एम.के. झा

लगी-लगाई नौकरी छोड़ शिक्षा की अलख जगाने वाला गणितज्ञ

एम.के. झा का नाम बिहार के शिक्षा जगत में आदर से लिया जाता है क्‍योंकि उन्‍होंने रेलवे की सुरक्षित और स्‍थायी नौकरी छोड़कर नई पीढ़ी को गणित सिखाने में अपनी सारी ऊर्जा लगा दी। पटना के झा क्‍लासेस केंद्र में उनकी लगन और मेहनत के कारण आज 5,000 से अधिक बच्‍चे प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में लगे हैं। झा को दिसम्बर 2018 में पटना में आउटलुक द्वारा आयोजित “आइकॉन्स ऑफ़ बिहार” के सम्मान से नवाज़ा जा चुका है। बिहार के मधुबनी जिले के शाहपुर में मई, 1970 में जन्मे एम.के. झा का नाम गणित की दुनिया में किसी परिचय का मोहताज नहीं है

पटना के नया टोला में झा क्लासेस के नाम से गणित का ट्‍यूटोरियल केंद्र चलाने वाले मनोज कुमार झा बचपन से ही प्रतिभाशाली छात्र थे। उनके पिता ताराकांत झा चाहते थे कि बेटा ऊंची तालीम लेकर बड़ा सरकारी अधिकारी बने। उनके बिहार के मैथिल ब्राह्मणों के परिवार से आने के कारण यह एक सहज और स्‍वाभाविक आकांक्षा थी, क्‍योंकि बिहार के मिथिलांचल में आमतौर पर प्रशासनिक सेवाओं या बैंक की नौकरियों का बड़ा क्रेज है। ताराकांत झा खुद एक व्‍यवसायी थे मगर अपने समाज के अन्‍य लोगों की तरह उनकी यही इच्‍छा थी कि उनका बेटा सरकारी अधिकारी बने। मगर मनोज के दिमाग में तो कुछ और ही चल रहा था। दरअसल मनोज आरंभ से ही शिक्षक बनना चाहते थे और छात्रों को गणित की शिक्षा देना चाहते थे। उनके एक प्रतिष्ठित शिक्षाविद् बनने की यात्रा की शुरुआत स्‍कूली जीवन से ही हो गई थी। उन्‍होंने बोकारो (अब झारखंड) के पास चास स्थित आदर्श मध्‍य विद्यालय से आठवीं कक्षा तक की शिक्षा ग्रहण की और चास के ही रामरुध उच्‍च विद्यालय से 1984 में मैट्रिक की परीक्षा पास की। इंटरमीडिएट में साइंस की पढ़ाई करने के लिए उन्‍होंने रांची यूनिवर्सिटी के मारवाड़ी कॉलेज का रुख किया। इसके बाद उन्‍होंने रांची कॉलेज से 1989 में स्‍नातक की डिग्री हासिल की। रांची विश्वविद्यालय के उनके कई साथी उनकी प्रतिभा के कायल रहे हैं और उनका कहना है कि गणित में झा की पकड़ उन्‍हें दूसरों से अलग करती थी। तब भी उनकी इच्‍छा यही थी कि अपना गणित का यह ज्ञान वे दूसरों में बांटें। अपनी पढ़ाई के दिनों में वे गरीब बच्‍चों को मुफ्त में पढ़ाया करते थे। अस्सी के दशक का यह जुनून अब भी बरकरार है और आज भी फीस देने में अक्षम छात्र उनके कोचिंग संस्‍थान में मुफ्त में शिक्षा ग्रहण करते हैं।

लेकिन कोचिंग संस्‍थान शुरू करने की यात्रा आसान नहीं थी। पिता तथा परिवार के अन्‍य सदस्‍यों के दबाव में मनोज झा ने नब्बे के दशक में पटना के महेंद्रू में रहकर बैंक के प्रोबेशनरी अधिकारी, स्‍टाफ सलेक्‍शन कमीशन तथा रेलवे की नौकरियों की तैयारी शुरू कर दी। मनोज प्रतिभाशाली तो थे ही इसलिए रेलवे में उन्‍हें एएसएम की नौकरी जल्‍द ही मिल गई। मगर वे नौकरी के लिए बने ही नहीं थे इसलिए उन्‍होंने नौकरी छोड़ दी। नौकरी छोड़ने के बाद एक बार फिर उनपर परिवार का दबाव पड़ा और इस दबाव में आकर उन्‍होंने पटना के ललितनारायण मिश्र इंस्‍टीट्‍यूट ऑफ बिजनेस मैनेजमेंट से एमबीए पाठ्‍यक्रम के लिए आवेदन कर प्रवेश परीक्षा पास की। लेकिन इसके बाद उन्‍होंने अपने मन को मजबूत कर लिया और किसी भी दबाव में आने से इनकार कर दिया। उन्‍होंने एमबीए कोर्स में दाखिला नहीं लिया और शिक्षण को अपना पेशा बनाने की घोषणा कर दी। 1995 में, उन्होंने परिवार के ही कुछ छात्रों को अंग्रेजी और गणित पढ़ाना शुरू कर दिया। उनके द्वारा शिक्षा पाए ये छात्र कुछ समय बाद बैंक, एलआईसी और रेलवे की अलग-अलग परीक्षाओं में चुन लिए गए। इस वक्त से मनोज को और प्रोत्‍साहन मिला और 1996 में पटना के महेंद्रू इलाके में उन्‍होंने अपना कोचिंग संस्‍थान शुरू कर दिया।

दो साल बाद यानी 1998 में उन्हें पटना के ही करतार कोचिंग में पढ़ाने का प्रस्ताव मिला, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया। सन् 2000 में उन्‍होंने अपने कोचिंग संस्‍थान को महेंद्रू से पटना के गोपाल मार्केट में स्‍थानांतरित कर लिया। इसके बाद 2011 तक यह संस्‍थान यहीं से संचालित होता रहा। एम.के. झा ने अपने संस्‍थान को पहचान दिलाने के लिए दिन-रात मेहनत की। उन्होंने आधी रात को भी छात्रों को पढ़ाया।
इस समय तक उन्‍हें यह महससू होने लगा कि करतार क्‍लासेस और अपने कोचिंग संस्थान के लिए वे एक साथ समय नहीं निकाल पाएंगे। इसलिए 2012 में कोचिंग संस्‍थान को छोड़ दिया और अपने संस्थान पर ध्यान केंद्रित किया। उन्‍होंने अपने संस्‍थान को झा क्‍लासेस का नाम दिया। इस समय तक पटना में गणित के शिक्षक के रूप में मनोज कुमार झा का नाम पूरी तरह स्‍थापित हो चुका था। उनकी प्रसिद्धि बिहार के दूसरे जिलों यहां तक कि पड़ोसी राज्य झारखंड तक फैल चुकी थी। नब्बे के दशक में अपने परिवार के केवल चार छात्रों के साथ शिक्षण शुरू करने वाले झा ने जब औपचारिक रूप से कोचिंग का पहला बैच शुरू किया, तो उनके पास 50 छात्र थे। आज झा क्‍लासेस में छात्रों की संख्या 5,000 से अधिक हो चुकी है। छात्रों की यह बढ़ती संख्या न केवल इस तथ्य की ओर इंगित करती है कि इस संस्थान के छात्र एम.के. झा के शिक्षण से प्रभावित हैं, बल्कि यह भी कि यह संस्थान वास्तव में अपने छात्रों की देखभाल करता है और उन्हें अपने कॅरिअर के निर्माण में उचित मार्गदर्शन देता है।

झा की पत्‍नी बबीता झा इस सफलता का श्रेय अपने पति के गणित ज्ञान के साथ-साथ उनके जीवन के दो गुणों को देती हैं। वे कहती हैं कि मनोज अपने जीवन में अनुशासन और समय के उचित उपयोग का कठोरता से पालन करते हैं। इसी अनुशासन की बदौलत वे राज्‍य के सफलतम शिक्षकों में हैं। बबीता मनोज झा का परिवार संभालने के साथ-साथ झा क्‍लासेस का प्रबंधन भी संभालती हैं। उनके अनुसार, “हमारे बेहतर प्रबंधन और गुणवत्तापूर्ण शिक्षण ने हमारे संस्थान और खुद एम.के. झा को कई पुरस्कार दिलाए हैं। इसका श्रेय हमारे छात्रों को भी जाता है, जिन्होंने अपनी पढ़ाई के लिए खुद को समर्पित किया और अपने कॅरिअर को एक आकार दिया। इसने हमारे संस्थान को प्रसिद्धि दिलाई।” एम.के.झा अब छात्रों की एक और मदद करने जा रहे हैं। इस बारे में वे खुद बताते हैं, “बैंकों, एसएससी और रेलवे की तैयारी को ध्यान में रखते हुए मैंने हाल ही में ‘ऑब्जेक्टिव अर्थमेटिक’ नामक एक पुस्तक लिखी है जिसे दिल्‍ली के मशहूर प्रकाशन समूह विली द्वारा प्रकाशित किया जाएगा। यह किताब छात्रों की मदद के लिए जल्‍द ही बाजार में आ जाएगी।”

वाकई कि किसी भी व्यक्ति के लिए अच्छी-खासी नौकरी छोड़ शिक्षक के पेशे को अपनाना अत्यन्त दुष्कर होता है। यह अत्यन्त दुर्लभ गुण और अपने ध्येय एवं उद्देश्य के प्रति समर्पण का ही परिणाम है और एम.के. झा में यह विशेषता भरपूर मात्रा में है। बिहार के हजारों छात्र इसका फायदा उठा रहे हैं और उठाते रहेंगे। उनकी ‘संपूर्ण गणित’ नामक पुस्तक बाजार में आ चुकी है। यह उनकी लगन और मेहनत का ही नतीजा है कि धुलाई 2019 में जारी एसएससी (जी डी) के फाइनल रिजल्ट में झा क्लोसेज के 30 छात्र चयनित हुए हैं।