डॉ. (कैप्‍टन) दिलीप कुमार सिन्‍हा

डॉ. (कैप्‍टन) दिलीप कुमार सिन्‍हा

डॉक्‍टर (कैप्‍टन) दिलीप कुमार सिन्‍हा बिहार में ऑर्थोपेडिक सर्जरी की दुनिया का जाना- माना नाम हैं। 73 साल के डॉक्‍टर सिन्‍हा 1972 से स्‍पाइनल कॉर्ड इंजुरी (एससीआई) का इलाज कर रहे हैं और पटना मेडिकल कॉलेज एवं अस्‍पताल के ऑर्थोपेडिक विभाग से रिटायर हुए हैं। एससीआई रीढ़ के हड्डी की सबसे खतरनाक चोट है, जिससे कोई भी ग्रसित हो सकता है

इससे चोट के नीचे वाले हिस्से की न केवल हाथ और पैर का शक्ति और महसूस करऩे का संवेदना खत्म होती है, बल्कि मल या मूत्र उत्सर्जन पर नियंत्रण भी समाप्त हो जाता है। हमारे देश में हर साल रीढ़ की हड्डी में चोट से पीड़ितों की संख्या, कम से कम 20 हजार नए रोगियों की दर से बढ़ रही है। एससीआई को लेकर लोगों में जागरूकता फैलाने में जुटे डॉक्‍टर दिलीप सिन्‍हा एससीआई मरीजों की देखरेख से जुड़े ‘पटना मॉडल’ के जनक हैं। इस मॉडल को विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन ने दुनिया के विकासशील देशों के लिए कोर मॉडल के रूप में मान्‍यता दी है।

देश भर में एससीआई का इलाज करने वाले पूरे देश में गिने चुने अस्पताल हैं मगर पटना के होप अस्‍पताल का इनमें अपना अलग स्‍थान है। डॉक्‍टर सिन्‍हा का यह ड्रीम प्रोजेक्‍ट है जो मरीजों की जेब पर भारी पड़े बिना उन्‍हें स्‍वास्‍थ्‍य का वरदान दे रहा है। यह देश का एससीआई इलाज का इकलौता अस्‍पताल है जो निजी तौर पर चलाया जा रहा है। अन्‍य सभी अस्‍पताल या तो कॉरपोरेट घरानों या फिर किसी न किसी ट्रस्‍ट द्वारा संचालित हैं। एससीआई के क्षेत्र में उल्‍लेखनीय कार्य करने के लिए उन्हें इंडियन स्पाइनल इंजरी सेंटर, नई दिल्ली में एक अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी के दौरान 2015 में लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 2018 में आउटलुक पत्रिका ने उन्‍हें ‘आइकन्‍स ऑफ बिहार’ अवार्ड से सम्‍मानित किया।

तीन हजार साल ईसा पूर्व के सबसे पुराने लिखित मेडिकल रिकॉर्ड, मिस्र के एडविन स्मिथ पेपिरस में, एससीआई को ‘लाइलाज बीमारी’ के रूप में घोषित किया गया था, क्योंकि इसके मरीज न तो ठीक हो पाते हैं और न ही लंबे समय तक जीवित रह पाते हैं। प्रोफेसर सर लुडविग ‘पोप्पा’ गट्टमैन ने दूसरे विश्व युद्ध की शुरुआत से ठीक पहले नाजी जर्मनी से भाग कर इंग्‍लैंड मे शरण ली थी। गट्टमैन ने पहली बार ये साबित किया कि इन रोगियों को भी जीने का अधिकार है और समाज से उन्हें जोड़ने की आवश्यकता है, ताकि चोट के बाद वे मुकम्मल जीवन जी सकें। इन रोगियों के प्रति उनके समर्पण के कारण उन्हें ‘पोप्‍पा’ कहा जाता था, जो दो शब्दों पोप और पापा का एक संयोजन है।

भारत में एससीआई के उपचार का विकास भी विश्वास और बदलाव की कहानी है। डॉ. मैरी वर्गीज ने सीएमसी वेल्लोर में रीढ़ की हड्डी के रोगियों के लिए पहली पुनर्वास इकाई स्थापित की थी। सबसे बड़ी बात यह कि डॉ. वर्गीज दुर्घटना के कारण खुद कमर से नीचे लकवाग्रस्त थीं। ऐसी ही कहानी है मेजर एच.पी.एस. अहलूवालिया की, जिन्होंने नई दिल्ली के वसंत कुंज में भारतीय स्पाइनल इंजरी सेंटर की शुरुआत की। मेजर अहलूवालिया 29 मई, 1965 को माउंट एवरेस्ट पर चढ़ने वाले पहले सेना अधिकारी थे। सितंबर 1965 में, जब भारत-पाकिस्तान युद्ध शुरू हुआ, तो उन्हें युद्ध के लिए बुलाया लिया गया था। उनकी यूनिट लाहौर पहुंच गई। जब उनकी यूनिट ताशकंद संधि के तहत लाहौर से लौट रही थी, तो मेजर अहलूवालिया दुश्मन के स्नाइपर की गोलियों की चपेट में आ गए, जिससे वह गर्दन के नीचे पूरी तरह से लकवाग्रस्त हो गए।

लंदन के स्टोक मैंडेविले अस्पताल में अपने इलाज के दौरान, उन्होंने भारत में एक ऐसा ही अस्पताल स्थापित करने का निर्णय लिया। लंदन से लौटने के बाद उन्होंने अपने दोस्तों की मदद से एक ट्रस्ट की स्थापना की। 1993 में इस ट्रस्ट के बैनर तले इंडियन स्पाइनल इंजरी सेंटर शुरू किया गया और अहलूवालिया को चेयरमैन नामित किया गया। आज यह विश्व प्रसिद्ध सेंटर है। बात करें डॉ. दिलीप कुमार सिन्हा की तो उन्‍होंने रांची के प्रसिद्ध राजेंद्र मेडिकल कॉलेज से एम.बी.बी.एस की पढ़ाई पूरी की और 1971 में हुई भारत-पाकिस्तान की लड़ाई के दौरान भारतीय सेना के मेडिकल कोर में कैप्टेन के पद पर योगदाऩ किया।

कुछ ही समय बाद उनकी 2 माउंटेन डिवीज़न युनिट की तैनाती तत्कालीन ईस्ट पाकिस्ताऩ (अब बांग्लादेश) में कर दी गई। युद्ध की समाप्ति पर सेना द्वारा डॉ.सिन्हा का ट्रांसफर पुणे के किर्की स्थित आर्मी पैराप्लेजिक रिहेब सेन्टर में कर दिया गया जो स्‍पाइनल इंज्युरी के मरीज़ों के लिए सेना का पहला अस्पताल था।

आर्मी में रहकर मरीज़ों की सेवा के दौरान डॉ.सिन्हा इस अस्पताल के संस्थापक एयर मार्शल चहल के संपर्क में आए और चहल ने डॉ.सिन्हा को स्पाइनल कॉड इंज्युरी से संबंधित मरीजों के इलाज की पूरी ज़िम्मेवारी सौप दी। इन लकवा ग्रस्त मरीजों का इलाज़ करते-करते डॉ. सिन्हा का उनके प्रति इनका लगाव बढ़ता गया और जिसने उनके भविष्य जीवन की दिशा तय कर दी।

भारतीय  सेना की नौकरी के बाद डॉ. दिलीप अपने गृहराज्‍य बिहार लौट गए और उन्‍होंने ऑर्थोपेडिक्स में एम.एस और पी.एच.डी के अलावा प्लास्टिक सर्जरी में एम.सी.एच की डिग्री भी हासिल की। इतनी विशेषज्ञता हासिल करने के साथ वे पटना मेडिकल कॉलेज में कार्यरत रहे। यहीं पर डॉ.दिलीप कुमार सिन्हा स्पाइनल कॉड इंज्युरी से पीड़ित मरीज़ों के सीधे संपर्क में आए और रोगियों का इलाज शुरू किया।

डॉ.सिन्हा कहते हैं कि तब पी.एम.सी.एच में गरीब मरीजों की संख्या काफी अधिक थी मगर कर्मचारियों और संसाधनों की भारी कमी थी। ऐसे में इलाज के दौरान मरीजों के मूत्रमार्ग में संक्रमण के अलावा अन्य कई प्रकार के संक्रमण का भी ख़तरा रहता था। इस कारण मृत्युदर अपने चरम पर थी। इसे देखते हुए डॉ.दिलीप सिन्हा ने अपने सहयोगियों और पी.जी. के कई छात्रों के सहयोग से एस.सी.आई मरीज़ों को ध्यान में रखकर ‘पटना मॉडल’ की शुरुआत की ।

डॉ.(कैप्टेन) दिलीप कुमार सिन्हा कहते हैं कि पी.एम.सी.एच में प्रशिक्षित कर्मचारियों की कमी को देखते हुए हमने ‘पटना मॉडल’ के तहत समस्या के समाधान की ठानी और प्रयोग के तौरपर मरीज के परिजनों को बुनियादी प्रशिक्षण देना आरंभ किया ताकि जरूरत पड़ने पर वे अपने और दूसरे मरीजों की भी देखभाल कर सकें और प्रशिक्षित नर्स की कमी की भरपाई हो सके। इस क्रम में परिजनों को यह भी सिखाया गया ‌िक यदि किसी दुर्घटना में किसी व्यक्ति की रीढ़ में गहरी चोट लगी हो तो उसे कैसे अस्पताल तक सुरक्षित पहुंचाया जा सकता है। साथ ही इलाज के उपरान्त अस्पताल से छुट्टी मिलने पर कैसे उसकी देखभाल की जानी चाहिए। यह प्रयोग उस समय बिलकुल नया था और पहले कभी किसी ने इस प्रकार का सफल प्रयोग नहीं किया था।
उस समय के कई डॉक्टरों को याद है कि कैसे दृढ़ इच्छाशक्ति वाले डॉ.  सिन्हा ने ‘पटना मॉडल’ की बुनियाद रखी और मानव संसाधन की समस्या का प्रभावी हल तलाशा। डॉ. सिन्हा ने अपने पीजी छात्र डॉ. अरुण कुमार को पटना माॅडल का थीसिस विषय देकर इस मॉडल की शुरुआत की। बाद में डॉ. सुदीप कुमार और डॉ. रवि खंडेलवाल ने इस मॉडल को और परिष्‍कृत किया। डॉ. (कैप्टन) सिन्हा कहते हैं, “संसाधनों की कमी से जूझने के लिए मैंने एक प्रयोग किया और ये कामयाब रहा।” ‘पटना मॉडल’ के सफल प्रयोग के कारण डॉक्‍टर सिन्‍हा को पूरी दुनिया से सराहना मिल चुकी है। डॉ.सिन्हा के इस मॉडल को पूरी दुनिया में सराहा गया और रेड क्रॉस सोसाइटी और डब्लू.एच.ओ द्वारा समय- समय पर डॉ.दिलीप सिन्हा को विश्व के कई देशों में संबंधित प्रशिक्षण के लिए आमंत्रित किया जाने लगा और इनकी ख्याति हिन्दुस्तान की सीमा पार कर गई। डॉ. सिन्हा को उनके पटना मॉडल के बारे में व्‍याख्‍यान देने के लिए लंदन के स्टोक मैंडविले अस्पताल, अमेरिका में बोस्टन, ऑस्ट्रेलिया में पर्थ, जापान में कोबे और बांग्लादेश, नेपाल, थाईलैंड, मलेशिया और वियतनाम जैसे देशों में आमंत्रित किया गया।

पीएमसीएच में नौकरी के दौरान ही डॉक्‍टर सिन्‍हा ने देखा कि स्‍पाइनल कॉड की चोट के सभी मरीजों का इलाज वहां नहीं हो पाता है। कई मरीजों को इसके इलाज के लिए बिहार से बाहर जाना पड़ता। गरीब मरीजों की आर्थिक हालत इसके कारण दयनीय हो जाती है क्‍योंकि स्‍पाइनल कॉड की चोट का इलाज बेहद महंगा साबित होता है। इसी को देखते हुए डॉक्‍टर सिन्‍हा ने पटना में होप अस्‍पताल की शुरुआत की जो कि पूरी तरह सिन्‍हा परिवार द्वारा संचालित निजी अस्‍पताल है। डॉ.दिलीप सिन्हा की पत्नी डॉ.कृष्णा सिन्हा खुद फीजियोलॉजी की प्रोफेसर हैं। उन्‍होंने बताया कि उनके पति और बच्‍चे लंबे समय से यह महसूस कर रहे थे कि बिहार में एक अच्‍छे एससीआई अस्‍पताल की जरूरत है जो कम खर्च में मरीजों का इलाज कर सके। इसे ध्यान में रखकर सिन्‍हा परिवार ने 1998 में पटना के मीठापुर में होप हॉस्पिटल की शुरुआत की।

डॉ.सिन्हा के पुत्र डॉ.कृष्णज गौरव अमेरिका के जॉन हॉपकिंस मेडिकल इंस्टिट्‍यूट में प्रसिद्ध हड्डी रोग विशेषज्ञ हैं। डॉ. दिलीप सिन्हा के दूसरे बेटे अर्नब सिन्हा भी हड्डी रोग विशेषज्ञ हैं और उनकी पत्नी रश्मि सिन्हा भी चिकित्‍सक हैं। अमेरिका में रहने वाले डॉ. कृष्णज गौरव की पत्नी डॉ. रूना पटेल का कहना है कि होप अस्पताल में एक मरीज के रूप में आए सुनील कुमार अस्पताल में सहकर्मी और प्रबंधक के रूप में काम कर रहे हैं। वह एससीआई रोगियों के लिए प्रेरणास्रोत हैं। डॉक्‍टर सिन्‍हा चिकित्‍सा के अलावा समाज के अन्‍य क्षेत्रों भी काफी सक्रिय हैं। उन्‍होंने और उनकी टीम ने 70 साल के अंतराल के बाद बिहार के पहले अंग्रेजी साप्ताहिक बिहार हेराल्ड का फि‍र से प्रकाशन शुरू कराया। उन्हें बिहार राज्य अल्पसंख्यक आयोग के उपाध्यक्ष के रूप में नामित किया जा चुका है और वे बिहार बांग्ला अकादमी के अध्यक्ष रह चुके हैं। वह अखिल भारतीय बांग्ला भाषा मंच के अध्यक्ष भी हैं। डॉक्‍टर सिन्‍हा रवींद्रनाथ ठाकुर पर हाल में प्रकाशित त्रिभाषी पुस्तक वॉक अलॉन्ग द टाइमलाइन विद टैगोर के सह-लेखक भी हैं। वर्तमान में, साधारण सा दिखने बाला यह आदमी, भारत के चिकित्सा जगत के किंबदन्ती पुरूष, भारत रत्न डॉ. बी. सी.राय के, पटऩा स्थित उनके जन्मस्थल और पैत्रृक निवास स्थल पर परिचालित, उऩकी मां श्रीमती अघोर देबी और पिता श्री प्रकाश राय के नाम से नामान्कित, गरीब बच्चों का बिद्यालय अघोर प्रकाश शिशु सदन के 180 साल पुराने परिसर को, टुट कर गिरने से बचाने के लिए प्रयासरत हैं।