डॉ. श्रवण कुमार

बिहार में ‘नियोनेटाल केयर के जनक’


डॉक्‍टर श्रवण को नवजात बच्‍चों से संबंधित समस्‍याओं में आधुनिक देखभाल प्रणाली (नियोनेटाल केयर) को बिहार में सबसे पहले लाने का श्रेय जाता है और इसलिए उन्‍हें राज्य में नियोनेटाल केयर का जनक माना जाता है। अपने संघर्ष भरे बचपन, पिता की बीमारी, खेती का भार आदि संभालते हुए उन्होंने डॉक्‍टरी की पढ़ाई पूरी की और आज उनका नाम बिहार के च‍िकित्‍सा जगत में आदर से लिया जाता है। उन्‍होंने पटना में एक इनक्‍यूबेटर की सहायता से राज्य के पहले नियोनेटाल आईसीयू ‘न्‍यू बॉर्न केयर सेंटर’ की स्‍थापना की थी और आज यह सेंटर अत्‍याधुनिक उपकरणों से लैस है जहां डॉक्‍टर श्रवण कुमार ने 800 ग्राम तक के बच्‍चे की जान बचाई है। नृत्‍य एवं नाटक के शौकीन डॉक्‍टर श्रवण अपनी पत्‍नी नीना मोटानी के साथ मिलकर रंगमंच पर अभिनय भी करते हैं और इसके जरिये लोगों में स्‍वास्‍थ्‍य जागरूकता फैलाने का काम करते हैं

बिहार के पश्चिम चंपारण के बेतिया में एक किसान परिवार में 1954 की 7 जनवरी को जन्‍मे श्रवण कुमार आरंभ से ही मेधावी छात्र थे और उनका लक्ष्‍य भी स्‍पष्‍ट था। उन्‍हें डॉक्‍टर ही बनना था, हालांकि पढ़ाई के दौरान ही उनके किसान पिता को गंभीर हार्ट अटैक से जूझना पड़ा और इससे श्रवण कुमार की योजनाओं को तगड़ा झटका लगा। उन्‍हें पढ़ाई के साथ-साथ घर की जिम्‍मेदारियां भी उठानी पड़ीं। पिता की बीमारी के कारण उन्‍हें खेती संभालनी पड़ी। उनके खेत उनके घर से 10 किलोमीटर दूर थे। डॉक्‍टर बनना उनका सपना था मगर परिस्थितियों ने उन्‍हें ऐसा घेर रखा था कि वे अपनी पढ़ाई पर ध्‍यान नहीं दे पा रहे थे। इसके बावजूद उन्‍होंने दिन-रात मेहनत की और अंतत: उनका चयन एमबीबीएस की पढ़ाई के लिए दरभंगा मेडिकल कॉलेज में हो गया। घर की स्थिति को देखते हुए उनके पिता शुरुआत में उन्‍हें डॉक्‍टरी की पढ़ाई करने देने के पक्ष में नहीं थे मगर परिवार के दूसरे सदस्‍यों के समझाने पर वे मान गए और इस तरह श्रवण कुमार ने एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी की।
इसके बाद उनका चयन कोलकाता के प्रसिद्ध रामकृष्‍ण सेवा प्रतिष्‍ठान में हो गया, उन्‍होंने यहां से सफलता पूर्वक डी.सी.एस. पूरा किया। यहां अपने प्रशिक्षण के दौरान वे ये देखकर आश्‍चर्यचकित रह गए कि नवजात बच्‍चों की देखभाल के लिए वहां कितना बेहतर प्रबंधन किया जाता है और समयपूर्व पैदा होने वाले कई बच्‍चों की जान यहां बहुत ही आसानी से बचा ली जाती है पर बिहार में ऐसी कोई सुविधा नहीं थी।

यह देखने के बाद उन्‍होंने नवजात बच्‍चों की देखभाल से संबंधित अपने शिक्षण-प्रशिक्षण को और भी गंभीरता से पूरा करना शुरू कर दिया, हालांकि कोलकाता से लौटने के बाद भी उन्‍हें पूरी संतुष्टि नहीं मिल पा रही थी इसलिए उन्‍होंने पटना मेडिकल कॉलेज एवं अस्‍पताल से शिशु रोग में एमडी की पढ़ाई की मगर उन्‍हें यह देखकर निराशा हुई कि पीएमसीएच में भी नवजात बच्‍चों की देखभाल की उचित व्‍यवस्‍था नहीं थी। ऐसे में डॉक्‍टर श्रवण दिल्‍ली के लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज पहुंचे और वहां उन्‍होंने नवजात बच्‍चों की देखभाल के अपने अनुभव को और भी समृद्ध किया। यहां उन्‍होंने नवजात बच्‍चों में पीलिया से संबंधित गंभीर स्थिति में ब्‍लड ट्रांसफ्यूजन के जरिये बच्‍चे की जान बचाने की तकनीक सीखी। बिहार में इस तकनीक का इस्‍तेमाल कोई नहीं करता था। उन्‍होंने सोच लिया कि वे पटना में बिहार का पहला नियोनेटाल आईसीयू स्‍थापित करेंगे।

घर लौटने के बाद डॉक्‍टर श्रवण ने अपने पिता को बताया कि वे पटना में नियोनेटॉलॉजी की शुरुआत करने जा रहे हैं तो उनके पिता ने पूछा कि आखिर ये होता क्‍या है। डॉक्‍टर श्रवण कुमार ने उन्‍हें बताया कि यह च‍िकित्‍सा शास्‍त्र की वह शाखा होती है जिसमें सिर्फ एक महीने से कम उम्र के बच्‍चों का इलाज किया जाता है। उनके पिता ने पूछा कि तुम शिशुरोग विशेषज्ञ हो जिसमें 12 वर्ष तक के बच्‍चों का इलाज किया जाता है। अब तुम कह रहे हो कि तुम सिर्फ एक महीने तक के बच्‍चों का इलाज करोगे, अगर तुम बाकी 11 साल 11 महीने के बच्‍चों को छोड़ दोगे तो ऐसे में तुम्‍हारा घर कैसे चलेगा? तब डॉक्‍टर श्रवण कुमार ने बताया कि बिहार में अभी तक गंभीर स्‍थिति वाले नवजात बच्‍चों की जान बचाने के लिए नियोनेटाल आईसीयू नहीं है। ऐसे में यहां इस क्षेत्र में विकास करने के लिए बहुत अच्‍छा अवसर है। इसके बाद डॉक्‍टर श्रवण ने पटना में एक कमरा किराए पर लेकर और सिर्फ एक इनक्‍यूबेटर की सहायता से बिहार के पहले नियोनेटाल आईसीयू की स्‍थापना की जिसका नाम उन्‍होंने ‘न्‍यू बॉर्न केयर सेंटर’ रखा तब पटना के डॉक्‍टरों को उम्‍मीद नहीं थी कि इस सेंटर में नवजात बच्‍चों की जिंदगी बचाई जा सकेगी मगर लगातार सफलताएं हासिल कर वे नियोनेटॉलॉजी के क्षेत्र में शिखर पर पहुंच गए। उनकी पत्‍नी नीना मोटानी ने हर कदम पर उनका साथ दिया।

वैसे आरंभ में डॉक्‍टर श्रवण को कई परेशानियों का सामना करना पड़ा, चूंकि यह पटना में अपनी तरह का पहला केंद्र था इसलिए इसके लिए जरूरी प्रशिक्षित स्‍टाफ वहां उपलब्‍ध नहीं था। डॉक्‍टर श्रवण को तब खुद बच्‍चों की साफ-सफाई, उनके मल-मूत्र आदि को साफ करना पड़ता था पर इसके साथ ही उन्‍होंने उपलब्‍ध मेडिकल स्‍टाफ को अपनी जरूरत के हिसाब से प्रशिक्षण देना जारी रखा। उनकी मेहनत रंग लाई और वे खुद भी तब आश्‍चर्यचकित रह गए जब उनके केंद्र पर समय पूर्व पैदा हुए 800 ग्राम वजन तक के बच्‍चों को बचाया गया। ऐसा ही एक बच्‍चा उनके सहयोगी डॉक्‍टर पीपी गुप्‍ता का बेटा भी था जिसकी जान तब इस केंद्र में बची थी। यह बच्‍चा आज पूरी तरह स्‍वस्‍थ जीवन जी रहा है और इंजीनियरिंग करने के बाद बिजनेस मैनेजमेंट की पढ़ाई कर रहा है। यह वो दौर था जब एक किलो से कम वजन के बच्‍चों का बचना असंभव माना जाता था।

उन्होंने आने वाले समय में शिशु रोग विशेषज्ञों के बीच नवजात शिशु की देखभाल के सिद्धांत को फैलाया और चूंकि उन्‍होंने बिहार में सबसे पहले यह काम आरंभ किया था इसलिए राष्‍ट्रीय स्‍तर पर आयोजित नियोनेटॉलॉजी फोरम में उन्‍हें बिहार में नियोनेटॉलॉजी का पिता कहकर उनके काम की सराहना की गई। इसके अलावा उन्‍हें नियोनेटॉलॉजी के क्षेत्र में फेलोशिप भी प्रदान की गई, वैैसे किसी भी इलाके में नियोनेटाल आईसीयू का खर्च बेहद अधिक होता है, ऐसे में इस खर्च को कम करने और इसे घर आधारित बनाने के लिए डॉक्‍टर श्रवण ने बिहार में सबसे पहले ‘कंगारू मदर केयर’ की शुरुआत की, इसके तहत मांओं को अपने समयपूर्व जन्‍मे नवजात बच्‍चों को अपने स्‍तनों के बीच रखना और वहीं से दूध पिलाना सिखाया जाता है ताकि बच्‍चे को मां की त्‍वचा से गर्मी और उचित देखभाल मिल सके। इस केएमसी केयर को अब आईसीयू केयर से भी बेहतर माना जाता है। देश के सामाजिक-आर्थिक रूप से पिछड़े राज्‍यों में इस तकनीक को नियोनेटॉलॉजी के क्षेत्र में एक क्रांति माना जाता है। डॉक्‍टर श्रवण कुमार ने माताओं और डॉक्‍टरों को प्रशिक्षित करने के लिए कंगारू मदर केयर से संबंधित वीडियो तैयार किए हैं और इन्हें सोशल साइट यू-ट्‍यूब पर उपलब्‍ध कराया गया है, इन वीडियो को एनबीसीसी पटना के जरिये सर्च किया जा सकता है, यहां बीमार और स्‍वस्‍थ बच्‍चों की देखभाल से संबंधित 20 वीडियो अपलोडेड हैं।

डॉक्‍टर श्रवण समाज सेवा में भी बहुत सक्रिय रहते हैं। नई पहल की खूंटी के तहत वे अपने परिवार और मित्रों के साथ मिलकर गरीबों में कपड़े बांटते हैं, और रोटरी तथा अन्‍य सामाजिक कार्यों में भी सक्रिय योगदान देते हैं। रोटरी में ऐसी ही एक परियोजना है गिफ्ट ऑफ लाइफ जिसके तहत हर साल ऐसे 100 बच्‍चों का नि:शुल्‍क ऑपरेशन किया जाता है जिनके दिल में छेद होता है। इसके अलावा डॉक्‍टर श्रवण कुमार मां वैष्‍णाे देवी सेवा समिति (एनजीओ) के साथ मिलकर 51 जरूरतमंद युगलों का विवाह भी करवाते हैं। डॉक्‍टर श्रवण नृत्‍य एवं नाटक में भी दक्ष हैं, अपनी पत्‍नी श्रीमती नीना मोटानी के साथ मिलकर वे पिछले कुछ वर्षों से बड़े रंगमंचों पर प्रस्‍तुतियां दे रहे हैं। यू-ट्‍यूब चैनल पर उनके हजारों प्रशंसक हैं, मंच पर उनकी प्रस्‍तुतियों में सिर्फ मनोरंजन के लिए नहीं बल्कि कैंसर और ऑटिज्‍म जैसे गंभीर स्‍वास्‍थ्‍य समस्‍याओं पर जागरूकता फैलाने वाले कार्यक्रम भी होते हैं। डॉक्‍टर श्रवण हमेशा कहते हैं: तुम अपना काम बेहतरीन तरीके से करो और बाकी सबकुछ ईश्‍वर पर छोड़ दो।