डॉ. अनिल कुमार

औरों से अलग चलकर बनाई पहचान

हममें से कितने लोग ऐसे हैं जो कॅरिअर के रूप में चमकदार भविष्य को छोड़कर एक अनिश्चित राह पर चलने का हौसला करते हैं? निश्चित रूप से ऐसे लोगों की संख्या उंगलियों पर गिने जाने योग्य होती है। हालांकि यह भी सच है कि समाज में पहचान बनाने में ऐसे ही लोग कामयाब होते हैं जो कि कुछ अलग करने का हौसला रखते हैं। प्रस्तुत आलेख के नायक ऐसे ही व्यक्ति हैं जिनके पिता चाहते थे कि बेटा पढ़-लिखकर गांव का नाम रौशन करे और बेटे ने पिता को निराश नहीं किया। उसने न सिर्फ गांव और अपने राज्य का नाम रौशन किया बल्कि देश की बहुमूल्य धरोहर आयुर्वेद को जन-जन के बीच लोकप्रिय बनाने में पूरा जीवन लगा दिया। हम बात कर रहे हैं डॉक्टर अनिल कुमार की, जो देश में एचआईवी के बारे में शोध एवं इसके सफल इलाज के क्षेत्र में देश के चुनिंदा नामों में शामिल हैं। भगवती आयुर्वेद प्राइवेट लिमिटेड के चेयरमैन के रूप में मेडिसीन के क्षेत्र में उनकी यात्रा वाकई शानदार रही है।

बिहार के नालंदा जिले के सोहसराय में 1967 में जन्मे डॉक्टर अनिल कुमार की शुरुआती शिक्षा गांव के ही प्रयाग लाल साहू हाई स्कूल में हुई। उनके पिता सोहसराय स्थित बरारा ग्राम पंचायत के मुखिया और व्यापारी थे। उनकी इच्छा थी कि उनका बेटा अच्छी शिक्षा पाकर कुछ नया करे और गांव एवं परिवार का नाम रौशन करे। स्कूल की पढ़ाई के बाद अनिल कुमार ने इंटर और बीएससी करने के लिए बिहार शरीफ के किसान कॉलेज को चुना। अपने भविष्य को लेकर अनिल पहले से स्पष्ट थे इसलिए बीएससी करने के बाद कुछ भी सोचे बिना उन्होंने आयुर्वेद के क्षेत्र में काम करने का फैसला लिया और 1998 में आयुर्वेदिक चिकित्सक की डिग्री हासिल की।

दरअसल उन्होंने बहुत ही कम उम्र से यह देखा था कि लोगों को इलाज के लिए अपना घर-बार तक गिरवी रखना या बेचना पड़ता है और इसके बावजूद बीमारी फिर लौटकर आ सकती है। ऐसे में उन्होंने एलोपैथी के बजाय आयुर्वेद पर ध्यान केंद्रित किया। बुजुर्गों में पाचन और जोड़ों के दर्द जैसी बीमारियां तो बार-बार उभर आती हैं। इसी वजह से डॉक्टर अनिल ने इन बीमारियों के स्थाई समाधान के लिए आयुर्वेद पर अपना ध्यान केंद्रित किया। आयुर्वेद के अपने शुरुआती अध्ययन में उन्होंने पाया कि भारत की इस पारंपरिक चिकित्सा विधि में ढंग से कोई शोध ही नहीं हुआ है जबकि इसमें बीमारियों के टिकाऊ इलाज की अनंत संभावनाएं छिपी हैं। यही सोच कर जन साधारण की सेवा में प्रभावी आयुर्वेद के प्रयोग के लिए 2004 में उन्होंने भगवती आयुर्वेद की स्थापना की। आयुर्वेदिक विज्ञान में उनके अनुभव और गहरी अभिरुचि एवं विभिन्न औषधीय पौधों की जानकारी ने उन्हें उसी साल आयुर्वेदिक दवा निर्माण का लाइसेंस भी दिलवा दिया।

इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। उन्होंने राजगीर के निकट एक प्रयोगशाला स्थापित की। कफ क्योर, रूमागोल्ड कैप्सूल, डी क्योर टेबलेट, लिवरेक्स सीरप और लिटोन सीरप जैसी दवाओं के जरिये भगवती आयुर्वेद ने बाजार में कदम रखा। इन दवाओं को बाजार से बेहद सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली। लिवरेक्स जैसी दवा लंबी अवधि में प्रभावी इलाज मुहैया कराती है क्योंकि यह शरीर के संपूर्ण रासायनिक कंस्टीट्‍यूशन पर काम करती है और शरीर के तीन दोषों-वात, कफ और पित्त को संतुलित करती है।
डॉक्टर अनिल ने अपनी प्रैक्टिस के दौरान पाया कि उनकी कई दवाएं जैसे कि लिटोन, एनीमिया तथा अन्य संबंधित बीमारियों से जूझ रहे उनके मरीजों की रोग प्रतिरक्षा प्रणाली और ब्लड काउंट को बेहतर करने में बहुत ही कारगर हैं। इस तथ्य ने उन्हें आयुर्वेद के जरिये दुनिया के सबसे घातक रोगों में से एक एचआईवी का इलाज खोजने के लिए प्रेरित किया।

उन्होंने पाया कि एचआईवी के रोगी सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में बढ़ रहे हैं। मगर उन्हें जिस तरह का इलाज मिल रहा है, उसे देखकर उन्हें दुख हुआ। उन्होंने अक्सर कई एचआईवी रोगियों को दयनीय जीवन जीते देखा है। इन रोगियों में से ज्यादातर एलोपैथिक चिकित्सा पर निर्भर हैं, जो केवल कुछ समय के लिए वायरस को दबा रहा था और धीरे-धीरे उनकी प्रतिरक्षा क्षमता को कमजोर कर रहा था। इससे वे कई प्रकार के कम प्रतिरक्षा-संबंधी बीमारियों के से ग्रस्त हो गए। इसके बाद उन्होंने शरीर की प्रतिरक्षा-क्षमता को मजबूत बनाने वाले औषधीय पौधों को लेकर गंभीर आयुर्वेदिक शोध आरंभ कर दिया।

यह एक लंबी और कठिन यात्रा थी क्योंकि डॉक्टर अनिल को वित्तीय कठिनाइयों के साथ-साथ सामाजिक सोच की वजह से एचआईवी मरीजों के साथ काम करने को लेकर भी कठिनाइयों से जूझना पड़ा। मगर इस बीमारी के उन्मूलन और इसका स्थाई प्रभावी इलाज तलाशने की दृढ़ इच्छा शक्ति ने डॉक्टर अनिल को लगातार प्रेरित किया। आखिरकार उन्होंने भगवती कॉन्स्टॉप के रूप में एक पथप्रवर्तक समाधान तलाश ही लिया। आयुर्वेद की यह दवा न सिर्फ शरीर की रोग प्रतिरक्षा प्रणाली को पुनःस्थापित करती है बल्कि मानव शरीर से एचआईवी के सारे वायरस को मार देती है। इसके कारण एचआईवी का मरीज पूरी तरह सामान्य जीवन जी सकता है।

डॉक्टर कुमार का शोध न सिर्फ सफल हुआ बल्कि इससे उन्हें अपनी सर्वश्रेष्ठ क्षमता से मानवता की सेवा करने का संतोष भी मिला। आज भी डॉक्टर अनिल एचआईवी के हर मरीज की पूरी जांच और उनमें मौजूद सीडी4 और वायरल लोड की मौजूदगी पर निगाह रखते हैं। मरीजों का नियमित फॉलोअप किया जाता है और बीमारी में हर सुधार को दर्ज किया जाता है। डॉक्टर अनिल कई एचआईवी मरीजों का सफल इलाज कर सामान्य जीवन में वापस भेज चुके हैं।

डॉ. अनिल आयुर्वेद को उच्चतम मानकों पर लाने के लिए लगातार शोध कर रहे हैं। इससे उन्हें अपार विश्वास और सम्मान मिला है। उन्होंने कई मीडिया कार्यक्रमों में भाग लिया और अपने अनुभव साझा किए। स्वास्थ्य क्षेत्र में उनकी सफलताओं को देखते हुए मीडिया के द्वारा उन्हें बिहारी अस्मिता सम्मान और हेल्दी लीविंग अवार्ड प्रदान किया गया है।