योजना आयोग के जरिये उन्‍होंने पटना में एक राष्‍ट्रीय डॉलफिन रिसर्च केंद्र खुलवाने का अनुरोध किया और इसके लिए विस्‍तृत प्रस्‍ताव भी बनाकर केंद्र सरकार को भेजा। 2013 में इस प्रस्‍ताव को मंजूरी मिल गई और अब उम्‍मीद है कि वर्ष 2019 में इस केंद्र का उद्‍घाटन हो जाएगा। सितंबर 2011 में टाइम्‍स नाउ टीवी चैनल ने उन्‍हें अमेजिंग इंडियन का खिताब दिया तो 2013 में सीएनएन टीवी चैनल ने उन्‍हें पॉजिटिव इंडियन का सम्‍मान दिया। 2013 में ही
उन्‍हें तीन महीने के लिए विजिटिंग प्रोफेसर के रूप में
स्‍टेट यूनिवर्सिटी ऑफ न्‍यूयॉर्क जाने का मौका मिला।
उन्‍होंने अमेरिका की कई यूनिवर्सिटीज में व्‍याख्‍यान दिए हैं। केंद्र सरकार ने उनकी सेवाओं को देखते हुए 2016 में उन्‍हें देश के चौथे सबसे बड़े नागरिक सम्‍मान पद्मश्री से सम्‍मानित किया। 2017 में बिहार के राज्‍यपाल ने उनकी नियुक्ति नालंदा ओपन यूनिवर्सिटी के कुलपत‍ि के रूप
में की। फ‍िलहाल प्रो. सिन्‍हा इसी पद पर अपनी सेवाएं
दे रहे हैं।