डॉ. नरेंद्र प्रसाद

साइकिल से पद्मश्री तक का सफर

डॉक्‍टर नरेंद्र प्रसाद बिहार के ख्‍यातिप्राप्‍त सर्जन हैं। साठ के दशक में साइकिल की सवारी कर दूर-दराज के गरीब मरीजों का इलाज करने वाले डॉ. प्रसाद को 2004 में उनकी सेवाओं के लिए देश में डॉक्‍टरों को दिया जाने वाला सबसे बड़ा सम्‍मान डॉक्‍टर बी.सी. राय अवार्ड दिया गया तो देश में नागरिक क्षेत्र में दिए जाने वाले चौथे सबसे बड़े सम्‍मान पद्मश्री से 2015 में सम्‍मानित किया गया है। कभी पारिवारिक जिम्‍मेदारियों के कारण उनके दादा को मेडिकल की पढ़ाई बीच में छोड़नी पड़ी थी। इस बात को ध्यान में रख डॉ. नरेंद्र के पिता मेदनी प्रसाद ने अपने पुत्र को उसके दादा का सपना पूरा करने का संकल्प दिलाया

पटना में डॉ. नरेंद्र प्रसाद के द्वारा स्‍थापित आलोक नर्सिंग होम एवं अनुपमा अस्‍पताल अत्‍याधुनिक सुविधाओं से लैस एक प्रसिद्ध चिकित्‍सा केंद्र है जिसे अब उनके काबिल सर्जन पुत्र डॉक्‍टर आलोक अभिजीत संभाल रहे हैं।

बिहारशरीफ से चार किलोमीटर दूर तिउरी गांव में आजादी से 14 साल पहले 1933 के 8 सितंबर को जन्‍मे नरेंद्र प्रसाद अपने पिता मेदनी प्रसाद और माता उमा देवी की सात संतानों में दूसरे नंबर पर थे उनके दादा राजकुमार लाल गांव के जमींदारों में शुमार होते थे, वे डॉक्‍टर बनना चाहते थे और इसकी पढ़ाई के लिए उन्‍होंने पटना के टेम्‍पल मेडिकल स्‍कूल (वर्तमान में पटना मेडिकल कॉलेज हॉ‌िस्‍पटल, पीएमसीएच) में दाखिला लिया था। हालांकि वे मेडिकल की पढ़ाई पूरी नहीं कर पाए और जमींदारी के कामों के बोझ के कारण पढ़ाई अधूरी छोड़ दी, पर जैसे-जैसे परिवार बड़ा होता गया, जमींदारी छोटी होती गई। स्थिति यह हो गई कि राजकुमार लाल के बड़े बेटे मेदनी प्रसाद को अपना परिवार चलाने के लिए पहले कोर्ट में क्‍लर्क की नौकरी करनी पड़ी जहां तरक्‍की पाकर वे मुहर्रिर और फि‍र पेशकार के पद तक पहुंचे। बाद में उन्‍होंने यह नौकरी छोड़ दी और सरकारी शिक्षक बन गए। उन्‍होंने अपने सभी बच्‍चों को अच्‍छी शिक्षा दिलाई मगर उनमें भी नरेंद्र प्रसाद बेहद मेधावी थे। मेदनी प्रसाद चाहते थे कि नरेंद्र मेडिकल की पढ़ाई करे और उनके पिता का जो सपना अधूरा रह गया है, उसे उनका यह बेटा पूरा करे।  

नरेंद्र ने भी इस सपने को अपना सपना बना लिया। उनकी सातवीं तक की शिक्षा औंदा मिडल स्‍कूल में हुई, आठवीं से आगे की पढ़ाई उन्‍होंने राजा राममोहन राय सेमिनरी स्‍कूल पटना से की, स्‍कूल से कॉलेज तक की उनकी पूरी पढ़ाई फुल फ्री शिप के तहत हुई। 1956 में उन्‍होंने पटना मेडिकल कॉलेज अस्‍पताल से एमबीबीएस की डिग्री हासिल कर दादा का सपना पूरा किया। हालांकि यह साल उनके लिए एक बुरी खबर लेकर भी आया जब उनके पिता का किडनी की बीमारी के कारण निधन हो गया।

एमबीबीएस करने के एक साल बाद उनका चयन बिहार स्‍वास्‍थ्‍य सेवा संवर्ग में हुआ और 1958 में उन्‍हें सहरसा जिले के थुम्‍हा स्‍वास्‍थ्‍य केंद्र पर बतौर सिविल असिस्‍टेंट सर्जन न‍ियुक्‍त किया गया। यहां वे 1960 तक कार्यरत रहे। वे एम.एस. और एफआरसीएस करना चाहते थे मगर आर्थिक हालत गड़बड़ थी, यह देखकर उन्‍होंने निजी प्रैक्टिस शुरू की। थुम्‍हा केंद्र से जो समय बचता था, उसमें वे साइकिल से मीलों दूर तक जाकर मरीजों का इलाज करते थे। इस दौरान उन्‍होंने पीएमसीएच से एम.एस. की पढ़ाई भी आरंभ कर दी थी। 1959 में उन्‍हें एम.एस. की डिग्री मिली, इसके बाद अपने सपने को पूरा करने वे 1961 में पानी के जहाज से इंग्‍लैंड गए और एक साल बाद 1962 में रॉयल कॉलेज ऑफ सर्जन, इंग्‍लैंड से उन्‍होंने एफआरसीएस किया।

इस दौरान पैसे की कमी के कारण उन्‍होंने मेनचेस्‍टर के बरी जनरल अस्‍पताल में नौकरी की। उन्‍होंने कुछ दिन क्‍वींस होम्‍योपैथी अस्‍पताल, लंदन में सर्जिकल रजिस्‍ट्रार का पद भी संभाला मगर आखिरकार 30 सितंबर, 1962 को वे मातृभूमि लौट आए। यहां आकर उन्‍होंने पीएमसीएच में नौकरी के साथ-साथ निजी प्रैक्‍ट‍िस आरंभ की, पटना के मखनियां कुआं इलाके में 40 रुपये मासिक पर एक कमरा लेकर उन्‍होंने अपना क्लिनिक शुरू किया। तब बिजली की खराब हालत के कारण उन्‍होंने टॉर्च की रोशनी में कई बड़े ऑपरेशन किए। 1962 से लेकर 1992 तक उन्‍होंने पीएमसीएच में रेजिडेंट सर्जिकल ऑफिसर के पद से नौकरी की शुरुआत कर सर्जरी विभाग के अध्‍यक्ष पद तक को सुशोभित किया।

डॉक्‍टर नरेंद्र प्रसाद के जीवन का दूसरा अध्‍याय 1963 में शुरू हुआ ज‍ब लीला प्रसाद से उनका विवाह संपन्‍न हुआ। पत्‍नी इंटर पास थीं और डॉक्‍टर नरेंद्र ने उन्‍हें आगे पढ़ने के लिए प्रेरित किया। लीला जी ने मगध महिला कॉलेज से बीए ऑनर्स किया। इसी बीच 15 जून, 1964 को इस दंपति के घर बेटे आलोक अभिजीत का जन्‍म हुआ और इसके तीन वर्ष बाद 18 जून, 1967 को बेटी अनुपमा का जन्‍म हुआ। लीला प्रसाद ने पारिवारिक जिम्‍मेदारियों को निभाते हुए एमए की पढ़ाई पूरी की और इसके बाद अरविंद महिला कॉलेज में इतिहास की लेक्‍चरर बन गईं। बाद में उन्‍होंने इतिहास में ही डॉक्‍टरेट की उपाधि भी ली, इस बीच परिवार की आर्थिक हालत सुधरने लगी तो खजांची रोड में जमीन खरीदकर उन्‍होंने निजी प्रैक्टिस को मखनियां कुआं से यहीं शिफ्ट कर लिया। आज यहां ‌स्थित आलोक नर्सिंग होम और अनुपमा अस्‍पताल की पहचान देश के बड़े और अत्‍या‍धुनिक केंद्रों में होती है। उनकी पुत्री अनुपमा पेशे से वकील थीं मगर शादी के कुछ ही समय बाद पेप्‍ट‍िक अल्‍सर के कारण 1996 में उनकी असामयिक मौत हो गई। इससे लीला जी पूरी तरह टूट गईं। वे गुमसुम रहने लगीं और कई तरह की बीमारियों की चपेट में आ गईं। आखिरकार 2009 में लीला प्रसाद ने इस नश्‍वर शरीर को त्‍याग दिया। पहले बेटी और फि‍र पत्‍नी के जाने से डॉ. प्रसाद टूट गए। इसके बावजूद उन्‍होंने हिम्‍मत नहीं हारी। च‍िकित्‍सा के पेशे में उनका नाम आसमान पर लिखा हुआ था। बिहार ही नहीं, सर्जरी के मामले में पूरी दुनिया में उनका नाम इज्‍जत से लिया जाता है। जाह‍िर है, जब इंसान की कामयाबी बढ़ती है तो उसकी जिम्‍मेदारियां भी उसी अनुपात में बढ़ती हैं और डॉ. नरेंद्र ने अपनी जिम्‍मेदारियों से मुंह मोड़ना नहीं सीखा, इसलिए पारिवारिक मोर्चे पर इतने झटके लगने के बावजूद वे अपनी पेशेगत और सामाजिक जिम्‍मेदारियों को बखूबी निभाते रहे। एक डॉक्‍टर के रूप में अपनी जिम्‍मेदारियों के निर्वहन के लिए उन्‍होंने दुनिया के कई देशों की यात्राएं की हैं और व्‍याख्‍यान दिए हैं।

उनके पुत्र आलोक अभिजीत भी एक डॉक्‍टर और काबिल सर्जन हैं एवं अब डॉक्‍टर नरेंद्र प्रसाद के अस्‍पताल का काम संभालते हैं। डॉक्‍टर आलोक की शादी रांची के प्रसिद्ध शिशु रोग विशेषज्ञ डॉक्‍टर रमेश की पुत्री स्‍मृति के साथ हुई है और दंपति को दो पुत्रियों और एक पुत्र के माता-पिता होने का सौभाग्‍य प्राप्‍त है। डॉक्‍टर प्रसाद का ज्‍यादातर समय अब पोते-पोतियों और अपने प्रोफेशन एवं समाजसेवा में ही बीतता है। डॉक्‍टर प्रसाद जेपी से प्रभावित रहे और जेपी विचार मंच के अध्‍यक्ष का काम भी संभाला। उनके प्रयासों और तत्‍कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के अनुमोदन से लोकसभा में जेपी की 18 फीट ऊंची कांस्‍य प्रतिमा की स्‍थापना हुई थी। समाजसेवा को लेकर वे कितने प्रतिबद्ध हैं, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि अपने गांव की जमीन उन्‍होंने समाज के नाम समर्पित कर दी। गांव की अपनी 5 एकड़ जमीन उन्‍होंने बिहार के राज्‍यपाल के नाम रजिस्‍ट्री कर दी और उस जमीन पर राज्‍य सरकार की अनुमति से एक हाईस्‍कूल का निर्माण करवाया है। इस स्‍कूल का नाम उनके पिता और माता के नाम पर मेदनी-उमा उच्‍च विद्यालय रखा गया है। डॉक्‍टर प्रसाद के भाइयों ने भी अपनी जमीन राज्‍य सरकार को दी है जिसपर सरकार की ओर से मध्‍य व‍िद्यालय चलाया जा रहा है। गांव के विकास के लिए उन्‍होंने और भी कई काम कराए हैं। उन्होंने एक स्‍वावलंबी सहकारी समिति का गठन कराया है जिसका नेतृत्‍व उनके पुत्र डॉक्‍टर आलोक करते हैं। गांव के सर्वांगीण विकास और खासकर बच्‍चों के कॅरिअर को लेकर डॉक्‍टर साहब बहुत ही सजग रहते हैं।

डॉक्‍टर नरेंद्र इंडियन मेडिकल एसोसिएशन से भी जुड़े हुए हैं। 1966 से शुरू हुआ यह जुड़ाव अबतक अनवरत चल रहा है। 1966 से 1997 तक वे आईएमए बिहार के अध्‍यक्ष रहे। 1990 से वे राष्‍ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्‍य हैं। तो एसोसिएशन ऑफ सर्जन्‍स ऑफ इंडिया के भी 1990 से सदस्‍य हैं, इसके अलावा भी अनगिनत संस्‍थाओं से जुड़े रहे हैं। 1997 से 1999 तक वे नेशनल मेडिकोज ऑर्गनाइजेशन के राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष रहे और उसके बाद से अब तक इस संस्‍था के संरक्षक हैं। उन्होंने ‘मेरा जीवन संघर्ष और सेवा’ नामक अपनी आत्मकथा लिखी है जो काफी प्रसिद्ध हुई, डॉक्‍टर नरेंद्र प्रसाद आरएसएस के स्‍वयंसेवक हैं मगर शाखाओं में कम जाते हैं। इसके अलावा वे भारतीय जनता पार्टी (बिहार प्रदेश) के च‍िकित्‍सा मंच के अध्‍यक्ष रहे हैं।